Wednesday, 15 April 2015

सानिया का एक और कमाल

खेल की दुनिया में ग्लैमर का तड़का लगाने के लिए सानिया मिर्जा के नाम के साथ अमूमन सनसनी शब्द जोड़ा जाता रहा है। उनके खेल के अलावा उनके टी शर्ट, नाक की बाली, रैंप पर फैशन परेड, पाकिस्तानी खिलाड़ी शोएब मलिक से विवाह, टीवी के रियलिटी शो में प्रतिभागी बनना, हर बात पर सनसनी खोजी गई। लेकिन अब उन्होंने जो कमाल कर दिखाया है, उसके लिए सनसनी शब्द कमजोर लगता है। विश्व की नंबर एक खिलाड़ी बनने की अद्भुत, असाधारण, अभूतपूर्व उपलब्धि उन्होंने हासिल की है और इस ऊंचाई तक पहुंचने वाली पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं। सानिया मिर्जा की यह कामयाबी अनूठी इसलिए हो जाती है, क्योंकि यह सब उन्होंने भारतीय लड़की होते हुए हासिल किया। भारत में लड़की होते हुए खेल को करियर बनाना और उसमें एक दशक से अधिक समय तक टिके रहना, कितना कठिन है, इसका वर्णन सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, मैरीकाम, सबा अंजुम, मिताली राज, दीपिका कुमारी जैसी लड़कियां ही कर सकती हैं। इनमें से किसी को आर्थिक तंगी से होकर अपनी राह बनानी पड़ी, तो किसी को सामाजिक वर्जनाओं का सामना करना पड़ा, कहींलिंगभेद की दीवार खड़ी हुई तो कहींधर्म के कट्टर फरमान। हर किसी की अपनी संघर्ष गाथा है, इसलिए जब वे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी कामयाबी हासिल करती हैं तो वह चांद को छूने जैसी ही होती है। सानिया मिर्जा ने तो अब चांद के साथ-साथ कई सितारों को भी अपने दामन में समेट लिया है। 2003 में जूनियर विम्बलडन चैंपियन बनने के बाद उनका टेनिस करियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ा। किंतु इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आए। सिंगल्स में उनकी विश्व रैंकिंग 27 तक पहुंची। लेकिन कलाई की एक चोट के कारण सिंगल्स की जगह डबल्स पर उन्होंने अधिक ध्यान देना शुरू किया। इसमें एक के बाद एक जीत का सिलसिला शुरू हुआ। 2009 में आस्ट्रेलियन ओपन, 2012 में फ्रेंच ओपन, 2014 में यू एस ओपन, राष्ट्रमंडल खेल, एशियाड सभी में उन्होंने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। स्विट्जरलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ जोड़ी बनाने के बाद उनके करियर को नई ऊंचाइयां मिली। बीते रविवार मार्टिना हिंगिस के साथ डब्ल्यूटीए फैमिली सर्किल कप का फाइनल जीतने के बाद अब सानिया मिर्जा विश्व की नंबर एक टेनिस खिलाड़ी बन गईं, और उन दोनों की जोड़ी भी नंबर वन जोड़ी बन गई है। सानिया से पहले भारत के सिर्फ लिएंडर पेस और महेश भूपति डबल्स रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचे हैं। अपने खेल के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद सानिया ने कहा कि जिस खेल को मैं इतना प्यार करती हूं उसमें नंबर-1 बनना सचमुच मेरे लिए असाधारण बात है। उम्मीद है कि इससे सही संदेश जाएगा। लोगों को समझने की जरुरत है कि लड़कियां जो करना चाहें करने दिया जाए। अगर दूसरे उन पर भरोसा नहीं करें तो माता-पिता को उन पर यकीन करना चाहिए। साथ देना चाहिए। 
भारत में महिलाएं खेलों में करियर तलाशने लगी हैं। लेकिन ज्यादातर अब भी ये ही सोचती हैं कि कई चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं। सभ्यता और संस्कृति इसकी अनुमति नहीं देता। मेरी कामयाबी ये ही कहती है कि लड़की जो करना चाहे वो करने दीजिए। मुझे उम्मीद है कि और भी लड़कियां आगे आएंगी। सानिया मिर्जा के इस कथन से असहमत नहींहुआ जा सकता। अभी कुछ दिनों पहले ही बैडमिंटन में साइना नेहवाल ने विश्व का नंबर एक खिलाड़ी होने का ताज पहना था। सानिया और साइना जैसी लड़कियां अन्य भारतीय लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं और करारा जवाब हंै उन रूढ़िवादी लोगों के लिए जो लड़की पैदा करने पर मां की कोख पर ही सवाल उठाते हैं।

Saturday, 11 April 2015

सपनों के सौदागर

इसी साल के अंत में बिहार में विधान सभा चुनाव होना हैं। चुनाव में अभी आठ माह का समय होने के बावजूद राजनीतिक दल पैंतरेबाजी शुरू कर चुके हैं। बिहार में राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो समय और मतदाता तय करेगा, फिलहाल यहां का राजनीतिक परिदृश्य इस कदर बदल चुका है कि लगता ही नहीं मतदाता कोई ठोस निर्णय ले पाएगा। 2014 के आम चुनावों में मिली अपार सफलता के बाद से ही कमल दल बिहार को लेकर मदमस्त है। उसे बिहार की सल्तनत मुट्ठी में आई लग रही है, जबकि यहां के बिगड़े समीकरणों पर फतह पाना भाजपा ही नहीं किसी भी दल के लिए आसान बात नहीं होगी।
राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता, यह बात राजनीतिक दलों के बेमेल गठजोड़ों से बार-बार सच साबित हो रही है। एक-दूसरे के धुर राजनीतिक विरोधी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की हालिया एका  बेशक बिहार में कोई कमाल न दिखा पाये पर इन बदले समीकरणों ने कमल दल की पेशानियों में जरूर बल ला दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहां बिहार की आवाम की ख्वाहिशें पूरी करने में अक्षम साबित हुए हैं वहीं लालू और उनकी जुगलबंदी के पास जात-पात की जोड़-तोड़ के अलावा कोई ठोस राजनीतिक मुद्दा भी नहीं है, जिससे बिहारियों को बहलाया-फुसलाया जा सके। फिलवक्त बिहार में जात-पात की कश्मकश ऐसे मोड़ पर है, जिसमें जीतन राम मांझी तुरुप का इक्का साबित होते दिख रहे हैं। मांझी बिहार की आवाम को मझधार से बाहर निकालने की ताकत तो नहीं रखते लेकिन उनके मैदान में ताल ठोकने मात्र से ही जनता परिवार की दम जरूर निकल सकती है। बिहार में भाजपा यही कुछ चाहती भी है।
भारतीय जनता पार्टी के पास लालू प्रसाद यादव या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मात देने का एकमात्र अस्त्र सुशील मोदी हो सकते थे लेकिन इन्हें भी अपनी ही पार्टी की जड़ों पर मठा डालने की बुरी आदत है। नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को नाराज कर जहां अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली वहीं कमल दल की उम्मीदों को भी पर लगा दिए हैं। स्थितियां कैसी भी हों सुशील मोदी अपनी ही पार्टी के तेज-तर्रार नेताओं का मानमर्दन कर सूबे का सरताज बनने की हसरत जरूर पाले हैं। नीतीश कुमार की जहां तक बात है वह अपने शासनकाल में जनता से किए वायदे पूरे करने में जहां नाकामयाब साबित हुए वहीं जीतन राम मांझी को अपमानित कर लगभग 10 फीसदी महादलितों को भी नाराज कर दिया है। दलितों की इस नाराजगी के चलते लालू-नीतीश का जनता परिवार बिहार में अपना राजनीतिक अभीष्ट पूरा कर पाएगा इसमें संदेह है।
बिहार में महादलित वोट बैंक की जहां तक बात है, यह अब तक जदयू और राजद के हाथों ही खेलता रहा है। भाजपा ने इस वोट बैंक को हासिल करने के प्रयास तो किए लेकिन उसे सफलता कभी नहीं मिली। जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार के बीच हुए पंगे के बाद कमल दल को उम्मीद बंधी है कि वह इन वोटों का ध्रुवीकरण कर अपनी हसरत पूरी कर सकता है। बिहार में नीतीश कुमार ताकतवर तो हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने भूमि सुधार, समान स्कूल शिक्षा प्रणाली और कृषि रोड मैप की जो तीन बातें प्रमुखता से कही थीं उन्हें आठ साल बाद भी वे धरातल नहीं दे पाए हैं। नीतीश कुमार 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। 2006 में भूमि सुधार आयोग का गठन हुआ और डी. बंदोपाध्याय के नेतृत्व में भूमि सुधार आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंप दी थी। इसके तहत 12 लाख एकड़ जमीन को सरकारी या भूदान समिति के नियंत्रण से मुक्त कराकर भूमिहीनों में बांटने और पर्चारहित अलग बटाईदारी कानून आदि बनाने की सिफारिश के बाद भी इसे लागू नहीं किया जा सका।
नीतीश कुमार ने बिहार की आवाम से समान स्कूल शिक्षा प्रणाली का भी वादा किया था। प्रोफेसर मुचकुंद दुबे ने समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग की सिफारिश 2007 में राज्य सरकार को पेश तो की लेकिन वह भी धरातल पर उतरती नहीं दिखी। इससे संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छह से 14 साल की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा मुहैया नहीं हो पाई। नीतीश ने राज्य के सभी बच्चों को उनके घर के पास ही समान स्तर की शिक्षा मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था लेकिन इस योजना का भी बच्चों को कोई लाभ नहीं मिला। सपनों के सौदागर नीतीश ने राज्य में खेती को नया रूप देने के लिए वीएस व्यास कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कृषि रोड मैप तो तैयार कराया लेकिन राजनीतिक खींचतान के चलते सारी सिफारिशें फाइलों में ही दफन हो गर्इं। झारखण्ड के अलग होने के बाद बिहार के पास प्राकृतिक संसाधन के नाम पर बचे जल और जमीन का भी नीतीश सरकार समुचित इस्तेमाल नहीं कर सकी।
नीतीश कुमार केन्द्र की मोदी सरकार को लेकर खूब तंज कसते हैं लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि जब तक सामंती ताकतों के गठजोड़ से हुकूमतें चलेंगी तब तक गरीब और मजदूरों के हित में क्रांतिकारी फैसले नहीं लिए जा सकते। आज जब समूची दुनिया आर्थिक राह चल रही हो ऐसे में गरीबों के पक्ष में खड़ा होने के लिए न केवल हौसला चाहिए बल्कि कुर्सी का मोह त्यागने की हिम्मत भी जरूरी है। जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से बिहार देश में पहले स्थान पर है। ऐसे में यहां भूमि की उपलब्धता सबसे बड़ी समस्या है। नीतीश ही नहीं हर राजनीतिज्ञ को पता है कि बिहार में भूमि सुधार, कृषि विकास और बच्चों की शिक्षा को लेकर अच्छी सोच और मेहनत से जो रिपोर्ट तैयार हुई वह क्यों और कैसे राजनीतिक दुर्घटना और प्रशासनिक जड़ता का शिकार हो गई। नीतीश कुमार और लालू यादव को गरीबों के सपनों की सौदागरी करने की बजाय बिहार की आवाम का दुख-दर्द दूर करने के प्रयास करने चाहिए। 

Saturday, 4 April 2015

साइकिल पर जनता परिवार

राजनीति में कुछ भी गलत और कुछ भी सही नहीं होता। सब कुछ  इस बात पर निर्भर है कि किसका, कितना लाभ होता है। सारे फैसले, जरूरत और स्वहित के लिए होते हैं। यहां अच्छा-बुरा कुछ नहीं होता है। जो दिन में बुरा होता है वही शाम को अच्छा लगने लगता है। कम से कम भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में आजकल कुछ यही हो रहा है। नरेन्द्र मोदी को दिल्ली में बेशक आप ने आईना दिखाया हो पर अधिकांश राज्यों में कमल दल को अकेले टक्कर देने की किसी दल में ताकत नहीं दिखती। कांग्रेस मन से हार मान चुकी है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, जनता दल सेक्युलर, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) पर मोदी मैजिक हावी है। छह दलों का जनता परिवार इन दिनों गलबहियां कर रहा है। मोदी को राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसाने की जनता परिवार की चाल कितना कारगर होगी यह तो समय बताएगा पर मतलब की इस एका से कांग्रेस भी सकते में है।
आम चुनाव में बुरी तरह मात खाने के बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव और मोदी से खुला पंगा लेने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की समझ में ही नहीं आया था कि उनकी सियासत अनायास अर्श से फर्श पर कैसे आ गई। उस पराजय के बाद से ही छोटे-छोटे राजनीतिक दलों में मोदी के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने की विवशता दिखाई देने लगी थी। 16 मई, 2014 से पूर्व नीतिश को लालू नहीं भा रहे थे तो मुलायम भी खासी अकड़ में थे। भला हो उनके पारिवारिक कुनबे का जोकि बमुश्किल संसद की सीढ़ी चढ़ पाये। लोकसभा चुनाव से पहले आज के इस जनता परिवार का हर दल चाहे वह सत्ता में रहा हो या सत्ता से बाहर अपने आपको बाहुबली मान रहा था, लेकिन जब परिणाम निकले तो मोदी की सुनामी में सबके मंसूबे बह गये। हिन्दीभाषी दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मुलायम सिंह और नीतिश कुमार की जो फजीहत हुई उसकी तो किसी राजनीतिक विश्लेषक ने भी उम्मीद नहीं की थी। इन दो राज्यों से 140 सदस्य संसद की सीढ़ी चढ़ते हैं। उस पराजय के बाद ही छोटे-छोटे दलों को यह एहसास हुआ कि यदि अब एक नहीं हुए तो देश भर में कमल खिल जाएगा।
नीतिश कुमार के सबसे कटु आलोचक लालू यादव जो स्वयं भी उनके हाथों हारने से पहले 10 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं, उन्होंने भी मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से हाथ मिलाने में अपनी गनीमत समझी। नतीजा यह रहा कि इन दोनों ने साथ मिलकर बिहार उप चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया और वहां पर भाजपा केन्द्र में खुद की सरकार होने के बावजूद अपनी पुरानी कहानी नहीं दोहरा पायी। जो भी हो पिछले साल नवम्बर में हुए जनता परिवार एकीकरण के प्रयास एक बार फिर नए सिरे से कुलबुलाने लगे हैं। एका की इस बेचैनी की वजह इसी साल बिहार और 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव हैं। इन राज्यों से पहले पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होने हैं लेकिन ममता बनर्जी उत्तर भारत की इस एका पर कोई दिलचस्पी नहीं लेना चाहतीं।
आगामी विधान सभा चुनावों में भाजपा को जीत से दूर रखने के लिए पांच अप्रैल को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के घर न केवल जनता परिवार पर अंतिम मुहर लगने की सम्भावना है बल्कि ये राजनीतिक अलम्बरदार एक झण्डे और एक निशान के नीचे भी आ सकते हैं। यदि ऐसा सम्भव हुआ तो इन दलों के सबसे प्रभावी नेता मुलायम सिंह न केवल जनता परिवार के मुखिया होंगे बल्कि इनका चुनाव चिह्न भी साइकिल हो सकता है। जनता परिवार के एकीकरण से इतर मोदी और भारतीय जनता पार्टी के तेवर और ताकत को देखें तो मोदी सरकार जो कहकर सत्ता में आई थी, वैसा 10 माह के शासनकाल में कुछ भी नहीं हुआ। देश के जो हालात हैं उसे देखते हुए साल के अंत तक इसमें और क्षरण हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भूमि अधिग्रहण अधिनियम को भाजपा ने जिस तरह नाक का सवाल बनाया है उसे देखते हुए मोदी सरकार पर किसान विरोधी होने का ठप्पा लग गया है। राजनीति में असम्भव नाम का कोई शब्द नहीं होता, ऐसे में छह दलों के जनता परिवार में सौदेबाजी से भी इंकार नहीं किया जा सकता। स्थानीय पार्टियों को मिलाकर जनता परिवार तो बन जाएगा पर यह कितने दिन का होगा इसकी गारण्टी भी बहुत कम है। देश के राजनीतिक इतिहास में इससे पूर्व भी कई गठबंधन अस्तित्व में आए लेकिन वे लम्बी रेस का घोड़ा कभी साबित नहीं हुए। देश में इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी के रूप में एक गठबंधन सरकार बनी थी लेकिन यह सरकार अपने ओछे कारनामों से तीस महीने में ही बिखर गई थी। इस बिखराव की वजह इसके तीन शीर्ष नेताओं मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं रहीं। इस टूटन के बाद 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनता की तालियों के बीच प्रधानमंत्री पद सम्हाला था लेकिन मंडल-कमंडल के प्रयोग से वह भी 11 माह में ही लोगों की आंख की किरकिरी बन गये। खैर, इन दिनों भारतीय राजनीति में जनता परिवार के विलय को लेकर खासी दिलचस्पी देखी जा रही है। छह दलों के इस कुनबे को समाजवादी जनता दल या समाजवादी जनता पार्टी के नाम से जाना जाएगा। इस नये गठबंधन की मुखालफत करने वालों का कहना है कि चूंकि मोदी सरकार भारत की मूल भावना के खिलाफ  काम कर रही है, यही वजह है कि समाजवादी विचारधारा के पुराने लोग देश बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं। इस राजनीतिक एकजुटता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो समय बताएगा पर आने वाले कुछ दिनों में भारतीय राजनीति का परिदृश्य जरूर बदला-बदला सा नजर आएगा।
(लेखक पुष्प सवेरा के समाचार संपादक हैं।)

Thursday, 2 April 2015

ताकि बना रहे क्रिकेट में गेंद और बल्ले का रोमांच...

इस बार क्रिकेट वर्ल्ड कप 2015 में रनों की बारिश होती रही। कई बल्लेबाजों ने ना सिर्फ मैदान पर चौके और छक्के उड़ाए बल्कि ताबड़तोड़ कई रिकार्ड भी बना डाले। बल्ले से रनों की रिमझिम बारिश होती रही और बेचारे गेंदबाज विकेट के लिए संघर्ष करते नजर आए।
मिसाल के तौर पर इस बार के क्रिकेट वर्ल्ड कप में तीन बल्लेबाजों के रनों को अगर आप देखे तो ऐसा लगता है कि क्रिकेट की दुनिया में अब सिर्फ बल्लेबाजों की हीं चांदी होती दिख रही है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बल्लेबाज  गेंदबाजों पर हावी होता नजर आता है। न्यूजीलैंड के मार्टिन गुप्टिल ने 9 मैचों में 547 रन बनाए जो इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा रन रहा। दूसरी तरफ श्रीलंका के कुमार संगकारा ने 7 मैचों में 541 रन बनाए तो दक्षिण अफ्रीका के विस्फोट बल्लेबाज एबी डिविलियर्स ने 8 मैचों में 482 रन बनाकर टूर्मामेंट में तीसरे स्थान पर रहे।
दरअसल बल्लेबाजों का यह शानदार प्रदर्शन सिर्फ उनके बल्ले या फॉर्म की वजह से ही नहीं हुआ है बल्कि आईसीसी के उस नए नियम की बदौलत भी मुमकिन हो पाया है जिसके तहत 30 गज के दायरे के बाहर 4 खिलाड़ी से ज्यादा गेंदबाजी कर रही टीम खड़ा नहीं कर सकती। सेमीफाइनल में टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने ऑस्ट्रेलिया से हाथों हुई हार के बाद इस नियम की जमकर आलोचना की थी। पहले जो नियम था उसके मुताबिक सर्किल के अंदर पांच खिलाड़ी हुआ करते थे। लेकिन जब से यह नियम (सिर्फ चार खिलाड़ियों को बतौर फिल्डर खड़ा करने का) लागू हुआ है तबसे बल्लेबाजों का पक्ष गेंदबाजों के मुकाबले मजबूत और हावी होता चला जा रहा है। हमेशा छक्के और चौके पड़ने से ही रोमांच नहीं बढ़ता। गेंद और बल्ले के बीच अच्छा मुकाबला तभी देखने को मिलता है जब मैच करीब का  होता है । यह तभी मुमकिन है जब गेंद और बल्ले का मुकाबला बराबरी का हो। इसी नियम की वजह से अब मैच एकतरफा हो गए हैं।
धोनी ने इस नियम में बदलाव की वकालत की थी। धोनी के मुताबिक क्रिकेट के इतिहास में वनडे मैचों में दोहरा शतक नहीं देखा और अब 3 साल में 3 दोहरे शतक (असल  में 6) बन गए हैं। धोनी का मानना है कि इस नियम की वजह से ज्यादा रन बनते है और गेंदबाजों के करने लायक ज्यादा कुछ नहीं बच जाता। क्योंकि सर्किल के अंदर सिर्फ 4 खिलाड़ी ही रहते है लिहाजा बल्लेबाज को रन बनाने और लॉफ्टर शॉट लगाने में पहले के मुकाबले अब आसानी होती है। फिर स्कोर बोर्ड पर रनों का अंबार खड़ा हो जाता है।
वनडे क्रिकेट में चार फील्डरों के नियम पर महेंद्र सिंह धोनी के सुर में सुर मिलाते हुए आस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क ने भी 30 गज के भीतर पांच फील्डर रखने के पक्ष में है जिससे गेंदबाजों को भी अधिक मौके मिल सके। दरअसल गेंदबाज को अधिक मौके मिलते हैं और मुकाबला बराबरी का होता है जिससे क्रिकेट के असल रोमांच के दीदार होते है। लेकिन चार फिल्डरों की वजह से गेंदबाज पर बल्लेबाज पूरी तरह हावी हो जाता है। क्लार्क की तरह भारतीय क्रिकेट टीम के दिग्गज बल्लेबाज राहुल द्रविड़ भी इस नियम के खिलाफ है और बदलाव की वकालत कर रहे है।
दरअसल धोनी सहित क्रिकेट के कई जानकारों को इस बात का डर सता रहा है कि इस नियम की वजह से क्रिकेट सिर्फ चौकों और छक्कों का खेल ना बनकर रह जाए। क्योंकि इससे यह ‘उबाऊ’ हो जाएगा। क्रिकेट एक रोमांचकारी खेल है जिसमें ओवर के अंतिम गेंद तक कभी-कभार रोमांच देखने को मिलता है। क्रिकेट वर्ल्ड कप 2015 के तहत न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच यह रोमांच देखने को मिला। जहां हर गेंद पर बल्ले से बनता रन रोमांच में हर पल इजाफा करता चला जा रहा था, तो दूसरी तरफ गिर रहे विकेट भी रोमांचक मैच की पटकथा लिख रहे थे। दरअसल क्रिकेट के मैदान में बल्लेबाज सिर्फ रन बनाता जाए तो यह उबाऊ सा बन जाता है जिसमें मजा नहीं आता है। कुछ अंतराल पर विकेटों का गिरना खेल में रोमांच पैदा करता है। इस खेल का तानाबाना ही ऐसा है कि रन बनना और विकेट गिरना दोनों दर्शकों को रोमांचित करते है। रन बनने के दौरान जहां दर्शकों को चौके और छक्के लुभाते है तो वही विकेट गिरने के वक्त 'रन आउट, पगबाधा (lbw), कैच आउट और बोल्ड' रोमांच के साथ दिल की धड़कनें भी बढ़ा देते है।
वनडे (50-50 ओवर) के फॉर्मेट से उबने और उसके विकल्प के बाद ही टी-20 का जन्म हुआ। और अब टी-20 के बाद क्रिकेट की दुनिया में फिलहाल नए फॉर्मेट की गुंजाईश कतई नहीं दिखती। क्रिकेट के इतिहास में टेस्ट मैच का खेल  सबसे पुराना है। लेकिन पांच दिनों तक खेले जाने वाले इस फॉर्मेट के बाद 50-50 ओवरों वाला वनडे मैच का जन्म हुआ। क्रिकेट के जानकार वनडे को परफेक्ट रोमांच का माध्यम मानते है जिसमें लगभग 9 घंटे के बाद मैच के परिणाम का पता चल जाता है। और एक दिन में यह पता चला जाता है कि जीत का स्वाद किसने चखा और हार किसे मयस्सर हुई।
रही बात रन बनने के रोमांच की तो बोलिंग और बैटिंग पावरप्ले के तहत 15 ओवर काफी ज्यादा होते है। जब भी कोई टीम खेल रही होती है तो शुरुआती 10 ओवर और 35 से 40 ओवर के पांच ओवरों का इंतजार सभी करते है क्योंकि यह पावरप्ले के ओवर होते हैं जिसमें बल्लेबाज रनों की बारिश करता है और विकेट भी गिरते है। इसलिए धोनी की इस दूरदर्शी सोच पर आईसीसी को नए सिरे से विचार करना चाहिए जिसमें उन्होंने क्रिकेट के रोमांच के खत्म हो जाने और उबाऊ होने की आशंका जताई है। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि क्रिकेट गेंद और बल्ले के उस मिक्सड रोमांच का नाम है जहां बल्लेबाज रन बनाता है तो गेंदबाज गेंद के बल पर विकेटों को चटखाता है।
SANJEEV KUMAR DUBEY  

राष्ट्रीय स्कूल खेलों में उत्तर प्रदेश का शर्मनाक प्रदर्शन

देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य 15वें स्थान पर
18 स्वर्ण, 37 रजत, 59 कांस्य सहित 114 पदक जीते
श्रीप्रकाश शुक्ला
आगरा। 15 मार्च, 2012 को जब युवा अखिलेश यादव ने देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सल्तनत सम्हाली थी, तब लगा था कि अब सूबे के खिलाड़ी खिलखिलाएंगे और प्रदेश में खेलों का कायाकल्प होगा। अफसोस ऐसा नहीं हुआ। राष्ट्रीय स्कूल खेलों की ओवर आॅल चैम्पियनशिप जीतने की कौन कहे 2014-15 में वह तालिका में 15वें स्थान पर रहा। यह राष्ट्रीय स्कूली खेलों में उत्तर प्रदेश का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है।
स्कूल खेलों को किसी राज्य की प्रतिभा कसौटी माना जाता है। इस कसौटी में उत्तर प्रदेश की प्रतिभाएं लगातार पिछड़ रही हैं। यहां स्कूली शिक्षा जहां नकल की भेंट चढ़ रही है वहीं स्कूली खिलाड़ी अव्यवस्था के चलते अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में नाकाम हैं। राष्ट्रीय स्कूल खेलों में देश के सभी राज्यों सहित कोई 41 यूनिटें शिरकत करती हैं। पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय स्कूल खेलों में शीर्षता की जंग दिल्ली और महाराष्ट्र के बीच ही रही है। स्कूल खेलों में उत्तर प्रदेश की जहां तक बात है, उसके खिलाड़ी हरियाणा, पंजाब, मणिपुर, केरल मध्य प्रदेश और असम जैसे छोटे-छोटे राज्यों के खिलाड़ियों को भी माकूल जवाब नहीं पा रहे हैं। साल दर साल स्थिति में सुधार की कौन कहे उनका प्रदर्शन लगातार गिरता जा रहा है।
कहने को प्रदेश की मिनी राजधानी सैफई में भारतीय खेल प्राधिकरण के कई खेल सेण्टर आबाद हैं लेकिन वहां से भी कोई नायाब प्रतिभाएं राष्ट्रीय क्षितिज पर चमक बिखेरती नहीं दिख रहीं। खेलों में जहां छोटे-छोटे राज्यों के खिलाड़ी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं वहीं उत्तर प्रदेश की प्रतिभाएं लगातार पिछड़ रही हैं। प्रदेश सरकार खिलाड़ियों के प्रोत्साहन की बातें तो करती है लेकिन जमीनी स्तर पर प्रयास होते नहीं दिख रहे। 2012-13 के राष्ट्रीय स्कूल खेलों में उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों ने 27 स्वर्ण, 36 रजत, 74 कांस्य सहित 137 पदक तो 2013-14 में 40 स्वर्ण, 46 रजत, 84 कांस्य सहित 195 पदक जीते थे। मौजूदा (2014-15) सत्र में प्रदेश के खिलाड़ी 18 स्वर्ण, 37 रजत, 59 कांस्य सहित 114 पदक के साथ 15वें स्थान पर रहे। राष्ट्रीय स्कूल खेलों में उत्तर प्रदेश का यह अब तक का सबसे शर्मनाक प्रदर्शन है। राष्ट्रीय स्कूल खेलों में प्रदेश के खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन युवा अखिलेश यादव सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता।
आगरा से संचालित होते हैं राष्ट्रीय स्कूल खेल
खेलों में उत्तर प्रदेश की स्थिति बेशक खस्ताहाल हो पर आगरा शहर स्कूल खेलों में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों के लिए खास है। स्कूल गेम्स  फेडरेशन आॅफ इण्डिया का मुख्यालय आगरा में ही है। वर्ष 2012 से विभिन्न स्कूली खेल गतिविधियां यहीं से संचालित हो रही हैं। शाहगंज के राधा बल्लभ इण्टर कॉलेज परिसर स्थित एसजीएफआई के इस मुख्यालय से ही राष्ट्रीय स्कूल खेलों का संचालन होता है। देश के सभी राज्यों सहित 41 यूनिटों की कमान एसजीएफआई के महासचिव डॉ. राजेश मिश्रा सहित 30 लोगों के हाथों में है।

राष्ट्रीय स्कूल खेलों में उत्तर प्रदेश की स्थिति
58वें स्कूल खेल 2012-13
क्रमांक राज्य स्वर्ण रजत कांस्य कुल पदक
01- दिल्ली 293 129 97 519
02- महाराष्ट्र 219 184 191 594
03- हरियाणा 76 91 125 292
04- पंजाब 64 87 124 275
05- मणिपुर 50 56 38 144
06- केरल 48 52 52 152
07- एमपी 37 42 74 153
08- कर्नाटक 31 32 51 114
09- छत्तीसगढ़ 28 23 46 97
10- प. बंगाल 27 38 36 101
11- उत्तरप्रदेश 27 36 74 137

59वें स्कूल खेल 2013-14
क्रमांक राज्य स्वर्ण रजत कांस्य कुल पदक
01- दिल्ली 354 151 109 614
02- महाराष्ट्र 197 219 248 664
03- हरियाणा 68 76 77 221
04- पंजाब 60 107 158 325
05- केरल 55 52 53 160
06- मणिपुर 54 42 42 135
07- तमिलनाडु 47 38 62 147
08- एमपी 43 45 74 162
09- उत्तर प्रदेश 40 46 84 170
10- गुजरात 34 69 92 195
11- प. बंगाल 34 33 42 109


60वें स्कूल खेल 2014-15
क्रमांक राज्य स्वर्ण रजत कांस्य कुल पदक
01- दिल्ली 362 161 131 654
02- महाराष्ट्र 219 233 222 674
03- हरियाणा 82 68 131 281
04- मणिपुर 56 38 43 137
05- पंजाब 53 112 142 307
06- तमिलनाडु 53 65 64 182
07- केरल 53 48 48 149
08- एमपी 48 46 99 193
09- प. बंगाल 36 39 54 129
10- झारखण्ड 29 28 27 84
11- असम 28 53 72 153
12- छत्तीसगढ़ 27 34 79 140
13- गुजरात 26 59 95 180
14- कर्नाटक 24 42 52 118
15- उत्तर प्रदेश 18 37 59 114

Wednesday, 1 April 2015

खिलाड़ी ही नहीं डोपिंग में कोच को भी निलम्बित करना जरूरी: मिल्खा


मैं अपनी जिंदगी में केवल तीन बार रोया
नई दिल्ली। अपने जमाने के दिग्गज एथलीट मिल्खा सिंह ने खेलों में डोपिंग को कैंसर करार देते हुए कहा कि केवल प्रतिबंधित दवाईयां लेने वाले खिलाड़ी ही नहीं बल्कि उसके कोच और संबंधित डॉक्टर को भी निलम्बित किया जाना चाहिए।
उड़न सिख ने मिल्खा श्योरफिट फिटनेस कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा, डोपिंग खेलों में कैंसर की तरह है। सरकार और खेल संघों को इस पर सख्त रवैया अपनाना चाहिए। इसके लिए खिलाड़ी ही नहीं कोच और डॉक्टरों को भी निलम्बित किया जाना चाहिए क्योंकि यह सब इनकी देखरेख में होता है।
भारत के कई खिलाड़ी विशेषकर भारोत्तोलक पिछले कुछ वर्षों में डोपिंग में पकडेÞ जाते रहे हैं। केरल में हाल में हुए राष्ट्रीय खेलों के दौरान भी कुछ खिलाड़ी प्रतिबंधित दवाईयों के सेवन के दोषी पाये गये थे। मिल्खा ने इसके साथ ही कहा कि यदि देश आजादी के छह दशक से भी अधिक समय बाद दूसरा मिल्खा तैयार नहीं कर पाया है तो उसके लिये काफी हद तक भारतीय एथलेटिक्स संघ भी दोषी है जोकि अपने काम के प्रति संजीदा नहीं है।
उन्होंने कहा, हमारी जनसंख्या 120 करोड़ से अधिक है लेकिन हम पिछले 60 साल में दूसरा मिल्खा पैदा नहीं कर पाये। इससे मुझे दुख होता है। इसकी वजह यह है कि हमारे खिलाड़ी, हमारे कोच और हमारी एसोसिएशन संजीदा नहीं हैं। रोम ओलम्पिक 1964 में मामूली अंतर से पदक से चूकने वाले 86 वर्षीय मिल्खा ने कहा, मैं चाहता हूं कि मैं जो नहीं कर पाया वह कोई और करे। मैं भारत को ओलम्पिक में एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतते हुए देखने के लिये जीवित रहना चाहता हूं।
मिल्खा ने हालांकि उम्मीद जतायी कि चीन के वुहान में जून में होने वाली 21वीं एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भारतीय खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा, एशियाई स्तर पर हम हमेशा अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं। यहां हमें ज्यादा चुनौती नहीं मिलती। मुझे उम्मीद है कि यहां एशियाई चैम्पियनशिप में हम कुछ पदक जीतने में सफल रहेंगे।
मिल्खा ने हाल में इंडिया ओपन का खिताब जीतने वाली विश्व की नम्बर एक खिलाड़ी बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल की तारीफ करते हुए कहा कि अन्य खिलाड़ियों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा, बैडमिंटन में साइना नेहवाल बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है। हमने मुक्केबाजी, कुश्ती, निशानेबाजी में भी अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन हमारे पास आज भी एथलेटिक्स में कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं है जो ओलम्पिक में पदक जीत सके जबकि एथलेटिक्स सभी खेलों की जननी है। इस महान एथलीट ने मिल्खा श्योरफिट कार्यक्रम के बारे में बताया, यह देश के बच्चों को स्वस्थ और पूरी तरह फिट से बनाने से जुड़ा है। तभी हम प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार कर सकते हैं।
मिल्खा इस अवसर पर अपने पुराने दिनों को याद करते हुए भावुक भी हो गये। उन्होंने कहा,अपनी जिंदगी में मैं केवल तीन बार रोया। पहले 1947 में बंटवारे के समय जब मैंने अपने सामने अपने माता-पिता और भाई-बहनों का कत्ल होते हुए देखा। दूसरा जब मैं रोम ओलम्पिक में पदक से चूका और तीसरा जब मैंने खुद पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग देखी। इस फिल्म ने मेरी उम्र दस साल बढ़ा दी।

आंवलखेड़ा में बन रहा अनूठा सूर्य मंदिर

दिन में सूर्य की किरणों से प्रकाशित होगा मंदिर
इस साल के अंत तक तैयार हो जाएगा मंदिर
आगरा। सामाजिक परिवर्तन की चाह, आत्म परिष्कार की उमंग और अध्यात्म के वैज्ञानिक स्वरूप को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य की जन्मस्थली आंवलखेड़ा में एक अनूठे सूर्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है।  इस मंदिर की खासियत यह है कि दिन के समय सूर्य की किरणें ही मंदिर के भीतर स्थापित भगवान भास्कर की मूर्ति और भवन को प्रकाशित करेंगी।
आगरा जिला मुख्यालय से कोई 35 किलोमीटर दूर आंवलखेड़ा में सूर्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। दो तलों में बन रहे इस मंदिर की खासियत इसमें लगाया जाने वाला लेंस होगा जिससे सूर्य की किरणें मंदिर के भीतर पहुंचेंगी। सूर्योदय से सूर्यास्त तक मंदिर सूर्य की रोशनी से ही प्रकाशित होगा।  इस अनूठे सूर्य मंदिर और ब्रह्मकमल का निर्माण कार्य अंतिम दौर में है। उम्मीद है कि यह मंदिर इसी साल बनकर तैयार हो जाएगा। अब आंवलखेड़ा आध्यात्मिक ऊर्जा ही नहीं, पर्यटन के लिहाज से भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र होगा। अब देश-विदेश से आने वाले लोग न सिर्फ ताजमहल का दीदार करेंगे बल्कि सूर्य मंदिर देखने आंवलाखेड़ा भी जरूर जाएंगे। भारत में उत्कल के कोणार्क के बाद अब पर्यटक आंवलखेड़ा में भगवान भास्कर के अद्भुत मंदिर तथा ब्रह्मकमल के दर्शन भी कर सकेंगे। आंवलखेड़ा में सूर्य से अध्यात्म और तकनीक की किरणें फूटेंगी तो साधकों को ध्यान का अवसर भी मिलेगा।
जलेसर रोड के किनारे स्थित आंवलखेड़ा को दिन-रात की अथक मेहनत के बाद आध्यात्मिक पर्यटन स्थल के रूप में तैयार किया जा रहा है। गायत्री परिवार के मुख्यालय हरिद्वार स्थित शांतिकुंज द्वारा तीर्थों की परम्परा में एक नया प्रयोग करते हुए आध्यात्मिक दृष्टि से अमूल्य धरोहर के रूप में इस सूर्य मंदिर को विकसित किया जा रहा है तो यहां के पुराने परिसर को ज्यों का त्यों संवारा जा रहा है।
कक्ष के केन्द्र में धवल संगमरमर से बनी मूर्ति में भगवान भास्कर देव सारथी के साथ रथ पर सवार हैं। उनके रथ में सात घोड़े ऐसी मुद्रा में लगाए गए हैं मानो अभी दौड़ने लगेंगे। इसके पीछे उदीयमान सूर्य का दृश्य उकेरा गया है। मंदिर में गायत्री मंत्र और प्रज्ञा गीत निरंतर चलते रहेंगे। सूर्य मंदिर के नीचे के तल में स्वास्तिक भवन बनाया गया है। इसमें पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवनवृत्त, व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनी लगाई जाएगी। यहां उनके द्वारा लिखी गई 3200 पुस्तकें, चारों वेद, 108 उपनिषद, छह दर्शन, 20 स्मृति, 18 पुराण, गीता एवं रामायण सारांश, गायत्री महाविज्ञान तथा दैनिक जीवन से जुड़ी वस्तुएं देखने को मिलेंगी।
मंदिर के शिखर पर लगेगा लेंस
मंदिर के शिखर पर एक लेंस लगाया जाएगा।  इस लेंस पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों से मंदिर में स्थापित भगवान भास्कर की मूर्ति और भवन प्रकाशित होगा। ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक मंदिर में सूर्य की रोशनी से ही प्रकाश रहे ताकि कृत्रिम प्रकाश की आवश्यकता न पड़े।
2011 में शुरू हुआ था निर्माण कार्य
अभियंता शरद पारधी ने बताया, मंदिर का निर्माण अगस्त 2011 से शुरू हुआ है। परिसर का नक्शा नागपुर के आर्किटेक्ट अशोक मोखा द्वारा तैयार किया गया है। निर्माण कार्य दिल्ली की कंस्ट्रक्शन कम्पनी कर रही है। दिल्ली और नागपुर से आए कुशल कारीगरों की कही सच मानें तो मंदिर का निर्माण छह माह में ही पूरा हो जाएगा।
चेन्नई में तैयार हुई है भगवान भास्कर की मूर्ति
मंदिर में स्थापित की गई सूर्यदेव की मूर्ति चेन्नई से तैयार होकर आई है। मंदिर के शिखर पर लगने वाले लेंस के लिए वृत्ताकार जगह छोड़ दी गई है। जानकारों का मानना है कि लेंस लगने के बाद मंदिर भव्य और अनूठेपन की मिसाल कायम करेगा। अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या के अनुसार, गुरु चरणों में समर्पित योजना को पूरा होने के बाद लोग आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहेंगे। गायत्री शक्तिपीठ,आंवलखेड़ा के व्यवस्थापक घनश्याम देवांगन के अनुसार यहां सूर्य से अध्यात्म और तकनीक की किरणें फूटेंगी।