Thursday, 18 June 2015

आडवाणी की चिन्ता

इन दिनों कमल दल का समय ठीक नहीं चल रहा है। उसकी मुश्किलें एक के बाद एक बढ़ती ही जा रही हैं। पार्टी अभी क्रिकेट की किरकिरी से सम्हली भी नहीं कि उसके वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने यह कहकर राजनीतिक गलियारे में सनसनी पैदा कर दी है कि मौजूदा दौर में लोकतंत्र को दबाने वाली ताकतें सक्रिय हो गयी हैंं जिसके कारण आपातकाल की वापसी की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि आडवाणी ने साफ कर दिया है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ नहीं है बावजूद इसके विपक्षी दलों ने आडवाणी के बयान को तूल देकर मोदी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान लागू किये गये आपातकाल में 19 महीने तक जेल में बंद रहने वाले आडवाणी ने कहा कि मैं नहीं सोचता कि 1975 -1977 से ऐसा कुछ किया गया हो जिससे यह आश्वासन मिले कि नागरिक अधिकारों को दोबारा निलम्बित नहीं किया जायेगा या उनका दमन नहीं किया जायेगा। हां, ऐसा आसानी से नहीं किया जा सकता लेकिन मैं यह नहीं कह सकता है कि ऐसा दोबारा नहीं हो सकता है। मैं यह नहीं कहता कि राजनीतिक नेतृत्व परिपक्व नहीं है लेकिन इसकी कमजोरी की वजह से हमें इस पर भरोसा नहीं है। 25 जून,1975 को लागू किये गये आपातकाल के 40 वर्ष पूरे होने के पहले आडवाणी ने अपने साक्षात्कार में जो कहा उसके निहितार्थ हैं। आडवाणी की भारतीय लोकतंत्र को लेकर जताई गई चिन्ता से दिल्ली सरकार को न केवल बल मिला है बल्कि भाजपा पर हमला बोलने का एक अवसर भी। केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच चल रही नूरा-कुश्ती का पटाक्षेप भी नहीं हुआ था कि कमल दल को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की  मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की चालबाज-भगोड़े ललित मोदी की सन्निकटता के चलते असहज हालातों का सामना करना पड़ रहा है। मोदी की स्थिति भी सांप-छछूंदर सी हो गई है। उनकी लगातार चुप्पी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है। भारतीय लोकतंत्र फिलवक्त जिस राह पर चल रहा है, उसे देखते हुए आडवाणी की चिन्ता जायज भी है। दिल्ली के मामले में मोदी सरकार ने यदि बड़े भाई का फर्ज निभाया होता तो शायद अरविन्द केजरीवाल को भाजपा पर तंज कसने का मौका नहीं मिलता। सिर्फ आम आदमी पार्टी ही नहीं कांग्रेस और दीगर दल भी प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली से असहज महसूस कर रहे हैं। आडवाणी ने लोकतंत्र को लेकर जो चिन्ता जाहिर की है, उसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों को भाजपा पर तंज कसने की बजाय आडवाणी की चिन्ता और नसीहत पर गम्भीरता से मनन करने की जरूरत है। यह बात सही है कि मोदी सरकार सबका साथ, सबका विकास मामले में आशानुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाई है, पर उसने कुछ अच्छे प्रयास जरूर किये हैं।

काली करतूतों की क्रिकेट

‘काजल की कोठरी में कितनोें सयानों जाये, एक लीक लागिहै पै लागिहै।’ जी हां भारत में क्रिकेट काजल की कोठरी ही है, इसके सम्पर्क में जो आयेगा, वह दागी कहलायेगा। क्रिकेट ने भारत को पहचान दी तो उसके मुरीदों ने भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड को दुनिया की सबसे समृद्ध खेल संस्था बनाने का विलक्षण कार्य किया। जहां पैसा होगा वहां रंजोगम तो होना ही है। भारत ने इण्डियन प्रीमियर लीग के बहाने जहां दुनिया भर में अपने मुरीद पैदा किये वहीं हर क्रिकेटर की इस मंच पर खेलने की ख्वाहिश इसे विशेष दर्जा प्रदान करती है। आईपीएल के आठ संस्करणों के संस्मरण बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। इस आयोजन से जुड़ी तमाम तरह की विसंगतियों ने क्रिकेटप्रेमियों को खासा निराश किया है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया की ललित मोदी से सन्निकटता को लेकर जो हायतौबा मची है उसे हम पारिवारिक दोस्ती या सामान्य शिष्टाचार कहें तो ज्यादा उचित होगा। सच्चाई तो यह है कि भारतीय क्रिकेट के महासागर में कमोबेश हर राजनीतिज्ञ ने किसी न किसी रूप में गोता जरूर लगाया है।
अनैतिक परम्पराओं, महत्वाकांक्षाओं, राजनीतिक जोड़-तोड़ और आनन-फानन में धन जुटाने की लालसा से क्रिकेट तो जरूर बदनाम हुई लेकिन राजनीतिज्ञों का इससे लगाव कम होने की बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि प्रधानमंत्री मोदी सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे को लेकर आखिर चुप क्यों हैं? इसकी वजह भी मोदी का क्रिकेट से जुड़ाव ही है। प्रधानमंत्री बनने से पूर्व मोदी भी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। अब यह दायित्व भाजपा के राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह के पास है। आज जिस ललित मोदी को लेकर राजनीति हो रही है कालांतर में मुल्क के सैकड़ों राजनीतिज्ञ उनसे दोस्ती को अपना सौभाग्य समझते थे। मोदी ही हैं जिन्होंने इण्डियन प्रीमियर लीग के बहाने बीसीसीआई को धन्नासेठ बनाया। आज ललित मोदी की छवि एक चालबाज और भगोड़े के रूप में की जा रही है। एक उद्योगपति घराने से ताल्लुक रखने वाले इस शख्स ने यदि क्रिकेट को पैसे की मशीन बनाने में रुचि न ली होती तो सच मानिए आज भी हमारे क्रिकेटर दोयमदर्जे का जीवन बसर कर रहे होते। क्रिकेट में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी पैठ बना चुकी हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। सिर्फ आयोजक ही नहीं भ्रष्टाचार के मोहपाश में अनगिनत खिलाड़ी और खेलनहार भी फंसे हुए हैं। सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे को लेकर राजनीतिज्ञों की अलग-अलग राय इसी बात का  प्रमाण है कि क्रिकेट में और भी दागी हैं, जिन्हें अपने नाम उजागर होने का डर है। आज सुषमा स्वराज पर उन कसौटियों पर खरा उतरने की जवाबदेही है जिनके सहारे वह और उनकी पार्टी पिछली सरकार को निशाने पर रखती रही है। ललित मोदी की विदेशी मुद्रा कानून उल्लंघन मामले में प्रवर्तन निदेशालय को तलाश है, उनके नाम ब्लू कॉर्नर नोटिस जारी हो चुका है और वह लंदन में एक तरह से निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मानवीय आधार पर कोई अपील करता है, तो सुषमा स्वराज जैसे वरिष्ठ एवं अनुभवी राजनेता से इतनी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि उसकी कोई भी मदद करते समय वे सम्बन्धित पक्षों को इसकी जानकारी देतीं और उन्हें विश्वास में लेतीं। सवाल यह भी कि ललित मोदी को यदि अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी के उपचार के लिए इंग्लैण्ड से पुर्तगाल जाना ही था, तो उन्होंने मानवीय आधार पर इसकी अनुमति देश-विदेश की किसी अदालत से मांगने की बजाय सीधे विदेश मंत्री से ही क्यों मांगी? दरअसल, सुषमा के पति, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल की ललित मोदी से 20 साल पुरानी दोस्ती है और वे ललित मोदी को पिछले कई सालों से कानूनी सलाह दे रहे हैं। इतना ही नहीं, सुषमा स्वराज की वकील बेटी बांसुरी कौशल भी पिछले सात साल में कई बार अदालत में ललित मोदी की पैरवी कर चुकी हैं। ललित मोदी और वसुन्धरा राजे की नजदीकियों की जहां तक बात है वसुंधरा राजे की मां राजमाता विजया राजे सिंधिया और ललित मोदी के पिता कृष्ण कुमार मोदी दोस्त थे। इसलिए अगली पीढ़ी में दोस्ती होना अचरज की बात नहीं थी। मुख्यमंत्री वसुंधरा न केवल तेज-तर्रार हैं बल्कि उनकी राजस्थान में तूती बोलती है। ललित मोदी ने इसी का लाभ उठाते हुए राजस्थान को अपना आशियाना बनाने की कोशिश की। वह न केवल राजस्थान क्रिकेट के अध्यक्ष बने बल्कि उन्होंने 2005-06 में जयपुर के प्रतिष्ठित और बेहद महंगे रामबाग पैलेस होटल को ही एक तरह से अपना घर बना लिया। समय बदला, रुतबा बढ़ा और ललित मोदी ने इण्डियन प्रीमियर लीग प्रतियोगिता के प्रयास तेज कर दिए। वर्ष 2008 में आईपीएल का आगाज हुआ और तब तक वसुन्धरा राजे की सरकार राजस्थान में रही। एक समय ऐसा भी आया जब ललित मोदी और राजे के बीच दूरियां बढ़ती दिखीं। राजस्थान में 2013 के विधान सभा चुनाव से पूर्व ललित मोदी ने भाजपा टिकट वितरण प्रणाली पर न केवल सवाल उठाए बल्कि वसुन्धरा का नाम लिए ही अरुण जेटली और सांसद भूपेन यादव जैसों से सम्हल कर रहने को कहा। दिसम्बर 2013 में वसुन्धरा के पुन: राजस्थान की सल्तनत सम्हालते ही मोदी के सुर बदल गये और उन्होंने कुछ ट्वीटों के जरिए वसुन्धरा की तो तारीफ की पर उनके इर्द-गिर्द रहने वालों की निष्ठा पर लगातार सवाल उठाए। ललित मोदी को लेकर हायतौबा मचाने वाली कांग्रेस को पता है कि क्रिकेट की काली कोठरी में कब-कब और कौन-कौन गया है। आज सुषमा और वसुन्धरा को लेकर जो नौटंकी हो रही है, उसकी मुख्य वजह कमल दल में फूट डालना और प्रधानमंत्री मोदी को असहज करना है। ललित मोदी के भ्रष्टाचार को लेकर सफेदपोश वाकई संजीदा होते तो इसका पटाक्षेप कब का हो गया होता। भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड ने मोदी की जांच के लिए चिरायु अमीन के नेतृत्व में ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरुण जेटली की तीन सदस्यीय कमेटी बनायी थी, मगर उसका क्या हुआ? आज जिस ललित मोदी को लेकर कांग्रेस हल्ला बोल रही है, उससे पूछना चाहिए कि 2012 के बाद उसके नेता कहां सोये थे। 2012 में ललित मोदी का पता करने के वास्ते एक औपचारिक परवाना ब्रिटिश फॉरेन आॅफिस भेजा गया था। यह नौटंकी नहीं तो क्या है कि एक तरफ ब्रिटेन और भारत की हुकूमतें कागजों में ललित मोदी की खोज में जुटी थीं तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगातार ललित मोदी के साक्षात्कार दिखा रहा था। सवाल यह भी कि भारत-ब्रिटेन के बीच 1993 में प्रत्यर्पण संधि किसलिए की गयी थी? यह सच है कि ललित मोदी मामले में संप्रग सरकार ने अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं किया लेकिन कालाधन वापस लाने का बेसुरा राग अलापने वाली भ्रष्टाचार मुक्त मोदी सरकार आखिर क्यों नहीं चाहती कि ललित मोदी को भारत लाया जाये?
(लेखक पुष्प सवेरा के समाचार संपादक हैं)

Wednesday, 17 June 2015

घोटालेबाज क्रिकेट बोर्ड का नया पैंतरा






हाल में संन्यास लिये तीन महान बल्लेबाजों को भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा नौकरी की पेशकश किये जाने का क्या अर्थ लगाया जाये? सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण से दुनिया की सबसे धनी और ताकतवर क्रिकेट संस्था का सलाहकार बनने के लिए अनुरोध किया गया है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के प्रारंभिक बयान में कहा गया है कि इन तीन खिलाड़ियों की तात्कालिक जिम्मेदारी हमारी राष्ट्रीय टीम को दिशा-निर्देश करना होगा, क्योंकि हम अंतरराष्ट्रीय मैचों में अपना प्रदर्शन सुधारना चाहते हैं, हमारी प्रतिभा की आमद को बेहतर करने के लिए मार्गदर्शन करना होगा तथा घरेलू क्रिकेट में सुधार के लिए कदम उठाना होगा ताकि हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव का सामना कर सकें।
यह बहुत ही अस्पष्ट बयान है। आश्चर्यजनक रूप से इस घोषणा के बाद गांगुली ने कहा कि उन्हें कोई अनुमान नहीं है कि उनकी भूमिका क्या होगी। इसका मतलब यह हुआ कि खिलाड़ियों से इस बारे में कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया था और इस पूरे मामले में किसी तरह की समझदारी नहीं बनायी गयी थी। इस प्रयास के पीछे बस यही इच्छा थी कि ये तीनों क्रिकेट बोर्ड से सम्बद्ध हो जायें। तो फिर यह पूरा मामला क्या है? और राहुल द्रविड़ द्वारा इस सलाहकार समिति में शामिल होने से इनकार की खबरों का क्या मतलब निकाला जाये? अनाम सूत्रों के हवाले से छपी एक खबर में अनुमान लगाया गया था कि द्रविड़ ऐसी किसी भी पहल में शामिल नहीं होना चाहते हैं, जिसमें सौरव गांगुली भी हों, क्योंकि उन दोनों में बहुत पुरानी प्रतिद्वंद्विता है। मुझे इस बात पर भरोसा नहीं है।
बड़बोले बिशन सिंह बेदी ने कहा कि वे इस नयी समिति के स्वरूप को नहीं समझ सके हैं। अगर उनके जैसे लोग भी समझने में नाकाम रहे हैं, तो फिर यह मामला किसे समझ में आयेगा। तथ्य यह है कि क्रिकेट बोर्ड भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए ही पुराने खिलाड़ियों को अपने पक्ष में रखना चाहता है। सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री ने बेमतलब के कामों के लिए चुपके से कई करोड़ रुपये के करार बोर्ड के साथ किये हैं, जबकि ये दोनों कमेंटेटर भी हैं। जब यह बात अखबारों में छपी, तो उन्होंने कुछ अस्पष्ट-सा स्पष्टीकरण दिया जो बहुतों के गले नहीं उतर सका। शास्त्री इन दिनों क्रिकेट बोर्ड के अनधिकृत, लेकिन वेतनभोगी प्रवक्ता हैं, कथित रूप से निरपेक्ष कमेंटेटर हैं और अब टीम निदेशक भी बन गये हैं (यह नया मनमोहक पद पहले अस्तित्व में नहीं था)
 क्रिकेट बोर्ड इन मामलों में पूरी तरह आपसी लेन-देन वाली संस्था है। लोगों का एक छोटा समूह हर चीज को नियंत्रित करता है, जिनमें कुछ व्यापारी और राजनेता हैं तथा कुछ पुराने खिलाड़ी हैं। आखिर यह समूह इतना छोटा क्यों है और अपना काम इस गोपनीयता से क्यों करता है? इसका कारण यह है कि यह घोटालों से भरा पड़ा है। इंडियन प्रीमियर लीग के संस्थापक फरार हैं, इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल के अध्यक्ष का दामाद सट्टेबाजी के आरोप में जेल में है, आईपीएल की अनेक टीमों पर मालिकाना और अन्य मामलों को लेकर गंभीर आरोप हैं तथा मैच फिक्सिंग के आरोप में खिलाड़ी गिरफ्तार किये जा रहे हैं और उन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। इस अव्यवस्था को कौन ठीक करने की कोशिश में है? कोई नहीं। जब भी क्रिकेट बोर्ड, जो अपने को नियमित करने का दावा करता है, यह कहता है कि वह खेल की बेहतरी के लिए कुछ करने जा रहा है, तो मुझे बहुत संदेह होता है। यह एक पैसा बनाने की मशीन है तथा सभी राजनेता इसमें अपना हिस्सा चाहते हैं।
 कांग्रेस के राजीव शुक्ला से लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरद पवार और भाजपा के अरुण जेटली तक, जो देश के सबसे ताकतवर और जाने-माने नेता हैं, भारत के क्रिकेट बोर्ड में जगह बनाने की चाहत रखते हैं। नियमन और पारदर्शिता में क्रिकेट बोर्ड का रिकॉर्ड खराब रहा है, खासकर जब मामला आईपीएल का आता है, जो दुधारू गाय है। एक अखबार ने रिपोर्ट किया कि इस नये पैनल से आईपीएल के बारे में सलाह लिये जाने की सम्भावना नहीं है। तो फिर इसका तात्पर्य क्या है और सचिन, सौरव और लक्ष्मण को क्यों बुलाया गया है तथा क्यों द्रविड़ ने इससे अलग रहने का निर्णय लिया है?
मेरा अनुमान है कि क्रिकेट बोर्ड को लगता है कि अंदर के ऐसे भरोसेमंद लोगों का उसके प्रभाव क्षेत्र से बाहर रहना खतरनाक है। इन तीन पूर्व खिलाड़ियों जैसे लोगों को बोर्ड अपने तम्बू के भीतर रखना चाहता है। इस पूरे प्रकरण में क्रिकेट बोर्ड वरिष्ठ और कनिष्ठ टीम की बेहतरी की किसी इच्छा से कतई प्रेरित नहीं है। इसकी पूरी कोशिश खुद को बचाये रखने की है। अगर इसकी चाहत खेल की जानकारी रखने वाले पूर्व खिलाड़ियों को अधिक जिम्मेदारी देने की होती, तो फिर सैयद किरमानी को यह शिकायत क्यों होती कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है? सम्भवत: ऐसा इसलिए है कि बहुत कम लोग ही आज उन्हें याद करते हैं। सचिन जैसे पूर्व खिलाड़ियों के विचारों से क्रिकेट बोर्ड को डर लगता है।
 अगर वे भारतीय बोर्ड के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ बोल दें, तो बोर्ड का दर्शकों के साथ भारी झमेला खड़ा हो सकता है। इसलिए उन्हें अंदर रखने की कोशिश बोर्ड कर रहा है। मेरे विचार में द्रविड़ ने बोर्ड के प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया, क्योंकि उन्हें इस जिम्मेदारी के असली चरित्र की समझ है। और यह चरित्र है बोर्ड का आखिरकार बचाव करना, भले ही वे कुछ भी हरकत करते रहें। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का यह सलाहकार बोर्ड इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए, क्योंकि उसके इतिहास को देखते हुए अच्छे भरोसे के प्रदर्शन की जिम्मेदारी पूरी तरह उन्हीं के ऊपर है।
आकार पटेल

हर दो दिन में औसतन तीन लोगों की मौत

नक्सली हिंसा: पिछले 35 वर्षों में देश में 20 हजार से अधिक लोग मारे गए
देश में नक्सली हिंसा की घटनाओं में पिछले 35 वर्षों के दौरान हर दो दिन में औसतन तीन लोग मारे जा रहे हैं । पिछले 35 वर्षों में नक्सली हिंसा में देश में 20 हजार से अधिक लोग मारे गए जिसमें तीन हजार से अधिक सुरक्षा बल के जवान शामिल हैं।
सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत गृह मंत्रालय के वामपंथ अतिवाद विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 1980 से 31 मई 2015 तक देशभर में वामपंथी चरमपंथ से जुड़ी घटनाओं में 3125 सुरक्षा बल शहीद हुए तथा 12177 नागरिक एवं 4768 नक्सली मारे गए। इस तरह से पिछले 35 वर्षों के दौरान नक्सली हिंसा की घटनाओं में कुल 20,060 लोग मारे गए। इसके तहत औसतन हर दो दिन में तीन लोग मारे जा रहे हैं। विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इसमें वर्ष 1986 में 146 नागरिक एवं सुरक्षा बल मारे गए, लेकिन इनकी अलग-अलग संख्या उपलब्ध नहीं है। एक अन्य आरटीआई के तहत गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, पिछले तीन वर्षाें में नक्सली घटनओंं एवं कानून व्यवस्था की चुनौतियों का सामना करने के लिए पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की योजना के तहत राज्यों को 3038.86 करोड़ रुपये आवंटित किये गए।
इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2012-13 में राज्यों को 300 करोड़ रुपये आवंटित किये गए जबकि वर्ष 2013-14 में प्रदेशों को पुलिस बल आधुनिकीकरण योजना के तहत 1341.62 करोड़ रुपये और वित्तवर्ष 2014-15 में राज्यों को 1397.24 करोड़ रुपये आवंटित किये गए। आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2012-13 से 2014-15 के बीच आंध ्रप्रदेश को पुलिस बल के आधुनिकीकरण की योजना के तहत 161 करोड़ रुपये जारी किये गए जबकि असम को 116 करोड़, बिहार को 120 करोड़ और छत्तीसगढ़ को 73 करोड़ रुपये जारी किये गए। आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना राज्य बनने के बाद 2014-15 के लिए इस योजना के तहत राज्य को 68.13 करोड़ रुपये जारी किये गए। पुलिस बल के आधुनिकीकरण की योजना के तहत उत्तर प्रदेश को पिछले तीन वर्षों के दौरान 377 करोड़ रुपये जारी किये गए जबकि गुजरात को 164 करोड़ रुपये, जम्मू-कश्मीर को 228 करोड़, झारखंड को 69 करोड़, कर्नाटक को 200 करोड़, मध्यप्रदेश को 133 करोड़, महाराष्ट्र को 199 करोड़, ओडिशा को 100 करोड़, राजस्थान को 181 करोड़ और तमिलनाडु को 173 करोड़ रुपये जारी किये गए। आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, वामपंथ उग्रवाद प्रभावित 10 राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की कवायद के तहत केंद्र सरकार ने 400 पुलिस थानों एवं चौकियोंं को मंजूरी दी है जिसमें से प्रत्येक थाने के लिए 2 करोड़ रुपये आवंटित किये जा रहे हैं। गृह मंत्रालय मिली जानकारी के अनुसार, मंत्रालय वामपंथ उग्रवाद प्रभावित राज्यों में किलेबंद पुलिस थानों के निर्माण एवं उन्हें मजबूत बनाने की योजना को लागू कर रहा है। वामपंथ उग्रवाद प्रभावित इन 10 राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की कवायद के तहत केंद्र सरकार ने 400 पुलिस थानों एवं चौकियोंं को मंजूरी दी है जिसमें से प्रत्येक थाने के लिए 2 करोड़ रुपये आवंटित किये जा रहे हैं। इसमें केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 80:20 है। 

खानपान की चिन्ता

सांप निकलने के बाद लकीर पीटना हमारी आदत में शुमार हो चुका है। इन दिनों मैगी नूडल्स के खिलाफ हम जो रंज दिखा रहे हैं, वह भी कुछ ऐसा ही प्रयास है। यह सही है कि मैगी नूडल्स में तय मानकों से अधिक सीसा की मात्रा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, पर सवाल यह उठता है कि हम दैनंदिन जिस खानपान पर जीवन यापन कर रहे हैं, वह कितना शुद्ध है। मैगी नूडल्स के खिलाफ भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने जो तत्परता दिखाई है, ऐसी तत्परता भारत में बन रही खाद्य वस्तुओं की जांच में कब अमल में लाई जाएगी। डिब्बाबंद आहार से सेहत पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर पहले भी कई अध्ययन आए और इनकी गुणवत्ता पर कड़ाई से नजर रखने की जरूरत रेखांकित की गई, पर तब इस मामले में कोई संजीदगी नहीं दिखाई दी थी। आज घर-घर की रसोई पर उस बाजार का कब्जा हो चुका है, जहां मिलावटखोरी दस्तूर बन गई है। आज शायद ही ऐसा कोई परम्परागत भोजन हो, जिसे पैकेटों में बंद करके बेचने की तरकीब न निकाल ली गई हो। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का कारोबार निरंतर फैल रहा है। नामी देशी-विदेशी कम्पनियां सेहत और स्वाद के दावे के साथ लोगों के खानपान की आदतों को बदलने और बिक्री बढ़ाने की नई-नई कोशिशें अमल में ला रही हैं। अपने उत्पाद की बिक्री और विश्वसनीयता को बढ़ाने की खातिर विज्ञापनों में फिल्म, खेल आदि क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों का सहारा लिया जा रहा है। नामी-गिरामी कम्पनियों के उत्पादों पर पहली बार उंगली नहीं उठी है। कम्पनियों के प्रचार और बिक्री-तंत्र को लेकर पहले भी संदेह जताए गए, पर इनके प्रभाव को ध्यान में रखने की भूल के चलते कभी जांच पर आंच नहीं आई। नामचीन कम्पनियों की आड़ में बहुत सारे नकली उत्पाद आज बाजार में अपनी पैठ बना चुके हैं। ये उत्पाद छोटी-मोटी दुकानों सहित ढाबे और रेस्तरां आदि में खूब खप रहे हैं। इतना ही नहीं दूरदराज के इलाकों में नामी कम्पनियों के उत्पाद से मिलते-जुलते नामों वाले नकली उत्पाद भी इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं। यह सब खाद्य पदार्थों में मिलावट का ही एक रूप है। कहने को इन पर नजर रखने के लिए हर शहर में खाद्य निरीक्षक तैनात हैं, पर वे इसे रोक नहीं पा रहे। जब भी कोई तीज-त्योहार आता है, उसके पहले यह खाद्य निरीक्षक सजगता का ढोंग कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। अफसोस की बात है कि गुणवत्ता-जांच के यह प्रयास कुछेक उत्पादों तक ही सीमित होते हैं। सच्चाई तो यह है कि हमारे उपभोक्ता के पास खानपान सामग्री की गुणवत्ता परखने का कोई आसान और प्रमाणिक जरिया भी तो नहीं है। बेहतर होगा हमारा भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण सांप निकलने के बाद लकीर पीटने की आदत से बाज आये।

भरोसे का जोखिम

बिहार विधान सभा चुनावों की दुंदुभी बजने में अभी वक्त है लेकिन लालू प्रसाद यादव हर रोज कमल दल पर चुटकी ले रहे हैं। लालू की चुटकी को आम आदमी बेशक मसखरा मान रहा हो पर मुख्यमंत्री पद को लेकर कमल दल वाकई पशोपेश में है। बिहार विधानसभा की 243 सीटों के होने वाले चुनावों में जनता किस दल को सिर-आंखों पर बिठायेगी, ये तो अभी दूर की कौड़ी है, पर मुख्यमंत्री की ख्वाहिश हर मन में है। लालू ने तो जहर का घूंट पीकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री मान लिया, लेकिन भाजपा ने अभी तक इस बात के संकेत नहीं दिये हैं कि बिहार में उसका चुनावी चेहरा कौन होगा? यदि भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के सांगठनिक प्रभारी अनंत कुमार के बयान को सच मान लें तो बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी मुख्यमंत्री पद के लिये किसी भी बिहारी नेता का चेहरा आगे नहीं करना चाहती। इसकी वजह दिल्ली विधानसभा चुनावों में कमल दल की फजीहत को माना जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में किरण बेदी को बतौर मुख्यमंत्री पेश करना भाजपा में भितरघात का कारण बना था। कई नेताओं की दावेदारी के विवाद से निपटने का पार्टी का यह राजनीतिक प्रयोग बुरी तरह पिट गया था। कहते हैं दूध का जला छांछ भी फंूक-फूंक कर पीता है। भाजपा भी दिल्ली से सबक लेते हुए बिहार में किसी पिटे-पिटाए प्रयोग को आजमाना नहीं चाहती। अब सवाल यह उठता है कि भाजपा आखिर किस फार्मूले से बिहार फतह करेगी? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक साल पहले आम आवाम से जो वादे किये थे, वे तो पूरे हुए नहीं ऐसे में मोदी बनाम नीतीश के खेल में कमल दल के फेल होने की ही सम्भावना अधिक है। भाजपा को लोकसभा चुनावों की सफलता विधानसभा से जोड़कर देखने की गलती भारी पड़ सकती है। बिहार भाजपा में इस वक्त सुशील कुमार मोदी के अलावा जिन नेताओं को पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार समझा जाता है, उनमें डॉ. सीपी ठाकुर, नंदकिशोर यादव, रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूड़ी, मंगल पाण्डेय और चन्द्रमोहन राय सहित कई नाम शामिल हैं। भाजपा की मुश्किल यही है कि इनमें से यदि किसी को आगे किया गया तो बाकी पीछे टांग खींचने से बाज नहीं आएंगे। बिहार चुनाव में अगड़ों और पिछड़ों की स्वीकार्यता भी मायने रखती है। सच्चाई यह है कि सुशील मोदी, सीपी ठाकुर और नंद किशोर यादव हर किसी को स्वीकार्य नहीं हैं। सुशील मोदी समर्थक तो चाहते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनके नाम को हरी झण्डी मिल जाये और ऐसा ही कुछ नंदकिशोर यादव, रवि शंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूड़ी समर्थक भी चाहते हैं। बिहार चुनाव कांटे का है। भाजपा जीतनराम मांझी को अपने पाले में करने की खुशफहमी में है बावजूद इसके यहां कमल दल की थोड़ी सी चूक उसे भारी पड़ सकती है। चुनावी आंकड़ों की रोशनी में देखें तो लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में राजद-जद (यू)-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 45 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिले थे, जबकि भाजपा 29.41 फीसदी वोट मिलने के बाद भी 40 में 22 सीटें जीतने में सफल रही। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जो जोड़-तोड़ के घाघ हैं, उनकी बात एक हद तक सही है कि सियासत में दो और दो मिलकर हमेशा चार नहीं होते। जो भी हो बिहार चुनाव के नतीजे बहुत हद तक दोनों गठबंधनों की रणनीति, प्रचारतंत्र की दक्षता और उम्मीदवारों के चयन पर निर्भर होंगे। 

Tuesday, 16 June 2015

क्षेत्रीय पत्रकारिता की चुनौतियां

65 साल पहले इंदौर से शुरू होने वाले अखबार, नई दुनिया के बिकने की खबर इन दिनों चर्चा में है। कुछेक पत्रकारों में (शेष अन्य को मतलब भी नहीं) चिंता और सरोकार है। एक मित्र ने वेबसाइट पर लिखा है, नई दुनिया केवल एक अखबार नहीं रहा है बल्कि यह एक संस्कार की तरह पुष्पित और पल्लवित हुआ।
 हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में नई दुनिया  ने वह मुकाम पाया, जो देश के नंबर एक और नंबर दो अखबार कभी सपने में भी नहीं सोच सकते। इस अखबार ने देश को सर्वाधिक संपादक और योग्य पत्रकार दिये हैं। यह बिलकुल सटीक आकलन व निष्कर्ष है, पर इसमें जोड़ा जाना चाहिए कि नई दुनिया सिर्फ अच्छे पत्रकारों को देने के लिए ही नहीं जाना जायेगा। सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण बात यह है कि नई दुनिया ने अपने दौर, काल या युग के जलते-सुलगते सवालों को जिस बेचैनी और शिद्दत से उठाया, वह इस अखबार की पहचान और साख है. इसने हिंदी पत्रकारिता को एक संस्कृति दी (जो आज की दुनिया के नंबर एक और नंबर दो बन जानेवाले हिंदी अखबार सपने में भी नहीं कर पायेंगे).
 बहुत पहले स्वर्गीय राजेंद्र माथुर ने (1983-84 के आसपास) राहुल बारपुते पर एक लेख लिखा था. उसमें उन्होंने मालवा की संस्कृति, पुणे के प्रभाव और गंगा किनारे की उत्तर प्रदेश-बिहार की भिन्न संस्कृति की चर्चा की थी. उनकी बातों का आशय था, अपने को हिंदी की मुख्यधारा माननेवाली पट्टी और उसके बौद्धिक, मालवा की संस्कृति और उसमें नई दुनिया  का योगदान और राहुल बारपुते के व्यक्तित्व का आकलन नहीं कर पायेंगे.
 यह सही है. एक शिष्टता, संस्कार और मर्यादा से राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, अभय छजलानी जैसे लोगों ने नई दुनिया को शीर्ष पर पहुंचाया. क्या इतने बड़े अखबार को सिर्फ चापलूसों की फौज डुबा सकती है? नहीं, साम्राज्यों या संस्थाओं के पतन में षड्यंत्रकारी या दरबारी चापलूसों की एक सीमा तक ही भूमिका रहती है. क्या सफलता से चल रहे बड़े या छोटे घरानों में ये चापलूस या षड्यंत्रकारी नहीं होते. दरअसल, साम्राज्यों या संस्थाओं के पतन के मूल में अन्य निर्णायक व मारक कारण होते हैं. समय की धार को न पहचानना और उसके अनुरूप कदम न उठाना, पतन का मूल कारण होता है। फिर सबसे बड़ा मारक कारक तो आर्थिक व्यवस्था है. इस तरह की किसी चीज के पतन के मूल में, ऐसी चीजों के प्रभाव जरूर होते हैं. पर इससे अधिक विध्वंसकारी तत्व अलग होते हैं.
 नई दुनिया  का अवसान, इस युग के धाराप्रवाह का प्रतिफल है. यह बड़ा और व्यापक सवाल है. यह सिर्फ नई दुनिया तक सीमित नहीं है. देश की अर्थनीति और राजनीति से जुड़ा यह प्रसंग है. मार्क्स-एंगेल्स की अवधारणा सही थी. आर्थिक कारण और हालात ही भविष्य तय करते हैं. डार्विन का सिद्धांत ही बाजारों की दुनिया में चलता है. मार्केट इकोनॉमी का भी सूत्र है, बड़ी मछली, छोटी मछली को खा जाती है. निगल जाती है. आगे भी खायेगी या निगलेगी. बाजार खुला होगा, अनियंत्रित होगा, तो यही होगा. जिसके पास पूंजी की ताकत होगी, वह अन्य पूंजीविहीन प्रतिस्पर्द्धियों को मार डालेगा.
1983-85 के बीच, राजेंद्र माथुर का राहुल बारपुते पर एक लेख पढ़ा था. लेख का शीर्षक था- हिंदी पत्रकारिता संदर्भ राहुल बारपुते. माथुर जी से मुलाकात तो धर्मयुग में काम करते दिनों में हुई थी. 1980 के आसपास. गणेश मंत्री के साथ. तब से उनकी प्रतिभा से परिचित था.
 नयी दुनिया की श्रेष्ठ परंपरा से भी. उस लेख में माथुर जी ने लिखा था, पांच साल दिल्ली में नवभारत टाइम्स की संपादकीय के बारे में कह सकता हूं कि नयी-पुरानी और दुर्लभ किताबों की दृष्टि से, बीसियों किस्म की पत्र-पत्रिकाओं की दृष्टि से, पत्रकारिता की ताजा पेशेवर सूचनाओं की दृष्टि से और संसार में जो ताना-बाना प्रतिक्षण बुना जा रहा है, उसे छूकर देखे जाने के सुख की दृष्टि से, जो 27 अखबारी वर्ष मैंने नयी दुनिया में गुजारे, वे दिल्ली की तुलना में कतई दरिद्र नहीं थे. एक माने में बेहतर ही थे, क्योंकि तब सार्थक पढ़ाई-लिखाई की फुरसत ज्यादा मिलती थी. यह थी नई दुनिया की परंपरा. नयी दुनिया महज एक अखबार नहीं रहा है. वह हिंदी के बौद्धिक जगत का सांस्कृतिक आलोड़न कर रहा है. हिंदी क्षेत्र में संस्कार और संस्कृति गढ़ने-बताने-समझने और विकसित करने का मंच भी. आज अखबारों में बाइलाइन या के्रडिट पाने की छीना-झपटी होती है. उस अखबार ने कुछ मूल्य और प्रतिमान गढ़े.
 गंभीर और मर्यादित पत्रकारिता के लिए. माथुर साहब ने लिखा था कि 'राहुल बारपुते हर रोज मेरे कॉलम के साथ, मेरा नाम छापने को तैयार थे. मुझे यह अश्लील लगा. मैंने आग्रह किया कि मैं प्रतिदिन अहस्ताक्षरित ही लिखूंगाह्ण. क्योंकि माथुर साहब को प्रेरणा मिली थी उन दिनों के चोटी के स्तंभकारों से, जो अपना नाम नहीं छापते थे. तब ए. डी. गोरवाला जी, विवेक नाम से लिखते थे. शामलाल जी, अदिव के नाम से लिखते थे. दुगार्दास जी, इंसाफ के नाम से लिखते थे. तब शरद जोशी जी भी नई दुनिया में ब्रह्मपुत्र नाम से लिखते थे. यह संस्कार, और परिपाटी-मयार्दा विकसित करने का पालना रहा है, नई दुनिया. आज देख लीजिए, संपादक, अपने ही अखबार में अपनी तसवीर, अपने लोगों की फोटो, अपने परिवार का गुणगान कर किस मयार्दा और अनुशासन का पालन करते हैं? यह दरअसल धाराओं की लड़ाई है. एक सामाजिक धारा है, जिसका प्रतिबिंब नई दुनिया का पुराना अतीत रहा है. मूल्यों से गढ़ा गया. तब नई दुनिया ने वैदेशिक कालम की शुरूआत की. जब इसकी कोई खास जरूरत नहीं थी, पाठकों के बीच इसकी मांग नहीं थी.
पर अपने पाठकों का संसार समृद्ध करना उसने अपना फर्ज समझा. आज बड़ी पूंजी से निकलने वाले अखबारों का फर्ज क्या है? वे पाठकों को उनकी रुचि का सर्वे करा कर फूहड़ और अश्लील चीजें भी देने को तैयार हैं. पाठकों की इच्छा के विपरीत, उनके संस्कार गढ़ने, ज्ञान संसार समृद्ध करने का जोखिम लेने को तैयार नहीं. पर नई दुनिया ने यह किया. आज पहला मकसद है, अखबारों का, प्राफिट मैक्सीमाइजेशन. यह नयी पत्रकारिता बाजार को साथ लेकर चलती है. हर वर्ग को खुश रखना चाहती है. उपभोक्तावादी संसार उसे ताकत देते हैं, इसलिए यह धारा आज ज्यादा प्रबल है.
यह तामसिक है. पहली धारा (जिससे नई दुनिया का अतीत जुड़ा है) वह सात्विक रही है. आज सात्विक और तामसिक धाराओं के बीच संघर्ष है. फिलहाल तामसिक धारा का जोर है. सात्विक, कमजोर और उपहास के पात्र. पर अंतत: जय सात्विक धारा की होगी. इसमें भी किसी को शंका नहीं होनी चाहिए? उस दौर में हिंदी का सबसे अच्छा अखबार, नई दुनिया कहा गया. क्यों? क्योंकि माथुर साहब के शब्दों में, नातों-रिश्?तों, ठेका और फायदों का जमाना शुरू ही नहीं हुआ था. पत्रकारिता का पैमाना क्या था? माथुर साहब के ही शब्दों में ही पढ़िए-
 'नई दुनिया में रह कर आप कह सकते हैं कि जो मैं लिखता हूं, वह मैं हूं. लेखन से जो सराहना की गूंज लौट कर आती है, वही मेरा पद है, और समाज निर्मित तथा समाज प्रदत्त होने के कारण यही सचमुच प्रमाणिक है.
 अखबारों का अर्थशास्त्र समझना जरूरी
 नई दुनिया '67 में, भारत का शायद पहला अखबार था, जिसने आॅफसेट प्रिंटिग पर अपनी छपाई शुरू की. तकनीक में भी यह औरों से आगे था. इन सबके पीछे एक पवित्र संकल्प और उद्देश्य था, क्योंकि उसके कर्ता-धर्ता लोगों में से एक राहुल बारपुते 'क्षमता के अनुसार काम और आवयश्कता के अनुसार पारिश्रमिक सूत्र पर चलते थे. यह एक जीवन दर्शन या समाज दर्शन, जिसका वैचारिक प्रस्फुटन था, नई दुनिया. इसे भी पढ़िए माथुर जी के शब्दों में -
 'राहुल जी ने आठ साल से अपना वेतन डेढ़ सौ रुपए प्रतिमाह तय कर रखा था, और उनका कहना था कि इससे ज्यादा मैं लूंगा नहीं, क्योंकि यह मेरी जरूरत के लिए पर्याप्त है. स्वैच्छिक गरीबी को वे संपादकीय प्रमाणिकता के लिए जरूरी मानते थे. पांच सौ रुपये से ज्यादा पानेवाले को वे चोरों की श्रेणी में गिनते थे. इस अर्थशास्त्र और सोच के तहत नई दुनिया आगे बढ़ा. जब राजेंद्र माथुर से पूछा गया, आपको क्या तनख्वाह चाहिए, तो उनका उत्तर भी उन्हीं के शब्दों में -'मैंने कहा कि पांच साल पहले जब मैं हास्टल में रहता था और फर्स्ट इयर में था, तब मुझे खर्च के लिए 75 रुपये महीना मिलते थे, और मेरी आवश्यताएं इन पांच सालों में ज्?यों की त्?यों है. इसलिए आप मुझे 75 रुपये दे दीजिएगा, और वे राजी हो गये.ह्ण बारपुते जी का जीवन कैसा था? वर्षों तक वे लीपे हुए दलान में जमीन पर सोते थे और चटाई के पत्तों पर खाते और खिलाते थे.
 यह सब पत्रकारिता के सतयुग की बातें हैं. जब-जब पत्रकारिता में ऐसे चरित्र थे, तब ऐसे अविष्कार जिंदा रहे. मैं खुद गणेश मंत्री, नारायण दत्त जी जैसे लोगों की सोहबत में रहा हूं. गणेश मंत्री धर्मयुग के स्टार पत्रकार थे, तब चिंतक, लेखक व विचारक भी. ईमानदारी, सात्विकता और साधन-साध्य की शुचिता के प्रतिमान. पिता, जनता पार्टी शासन में राजस्थान में राजस्व मंत्री रहे. अत्यंत सम्मानित व प्रतिष्ठित. पर गणेश मंत्री कभी उनकी गाड़ी पर नहीं चढ़े, क्योंकि वह सरकारी होती थी. नारायण दत्त जी नवनीत के संपादक रहे. हिंदी के सर्वश्रेष्ठ वैचारिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक-आध्यात्मिक पत्रकार.
 इंदिरा जी के लंबे समय तक प्रेस सलाहकार रहे, अद्वितीय और अनोखे गांधीवादी विद्वान. एचवाइ शारदा प्रसाद के छोटे भाई. श्री दत्त आज भी मौजूद हैं, बेंगलुरू में रहते हैं. अकेले. कई भाषाओं के जानकार. सच्चे गांधीवादी. इन दोनों के घर, सत्ता के ताकतवर केंद्र रहे, दोनों अपने-अपने क्षेत्र में अपने कार्यकाल में, देश के चोटी के पत्रकार-संपादक रहे, पर इन दोनों का जीवन, नितांत गांधीवादी, सामान्य और सरल रहा. अपने जीवन के दो मेंटर (पथ प्रदर्शक) इन दोनों को पाता हूं.

नजदीक से इन्हें देखा कि कैसे ये सभी 24 कैरेट का सोना रहे. ताउम्र. आज इस पत्रकारिता में पैसे की हवस है. रातोंरात धनकुबेर बनने की भूख है. जायज-नाजायज कोई प्रतिमान नहीं रह गया. न आदर्श, न मूल्य. इस धारा का जोर इन दिनों ज्यादा सशक्त और प्रबल है. हर शहर से लेकर दिल्ली तक देख लीजिए, जो स्वनाम-धन्य पत्रकार खुद को समाज का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मानने लगे हैं, उनकी योग्यता क्या है? आमद क्या है? उनकी कुल संपत्ति क्या है? ठाठ-बाट कैसे हैं? क्या समाज में कोई मूल्य रह गया है या नहीं? क्या कोई उसूल बचा है? जब लड़ाई, सिद्धांत और सिद्धांतविहीनता के बीच हो, साधु और गैर साधु के बीच हो, नीति और अनीति के बीच हो, तो अनीति-षडयंत्र को ही कामयाबी मिलेगी. आज के संसार में. यही हो रहा है.

टाइम्स आॅफ इंडिया में 750 रुपये, ट्रेनी के रूप में प्रतिमाह हमें मिलता था. 1977-78 के दौर में. तब कई लोगों ने इससे अधिक की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता को चुना और पत्रकारिता को ही कैरियर अपनाया. रिजर्व बैंक व अन्य संस्थाओं की नौकरी (अधिक तनख्वाह) छोड़ कर हमने भी यही पेशा चुना. आज खुद मैं लाखों पाता हूं, जो कभी सोचा नहीं था. वह भी क्षेत्रीय अखबार में (इससे कई गुना अधिक के आॅफर मिले, यह अलग बात है कि यही रहा), पर अपने काम से जोड़ कर देखता हूं, तो तब (धर्मयुग, रविवार या प्रभात खबर के आरंभिक दिनों में) जितना परिश्रम कर पाता था.

पूरा डट कर. जुट कर. डूब कर. उतना ही आज भी करता हूं. पर तनख्वाह कई गुना अधिक. राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुर के प्रतिमान से खुद को सोचता हूं, तो अपराध बोध होता है. कई बार खुद से पूछा, क्यों गलत मानते हुए इतनी तनख्वाह लेता हूं. कारण, सुरक्षा का सवाल है. पहले समाज में 'सेफ्टीनेटह्ण (सुरक्षाजाल) था. संयुक्त परिवार, उदार परिवार, एक दूसरे की देखभाल करनेवाला. आज एकल परिवार (न्यूक्लीयर परिवार) हैं, स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च और इस पेशे में नौकरी की असुरक्षा, शाश्वत चुनौतियां हैं. इसलिए भविष्य में स्वाभिमान रहे, हाथ न पसारना पड़े, इसलिए आज यह तनख्वाह और उसमें से लगातार बचत जरूरी है.

फिर भी, जब पूरे भारतीय समाज के बारे में सोचता हूं, तो लगता है, यह चोरी है. पहले संयुक्त परिवार और खेतिहर परिवेश का भरोसा था कि कोई निर्णय लेने के बाद, सड़क पर नहीं रहना होगा. समाज, गांव और परिवार पीछे है. आज ये संस्थाएं टूट गयी हैं. आज भविष्य के प्रति डर है. ऐसा समाज हमने बना लिया है. इसलिए अधिक तनख्वाह का सवाल हमें बहुत कुरेदता नहीं.

पूरे मीडिया उद्योग की तनख्वाह में बेशुमार इजाफे को अगर देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखें, तो उत्पादन लागत और आय के आधार पर आंकें, तो यह कृत्रिम अर्थप्रणाली है. यह किसी भी दिन भहरायेगी. धवस्त होगी. भारत की पेट्रोलियम कंपनियों को देख लीजिए. उनके यहां मैनपावर कॉस्ट से लेकर स्टेब्लिशमेंट कॉस्ट इतने अधिक हैं कि हम पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी प्रति लीटर 30 रुपये अधिक पर पेट्रोल बेचते हैं. ओएनजीसी जैसी महारत्न कंपनियों में चपरासी की भी तनख्वाह 60 हजार से अधिक है.

यह आपको मालूम होगा कि भारत की पेट्रोलियम कंपनियां दो लाख करोड़ के घाटे में चल रही हैं. आमद चवन्नी और खर्च अठन्नी का मामला है. यही स्थिति आज नयी दुनिया और छोटे अखबारों के साथ है. अगर नई दुनिया को बाजार में रहना है, तो उसे अपने पत्रकारों को भी हिंदी के बड़े अखबारों के पत्रकारों के समकक्ष वेतन देना होगा. पर नई दुनिया की आमदनी तो बड़े अखबारों जैसी है नहीं. न उसके पास विदेशी पूंजी (एफडीआइ) है.

न शेयर बाजार का पैसा है. न इक्विटी है. उधर हिंदी के कुछेक बड़े अखबारों को देख लीजिए. उनकी बैलेंस शीट देख लीजिए. किसी के पास पांच सौ से छह सौ करोड़ जमा है. किसी के पास चार सौ से पांच सौ करोड़ जमा है. बड़े अखबार भी मैनपावर कॉस्ट इतना बढ़ा चुके है कि इन्हें भी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन के लिए पेड न्यूज का सहारा लेना पड़ता है.

उपभोक्ता बाजार के फैलाव में सशक्त मंच के रूप में ये बड़े अखबार काम करते हैं. बाजार को फैलाना-बढ़ाना इनका पहला ध्येय है, क्योंकि बाजार बढ़ेगा, तो आमद बढ़ेगी. पाठकों के बौद्धिक संसार और समाज को बेहतर बनाने से इनका क्या संबंध रह गया है? यह बदले अर्थयुग (उदारीकरण) का प्रभाव है.

हिंदी इलाकों में यह कुछ गंभीर समस्याएं हैं. हम हीन मानस के झगड़ालू लोग हैं. उसमें भी यदि राजेंद्र माथुर के शब्दों में कहें, 'क्योंकि बलिया और पुणे में एक फर्क है, जो गंगा-यमुना के बीच रहनेवाले उत्तर भारतीयों को कभी समझ में नहीं आयेगा.ह्ण वैसे तो हिंदुस्तान में ही समस्या है, पर हिंदी इलाकों में खासतौर से. इस बीमारी का लक्षण भी माथुर साहब के शब्दों में ही- 'समाज के नाते अथवा संस्था के नाते हम हिंदुस्तानी आकृष्ट होना जानते ही नहीं. हिंदीभाषियों में यह खासियत दूसरों से कुछ ज्यादा ही है. नौ कनौजिए यहां नौ सौ चूल्हे जलाते हैं. सारे संस्कार ही हिंदी में हीनता, विपन्नता और ईर्ष्या में हैं.ह्ण

राजेंद्र माथुर ने हिंदी इलाके के इस मानस पर कब टिप्पणी की थी, तब से आज के 25 वर्षों बाद, यह और अधिक विकृत हुई है. पर उससे क्या? नई दुनिया का अपना रोल रहा. देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार उसने अपने प्रयास से हिंदी समाज को संवारा. उसकी बौद्धिक क्षमता बढ़ायी. अपने समय-दौर में देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप श्रेष्ठ रोल प्ले (भूमिका अदा की) किया. अब वह नई दुनिया, नयी परिस्थितियों में अपना पुराना चोला उतार रहा है. राजेंद्र जी राहुल जी नई दुनिया के अतीत बन रहे हैं. भविष्य के साथ उनके रिश्ते क्षीण होते जायेंगे. यही काल है.

पुरानी कहावत है, 'समय होत बलवान !ह्ण वहीं अर्जुन, वही गांडीव, पर भील उनकी औरत को हर ले गये. ऐसा तो होना ही है. दर्शन में कहें, तो यह काल की गति है. इस असार-संसार में ना तो हम अपने परिवेश या अस्तित्व के स्थायी होने का ठेका ले सकते हैं और न उसके भविष्य का, क्योंकि दोनों ही चीजें समय के साथ खिसक जाती हैं. तानपुरे ढीले पड़ जाते हैं, या महफिलें बदल जाती हैं. सफेद पर्दे मैले हो जाते हैं. परेशानियां अपनी पहचान के लिए अलग पृष्ठभूमि खोजती हैं.

नई दुनिया के साथ उत्पन्न स्थिति को समझने के लिए नई दुनिया के अर्थशास्त्र को समझना जरूरी है. एक औसत बीस पेज का अखबार रोज निकालने के लिए सिर्फ स्याही और प्लेट पर खर्च लगभग चार रुपये है. अन्य ओवरहेड खर्च जोड़ दें, तो एक प्रति की कीमत लगभग सात रुपये होगी. यह खर्च तब, जब अखबार मामूली या औसत न्यूजप्रिंट पर निकलता है.

यह एक अखबार निकालने का खर्चा है. अब आमद का पक्ष समझ लीजिए. फर्ज कीजिए आपका अखबार, एक सप्ताह में तीन दिन दो रुपये, और चार दिन तीन रुपये में बिकता है. तब आमद गणित समझिए. अखबार बिकता है, दो या तीन रुपये में. सप्ताह की कुल कीमत जोड़ दें, तो औसत कीमत 2.5 रुपये होगी रोज. इस 2.5 रुपये में हॉकर और एजेंटों का कमीशन है, लगभग 1.40 रुपये. आपके पास बचा (2.5-1.40) 1.10 रुपये प्रति कॉपी.

एक अखबार का उत्पादन लागत यानी एक अखबार निकालने में खर्च हुए सात रुपये. इस तरह, हर एक कापी में खर्च हुए (7-1.10) 5.90 रुपये. इस तरह, एक दिन में एक कापी पर घाटा हुआ लगभग 6 रुपये. अगर किसी अखबार की दस लाख प्रतियां रोज बिकती हैं, तो एक दिन में लॉस (घाट) हुआ लगभग 60 लाख रुपये. महीने में यह घाटा हुआ (60 गुणा 30) 18 करोड़ रुपये. साल में यह घाटा हुआ (18 गुणा 12) 216 करोड़. अब इस 216 करोड़ का लॉस फाइनेंसिंग सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन से होना है.

एक स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब उत्पादन लागत सात रुपये है, तो दो रुपये में क्यों बेचते हैं. घाटा उठा कर. बड़े अखबार, जो पूंजी संपन्न हैं, वे कीमत घटा देते हैं, ताकि कमजोर को मार सकें या जो जमेजमाये अखबार हैं, उनके बीच बाजार बनाने के लिए आपको कीमत कम करनी पड़ती है, ताकि पाठक अखबार खरीद-देख सकें. अंतत: प्रसार होगा (सरकुलेशन बढ़ेगा), तभी विज्ञापन भी मिलेंगे. इसलिए अखबार प्रसार बढ़ाने के लिए कीमत कम करने को विवश हैं.

अगर अंबानी समूह से 200 करोड़ का लोन नई दुनिया ने लिया भी होगा, तो उसका हश्र यही हुआ होगा. इसके ऊपर दफ्तर में बढ़ती बेशुमार तनख्वाह, जिसका कोई वास्ता प्रोडक्टीविटी (उत्पादकता) से नहीं है. उत्पादकता और तनख्वाह के बीच कोई अनुपात नहीं है. एक मामूली अखबार में कुल आमद (रिवेन्यू) कितने  फीसदी है? हिंदी के जो तीन बड़े अखबार है, उनमें 12 फीसदी, 11 फीसदी और 14 फीसदी हैं. क्योंकि इनके अनेक संस्करण हैं, तो कुछ खर्चे कामन निकल जाते हैं.

छोटे अखबार जिनके पास अनेक राज्यों के संस्करण नहीं हैं. न शेयर बाजार का पैसा है, न एफडीआइ है, न इक्विटी है, उनका वेज बिल (स्टाफ कास्ट, यानी तनख्वाह वगैरह पर खर्च) वर्ष 2009-10 में कुल आमद का 15 फीसदी था. इसी तरह वर्ष 2010-11 में, हिंदी के तीन बड़े अखबारों का स्टाफ कास्ट टोटल रेवेन्यू का 14 फीसदी, 14 फीसदी और 12 फीसदी था.

पर जो छोटे अखबार इनसे कंपीट करना चाहते हैं, उनका स्टाफ कास्ट 20 फीसदी. इसी तरह वर्ष 2011-12 में हिंदी के तीन बड़े अखबारों का स्टाफ कास्ट (परसेंटेज आफ टोटल रेवेन्यू) था, 12 फीसदी, 16 फीसदी और 12 फीसदी. पर अन्य छोटे अखबरों का लगभग 19-20 फीसदी. यानी नई दुनिया जैसे मंझोले या छोटे अखबार का स्टाफ कास्ट भी बड़े अखबारों के मुकाबले अधिक और आमद भी कम, तो अर्थशास्त्र के किस नियम के तहत ऐसे संस्थान चल सकेंगे?

बढ़ती लागत-महंगा कर्ज तोड़ रहे कमर

नयी अर्थव्यवस्था ने छोटे अखबारों के लिए संकट पैदा किया है. यह शुद्ध अर्थशास्त्र का मामला है. ऊपर से पिछले एक साल में आये अन्य आर्थिक परिवर्तनों को जान लीजिए, जिन्होंने छोटे अखबारों की कमर तोड़ दी है. पिछले तीन सालों में रंगीन स्याही पर कितना खर्च बढ़ा है, लगभग नौ लाख प्रतिदिन बिकनेवाले अखबारों का? अगर कीमत वृद्धि की यही रफ्तार रही, तो आगामी दो वर्षों में यह कितना बढ़ेगा? यह आकलन भी चार्ट में हैं.

2009-10 2010-11 2011-12 2012-13 2013-14
कीमत
रंगीन स्याही/किग्रा 139.55 146.84 166.86 183.00 195.00
वृद्धि (प्रतिशत में) 5 फीसदी 14 फीसदी 10 फीसदी 7 फीसदी

काली स्याही/ किग्रा 54.55 60.54 70.52 77.50 83.00
वृद्धि (प्रतिशत में) 11 फीसदी 16 फीसदी 10 फीसदी 7 फीसदी

सीटीपी प्लेट / प्लेट 153.78 152.98 150.25 159.00 165.00
वृद्धि (प्रतिशत में)- 1 फीसदी -1 फीसदी 6 फीसदी 4 फीसदी

कच्चे माल और स्याही के खर्च को प्रभावित करनेवाले कारक -

1. डॉलर का बढ़ता भाव बनाम भारतीय रुपये का घटता भाव.
2. पेट्रोलियम पदार्थों के बढ़ते भाव.
3. कमोडिटी प्राइस परिवर्तन और बाजार का अनुमान.

(नोट : 2012-13 एंड 2013-14 के भाव, अनुमान पर निकाले गये हैं. )

सूद का बढ़ा दर या कर्ज की कीमत

इस दौर में जो अखबार बाजार से या बैंक से लोन लेकर चल रहे हैं, उन पर क्या असर पड़ा है? यह जानना जरूरी है. ब्याज की कीमत आज क्या है? पिछले  एक-डेढ़ साल में लगातार खबरें आयीं कि रिजर्व बैंक ने रिवर्स रेपो रेट बढ़ाया. यह वह दर है, जिसके तहत आरबीआइ दूसरे बैंक से उधार लेता है और इससे एक फीसदी अधिक दर पर अन्य बैंकों को पैसा देता है. जनवरी 2004 से जनवरी 2012 के बीच का चार्ट देख लीजिए.

वर्तमान रेपो रेट 8.5 फीसदी है. जनवरी 2010 में यह 4.25 फीसदी था. वाणिज्यिक बैंक, इस रेट से छह से सात फीसदी अधिक सूद पर अच्छी साखवाले संगठनों को ॠण देते थे. आज सूद की दर है, 18-20 फीसदी. फर्ज कीजिए जिस अखबार की कंपनी ने 75 करोड़ का लोन 2010 में लिया था. तब उसे 8.4 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष सूद देना पड़ता. अब वह बढ़ कर 12.5 करोड़ से अधिक होगा. यानी चार करोड़ सूद अदायगी में, भारत सरकार की नीतियों के कारण, एक वर्ष में वृद्धि.

अगर 75 करोड़ से अधिक ॠण है, तो और अधिक सूद. इसका क्या असर होता है? अन्य प्रतिस्पर्द्धी कंपनियों के मुकाबले बाजार में सूद की देनदारी बढ़ जाना. उदाहरण के तौर पर वित्तीय वर्ष 2009-10 में हिंदी के तीन बड़े अखबारों का सूद और वित्तीय चार्ज ऐसे ॠणों पर था, एक फीसदी, तीन फीसदी और दो फीसदी. छोटे अखबारों का भी तब दो फीसदी था. इस बीच ॠण लेकर नई दुनिया की तरह, जिन छोटे या मंझोले अखबारों ने अपने संस्करण बढ़ाये और खर्च बढ़ाया, यह बढ़ कर चार फीसदी हो गया. वर्ष 2010-11 में.

जबकि हिंदी के तीन बड़े अखबारों (जिनके पास एफडीआइ है, इक्विटी और शेयर बाजार का पैसा है) उनके लिए यह घट कर एक फीसदी हो गया. 2011-12 में तीन बड़े घरानों का यह इंट्रेस्ट और फाइनेंस चार्ज (परसेंटेज आॅफ  टोटल रेवेन्यू) रहा- पहले का एक फीसदी, दूसरे का दो फीसदी और तीसरे का जीरो फीसदी.

यानी उसने अपना ॠण चुकता कर दिया. जिस छोटे अखबार ने अपने संस्करण फैलाये, उनके लिए अब खर्च हो गया, 6 फीसदी. अब आप बतायें, कौन सा आर्थिक गणित छोटे अखबारों के पक्ष में है? यानी सामान्य भाषा में कहें, तो सूद मद में बड़े अखबारों की देनदारी शून्य और छोटे अखबारों पर 10-20 करोड़ का सालाना कहर. ये और ऐसे अन्य खर्चे तो छोटे और मंझोले अखबारों को मार ही रहे हैं. पर सर्वाधिक असर डालने वाली चीज है, न्यूज प्रिंट की कीमत. औसत दर से न्यूज प्रिंट की कीमत में क्या बढ़ोतरी हुई है, और आनेवाले वर्षों का क्या अनुमान है, यह जान लीजिए -

वर्ष 2009-10 2010-11 2011-12 2012-13 2013-14
न्यूज प्रिंट / किग्रा 26 रु 29 रु 32 रु 34.50 रु 35.50 रु
वृद्धि (प्रतिशत) 11 फीसदी 12 फीसदी 7.5 फीसदी 3.5 फीसदी

दरअसल, कागज की बढ़ती कीमतों ने अखबारों की कमर तोड़ दी है. दुनिया में लगातार बड़ी अखबारी कागज मिलें बंद हो रही हैं. कच्चा माल न मिलने की वजह से. मिलों के बंद होने से बाजार में कम माल आ रहा है. भारत में उतनी मिलें नहीं हैं. किसी भी अखबार का सर्वाधिक खर्च न्यूजप्रिंट पर ही है. लगभग 80 से 90 फीसदी. पिछले एक साल में पांच कारणों से न्यूजप्रिंट की कीमत में भारी बढ़ोतरी हुई है-

1. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का कमजोर होना.
2. पूरी दुनिया में कई कागज मिलों का बंद होना.
3. भारतीय कागज मिलों की खराब आर्थिक स्थिति.
4. असंगठित बाजार में रद्दी कागज की कीमत.
5. बाजार में पालीथीन बैगों का घटता इस्तेमाल

इस तरह से गुजरे एक साल में न्यूजप्रिंट, अखबारी कागज की कीमतों में भारी वृद्धि. रंगीन स्याही, प्लेट और अन्य आवश्यक उपकरणों के भाव में वृद्धि. तनख्वाहों में बेशुमार वृद्धि. सूद और ब्याज की दरों में भारी वृद्धि. इन सबको मिला कर कुल असर एक अखबार के अर्थशास्त्र पर क्या पड़ेगा? क्या इसका अनुमान लगाये बगैर आप नई दुनिया के साथ हुए इस प्रकरण को समझ पायेंगे?
विज्ञापन बाजार भी बड़ों के साथ है!
 अखबारों की आमद का एकमात्र स्रोत, विज्ञापन का गणित या संसार भी समझ लीजिए. आज 2011-12 में कुल विज्ञापन बाजार है, 25594 करोड़ का. इसमें से 10791 करोड़ प्रिंट मीडिया के पास है. कुल विज्ञापन का लगभग 46 फीसदी हिस्सा, अंगरेजी अखबारों पर खर्च होता है. अब देश में कुल अंगरेजी अखबार कितने हैं, यह जोड़ लीजिए, तो पता चलेगा कि हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं की संख्या से कम हैं. पर उनके लिए विज्ञापन का बाजार ज्यादा बड़ा है.
 यानी 46 फीसदी. लगभग 4.5-4.6 हजार करोड़. प्रिंट मीडिया का लगभग 30 फीसदी हिंदी अखबारों पर खर्च होता है. हिंदी के कितने पत्र-पत्रिकाएं हैं, यह जोड़ लीजिए, तो साफ हो जायेगा कि प्रति अखबार कितना कम विज्ञापन उपलब्ध है. हिंदी के जो तीन-चार बड़े अखबार हैं, वो इसका लगभग 70-80 फीसदी (यानी 3-3.5 हजार करोड़) अकेले ले जाते हैं. अपना रेट घटा कर.

अधिक संस्करण होने की बारगेनिंग कर. आक्रामक मार्केटिंग कर. बड़े होने का लाभ लेकर. कई राज्यों में होने और अनेक संस्करण निकालने के बल. अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए स्थिति है कि लगभग 10800 करोड़ के प्रिंट विज्ञापन बाजार में से अकेले मराठी को सात फीसदी मिलता है. तेलुगु को चार फीसदी. तमिल को तीन फीसदी. बंगाली, गुजराती, मलयालम और कन्नड़ को 2-2 फीसदी. ओड़िया को एक फीसदी.

इसके और अंदर जायें, तो पता चलेगा, मध्य प्रदेश या राजस्थान जैसे हिंदी राज्य, जो बीमारू हिंदी राज्यों के दुष्चक्र से बाहर आ गये हैं, उनके यहां विज्ञापन बाजार की स्थिति क्या है? झारखंड-बिहार जैसे बीमारू माने जानेवाले, कम विकसित राज्यों में क्या स्थिति है? मध्य प्रदेश में लगभग 770 करोड़ का विज्ञापन बाजार है, जिसमें अकेले भोपाल और इंदौर में 460 करोड़ का व्यवसाय है.

इसी तरह राजस्थान में भी लगभग 650 करोड़ का विज्ञापन बाजार है. अकेले जयपुर 350 करोड़ का विज्ञापन बाजार है. इसके उलट बिहार में लगभग 350 करोड़ का बाजार है, जिसका 60 फीसदी यानी लगभग 200 करोड़ पटना का बाजार होगा. झारखंड का बाजार लगभग 170-200 करोड़ का होगा. इसमें से 50 फीसदी का विज्ञापन बाजार रांची से होगा.

अब आप गौर करें कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और झारखंड का फर्क क्या है? मध्य प्रदेश और राजस्थान में शहरीकरण अधिक है. बाजार अधिक विकसित है. तुलनात्मक रूप से संपन्नता अधिक है. इसलिए वहां विज्ञापन अधिक हैं. विज्ञापन बाजार का बजट बड़ा है. बिहार और झारखंड़ पिछड़े हैं, इसलिए यहां विज्ञापन बाजार कम है. यहां पर सरकार ही सबसे बड़ी विज्ञापनदाता है. क्योंकि बाजार विकसित ही नहीं हुआ है या कम विकसित हुआ है. अब बड़े अखबार क्या कर रहे हैं? वे मध्य प्रदेश से भी कई संस्करण निकाल रहे हैं.

राजस्थान से भी निकालते हैं. पंजाब हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड सब जगह से निकालते हैं. उनका सारे बाजारों पर कब्जा है. नई दुनिया जैसे अखबार या अन्य मंझोले अखबार, जो सिर्फ अपने प्रदेश में ही रह गये और जिन्हें अपने राज्य के बाजार या सरकार से विशेष मदद नहीं मिली, वे तो बंद होंगे ही. यह तो वैसी ही स्थिति है कि शेर के सामने मेमने को खड़ा कर दीजिए या एक व्यक्ति को 25-30 वर्ष तक खूब खिलाइए-पिलाइए और एक को 25-30 वर्षों तक कुपोषण का शिकार रखिए, ताकि वह सिर्फ नरकंकाल भर रह जाये और दोनों के बीच अखाड़े में कुश्ती-मुकाबला कराइए. तब अगर नरकंकाल हार जाता है, तो आप सवाल पूछिए कि आप हार क्यों गये?
 दरअसल, ऐसी जगहों पर सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है. क्यों सरकारें छोटे अखबारों को, अपने राज्य से निकलने वाले अखबारों को, कम प्रसार वाले अखबारों को प्राथमिकता के आधार पर विज्ञापन देकर नहीं बचातीं? जब ऐसे अखबार बिक या बंद हो जायेंगे, तब वे सवाल उठायेंगे कि ऐसा कैसे हो गया? इंदिराजी अपने जमाने में, बड़ी कंपनियां छोटी कंपनियों को न खायें या बड़ी मछली, छोटी मछली को न निगले, इसके लिए एमआरटीपी एक्ट लायी थीं.
 किसी राजनेता या दल द्वारा, आज आप इस तरह की बात सुनते हैं? क्या आपको याद है कि 1990-2000 के दशक के बीच हिंदी के कितने अखबार बंद हो गये? या अपने दम पर घिस-घिस कर चल रहे हैं. गौर करिए, दिनमान, दिनमान टाइम्स, धर्मयुग, माधुरी, हिंदुस्तान साप्ताहिक, नवभारत टाइम्स (जयपुर, लखनऊ, पटना), आवाज, आर्यावर्त्त, प्रदीप, संडे मेल (जेवीजी ग्रुप का अखबार), स्वतंत्र भारत. वगैरह-वगैरह. दलों द्वारा संचालित मुखपत्रों को भी याद कर लीजिए. नेशनल हेरल्ड (कांग्रेस), नवजीवन (कांग्रेस), गणशक्ति (माकपा), मदरलैंड (भाजपा). पता नहीं, नवज्योति और वीर अर्जुन जैसे अखबार कहां और किस हाल में हैं? यह सूची और बड़ी हो सकती है. नई दुनिया जैसे अखबार भी इसी द्वंद्व और हालात से गुजरे होंगे.
 ब्रिटेन के राज्य में, क्यों सूर्यास्त नहीं होता था? उसने नयी तकनीक खोज कर आर्थिक साम्राज्य कायम किया. वह आधुनिक राष्ट्र बना. उसके पास पूंजी थी, नयी तकनीक थी. सबसे तेज चलनेवाले समुद्री जहाज थे. इसलिए उन्हें कई इतिहासकारों ने माडर्न राबर्स (आधुनिक लुटेरा) कहा है, जो नये हथियारों से, पूंजी से लैश थे. बाबर या मुगल, भारत के खिलाफ हमलों में क्यों कामयाब हुए? क्योंकि उनकी सेना में, तोप चलाने की ताकत थी. भारतीय सेना बिदकते हाथियों-घोड़ों और जंग लगी तलवारों तक सीमित थी. यही स्थिति मीडिया की दुनिया में भी है. जिसके पास साधन है