Saturday, 9 November 2013

महिला होने की गर्वोक्ति आखिर कब?

आज महिलावाद या महिला विमर्श एक फैशन बन गया है। महिलाओं के मुद्दों पर चिन्तित समाज आंदोलन की राह चल निकला है। महिलाओं के लिए हो रहे आन्दोलन कोई नई बात नहीं हैं।  नारी अस्मिता और उससे जुड़े तमाम सवालों का हल हमारा समाज बीते दो सौ साल से खोज रहा है तथापि समस्याएं यथावत हैं। अठारहवीं शताब्दी के मध्य से ही दुनिया भर की तमाम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। भारत में महिलाओं की गरिमा को सनातन समय से गौरवशाली मुकाम हासिल है बावजूद आज सब कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता।
भारत में सरोजिनी नायडू पहली ऐसी महिला थीं जिन्होंने एनी बेसेण्ट और अन्य लोगों के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना की थी। उन्नीसवीं शताब्दी की महिला आन्दोलनकारियों में फ्रांस की सिमोन द बोउवा का नाम सर्वोपरि है। उनकी पुस्तक द सेकेण्ड सेक्स स्त्री विमर्श की चर्चित कृति है। सिमोन मानती थीं कि स्त्री का जन्म भी पुरुष की तरह ही होता है मगर परिवार व समाज द्वारा उसमें स्त्रियोचित गुण भर दिए जाते हैं। 1970 में फ्रांस के नारी मुक्ति आंदोलन में भाग लेने वाली सिमोन स्त्री के लिए पुरुष के समान स्वतंत्रता की पक्षधर थीं। महिलाएं चाहे जिस भी नस्ल, वर्ण, जाति, धर्म, संस्कृति या देश की हों, उनका संघर्ष लगभग एक समान है। आश्चर्यजनक तो यह है कि स्त्रीवादियों के आन्दोलन की जो लहर अठारहवीं शताब्दी के मध्य में उठी थी, अब तक अपनी मंजिल नहीं पा सकी है। धार्मिक नेता और समाज के ठेकेदार युवतियों के रहन-सहन, परिधान, संचार साधनों के उपयोग और जीवनसाथी के चयन जैसे सर्वथा निजी मामलों में भी अपनी राय थोपकर उनकी स्वतंत्रता का हनन करते हैं। वस्तुत: महिलाओं के संदर्भ में रोजगार, शिक्षा और कानून को लेकर समानता की मांग बेमानी नहीं है क्योंकि वे हर जगह भेदभाव से पीड़ित हैं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की उन्नति के मार्ग में हर कदम पर अवरोध दिखाई देते हैं।
महिलाएं अपने परिवार के लिए अथक परिश्रम करती हैं पर उनके श्रम को कोई सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है। भारत में तो कर्तव्य और प्रेम की ओट में उसके श्रम की अनदेखी कर दी जाती है। मगर दु:ख की बात यह है कि भारतीय महिलाओं की स्थिति सरकार के समस्त प्रयासों के बावजूद दयनीय होती जा रही है। आज सबसे बड़ी समस्या महिलाओं की स्वतंत्रता नहीं, सुरक्षा की है। संसद की महिलाओं के पोषण से सम्बन्धित कामकाज देखने वाली केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की लोकसभा प्राक्कलन समिति ने सरकार को इस बात के लिए फटकारा है कि देश में आज भी 70 प्रतिशत बच्चे और 60 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं। देश तमाम प्रौद्योगिक क्षेत्रों में विकास कर रहा है, संचार और तकनीकी युग में इतना कुपोषण शर्म की ही बात है। कुपोषण रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए ग्रोथ चार्ट के बाद भी देश में बच्चों एवं महिलाओं की स्थिति जस की तस है। महिलाओं और बच्चों के कुपोषण पर हमारी सरकारों और उनके विभागों के बीच समन्वय का बेहद अभाव है।
सरकार कुपोषण खत्म करने के लिए जो भी योजनाएं लागू की कर रही है, वे जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं हो पा रही हैं। आंगनबाड़ियों और स्वास्थ्य विभाग में व्यापक समन्वय की कमी है। अधिकांश बच्चों का वजन नहीं लिया जाता। इससे वास्तविकता का पता नहीं चलता। एक समय प्रधानमंत्री ने भी कुपोषण को देश के लिए राष्ट्रीय शर्म बताया था। पर सरकार और समाज दोनों के बीच कोई चेतना और समस्याओं के प्रति जुझारूपन देखने को नहीं मिलता। इसी समिति ने यह भी बताया है कि देश में बच्चों में कुपोषण 1998-99 में 74 प्रतिशत के मुकाबले 2005-06 में 80 प्रतिशत हो गया यानी कुपोषण की दर घटने की बजाय बढ़ गई है।
यह गम्भीर मामला है। हम जिस स्तर को स्थिर नहीं रख सके, कम से कम उसे दुर्गति की ओर जाने से तो रोक ही सकते थे। आज ग्रामीण क्षेत्रों में सुदृढ़ होती स्वास्थ्य व्यवस्थाएं, जैसा वाक्य सरकारी विज्ञापन का हिस्सा तो हो सकता है लेकिन वास्तविकता से इसका बहुत वास्ता नहीं हो सकता। देश में हर बार बजट बढ़ता है और हर बार कुपोषण भी सामने आता है। हर बार कुपोषण, रक्त अल्पता, निरक्षरता की शिकार महिलाओं की संख्या करोड़ों में हो जाती है। देश में बाल विवाह को लेकर लाख सजगता का दम्भ भरा जाता हो पर प्रतिवर्ष लाखों की तादाद में जवाबदेह लोगों के सामने क्रूर मजाक होता है। आज देश में करीब 40 प्रतिशत लड़कियों का बाल विवाह राष्ट्रीय शर्म की बात नहीं तो क्या है?
दुर्भाग्य की बात है जिस समय समय संयुक्त राष्ट्र बाल विवाह रोकने की बात कर रहा था ठीक उसी समय हरियाणा में एक राजनैतिक पार्टी के नेता 15 वर्ष में लड़कियों के विवाह की सलाह दे रहे थे। भारतीय समाज, यहां का शासक वर्ग अपने हितों को बनाये रखने व राजनैतिक पार्टियां अपने चुनावी गणित की दृष्टि से पिछड़े सामंती मूल्यों को बनाये रखे हुए हैं। यही कारण है कि भ्रूण हत्या, बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसी तमाम स्त्री विरोधी प्रथाएं और परम्पराएं आज भी बदस्तूर जारी हंै। शासक वर्ग इन समस्याओं के समाधान में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। वह मात्र चुनावी रस्म अदायगी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जड़ में चोट करने वाले व्यापक आंदोलन की शुरूआत हो। 

सपा के गढ़ में मोदी की नमो-नमो

देश की सल्तनत के लिए चुनाव होने में अभी वक्त है, पर राजनीतिक दल पांच राज्यों में होने जा रहे विधान सभा चुनावों में अपनी ताकत का अंदाजा लगाने की पुरजोर कोशिश में जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश अभी विधान सभा चुनावों से बहुत दूर है, पर यहां की 22 करोड़ जनता राजनीतिक दलों की नजर में है। चुनाव कोई भी हो देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश राजनीतिक दलों के मानस को जरूर हलाकान करता है। इसकी वजह यहां की 80 लोकसभा सीटें हैं। सभी दल जानते हैं कि उत्तर प्रदेश से ही देश के दिल दिल्ली के तख्तोताज को रास्ता जाता है। आगामी लोकसभा चुनावों का बिगुल बजने में अभी वक्त है, बावजूद कमल दल के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी समाजवादी पार्टी के राजनीतिक गढ़ में सेंध लगाने की खातिर 19 अक्टूबर को कानपुर में नमो-नमो करने जा रहे हैं। भाजपा की इस भावना को भांपते हुए राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 18 अक्टूबर को ही कानपुर को विकास की सौगातें सौंपकर कमल दल की हवा निकालने का जतन कर चुके हैं। इस नूरा-कुश्ती में नफा-नुकसान का पता लगने में अभी वक्त है, पर सपा का यह राजनीतिक पैंतरा मोदी के प्रयासों पर पानी फेर सकता है।
जो भी हो मोदी की 19 अक्टूबर की कानपुर रैली को ऐतिहासिक बनाने के लिए कमल दल ने पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी को भरोसा है कि कानपुर रैली न केवल ऐतिहासिक होगी बल्कि सपा के गढ़ में इस बार वह सेंध लगाने में जरूर सफल होगी। अनुमानित भीड़ को देखते हुए जहां भाजपा को मोदी की सुरक्षा की चिन्ता सताने लगी है वहीं प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी की पेशानियों में भी बल पड़ता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा-भाजपा की इस उठापटक पर बहुजन समाज पार्टी  की भी नजरें गड़ी हुई हैं। हालांकि वह अभी अपने पत्ते खोलने के मूड में नहीं है। नरेन्द्र मोदी की कानपुर रैली को उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरूआत माना जा रहा है। देखा जाए तो कानपुर क्षेत्र में कमल दल की हालत बेहद खस्ता है। वजह साफ है यहां सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने अपनी राजनीतिक जमीन इतनी मजबूत कर ली है कि दूसरे दलों के लिए यहां सेंधमारी आसान बात नहीं है।  सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के गृह जिले इटावा तथा संसदीय क्षेत्र मैनपुरी सहित अन्य क्षेत्र उसके मजबूत गढ़ हैं। आलम यह है कि इस क्षेत्र की सात लोकसभा सीटों में से छह समाजवादी पार्टी के कब्जे में हैं जबकि कानपुर महानगर में कांग्रेस का कब्जा है।
नमो-नमो की कानपुर रैली के निहितार्थ हैं। भाजपा कानपुर में हिन्दुत्व और विकास की अलख जगाकर देश के सबसे गरीब महानगर में जहां वोटों का ध्रुवीकरण करने की फिराक में है वहीं उसके इन प्रयासों से सपा पर भी अपने गढ़ को बचाने का मानसिक दबाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता। कमल दल की मंशा है कि वह सपा को उसके ही गढ़ में ललकार कर उसे इस क्षेत्र से इतर हाथ-पैर चलाने से रोक दे। भाजपा अपने इस मिशन में यदि सफल रहती है तो सपा का उत्तर प्रदेश में 60 सीटें जीतने का सपना हवा-हवाई होने से इंकार नहीं किया जा सकता। सपा एक जुझारू पार्टी है, वह आसानी से कमल दल से मात नहीं खाएगी। उसने इसका जवाब देने का तरीका ढूंढ़ निकाला है। नरेंद्र मोदी के कानपुर में नमो-नमो से एक दिन पहले 18 अक्टूबर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यहां कई विकास परियोजनाओं का पिटारा खोलने जा रहे हैं। सपा के इस सियासी पैंतरे से कमल दल भी सकपका गया है।
राजनीतिक बीथिका में चर्चा है कि कानपुर में गुजरात के विकास पुरुष नरेंद्र मोदी जहां भावी भारत की तस्वीर खींचेंगे वहीं प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  महानगर को विभिन्न परियोजनाओं की सौगात देकर यह संदेश देने की कोशिश करेंगे कि समाजवादी पार्टी प्रदेश के सम्पूर्ण विकास के एजेण्डे पर चलने वाली पार्टी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कानपुर दौरा भाजपा की भभकी का ही सीधा विरोध है।  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने कानपुर दौरे में आधुनिक पुलिस नियंत्रण कक्ष, एक बालिका इण्टर कॉलेज और गरीब परवरदिगारों के लिए बनाए गए पांच सौ से ज्यादा मकानों का उद्घाटन करने के साथ-साथ तीन सामुदायिक केन्द्रों और कानपुर विकास प्राधिकरण की बहुमंजिला पार्किंग का शिलान्यास करेंगे।
नरेन्द्र मोदी और अखिलेश यादव कानपुर की जनता पर अपना क्या प्रभाव छोड़ते हैं यह तो भविष्य तय करेगा पर अपने-अपने राज्यों में विकास की पटकथा लिख रही इन दोनों ही शख्सियतों में कई समानताएं भी हैं। जहां देश के अधिकांश राजनीतिक दल मोदी को मुस्लिम विरोधी करार देते हैं वहीं वे अपने सूबे में इस जमात के बीच खासे लोकप्रिय हैं। बीते विधान सभा चुनाव में राज्य के 35 फीसदी मुसलमानों का मोदी को मिला समर्थन इस बात की गवाही देता है कि लोग मोदी की विकास अवधारणा के कायल हैं। सपा और मुस्लिम बिरादर एक-दूसरे के पूरक हैं। सच कहें तो पिछले विधान सभा चुनावों में मुस्लिमों और युवाओं ने ही अखिलेश को प्रदेश की सल्तनत सौंपी है। मोदी और अखिलेश दोनों ही युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं। भारत आज युवाओं का देश है। आर्थिक क्षेत्र में भारत एक ताकत बनने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय मोदी का यूपी में जादू चलेगा या युवा अखिलेश लोगों की आंखों का तारा बनेंगे यह कमोबेश कानपुर की रैली में देखने को मिल सकता है। आज उत्तर प्रदेश का युवा न केवल बेरोजगार है बल्कि वह भ्रमित भी है। उसे लगता है कि उसकी जिंदगी राजनीतिक आश्वासनों के बीच ठहर सी गई है। उसे जीवन चलाने के लिए रोजगार तो घर बसाने के लिए आटे-दाल का भाव पता होना चाहिए। पर ऐसा नहीं है। मोदी और अखिलेश में कौन इन युवाओं का रोल मॉडल होगा यह कुछ महीनों में ही पता चल जाएगा। फिलहाल इस समय राजनीतिक दलों की नजरें 18 और 19 अक्टूबर को कानपुर में होने जा रहे विकास जयघोष पर टिकी हैं।

अम्बाला में फहरा आगरा का परचम

शिवम, अभिनव और विपुल अब पुणे में दिखाएंगे जौहर
आगरा। बीते साल आगरा को केन्द्रीय विद्यालय संगठन की नेशनल लॉन टेनिस प्रतियोगिता में ओवर आॅल चैम्पियन बनाने वाले ग्वालियर के शिवम शुक्ला और अभिनव गौतम ने 24 से 28 अक्टूबर तक अम्बाला में खेली गई प्रतियोगिता में अपने शानदार खेल-कौशल से न केवल लोगों की वाहवाही लूटी बल्कि अण्डर 19 आयु वर्ग में आगरा को चैम्पियनशिप भी दिलाई। अण्डर 17 आयु वर्ग में आगरा केन्द्रीय विद्यालय एक के विपुल प्रताप सिंह ने व्यक्तिगत एकल के सेमीफाइनल में दस्तक देकर एसजीएफआई का टिकट कटाया।
अम्बाला में शानदार कामयाबी के बाद अब शिवम, अभिनव और विपुल प्रताप दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में पुणे में होने वाले स्कूल गेम्स फेडरेशन आॅफ इण्डिया की टेनिस स्पर्धा में केन्द्रीय विद्यालय संगठन टीम का प्रतिनिधित्व करेंगे। अम्बाला में खेली गई नेशनल लॉन टेनिस प्रतियोगिता की टीम स्पर्धा के अण्डर 17 आयु वर्ग में आगरा के विपुल और आकर्षित से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन यह जोड़ी पहले राउण्ड में वाकओवर मिलने के बाद दूसरे मुकाबले में दिल्ली से हार गई। व्यक्तिगत सिंगल्स मुकाबलों में आकर्षित महाजन से आकर्षक खेल की उम्मीद थी पर वह पिछले साल की सफलता दोहराने में असफल रहा। इसी आयु समूह में विपुल प्रताप सिंह ने जोरदार खेल दिखाया और सेमीफाइनल तक पहुंचा। कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में वह हार गया। विपुल को बेशक कांस्य पदक नहीं मिला पर उसने एसजीएफआई की टिकट जरूर कटा ली।
प्रतियोगिता के अण्डर 19 आयु वर्ग में केन्द्रीय विद्यालय-एक ग्वालियर के शिवम शुक्ला और अभिनव गौतम ने टीम स्पर्धा में मजबूत चेन्नई,जयपुर और दिल्ली के खिलाफ शानदार जीत दर्ज करने के बाद खिराबी मुकाबले में तिनसुकिया को 2-0 से पराजय का पाठ पढ़ाया। उम्मीद थी कि आगरा और तिनसुकिया के बीच खिताबी मुकाबला कांटे का होगा, पर सिंगल्स में अभिनव ने 4-0 और डबल्स मुकाबले में शिवम-अभिनव की जोड़ी ने 4-1 से शानदार जीत दर्ज कर आगरा की झोली में टीम स्पर्धा का स्वर्ण पदक डाल दिया। टीम स्पर्धा में स्वर्णिम सफलता से उत्साहित इन खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत एकल मुकाबलों में भी दमदार प्रदर्शन किया। शिवम फाइनल तो अभिनव सेमीफाइनल तक पहुंचा। सिंगल्स में शिवम ने रजत तथा अभिनव ने कांस्य पदक जीता। इन खिलाड़ियों के उम्दा प्रदर्शन से न केवल आगरा चैम्पियन बना बल्कि इससे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश गौरवान्वित हुए।
खिलाड़ियों ने कहा- वेरी-वेरी थैंक्स पुष्प सवेरा
अम्बाला में विजय पताका फहराकर आगरा लौटे नेशनल चैम्पियन खिलाड़ियों शिवम शुक्ला, अभिनव गौतम और विपुल प्रताप सिंह ने जैसे ही अपनी उपलब्धियों को समाचार पत्र में देखा, वे न केवल खुशी से झूम उठे बल्कि इस प्रोत्साहन के लिए पुष्प सवेरा को वेरी-वेरी थैंक्स भी कहा। टीम के साथ गये झांसी के टीम मैनेजर केपी सिंह ने पुष्प सवेरा के 19 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित अम्बाला में फहरेगा आगरा का परचम समाचार की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि समाचार पत्र के आकलन को मेरा और मेरे खिलाड़ियों का सलाम। पुष्प सवेरा ने जो कहा वही सच हुआ। वेरी-वेरी थैंक्स पुष्प सवेरा।

भीड़ से भरोसे की कवायद

एक तरफ दुनिया भारतीय वैज्ञानिकों की मंगल मिशन पर शानदार कामयाबी की बलैयां ले रही है तो दूसरी तरफ मुल्क की तारणहार राजनीतिक पार्टियां सल्तनत के लिए भीड़तंत्र का सहारा ले रही हैं। लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं पर राजनीतिक क्षत्रप अपने-अपने पराक्रम की दुहाई देने का कोई भी मौका जाया नहीं करना चाहते।  यह जानते हुए भी कि आज देश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित और तीसरा नागरिक भूखा सोता है। तरक्की की डींगें और गरीबी के बीच फासला बढ़ता ही जा रहा है। पिछले पांच साल के तरक्की के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक तरफ देश में अरबपतियों की संख्या 24 से बढ़कर 55 हुई है तो भूखे पेट सोने वालों में करोड़ों का इजाफा हुआ है। यह विडम्बना ही है कि आज मुल्क न सिर्फ अरबपतियों की संख्या के मामले में बल्कि गरीबों के मामले में भी अफ्रीकी देशों को कड़ी शर्मनाक टक्कर दे रहा है। ये आंकड़े न सिर्फ त्रासद व चुनौतीपूर्ण हैं बल्कि कालान्तर में इनके और विस्फोटक होने से इंकार नहीं किया जा सकता।
देखा जाए तो भारत में आर्थिक असमानता सदियों से विद्यमान रही है, पर पिछले 20-25 साल में इसमें बेतहाशा वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों पर गौर करें तो 2004-05 से 2011-12 के बीच देश में अमीरी-गरीबी के बीच की खाई न सिर्फ चौड़ी हुई बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में यह पिछले 35 साल के सबसे अधिक स्तर पर दर्ज की गई। शहरी क्षेत्रों में भी असमानता का ग्राफ रिकार्ड 0.37 प्रतिशत के स्तर पर जा पहुंचा है। समाज में बढ़ती आर्थिक विपन्नता और विरोधाभास लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इतिहास गवाह है कि विरोधाभासों से घिरा समाज ज्यादा समय तक शांत और सुरक्षित नहीं रह सकता। दरअसल, आर्थिक विरोधाभास समाज के मूल पर प्रभाव डालता है। यही वजह है कि देश के हर कोने में आज व्यवस्था के प्रति लोगों में रंज है। यहां तक कि लोगों का गुस्सा सशस्त्र संघर्ष के रूप में सामने आने लगा है। क्या यह परिदृश्य एक लोकतंत्र के लिए जो समता, समरसता और सामाजिक न्याय के मूल्यों का पक्षधर और पहरुआ हो, उसके लिए उचित है?
आज सभी राजनीतिक दल देश की सल्तनत हथियाने के लिए गरीबों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। खुद डरे-सहमे राजनीतिज्ञ उसे निडरता का पाठ पढ़ा रहें हैं जोकि हर पल भूखा पेट भरने को डरता और मरता है। भीड़तंत्र जुटाने के इस प्रहसन में कोई भी दल दूध का धुला नहीं है। राजनीतिक दलों के इस सत्ता खेल में कांग्रेस व भाजपा ही नहीं तीसरे मोर्चे के सम्भावित लोग भी दम ठोक रहे हैं। देश की सल्तनत पिछले 16 साल से गठबंधन के बंधन में जकड़ी हुई है। मुल्क की भोली-भाली जनता कभी कांग्रेस तो कभी कमल दल से दिल लगाती है। उसने तीसरे मोर्चे को बेशक कभी तवज्जो न दी हो पर इसके क्षत्रपों ने सत्ता का सुख हमेशा भोगा है। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा ही नहीं अन्य दल भी भीड़तंत्र की कवायद में जुट गए हैं।
भारतीय राजनीति में जहां तक सम्भावित तीसरे मोर्चे का सवाल है उसने 1977, 1989 और 1996 की अपनी विफलताओं से कोई सबक नहीं लिया है। इन्हें मौके भी मिले पर अपने-अपने पूर्वाग्रह और अंतर्विरोधों के चलते सल्तनत सम्हाल नहीं पाए और उन पर देश की अस्थिरता के आरोप लगे। जबकि इस अस्थिरता में कांग्रेस का बड़ा हाथ था। 1977 में जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार इसलिए गिरी कि कांग्रेस को जनादेश का आदर करते हुए पांच साल तक रचनात्मक विपक्ष का फर्ज निभाना कुबूल नहीं था और उसने जनता पार्टी में फूट डालकर चौधरी चरण सिंह की सरकार तो बनवा दी पर उन्हें संसद का मुंह नहीं देखने दिया। चन्द्रशेखर, एचडी देवगौड़ा व इन्द्र कुमार गुजराल की सरकारों के साथ भी लगभग वही सलूक हुआ पर कांग्रेस ने उन सरकारों की अकाल मृत्यु से उत्पन्न अस्थिरता की जिम्मेदारी अपने ऊपर कभी नहीं ली।
कमल दल ने भी विश्वासघात का दंश झेला है। भाजपा की खुद की पहली सरकार 13 दिन जबकि दूसरी 13 महीने चली थी। दो झटकों के बाद कमल दल ने अटल सरकार को कभी दांव पर नहीं लगाया और राम मंदिर मुद्दे को ठण्डे बस्ते में डाल फीलगुड करती रही। पिछले 16 साल से तीसरा मोर्चा राष्ट्रीय परिदृश्य से तो गैरहाजिर रहा पर कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधनों में उनके नेता राज करते रहे। देश के आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं। निरंकुश महंगाई से लोग परेशान हैं। देश को गरीबी का दंश देने वाली कांग्रेस और स्थिर सरकार देने का दम्भ भरने वाला कमल दल भीड़ से भरोसा दिलाने का जतन कर रहे हैं तो तीसरा कुनबा भी  चैन की बंशी बजा रहा है। फिलवक्त मुल्क का हर राजनीतिक दल दिल्ली दूर है जाना जरूर है का राग अलाप रहा है तो गरीबी का दंश झेलती लाचार जनता किसी को भी जनप्रिय मानने को तैयार नहीं है।

सचिन बिना कैसी क्रिकेट!

लगभग तीन दशक से खेल मैदानों और खिलाड़ियों की निगहबानी करती आ रही मेरी आंखों को अब कुछ भी नहीं भा रहा। जेहन में बस एक ही सवाल परेशान कर रहा है कि गोया भारतीय टेस्ट क्रिकेट विलक्षण सचिन बिना कैसा होगी? उसकी सांगीतिक बल्लेबाजी किसके बल्ले की धुन बनेगी? यकीन ही नहीं हो रहा कि हर हिन्दुस्तानी में क्रिकेट की दिलचस्पी जगाने वाला सचिन 18 नवम्बर के बाद बल्ले पर हाथ नहीं लगाएगा और फिर कभी किसी शेन वार्न को कोई सपना नहीं डराएगा। सच कहें तो सचिन के संन्यास से हर भारतीय की तरह मैं भी अपने आपको असहज महसूस कर रहा हूं। वजह साफ है, हरदिल अजीज सचिन ने क्रिकेट की दुनिया में जो भी आयाम स्थापित किए उनमें कई लम्हों का मैं स्वयं जो गवाह रहा। एक लम्हा है,जो ठहर सा गया है। बात 31 मार्च, 2001 की है। रतजगे के बीच थकाऊ बस यात्रा ने शरीर को चूर-चूर कर दिया था बावजूद सचिन पर विश्वास था कि इंदौर के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में वह कंगारुओं का मानमर्दन अवश्य करेगा। मुकाबला शुरू हुआ और सचिन ने अपने 266वें एकदिनी मुकाबले में 139 रनों की विध्वंसक पारी खेलकर न केवल कंगारुओं का गुरूर चूर-चूर किया बल्कि क्रिकेट के इस प्रारूप में दुनिया के पहले दसहजारी बल्लेबाज भी बन गये। मुझे याद है इस मुकाबले से पूर्व सचिन को लेकर आस्ट्रेलियाई टीम ने बड़ी-बड़ी ढींगें हांकी थीं।
फटाफट क्रिकेट में अपने प्रिय खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर के ग्वालियर के कैप्टन रूप सिंह मैदान में ऐतिहासिक नाबाद दोहरे शतक का भी मैं गवाह हूं। 24 फरवरी, 2010 को मीडिया बॉक्स में वाणी के सरताज सुशील दोषी मेरे स्वयं के खेल समाचार-पत्र की तारीफ करने के बाद जल्दी जाने की जिद कर रहे थे कि आसमान को ताकता सचिन, वीरेन्द्र सहवाग के साथ 22 गज की पट्टी के पास जा पहुंचा। मैंने सुशील दोषी जी से कहा- दादा आज सचिन कुछ नया करने के मूड में है। वह बोले ऐसा कैसे कह सकते हो। मैंने कहा मैं नहीं मेरा विश्वास बोल रहा है कि आज कुछ अनोखा होगा। दरअसल उस दिन सचिन ने पहली गेंद के साथ जो सलूक किया उसी से लग गया था कि वह कुछ करने वाला है। मेरा विश्वास सच में बदल गया और नटवर नागर ने दुनिया की सबसे संतुलित दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाजी को सबक सिखाते हुए नाबाद दोहरा सैकड़ा जड़ दिया। भारतीय पारी के समापन के बाद कमेंटेटर दोषी ने विलक्षण सचिन की तारीफ की तो भारतीय टीम के जीतने के बाद सचिन न केवल हम सबसे रू-ब-रू हुए बल्कि विकेट और पिच क्यूरेटर की तहेदिल से सराहना की।
18 मार्च, 2012 को ढाका में भारत-पाक मैच के बाद जब सचिन ने फटाफट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा की तो एकबारगी दिल धक्क से रह गया। पर तसल्ली थी कि बाकी फार्मेट  में क्रिकेट का नाटा उस्ताद खेलेगा। कुछ समय गुजरा छह अक्टूबर, 2013 को चैम्पियंस लीग ट्राफी जीतकर उसने टी-20 से भी विदाई की घोषणा कर दी। दरअसल, समय का चक्र और उस चक्र से जुड़े चक्रवातों को झेलने के लिये ही खुदा ने कायनात तैयार की है। क्रिकेट के दो प्रारूपों को अलविदा कहने के बाद आखिरकार 10 अक्टूबर, 2013 को सचिन ने 200वें टेस्ट के बाद पूर्ण संन्यास की घोषणा कर अपने मुरीदों और क्रिकेट को श्रीहीन कर दिया है। सचिन 199वां मैच कोलकाता और 200वां मैच अपने घरेलू मैदान वानखेड़े स्टेडियम में खेलेंगे। सचिन के विदाई टेस्ट को उनकी आई (मां) ही नहीं उनके निकट सम्बन्धी भी देखने को तैयार हैं।
खेल मैदानों से लम्बे जुड़ाव और सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मुलाकातों के बाद मैं ख्यातिनाम धावक पीटी ऊषा और सचिन की सदाशयता से हमेशा प्रभावित रहा। आज खिलाड़ियों की मामूली सफलता जहां उनके मिजाज को खराब कर देती है वहीं क्रिकेट के बेशुमार कीर्तिमानों के शिल्पी सचिन में दम्भ नाम की बात मैंने कभी नहीं देखी। क्रिकेट को जीने वाले इंसान का इस खेल को अलविदा कहना कितना मुश्किल होगा, ये तो सचिन ही महसूस कर सकते हैं। पर हकीकत यही है कि अपना 200वां मैच खेलने के बाद सचिन प्रतिस्पर्धी क्रिकेट नहीं खेलेंगे और फिर कभी मैदानों में उनकी बल्ले-बल्ले नहीं सुनाई देगी। खेल में तमाम ऊंचाइयां और व्यक्तित्व में समुद्र-सी गहराई वाले इस शख्स ने तमाम आलोचनाओं के बावजूद कभी किसी के खिलाफ मुंह नहीं खोला। दरअसल बचपन में सचिन काफी नटखट थे। उन्हें क्रिकेट नहीं, टेनिस से लगाव था। उनका आदर्श कोई क्रिकेटर नहीं बल्कि जान मैकनरो थे। समय बीता और उनमें साहित्यकार पिता का  गहरा असर पड़ा। जब सचिन क्रिकेट जगत के सितारे बन रहे थे तब पिता रमेश तेंदुलकर ने कहा था कि तुम क्रिकेटर ही नहीं, इंसान भी अच्छे बनना। तुम्हारा क्रिकेट जीवन तो एक समय बाद ठहर जाएगा लेकिन यदि तुम अच्छे इंसान बने तो लोग तुम्हें ताउम्र याद रखेंगे। पिता की सीख सचिन ने हमेशा याद रखी, यही वजह है कि आज हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया उसकी शालीनता को सलाम कर रही है।
सचिन हमेशा विवादों से दूर रहे। उन्होंने क्रिकेट को नई ऊंचाइयां दीं। यही वजह है कि उन्हें क्रिकेट मुरीदों ने भगवान के रूप में पूजा। वे करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों के प्रतीक रहे। जब भी टीम मुश्किल में होती लोग कहते कि अभी सचिन है ना। सचिन के क्रिकेट में अवतार के बाद भारतीय टीम में नई खेल संस्कृति पनपी और कई जुझारू खिलाड़ी सामने आए। कुदरत ने उन्हें क्रिकेट की सम्पूर्णता प्रदान की तो उन्होंने उसे तन-मन से निखारा भी। लगातार 24 साल खेलना और फिट रहना सहज नहीं है। वे कभी थके नहीं। उन्होंने क्रिकेट को नई गरिमा दी। सही मायनों में सचिन क्रिकेट के एक अनुकरणीय आदर्श हैं। उनके शून्य को भरने में लम्बा वक्त लगेगा। 24 अप्रैल, 1973 को जन्मे इस बल्लेबाज को खेलपे्रमियों से जहां अपार स्नेह मिला वहीं भारत सरकार ने उन्हें 1994 में अर्जुन, 1997-98 में राजीव गांधी खेलरत्न, 1999 में पद्मश्री, 2011 में महाराष्ट्र विभूषण और 2008 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाज कर महान सचिन की गरिमा को चार चांद लगाए। मुल्क में तेंदुलकर के अलावा शायद ही कोई शख्सियत ऐसी रही, जिसे भारत-रत्न बनते देखने के लिए लोगों में इतनी उत्सुकता, इतनी उतावली रही हो। राज्यसभा के लिए जब उन्हें मनोनीत किया गया तो लोगों ने इसे कांग्रेस की चाल करार दिया। सचिन ने राज्यसभा की शपथ ग्रहण करते ही साफ कर दिया कि कोई कुछ भी कहे उन्हें जो भी मिला वह क्रिकेट की देन है। मेरे लिए सम्मान-सत्कार या कोई भी पद अहमियत नहीं रखता, सिवाय क्रिकेट के। सचिन की क्रिकेट के प्रति निष्ठा, सजगता, ईमानदारी और कर्मठता अद्वितीय है। यही वजह है कि उनके संन्यास की घोषणा के बाद खेल का हर दिग्गज कहीं न कहीं टीस का अनुभव कर रहा है। उनमें मैं भी शामिल हूं। जो भी हो अब क्रिकेट दो भागों में जरूर बंट जाएगी, एक सचिन से पहले और एक सचिन के बाद।

खुदाई से खजाने की परख

एक तरफ भारत अपने को 21वीं सदी में होने का दम्भ भर रहा है और तरक्की की ढींगें हांक रहा है तो दूसरी तरफ उसकी सरकारी मशनरी अतीत से गलबतियां कर रही है। इन दिनों उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की तहसील बीघापुर का अति पिछड़ा गांव डौंड़ियाखेड़ा लोगों में कौतूहल का विषय बना हुआ है। इसकी मुख्य वजह है खजाने में दबा एक हजार टन सोना। एएसआई की निगहबानी में राजा राव रामबख्श सिंह के जमींदोज हो चुके आशियाने का उनकी मौत के 143 साल बाद पुन: पोस्टमार्टम हो रहा है। एएसआई द्वारा यह खुदाई सोभन सरकार के कहे पर नहीं बल्कि 1967 के उन दस्तावेजों को आधार मानकर की जा रही है, जिसमें बैसवारा के इस किले में बहुमूल्य धातुएं दफन होने के संकेत मिले थे।
फिलहाल राजा राव रामबख्श सिंह के किले में सोने के अकूत भण्डार के दफन होने पर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। सोभन सरकार उर्फ विरक्तानंद महाराज के अनुयायी उनकी कही हर बात को सौ फीसदी सही करार दे रहे हैं वहीं मीडिया और देश का आम जनमानस इस वाक्ये को दिवास्वप्न के सिवा कुछ भी मानने को तैयार नहीं है। खुदाई कर रहा पुरातत्व विभाग भी एक हजार टन सोने पर यकीन नहीं कर रहा पर वह खुदाई इस गरज से कर रहा है कि उसे सोने से भी बहुमूल्य कुछ ऐसी चीजें जरूर मिलेंगी जिसका आने वाली पीढ़ी गुणगान अवश्य करेगी।
आर्थिक संकट से जूझ रहे भारत के लिए एक हजार टन सोना मायने रखता है। यह सोना तंगहाल भारत की तकदीर और तस्वीर बदल सकता है। एक हजार टन न सही इसका एक चौथाई भी मिल गया तो मुल्क का भाग्य बदल जाएगा। देखा जाए तो भारत के पास इस वक्त सिर्फ 558 टन सोना ही है। दुनिया में सिर्फ आठ देश ही ऐसे हैं जिनके पास एक हजार टन से अधिक सोना है। राजा राव रामबख्श सिंह का खजाना मुल्क की कितनी तकदीर बदलेगा यह तो भविष्य तय करेगा पर डौंड़ियाखेड़ा में जो हो रहा है उस पर दुनिया ठहाके लगा रही है। यह खुदाई सच की पड़ताल नहीं बल्कि भारतीय जगहंसाई का कारण बन सकती है। माना कि हर खबर की अपनी एक तासीर होती है, वह अपनी जगह बना ही लेती है, पर खुदाई करने से पहले यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिए था कि क्या पुरातत्व विभाग सपने के आधार पर खुदाई कर रहा है? क्या बिना किसी खुदाई के इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि फलां जगह पर एक हजार टन सोना निकलेगा ही।
पत्रकारिता की बुनियादी जरूरत होती है, खबर का आधार पता करना पर राजा राव रामबख्श सिंह के खजाने के मामले में कई बातों की अनदेखी की गई। पुरातत्व विभाग ने जैसे ही खुदाई प्रारम्भ की मीडिया को अपनी गलती का अहसास हुआ। खुदाई से पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जहां अपनी टीआरपी बढ़ाने को संत सोभन सरकार के सपने को आधार बनाया वहीं प्रिंट मीडिया ने भी अंधानुकरण करते हुए मनगढ़ंत खबरें प्रकाशित कीं। मेरा इस क्षेत्र से गहरा लगाव होने के चलते बक्सर से कोई पांच किलोमीटर दूर स्थित डौंड़ियाखेड़ा कई बार आना-जाना हुआ। कानपुर देहात के शिवली थाना क्षेत्र के सोभन आश्रम से ताल्लुक रखने वाले सोभन सरकार ने बक्सर में अपने गुरु सत्संगानंद बाबा की कर्म और तपस्थली में कई अतुलनीय कार्य किए। मां चंदिका मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की मदद से गंगापुल निर्माण कराकर एक बड़ा काम किया है। संत सोभन सरकार ने बातचीत में खुलासा किया कि उन्होंने सपने में खजाने की बात किसी से नहीं की, अलबत्ता केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत को कुछ दस्तावेज जरूर सौंपे जिसमें राजा राव रामबख्श सिंह के किले में कुछ बहुमूल्य धातुएं मिलने के संकेत हैं। हां सोभन सरकार ने यह जरूर कहा कि यदि पुरातत्व विभाग उनके कहे अनुसार दीपावली से पूर्व खुदाई करवा दे तो वे अपने तप से सरकार की झोली अकूत सोने से भर सकते हैं।
संत सोभन सरकार की कर्मस्थली उन्नाव और कानपुर के अनुयायी उन्हें श्रद्धा से सरकार कहते हैं न कि बाबा, महाराज या गुरुजी। सोभन सरकार न कभी कैमरे के सामने आते हैं न ही उन्हें मंच प्रिय है। उन्हें ढोंग से भी चिढ़ है। उपदेश, प्रवचन, अनुष्ठान और दीगर कर्मकाण्डों से भी वे हमेशा दूर रहते हैं। उन्हें दान-दक्षिणा या चंदा लेना भी पसंद नहीं है। अपने अनुयायियों से चरण वंदन कराना तो दूर वे अपने पास भी किसी को फटकने नहीं देते। सोभन सरकार की इन्हीं खूबियों के चलते लोग उन्हें भगवान नहीं तो उससे कम भी नहीं मानते। सोभन सरकार से इतर राजा राव रामबख्श सिंह की बात करें तो उन्हें अंग्रेजों ने 28 दिसम्बर, 1859 को बक्सर में एक बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी थी। चन्दिका मां का अनन्य भक्त आज बेशक जिन्दा नहीं है पर जनश्रुतियां इस बात की गवाही देती हैं कि वह निडर और पराक्रमी राजा थे, जिनसे अंग्रेज जीवन पर्यन्त खौफ खाते रहे। पतित पावनी गंगा के किनारे 50 एकड़ में फैले राजा राव रामबख्श सिंह के खण्डहर हो चुके किले के सौ मीटर क्षेत्र में पुरातत्व विभाग के कोई दो दर्जन लोग खजाना खोद और खोज रहे हैं। इस इलाके में सिर्फ राजा राव रामबख्श सिंह का किला ही नहीं बल्कि कई और किले, महल और हवेलियां लावारिस पड़े हैं। बैसवारा के राजाओं की बात करें तो कई अंग्रेजों के चाटुकार रहे पर राजा राव रामबख्श सिंह हमेशा अपने उसूलों पर जिए। राजा राव रामबख्श सिंह अपनी रियासत के 24वें और अंतिम राजा थे।
किले की खुदाई चल रही है। ऐसे में यह कहा जा रहा है कि 14 परगनों के दो-ढाई सौ गांवों की रियासत के इस छोटे से जागीरदार के पास भला एक हजार टन सोना आया कहां से? डौंड़ियाखेड़ा का इतिहास छठवीं सदी से प्रारम्भ होता है। स्थानीय मान्यता है कि गजनवी-गौरी के आक्रमण के समय पूरे अवध प्रांत की जागीरें और स्थानीय साहूकार अपने खजाने गंगा के किनारे स्थित इस अति सुरक्षित किले में रखते थे। यहां के 14 किलोमीटर क्षेत्र में सात समृद्ध बाजार थे, इनमें दो लखटकिया बाजार के रूप में प्रसिद्ध थे। जनश्रुति है कि इन बाजारों में उसी को दाखिल होने की इजाजत थी जिसके पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएं होती थीं। ऐतिहासिक दस्तावेज और विलियम हार्वर्ड रसल की किताब माय इंडियन डायरी, अमृतलाल नागर की पुस्तक गदर के फूल और कानपुर का इतिहास खण्ड-एक में साफ-साफ उल्लेख है कि राजा राव रामबख्श सिंह महाजनी करते थे। कोलकाता और कानपुर के व्यापारी ही नहीं नाना राव पेशवा भी अपना सोना अति सुरक्षित डौंड़ियाखेड़ा किले में रखना ही महफूज समझते थे। किले के पास स्थित कामतेश्वर बाबा मंदिर का जीर्णोद्धार 1935-36 में पजनखेड़ा के जमीदार कामता प्रसाद दीक्षित कांति बाबा ने कराया था। जो भी हो पुरातत्व विभाग किले की निरंतर खुदाई कर रहा है, उसे भरोसा है कि इस खण्डहर से जरूर कुछ न कुछ निकलेगा। आओ हम दुआ करें कि उससे सोने का भण्डार ही निकले।

खजाने पर निगहबानी

कानपुर के परेड, बिठूर और फतेहपुर के भगवतपुर में भी स्वर्ण खजाने!
पतित पावनी गंगा के तीरे साल भर श्रद्धालु आते-जाते रहते हैं। साल में कुछ ऐसे भी अवसर आते हैं जब श्रद्धालुओं का रेला मोक्षदायिनी गंगा में डुबकी लगाकर अपने को पुण्य का भागी मानता है। इस समय उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का एक पिछड़ा ऐतिहासिक गांव डौंड़ियाखेड़ा सिर्फ प्रदेश ही नहीं सम्पूर्ण देश के जनमानस के कौतूहल का केन्द्रबिन्दु बना हुआ है। वजह एक हजार टन सोने का वह खजाना है जिसे आजादी के दीवाने राजा राव रामबख्श सिंह की धरोहर माना जा रहा है। इस खजाने को लेकर सिर्फ जनमानस ही नहीं सरकारी मशीनरी भी बौराई हुई है।  खजाने को हासिल करने के लिए हर तरह के प्रयास शुरू हो चुके हैं। खजाने की सूचना पर्यावरण प्रेमी और लोकप्रिय संत सोभन सरकार ने बीते माह केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत को दी थी। फिर क्या था यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। कहा जा रहा है कि संत सोभन सरकार को राजा राव रामबख्श सिंह ने खजाने का सपना दिखाया है। जो भी हो इस बात को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। लोगों की कही सच मानें तो सोभन सरकार ने सिर्फ डौंड़ियाखेड़ा ही नहीं फतेपुर जिले के दुधीकगार आश्रम के पास स्थित भगवतपुर गांव, कानपुर के परेड और बिठूर के पास भी अकूत सोना दबे होने की जानकारी सम्बन्धित जिला प्रशासन को दी है। सोभन सरकार के शिष्य ओम ने तो यहां तक कहा है कि भगवतपुर में 25 हजार टन से अधिक सोना जमींदोज है। संत सोभन सरकार ने चूंकि बैसवारा क्षेत्र में विकास की गंगोत्री बहाने के प्रयास किये हैं सो इन्हें लोग देवतुल्य मानते हैं।
उन्नाव से कोई 60 किलोमीटर दूर गंगा के किनारे स्थित डौंड़ियाखेड़ा में स्वर्ण खजाने की खुदाई जहां जारी है, वहीं दूर-दूर से लोग वहां पहुंच रहे हैं। पुरातत्व विभाग की देखरेख में हो रही धीमी गति की खुदाई से जहां लोग नाखुश हैं वहीं हर कोई सोभन सरकार की कही सच मान रहा है। सोभन सरकार का इस क्षेत्र से कोई दो दशक पुराना नाता है। इससे पूर्व संत प्रवर सोभन सरकार बिठूर और कानपुर देहात के शिवली गांव स्थित अपने 100 एकड़ के आश्रम में ईश्वर आराधना करते थे। दरअसल संत सोभन सरकार डौंड़ियाखेड़ा से कोई दो किलोमीटर दूर गंगा के पावन तट पर स्थित बक्सर में मां चन्दिका देवी मंदिर के पास स्थित सत्संगा नंद बाबा के आश्रम से जुड़ाव के चलते यहां आए। उन्होंने इस आश्रम की कायाकल्प करने के साथ ही मां चन्दिका देवी मंदिर के जीर्णोद्धार का पुनीत कार्य भी किया। इस क्षेत्र के लिए उनका सबसे बड़ा पुण्य कार्य गंगा पुल निर्माण है। समाजवादी पार्टी की पिछली प्रदेश सरकार के सामने जब संत सोभन सरकार ने गंगा पुल निर्माण की बात रखी तो पहले तो सरकार तैयार नहीं हुई पर उनके यह कहने पर कि सरकार यदि यह कार्य नहीं करती तो वे स्वयं यहां पुल निर्माण का पुनीत कार्य करेंगे।
संत सोभन सरकार की मंशा का पता लगते ही उनके मुरीदों ने सीमेंट और सरियों से भरे ट्रक भेजने शुरू कर दिए। सरकार को इस बात की भनक लगते ही तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव न केवल पहुंचे बल्कि उन्होंने संतश्री को पुल निर्माण का भरोसा भी दिया। संत सोभन सरकार ने मंत्री शिवपाल सिंह यादव के सामने शर्त रखी कि पुल बने पर इस पुल से किसी प्रकार का भी टैक्स न लिया जाए। अंतत: पुल बना और लोगों ने राहत की सांस ली। संतश्री ने मंत्री शिवपाल को आशीष दिया था कि पुल बनवाने पर वे एक बार फिर लोक निर्माण मंत्री बनेंगे, और ऐसा हुआ भी। फिलवक्त शिवपाल सिंह अखिलेश सरकार में लोक निर्माण मंत्री ही हैं। जो भी हो इस पुल के बन जाने से क्षेत्र के लोगों को फतेहपुर जिले की बड़ी मण्डियों में शुमार बिन्दकी से कारोबार करने में आसानी हो गई। इससे पहले लोगों को बिन्दकी मण्डी पहुंचने के लिए 30-40 किलोमीटर से अधिक का अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ता था।
मां चन्दिका देवी के अनन्य भक्त थे राजा राव रामबख्श सिंह
आजादी के दीवाने राजा राव रामबख्श सिंह न केवल बहादुर थे बल्कि मां चन्दिका देवी के अनन्य भक्त भी थे। वे प्रतिदिन कई घण्टों मां चन्दिका देवी की पूजा-अर्चना करते थे। जनश्रुति है कि जब वे मां चन्दिका देवी की आराधना करते थे तब म्यान से तलवार स्वयं उनके हाथ में आ जाती थी।
1859 में अंग्रेजों ने दी थी राजा राव रामबख्श सिंह को फांसी
बहादुर राजा राव रामबख्श सिंह को तत्कालीन मुरारमऊ रियासत के राजा भगवती बख्श सिंह के षड्यंत्र के चलते 1859 में बक्सर स्थित एक बरगद के पेड़ में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। यह पेड़ दो दशक पहले गिर चुका है। जनश्रुति है कि मरने से पहले राजा राव रामबख्श सिंह ने भगवती बख्श सिंह को श्राप दिया था कि सात पुश्त तक मुरारमऊ राजघराने का कोई भी वारिस राजगद्दी पर नहीं बैठ पाएगा। उनकी कही सच निकली। लगभग जमींदोज हो चुकी मुरारमऊ रियासत  की राजगद्दी की परम्परा आज भी दशहरा को निभाई तो जाती है पर इस राजगद्दी पर अब तक गोद लिए बच्चे ही बैठते आए हैं।
...तो मालामाल हो जाएगा उत्तर प्रदेश
पुष्प सवेरा ने जब क्षेत्रवासियों से सोने के खजाने की असलियत जानने की कोशिश की तो शिक्षक जयप्रकाश बाजपेई, गिरीश तिवारी, राजकुमार मिश्रा आदि ने कहा संत सोभन सरकार जो कहते हैं वही सच होता है। क्षेत्र के लोगों को पूरा भरोसा है कि डौंड़ियाखेड़ा में सोने का भण्डार अवश्य निकलेगा। इन लोगों का कहना है कि संतश्री कानपुर के परेड, बिठूर और फतेहपुर के गांव भगवतपुर में भी सोने के खजाने होने की बात कह रहे हैं, जोकि सच साबित होगी। काश यह सच हो जाए ताकि देश का सबसे बड़ा प्रदेश मालामाल हो जाए।