अब पूनम बनेगी मिर्जापुर की बहुरिया
श्रीप्रकाश
शुक्ला



पूनम की मुफलिसी का आलम ये था कि 2014 ग्लासगो
राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने के लिए पूनम के पिता ने भैंस बेच दी थीं। ग्लासगो
राष्ट्रमंडल खेलों से कांस्य पदक जीतकर लौटी बेटी की खुशी में मिठाई बांटने के लिए
बाप के पास पैसे तक नहीं थे। बीते दिनों का जिक्र आते ही पूनम की मां और दादी की आंखों
से आंसू निकल आते हैं। बचपन में पूनम मां-बाप के साथ खेतों में काम से लेकर घर में
भैंस और अन्य जानवरों को चारा देने तक का काम करती थी। पूनम खेतों में जहां खूब
मेहनत करती थी वहीं अपना ध्यान खेल में भी शिद्दत से लगाया जिसका नतीजा यह है कि
आज वह अपने परिवार के साथ देश का नाम रोशन कर रही है।
पूनम यादव बताती हैं कि उनके परिवार की आर्थिक
स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। बचपन में तो हम लोगों को एक वक्त भी अच्छे से खाना
नहीं मिल पाता था। जब हम बहुत छोटे थे, तभी बाबा चल बसे। उसके बाद की सारी जिम्मेदारी मेरे पिता ने उठाई।
उनके लिए यह सब बहुत मुश्किल था। हम सात भाई-बहन थे। पांच बहनें और दो भाई। पापा
के पास खेती के अलावा कोई काम नहीं था। जमीन भी सिर्फ दस बीसा ही थी। इसी में खेती
करके सभी का पेट भरना होता था। बड़ी मुश्किल से गुजारा होता था। यहां तक कि
कभी-कभार भूखे पेट सोना पड़ता था। इस मुश्किल समय में पापा से लोगों ने कहा कि अपनी
बच्चियों को पढ़ाइए। पापा ने सरकारी स्कूल में हमारा नाम लिखाया। लेकिन हम लोगों को
पढ़ाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। एक बार रुपये-पैसे की इतनी तंगी हो गई कि हमारी
पढ़ाई बीच में रोकनी पड़ी। पापा बहुत परेशान थे। कहीं से भी वह इतनी रकम नहीं जुटा
पा रहे थे कि हमारी पढ़ाई-लिखाई जारी रखी जा सके। फिर पापा को किसी ने सलाह दी कि आप चाहे जो कीजिए, लेकिन इन बच्चियों को अगर आगे बढ़ाना है, तो इन्हें पढ़ाइए जरूर। जैसे-तैसे करके
फिर से पढ़ाई शुरू हुई। गांव के पास ही स्कूल था। हम पैदल स्कूल जाते थे। कई बार तो
मैं बगैर चप्पल के भी स्कूल गई हूं। भीषण गर्मी में बगैर चप्पल के पैर जलते थे, फिर भी हम स्कूल जाते थे।
पैसा न होने का मतलब ही हर तरह की चुनौतियों का
सामना करना होता है। मैं पढ़ने में ठीक थी, लेकिन किसी भी तरह की सुविधा नहीं थी। पापा बहुत सुबह उठा देते थे
पढ़ने के लिए। चार बजे के करीब उठकर मैं और मेरी बहनें पढ़ाई करते थे। कई बार तो देर
रात तक पापा पढ़ाते थे। पास कोचिंग की सहूलियत तो थी नहीं, इसलिए घर पर ही पढ़ाई करनी होती थी।
पापा सभी बहनों को पढ़ाते थे। इतनी मेहनत करने के बाद भी कई बार हम लोगों को टीचर
से डांट खानी पड़ती थी। कई बार तो ऐसा हुआ कि स्कूल पहुंचने में अगर देर हुई, तो हमें क्लास के बाहर खड़ा कर दिया
गया। प्रिंसिपल कहतीं कि तुम देरी से आई हो, अब दो पीरियड तक बाहर ही खड़ी रहो। शुरू-शुरू में मेरे खेल को लेकर उस
तरह का सपोर्ट स्कूल से नहीं मिला, जैसा मिलना चाहिए था। मेरी बहन जब दसवीं में पढ़ती थी, तो उसे लगा कि पापा के लिए कुछ करना
चाहिए। उसी ने पापा से बात की, तो पापा ने कहा कि तुम लोग खेलो। पापा ने ही ले जाकर स्टेडियम में हम
लोगों को प्रवेश दिलाया। इसके बाद वहां के प्रशिक्षक ने हमारा बहुत साथ दिया। वह
हमें लेकर गए और स्पोर्ट्स हॉस्टल में एडमीशन करा दिया। यहीं से हमारी जिन्दगी में
बदलाव आना शुरू हुआ।
स्पोर्ट्स हॉस्टल में एडमीशन के बाद भी जिन्दगी
बहुत कठिन थी। घर स्टेडियम से बहुत दूर था। 10-12 किलोमीटर की दूरी रही होगी। पापा हम लोगों को साइकिल
पर बिठाकर कैंट रेलवे स्टेशन ले जाते। वहां से फिर हम लोग स्टेडियम जाते। वहां लोग
बहुत ‘कमेंट’ मारते थे। सबको लगता था कि इस शहर में गांव से आकर खेलने वाली ये
लड़कियां कौन हैं?
लड़की
होकर ऐसे खेल खेलने जा रही हैं। इससे भी बड़ी मुश्किल यह थी कि घर पर प्रैक्टिस
करने का कोई साधन नहीं था। एक दिन पापा कहीं से एक रॉड लेकर आए, उसमें चक्की के पहिए लगाकर हम लोग
प्रैक्टिस करने लगे। बाकी थोड़ी-बहुत एक्सरसाइज, जिसके लिए किसी इक्विपमेंट की जरूरत नहीं होती। वह भी हम घर पर ही कर
लिया करते थे। फिर भी पापा ने हम लोगों का हौसला बढ़ाए रखा। वह हर तरह से सपोर्ट
किया करते थे। पापा कहते कि किसी की बात मत सुनो, बस जाओ और जाकर मेहनत करो। तुम लोगों को कुछ बड़ा करना है। स्टेडियम
के अलावा जिम में जाना भी बहुत जरूरी था। लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि हम
जिम जाएं, तो हम लोगों ने तरह-तरह की कसरत का जुगाड़
घर पर ही कर लिया था।
वेटलिफ्टिंग में ‘डाइट’ अच्छी चाहिए, जो तब हमें मिलती तक नहीं थी। पर न तो मैंने कभी इन बातों को लेकर
दिल छोटा किया और न कभी कोई शिकायत की। दूसरी तरफ, पापा ने भी कभी मुझे मना नहीं किया कि मुझे वेटलिफ्टिंग नहीं करनी
है। वह न तो चुनौतियों से घबराए, न ही समाज की तरफ से उठने वाले उन सवालों से कि लड़कियों को खेल में
डालने की क्या जरूरत है? मेरे
करियर के शुरुआती दिनों से लेकर आज तक जो भी कामयाबी आई, उसके पीछे मेरे पापा का सपना है। हमें
सिर्फ मेहनत ही तो करनी थी, जो अब भी चल रही है। गोल्ड कोस्ट में गोल्ड मेडल जीतकर
देश का नाम रोशन करने वाली पूनम यादव भविष्य में मिर्जापुर की बहू बनेंगी। ओलम्पिक
में हिस्सा लेने के बाद पूनम यादव और फौजी धर्मराज यादव दाम्पत्य सूत्र बंधन में
बंधेंगे, इस बात पर सहमति दोनों परिवारों में हो चुकी है। पूनम के पिता कैलाश यादव
का कहना है कि उनकी बेटी की शादी मवैया गांव के धर्मराज यादव से तय हुई है।
धर्मराज भी खिलाड़ी रहे हैं।