Sunday, 5 July 2015

मोदी की गुगली- सांसत में सियासत



सात जून को लंदन के द संडे टाइम्स में ललित मोदी पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की कथित मेहरबानियों का स्याह सच क्या उजागर हुआ कमल दल सकते में आ गया। 14 जून, 2015 को सुषमा ने मानवीयता की बात कहकर अपना बचाव तो किया, लेकिन उसके बाद से पूर्व आईपीएल प्रमुख ललित मोदी की गुगली पर एक-एक कर राजनीतिज्ञ हिटविकेट हो रहे हैं। मोदी लंदन से हर रोज कोई न कोई ऐसी गेंद फेंक रहे हैं जिसके सामने राजनीतिज्ञों को अपनी नैतिकता और ईमानदारी स्वयं खोटी नजर आने लगी है। विवादित मोदी जो भी खुलासा कर रहे हैं, उसे मिथ्या भी नहीं कहा जा सकता। ललित मोदी के खुलासों से जहां केसरिया रंग फीका नजर आने लगा है वहीं कमजोर विपक्ष को अज्ञात शक्ति मिलती दिख रही है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया और सुल्तानपुर से भाजपा सांसद वरुण गांधी पर शक गहरा गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जहां चुप हैं वहीं भाजपा पर लगातार आक्रामक होती कांग्रेस की बोलती भी गांधी परिवार का नाम आने से बंद होती दिख रही है। ललित मोदी जिस तरह के तेवर दिखा रखे हैं, उससे साफ जाहिर है कि उनके हाथ भारतीय राजनीतिज्ञों की काली करतूतों का बड़ा पुलिन्दा है। मोदी की साफगोई पर कांग्रेसी और भाजपाई कुछ भी कहें पर इस सच से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि क्रिकेट में भ्रष्टाचार की जड़ें इतने गहरे पैठ बना चुकी हैं, जिन्हें आसानी से नहीं उखाड़ा जा सकता। सिर्फ आयोजक ही नहीं भ्रष्टाचार के मोहपाश में अनगिनत खिलाड़ी और खेलनहार भी फंसे हुए हैं। सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे को लेकर राजनीतिज्ञों की अलग-अलग राय इसी बात का प्रमाण है कि क्रिकेट में और भी दागी हैं, जिन्हें अपने नाम उजागर होने का डर है। ललित मोदी की विदेशी मुद्रा कानून उल्लंघन मामले में प्रवर्तन निदेशालय को तलाश है, उनके नाम ब्लू कॉर्नर नोटिस जारी हो चुका है और वह लंदन में एक तरह से निर्वासित जीवन बिता रहे हैं।
इण्डियन प्रीमियर लीग क्रिकेट की बुनियाद ही अनैतिक परम्परा, महत्वाकांक्षा, राजनीतिक जोड़-तोड़ और आनन-फानन धन जुटाने की लालसा का प्रतिफल है। ललित मोदी पर हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार की तोहमत मिथ्या नहीं कही जा सकती पर इस गंगोत्री में राजनीतिज्ञों ने भी गोते लगाये हैं यह भी सौ फीसदी सच है। क्रिकेट से राजनीतिज्ञों का लगाव कोई नई बात नहीं है। आज हर क्रिकेट एसोसिएशन राजनीतिज्ञों के हाथ की ही कठपुतली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मुल्क की सल्तनत सम्हालने से पहले गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। आज यह दायित्व भाजपा प्रमुख अमित शाह सम्हाल रहे हैं। आज ललित मोदी की छवि एक चालबाज और भगोड़े के रूप में की जा रही है। यह भी सच है कि एक उद्योगपति घराने से ताल्लुक रखने वाले इस शख्स ने यदि क्रिकेट को पैसे की मशीन बनाने में रुचि न ली होती तो शायद आज सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे सरीखे लोग मानवता की दुहाई न दे रहे होते।
ललित मोदी को लेकर हमलावर कांग्रेस भी जानती है कि क्रिकेट के काले खेल में कमल दल ही नहीं बल्कि कई कांग्रेसियों के भी व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं। ललित मोदी प्रकरण में सबसे पहले सुषमा स्वराज का नाम आया। बहस उठी कि धनशोधन और फेमा उल्लंघन के आरोपी को मानवीय आधार पर मदद दी जा सकती है या नहीं? बहस ने तूल पकड़ा ही था कि बात ललित मोदी और सुषमा स्वराज के वकील पति के बीसियों साल पुराने रिश्ते तक पहुंच गई। बहस परवान चढ़ती, तभी वसुन्धरा राजे और उनके बेटे का नाम भी सामने आ गया। ललित मोदी का क्रिकेट से व्यावसायिक-प्रशासनिक याराना 2004 में राजस्थान क्रिकेट बोर्ड के जरिये ही परवान चढ़ा था। वसुन्धरा के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने भी आव्रजन मामले में ललित मोदी की मदद की और उनके बेटे की कम्पनी में ललित मोदी ने करोड़ों रुपये लगाये। आव्रजन मामले में मोदी को राकांपा नेता शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल और कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला से भी मदद मिली है। पवार और शुक्ला भी भारतीय क्रिकेट बोर्ड के प्रशासक रह चुके हैं। बचाव के तर्क सबके पास हैं। सुषमा के पास मानवीय आधार का कवच है तो वसुन्धरा के पास जानकारी न होने की ढाल। पवार का कहना है कि वे लंदन गये ही थे मोदी को यह बताने कि भारत आकर अदालत का सामना करो, जबकि राजीव शुक्ला कह रहे हैं कि वह तीन साल से मोदी से सम्पर्क में ही नहीं हैं। आरोप और बचाव की इस लुका-छिपी में बस एक बात नहीं पूछी जा रही कि धन की गंगोत्री जहां से फूटती है, वहां बाघ और बकरी अपना स्वभावगत बैर भूलकर आखिर एक साथ पानी क्यों पीते हैं? भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड की जहां तक बात है, उसका दुनिया की सबसे धनी खेल संस्थाओं में शुमार है और ललित मोदी प्रकरण ने यह साबित किया है कि बात धन की ऐसी सदानीरा नदी की हो तो नेता,अभिनेता, व्यापारी, नौकरशाह सब अपनी स्वभावगत दूरी को परे कर पारस्परिक लाभ की ऐसी पारिवारिकता विकसित कर लेते हैं, जिसे भेद पाना सवा अरब लोगों के लोकतंत्र के लिए अकसर बहुत मुश्किल होता है।
सुषमा के पति और बेटी भी ललित मोदी के मददगार
सुषमा स्वराज मानवीयता की बेशक दुहाई दे रहीं हों पर उन्हें मोदी की मदद से पहले सम्बन्धित पक्षों को जानकारी देनी थी। कम से कम वह प्रधानमंत्री मोदी से तो बात कर ही सकती थीं। सवाल यह भी कि ललित मोदी को यदि अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी के उपचार के लिए इंग्लैण्ड से पुर्तगाल जाना ही था, तो उन्होंने मानवीय आधार पर इसकी अनुमति देश-विदेश की किसी अदालत से मांगने की बजाय सीधे विदेश मंत्री से ही क्यों मांगी? दरअसल, सुषमा के पति, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील स्वराज कौशल की ललित मोदी से 20 साल पुरानी दोस्ती है और वे ललित मोदी को पिछले कई सालों से कानूनी सलाह दे रहे हैं। इतना ही नहीं, सुषमा स्वराज की वकील बेटी बांसुरी कौशल भी पिछले सात साल में कई बार अदालत में ललित मोदी की पैरवी कर चुकी हैं।
स्वराज को डायरेक्टर बनाना चाहते थे मोदी
ललित मोदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल को अपनी कम्पनी इंडोफिल में डायरेक्टर की पोस्ट आॅफर की थी लेकिन कौशल ने इसे ठुकरा दिया था।
वसुन्धरा राजे की पारिवारिक नजदीकियां
ललित मोदी और वसुन्धरा राजे की नजदीकियों की जहां तक बात है वसुंधरा राजे की मां राजमाता विजया राजे सिंधिया और ललित मोदी के पिता कृष्ण कुमार मोदी दोस्त थे। इसलिए अगली पीढ़ी में दोस्ती होना अचरज की बात नहीं है। मुख्यमंत्री वसुंधरा की राजस्थान में तूती बोलती है। ललित मोदी ने इसी का लाभ उठाते हुए राजस्थान को अपना आशियाना बनाने की कोशिश की। वह न केवल राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने बल्कि उन्होंने 2005-06 में जयपुर के प्रतिष्ठित और बेहद महंगे रामबाग पैलेस होटल को ही एक तरह से अपना घर बना लिया। समय बदला, रुतबा बढ़ा और ललित मोदी ने इण्डियन प्रीमियर लीग प्रतियोगिता के प्रयास तेज कर दिए। वर्ष 2008 में जब आईपीएल का आगाज हुआ तब वसुन्धरा राजे की सरकार राजस्थान में रही।
मोदी की जांच में क्यों हुई हीलाहवाली?
भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड ने मोदी की जांच के लिए चिरायु अमीन के नेतृत्व में ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरुण जेटली की तीन सदस्यीय कमेटी बनायी थी, मगर उसका क्या हुआ? आज जिस ललित मोदी को लेकर कांग्रेस हल्ला बोल रही है, उससे पूछना चाहिए कि 2012 के बाद उसके नेता कहां सोये थे। 2012 में ललित मोदी का पता करने के वास्ते एक औपचारिक परवाना ब्रिटिश फॉरेन आॅफिस भेजा गया था। यह नौटंकी नहीं तो क्या है कि एक तरफ ब्रिटेन और भारत की हुकूमतें कागजों में ललित मोदी की खोज में जुटी थीं तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगातार ललित मोदी के साक्षात्कार दिखा रहा था। सवाल यह भी कि भारत-ब्रिटेन के बीच 1993 में प्रत्यर्पण संधि किसलिए की गयी थी?
11 महीने 32 यात्राएं
नटखट, रंगमिजाज ललित मोदी के हाथ एक अगस्त 2014 को जैसे ही यात्रा सम्बन्धी दस्तावेज आये मानों उनके अरमानों को पंख लग गये। मोदी ने इन 11 महीनों में 32 बार उड़ानें भरीं। मोदी की यह यात्राएं शादी-समारोहों में शिरकत के साथ ही नाओमी कैम्पबेल से लेकर पेरिस हिल्टन और केविन स्पेसी से लेकर स्टीफन फ्राइ तक तमाम मॉडलों व अभिनेताओं के साथ शानदार पार्टियों के नाम रहीं।
ललित मोदी के दोस्त
ललित मोदी के दोस्त और दुश्मनों की लम्बी फेहरिस्त है। कहा जाता है जो संकट में मदद करे वही असली दोस्त होता है। इस मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल और ब्रिटिश सांसद कीथ बाज आदि ने मोदी की मदद  में कोई कोताही नहीं बरती। मोदी से एनसीपी प्रमुख शरद यादव, कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला, बीसीसीआई सचिव अनुराग ठाकुर से भी अच्छे सम्बन्ध रहे हैं, यह बात आलग है कि यह त्रिमूर्ति मतलबपरस्ती की राह चलने की आदी है।
ललित मोदी के दुश्मन
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम, पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर, आईसीसी अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन, बीसीसीआई प्रमुख जगमोहन डालमिया, वित्त मंत्री अरुण जेटली आदि।
मोदी यानि बिगड़ैल रईसजादा
 ललित मोदी की जहां तक बात है उनकी कहानी एक धंधेबाज और बिंदास जीवन जीने वाले व्यक्ति की कथा भर नहीं बल्कि भारतीय राजनीति और सरकारों के मुनाफाखोरों और सट्टेबाजों के चंगुल में फंसने की त्रासदी भी है।
 मोदी को अमेरिका में सजा
 -करीब तीन दशक पहले ललित मोदी को अमेरिका में गिरफ्तार किया गया था। तब वे उत्तरी कैरोलाइना के ड्यूक विश्वविद्यालय में छात्र थे। उन पर नशीले पदार्थ रखने और एक 16-वर्षीय किशोर एलेक्जेंडर वान डाइन को अपहृत करने तथा चोट पहुंचाने का आरोप लगा था।  अपहरण की वारदात को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने 24 फरवरी, 1985 को मोदी को दोषी माना और दो साल कैद की स्थगित सजा सुनायी। नशीले पदार्थ रखने के आरोप पर उन्हें पांच वर्ष के प्रोबेशन पर रखा गया था। इसके अलावा उन्हें 300 घंटे समाज सेवा करने तथा 50 हजार डॉलर की जमानत भरने का निर्देश भी दिया गया था।
मोदी पर कैसे-कैसे आरोप
आईपीएल के ग्लोबल राइट्स का अधिकार वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप को दिया गया, जबकि सिंगापुर स्थिति मल्टी स्क्रीन मीडिया को भारत में मैच के प्रसारण का अधिकार दिया गया। लेकिन इसमें धांधली के कारण बीसीसीआई ने समझौते को रद्द कर दिया। इसके तत्काल बाद वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप मॉरीशस जिसका स्वामित्व भी भारत स्थित वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप की तरह था उसे भारत में प्रसारण का अधिकार दे दिया गया। इस कम्पनी को साइनिंग अमाउण्ट के तौर पर बीसीसीआई को 112 करोड़ रुपये देने थे। बीसीसीआई को यह पैसा कभी नहीं मिला।
 2010 में नीलामी प्रक्रिया में गड़बड़ी
 बीसीसीआई ने 2010 में दो और टीमों को आईपीएल में शामिल करने का फैसला लिया। ललित मोदी ने नीलामी प्रक्रिया में तत्काल कुछ शर्तें जोड़ दीं और कहा कि नीलामी प्रक्रिया में एक बिलियन डॉलर की कम्पनी ही हिस्सा ले सकती है और बैंक गारंटी के तौर पर उसे 100 मिलियन डॉलर देना होगा। बीसीसीआई ने तर्क दिया है कि नीलामी प्रक्रिया में ये शर्तें शामिल नहीं थीं, कुछ प्रतियोगी कम्पनियों को इससे बाहर करने के लिए ऐसा किया गया।
 फ्रेंचाइजी पर दबाव बनाना
 2011 आईपीएल में शामिल होने के लिए पुणे वारियर्स और कोच्चि टस्कर नीलामी प्रक्रिया के तहत चुन ली गयीं। मोदी इससे खुश नहीं थे और उन्होंने दूसरी फ्रेंचाइजी का पक्ष लेना शुरू कर दिया। कोच्चि फ्रेंचाइजी के कुछ सदस्यों को उन्होंने दबाव डालकर अपनी हिस्सेदारी वापस लेने को कहा। जब वे नहीं माने तो ललित मोदी ने शेयरहोल्डिंग पैटर्न को सार्वजनिक करने और कुछ बीसीसीआई अधिकारियों का खुलासा करने की धमकी दी। उनके खुलासे से केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को इस्तीफा देना पड़ा।
 फ्रेंचाइजी के शेयरहोल्डर से नजदीकी रिश्ता
 ललित मोदी राजस्थान रॉयल्स में हिस्सेदारी रखने वाले सुरेश चेलारमन के साले हैं। उन्होंने यह जानकारी क्रिकेट बोर्ड को नहीं दी। उन्होंने अपने करीबियों को नीलामी से जुड़ी जानकारी देकर फ्रेंचाइजी खरीदने में मदद पहुंचायी।
 ललित मोदी पर अन्य आरोप
 -इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने इंग्लिश लीग के साथ मिलकर एक विरोधी लीग तैयार करने की कोशिश की। कई समझौते उन्होंने बोर्ड को बताये बिना किये। वेबराइट देने के लिए उन्होंने ऐसी एजेंसी को चुना जिसका उनसे करीबी रिश्ता था।
- प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) फेसीलेशन फीस के तौर पर वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप को मल्टी स्क्रीन मीडिया द्वारा प्रसारण अधिकार के लिए 80 मिलियन डॉलर के भुगतान की जांच कर रहा है।
- ईडी इसकी भी जांच कर रहा है कि इस 80 मिलियन डॉलर में से 25 मिलियन डॉलर ललित मोदी, उनके सहयोगी और राजनीतिक लोगों के अवैध खाते में तो नहीं पहुंचाये गये।
- ईडी 2008 की आईपीएल की नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने वाले कुछ फ्रेंचाइजी को नीलामी की गोपनीय जानकारी देने के मामले की जांच कर रहा है। राजस्थान रॉयल्स की फ्रेंचाइजी लेने वाले और दूसरे स्थान पर रहने वाले के बीच नीलामी की राशि में 3 लाख डॉलर का अंतर पाया गया।
- ईडी मोदी द्वारा केमन आईलैंड की कम्पनी से कालेधन का प्रयोग कर कॉरपोरेट जेट खरीदने के मामले की जांच भी कर रहा है।
- मुंबई के फोर सीजंस होटल के मालिक रमेश गोवानी की भी ईडी जांच कर रहा है। ललित मोदी अकसर इस होटल में रुकते रहे हैं।
- ललित मोदी की पत्नी की कंपनी इंडियन हेरिटेल होटल में मॉरीशस की कंपनी द्वारा 10 करोड़ रुपये निवेश की जांच भी ईडी कर रहा है।
- फेमा के तहत भी मामले दर्ज हैं, जिसमें फ्रेंचाइजी का स्वामित्व, विदेश निवेश का तरीका, शेयरों की कीमत और फिर उसका ट्रांसफर जांच के दायरे में हैं।
- वित्त मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति के समक्ष दिसंबर 2014 में पेश एक्शन टेकन रिपोर्ट में कहा गया है कि ईडी ने ललित मोदी, बीसीसीआई के कुछ अधिकारी और निजी कंपनियों को 2148.3 करोड़ की हेराफेरी के मामले में फेमा कानून का उल्लंघन करने के लिए नोटिस भेजा है।
- आयकर विभाग ने 16 सितम्बर, 2010 को बिना पैन नम्बर दिये वित्तीय वर्ष 2008-09 के दौरान बड़े पैमाने पर लेन-देन करने के लिए नोटिस भेजा था। नियम के मुताबिक पैन नम्बर देना अनिवार्य है।
- मुंबई जोन डायरेक्टोरेट आॅफ रिवेन्यू इंटेलीजेंस ने एयरक्राफ्ट का गोल्डन विंग्स कंपनी से आयात के संबंध में कागजात देने के लिए चार नवम्बर, 2011 को नोटिस भेजा।

Friday, 3 July 2015

सतनाम का गाँव की सत्ता से एनबीए तक का सफर


22 नम्बर का जूता पहनता है सतनाम
पंजाब के बरनाला जिले का छोटा सा गाँव है बल्लो। आबादी करीब 2200। काफी पिछड़े हुए इस गाँव का बहुतों ने पहले नाम भी नहीं सुना होगा लेकिन यहाँ के रहने वाले सतनाम सिंह ने ये पक्का कर दिया है कि उन्हें और उनके गाँव को कोई अब हल्के में नहीं ले। जब से सतनाम अमरीका की मशहूर नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन यानी एनबीए ड्राफ्ट में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने हैं, गाँव में उनकी ही चर्चा है।
19 साल और सात फुट दो इंच के सतनाम पिछले पांच साल से अमरीका में रहते हैं। सतनाम की कहानी उन्हीं की जुबानी जानने के लिए हमने उन्हें अमरीका फोन किया, बधाइयों के तांते के बीच उनके पास रात को ही बात करने की फुरसत थी यानी भारत में सुबह के कोई छह बजे।
अपनी भारी भरकम आवाज में सतनाम ने बताया कि आज भले ही लोग उन्हें चैम्पियन समझते हैं लेकिन बचपन में उन्हें यह खेल कतई पसंद नहीं था। सतनाम का परिवार खेती-किसानी करता आया है। लम्बी कद-काठी और डील-डौल सतनाम को विरासत में मिली। पिता बलबीर सिंह भामरा का कद करीब-करीब सतनाम जितना है, दादा और दादी का कद करीब 6 फुट 9 इंच था।
पसंद नहीं था बास्केटबॉल
सतनाम के पिता बताते हैं कि उनका बचपन बहुत गरीबी और बिन माँ के बीता था और वो कभी चाहकर भी स्पोर्ट्स में नहीं जा सके। लेकिन सतनाम थोड़ा बड़े हुए तो परिवार के एक दोस्त ने सतनाम की कद-काठी देखकर पिता बलवीर से कहा कि इसे खेती में न डालकर स्पोर्ट्स में डालो। बस वहीं से शुरू हुआ सतनाम का सफर और वे गाँव से लुधियाना बास्केटबॉल एकेडमी जाकर बास्केटबॉल सीखने लगे।
सतनाम बताते हैं, मुझे बास्केटबॉल पसंद नहीं था। मैंने सोचा कि मैं नहीं खेलूंगा। लुधियाना से हर हफ्ते मैं गाँव भाग आता। एक दिन मैंने जगदीप बैस का खेल देखा। मैं उन्हें इंडिया का सबसे तगड़ा प्लेयर मानता हूँ। उनका गेम देखा तो लगा मुझे ऐसा ही प्लेयर बनना है। 2010 तक मैं भारत में खेलता रहा। पंजाब टीम, नेशनल, इंटरनेशनल भी खेला। एक दिन मुझे बताया गया कि अमरीका से कुछ कोच आए हैं जो चार लड़के-लड़कियों का चयन करना चाहते हैं। सबने कहा सतनाम को कोशिश करनी चाहिए। मुझे आईएमजी की ओर से स्कॉलरशिप मिली जिसके बाद मैं 2010 में अमरीका आ गया। कभी लुधियाना से हर हफ्ते गाँव भाग जाने वाले सतनाम को अमरीका में आए दिन नई-नई दिक्कतें झेलनी पड़ीं। 14 साल के लड़के के लिए बेगाने मुल्क में रहना इतना आसान नहीं था।
नहीं आती थी अंग्रेजी
पुराने दिनों की परेशानियों पर हँसते हुए सतनाम बताते हैं, मुझे सब कुछ अलग सा लगता था। जब मैं अमरीका आया था तो खाना अजीबोगरीब लगा। तीन-चार दिन बाद मैंने जो मिल रहा था वही खाना शुरू कर दिया क्योंकि यहां मम्मी तो बैठी नहीं थीं जो मनपसंद खाना लाकर देतीं। मुझे यह भी अहसास हो गया कि मैं वापस घर नहीं जा सकता था। यहीं रहना पड़ेगा और मन लगाकर खेलना होगा। लेकिन मामला इतना आसान नहीं था, खासकर अगर अमरीका में अंग्रेजी बोलनी न आती हो। सतनाम ने बताया कि पहले तो कुछ समय वो सिर्फ पंजाबी ही बोलते रहे लेकिन फिर स्कूल जाकर इंग्लिश सीखी।
गाँव की सत्ता से एनबीए के सतनाम सिंह के सफर की छोटी सी झलक मुझे इस वाक्य में नजर आई। जिस दौरान फोन पर मेरी उनसे बात हो रही थी उसी दौरान सतनाम के कुछ अमरीकी दोस्त घर पर आए हुए थे। मेरी बात बीच में रोककर सतनाम ने दोस्तों से विदा ली और बोला, थैंक यू गाएज, सी यू टूमॉरो। और फिर मुझसे सॉरी फॉर थैट बोलकर बातों का सिलसिला आगे बढ़ा दिया।
चोरी-छिपे खाना खाते थे
दिखने में लम्बे-चौड़े और भारी-भरकम आवाज वाले सतनाम की बहन सरबजोत ने उन्हें अलग रूप में देखा है। बचपन की यादें बांटती हुई सरबजोत ने बताया, हम साथ-साथ स्कूल जाते थे। वो बहुत नरम मिजाज और भोले थे। पढ़ाई में कम ही मन लगता था। हाँ उन्हें स्कूल में भूख बहुत लगती थी। स्कूल में खाना खाने के लिए बस लंच ब्रेक मिलता था लेकिन मैं उन्हें चोरी-चोरी क्लास में खाना देती थी।
सतनाम बताते हैं, मैं बड़ा हूँ और खेती में मदद करने की जिम्मेदारी अकसर बड़े बेटे के कंधों पर आती है लेकिन मेरे भाई और बहन ने कहा कि भैया आप आगे बढ़िए घर-परिवार हम देख लेंगे। मेरे भाई-बहन ने मेरी बहुत मदद की है।
गरीबी में जीवन काटने वाले पिता बेटे की कामयाबी को अपनी कामयाबी मानते हैं। वो बड़े मान से कहते हैं, इस सफलता में मेरा भी खून पसीना मिला है। सतनाम के परिवार ने गाँव में कई छोटे-मोटे काम किए, भाई आटा चक्की चलाने में गाँव में पिता की मदद करता आया है, तभी सतनाम बास्केटबॉल के मैदान पर ऊंची छलांगे लगा पाते हैं। लेकिन भारत में खिलाड़ियों की समस्याओं को सतनाम भूले नहीं हैं। वे कहते हैं, खिलाड़ियों को अच्छी डाइट, अच्छा मैदान नहीं मिलता। खाना अच्छा नहीं मिलेगा तो वे बाहर खाएंगे, बीमार होंगे फिर घर जाएंगे जिससे उनकी प्रैक्टिस खराब होगी, इसलिए उन्हें शुरू में ही बेहतर सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
दूर है मंजिल
अभी हर ओर सतनाम की कामयाबी का जश्न है लेकिन सतनाम का सपना क्या है? तपाक से वे जवाब देते हैं, मेरा जो सपना था मैं उसके अंदर घुस गया हूँ। अब बस अच्छा खेलना है और कुछ करके दिखाना है ताकि लोग देखें कि कोई इंडिया का प्लेयर आया है। उम्मीद है मेरे आने से अमरीका में दूसरे भारतीयों के लिए दरवाजे खुलेंगे। लेकिन एनबीए में अभी सतनाम की शुरुआत भर है। सतनाम के परिवार ने अब तक बहुत सीमित संसाधनों में गाँव में जीवन बसर किया है। उन्हें उम्मीद है कि एनबीए से सतनाम न केवल नाम रोशन करेगा बल्कि परिवार को भी गुरबत से निकालेगा। और हाँ 22 नम्बर का जूता पहनने के लिए कोई सतनाम को चिढ़ाएगा नहीं।

यूनान से नसीहत के संकेत

जितनी बड़ी चादर हो, उतने ही पैर पसारो। यह कहावत नहीं बल्कि नसीहत है। सिकन्दर के देश यूनान के हुक्मरानों ने इस नसीहत को न मानकर ही अपनी आवाम को संकट में डाल दिया है। यूनान के मौजूदा वित्तीय संकट के लिए उसकी सहखर्ची और 2004 के ओलम्पिक खेलों को माना जा रहा है। आज दुनिया के कई मुल्क आर्थिक विकास की मृग मरीचिका, भ्रष्टाचार और अविचारित विलासिता के दुष्परिणाम का शिकार हैं। यूनान के लिए आने वाले कुछ दिन न बिसरने वाला लम्हा साबित हो सकते हैं। फिलवक्त यूनान लगभग दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच चुका है। वहां के बैंकों को जहां बंद कर दिया गया है वहीं लोगों को एटीएम से सीमित राशि ही निकालने की इजाजत है। उद्योग-धंधे ठप होने से बेरोजगारी सातवें आसमान पर पहुंच गई है। सरकार कर्जदाताओं के आगे लाचार है।
मानव समाज में जो पहले पहल आधुनिक सभ्यता और आर्थिक समृद्धि पनपी, उसमें यूनान अग्रणी देशों में रहा है। यूनान के बहाने आज दुनिया पूंजीवादी आर्थिक साम्राज्यवाद का विध्वंस बिल्कुल करीब देख रही है। जिस यूरोप की धरती से इस साम्राज्य का विस्तार हुआ, उसी यूरोप का एक छोटा देश पूंजीवादी आर्थिक उदारवाद के चंगुल में फंसकर अपनी आर्थिक हैसियत को लगभग चौपट कर चुका है। यूनान को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से लिया डेढ़ अरब यूरो कर्ज चुकाना है। यह आसान नहीं है क्योंकि यूरोपियन सेण्ट्रल बैंक ने उसे आपातकालीन निधि देने से इनकार कर दिया है। यूनान पर आये इस आर्थिक संकट से दुनिया के शेयर बाजार लगातार गिर रहे हैं। यूनान में जो घटित हुआ, यह सब अचानक एक दिन की बात नहीं है, वहां पिछले कई वर्षों से इस दिवालियेपन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। बार-बार चेतावनी के संकेत भी मिल रहे थे बावजूद इसके वहां की सरकार और प्रशासन ने खस्ताहाल स्थिति की अनदेखी कर शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर डाले रखा ताकि संकट दिखे ही नहीं। यूनान को इस संकट का शिकार इसलिए होना पड़ा क्योंकि उसने अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा सहखर्ची को प्राथमिकता देने का गुनाह किया।
यूनान यूरोपीय देश होने के बावजूद कभी साम्राज्यवादी देश तो नहीं रहा लेकिन उसने पूंजीवाद की हिमायत जरूर की। यूनान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए वर्तमान वामपंथी सरकार पर दोष मढ़ा जा रहा है। दरअसल, यूरोपीय संघ में शामिल होने के बाद यूनान से कुछ ऐसी चूक हुर्इं जिनका खामियाजा आज उसे भुगतना पड़ रहा है। उसने यूरो को ही मुद्रा के रूप में अपनाया बगैर यह विचार किए कि अपनी मुद्रा बनाए रखने के क्या फायदे हैं। सच यह है कि अपनी मुद्रा का अधिकार जब देश के पास रहता है तो जरूरत पड़ने पर वह रोजगार सृजित करने, निर्यात बढ़ाने के साथ ही उसका मूल्य अपनी शर्तों पर निर्धारित कर सकता है। बाजार में स्थिरता लाने के लिए मुद्रा की आपूर्ति कितनी हो यह सुनिश्चित करने को भी वह स्वतंत्र होता है। दुर्भाग्य से यूरो के साथ यह छूट यूनान नहीं ले पाया। जनवरी 2015 में सम्पन्न यूनान के चुनावों में साम्यवादी नेता एलेक्सिस सिपरास की जीत ने पूरे यूरोप की आर्थिक व्यवस्था में खलबली मचा दी थी। एलेक्सिस सिपरास ने इस मुद्दे पर चुनाव लड़ा था कि जीतने के बाद वे यूरोजोन के अन्य देशों द्वारा निर्देशित यूनान के सरकारी खर्च में किसी भी प्रकार की कटौती को स्वीकार नहीं करेंगे। यूरो बेशक मजबूत मुद्रा है, लेकिन उसकी यह मजबूती फ्रांस, जर्मनी जैसी मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों के कारण है।
यूनान के नये नेतृत्व का कहना है कि यूरो जोन के अन्य देशों द्वारा कटौती थोपे जाने और आईएमएफ, यूरोपीय समुदाय के केन्द्रीय बैंक और यूरोपीय आयोग की तिकड़ी की हिटलरशाही के चलते उनका मुल्क बर्बाद हो रहा है। सरकार कुछ भी कहे पर यूनान में आर्थिक संकट की शुरुआत बहुत पहले ही हो गई थी। दुनिया को ओलम्पिक से परिचित कराने वाले यूनान को वर्ष 2004 में इस खेल महाकुम्भ की मेजबानी बहुत महंगी पड़ी। पश्चिमी सभ्यता की जन्मस्थली माने जाने वाले यूनान में कालांतर में हर चार साल में ओलम्पिक खेलों का आयोजन होता था। इसकी शुरुआत 776 ईसा पूर्व में हुई थी। ईसा पूर्व पांचवीं तथा छठी शताब्दी में ये खेल अपने चरम पर थे लेकिन यूनान पर रोमनों के आधिपत्य के बाद इन खेलों की महत्ता धीरे-धीरे समाप्त हो गयी। इसके बाद पहले आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन भी यूनान की राजधानी एथेंस में ही वर्ष 1896 में हुआ था। यूनान ने आधुनिक ओलम्पिक के 100 साल पूरे होने पर 1996 में भी इन खेलों की मेजबानी की कोशिश की थी, पर वह नाकाम रहा। वर्ष 2004 में यूनान को ओलम्पिक की मेजबानी मिली और उसने खेल महाकुम्भ को यादगार बनाने की खातिर भारी कर्ज ले लिया। उसने इन खेलों पर लगभग 11 अरब डॉलर खर्च किए थे। तब ओलम्पिक मेजबानी से यूनानवासी गर्व से फूले नहीं समा रहे थे लेकिन आज यही आयोजन देश में रोष की वजह बन गया है। माना जाता है कि ओलम्पिक के आयोजन पर अनाप-शनाप खर्च, पिछली सरकारों की भ्रष्टाचार में संलिप्तता और उसके बाद 2007-08 में भयावह यूरोपीय मंदी के चलते ही उसकी हालत खस्ता हुई है।
दुनिया में सिर्फ यूनान ही नहीं  साइप्रस, आयरलैंड, इटली, पुर्तगाल, स्पेन आदि भी आर्थिक खस्ताहाल स्थिति से गुजर रहे हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे यूरोपीय देशों को राहत देने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, यूरोपीय केन्द्रीय बैंक और यूरोपीय आयोग आदि ने सहायता पैकेज तो दिये लेकिन इन सहायता पैकेजों का इस्तेमाल पुराने कर्जे चुकाने पर ही हो गया। पिछले पांच साल में यूनान की जीडीपी 25 प्रतिशत कम हुई तो बेरोजगारी 60 प्रतिशत तक पहुंच गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कर्जदाताओं ने उस पर कटौतियों और टैक्स लगाने की सख्त शर्तें भी थोप दीं। मौजूदा हालातों में यूनान सरकार अपनी आवाम को दो विकल्प देते हुए जनमत संग्रह करा रही है तो यूरोपीय समुदाय के नेता जनमत संग्रह नहीं होने देना चाहते। आर्थिक संकट से जूझ रहे यूनानवासियों के सामने न केवल जीवनयापन बल्कि सम्मान और गरिमा के साथ जीने पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। यूनान में जो हुआ उससे सबक लेते हुए अन्य लोकतांत्रिक देशों की सरकारों को भी समझना चाहिए कि जब वे मनमानी भरे निर्णय लेते हैं तो उसका असर किस तरह जनता पर पड़ता है। यूनान संकट से फिलहाल भारत चिन्तामुक्त है क्योंकि उसके यूनान से ज्यादा गहरे आर्थिक सम्बन्ध नहीं हैं। दूसरी बात यह कि वह न तो उत्पादक देश है और न ही बड़ा उपभोक्ता रह गया है। भारत सरकार को यूनान से सबक लेते हुए बड़ी-बड़ी बातों और घोषणाओं से तो परहेज करना ही चाहिए।

Thursday, 2 July 2015

खेल को खेल रहने दो

हाल में बांग्लादेश ने पहली बार भारत से वनडे सीरीज जीती। इसके बाद बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह वहां के क्रिकेट के लिए शुभ संकेत नहीं है। बांग्लादेश में मीडिया ने जिस तरीके से भारतीय टीम का मजाक उड़ाया है, वह खेलभावना के खिलाफ है। खिलाड़ियों और टीम का अनादर है। एक प्रमुख अखबार में भारतीय टीम के धोनी, कोहली, रोहित शर्मा, रहाणे, शिखर धवन, अश्विन और जड़ेजा का सिर आधा मुड़ा हुआ दिखाया गया है। साथ में बांग्लादेशी गेंदबाज मुस्तफिजुर को एक कटर के रूप में पेश किया गया है। यह सही है कि बांग्लादेश ने बेहतर खेल दिखाया और पहले दोनों वनडे मैचों में जीत हासिल की (तीसरा मैच भारत ने जीता था), लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वह दुनिया की नम्बर एक टीम बन गयी है। ऐसा भी नहीं है कि यह बांग्लादेश की किसी वनडे में पहली जीत थी।
इसी देश ने कभी वर्ल्ड कप में भारत की कहानी खत्म कर दी थी। वैसे भी बांग्लादेश की टीम एक दशक से क्रिकेट खेल रही है। इस दौरान अनेक दिग्गज टीमों को उसने हराया और अनेक टीमों से हारी। यह खेल है और खेल में हार-जीत होती रहती है। इसलिए अगर भारतीय टीम हार गयी, तो इस हद तक जाकर खिलाड़ियों का मजाक उड़ाना उचित नहीं है। यह सही है कि बांग्लादेश के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर ने बेहतरीन खेल दिखाया और दो मैचों में तो भारतीय खिलाड़ियों के पास उसकी काट नहीं दिख रही थी, लेकिन तीसरे में उसकी धुनाई भी हुई। लेकिन बांग्लादेश के अखबार ने मजाक का पात्र बनाया भारतीय टीम को। इतिहास गवाह है कि दर्जनों ऐसे मौके आये हैं, जब भारत ने बांग्लादेश को बुरी तरह से हराया, तो क्या भारतीय अखबार या मीडिया वहां के खिलाड़ियों का मजाक उड़ाते? क्रिकेट में अपमानित करने के कुछ अवसर पहले भी आये हैं। 1980 के दशक में जब भारतीय टीम आॅस्ट्रेलिया में पहला टेस्ट हार गयी थी, तो ग्रेग चैपल ने कमेंट किया था- भारतीय टीम हमारा समय खराब कर रही है। उसे भारत लौट जाना चाहिए। इसका नतीजा यह निकला कि दूसरा टेस्ट किसी तरह ड्रॉ करने में भारत सफल रहा और तीसरे में उसने आॅस्ट्रेलिया को सौ रन के भीतर आउट कर दिया था। इसलिए एक जीत के बाद घमंड करने की प्रवृत्ति कतई उचित नहीं। बांग्लादेश भारत का पड़ोसी है। जब दोनों देशों के बीच खेल होते हैं, तो सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, दोनों देशों के रिश्ते इससे मजबूत होते हैं, दूरियां कम होती हैं। बीसीसीआई ने बांग्लादेश क्रिकेट को खड़ा करने में बड़ी भूमिका अदा की है। ऐसी हरकतों का सिर्फ क्रिकेट पर नहीं, बल्कि दोनों देशों के संबंधों पर असर पड़ता है। एक-दो मैच या एक सीरीज से टीम इंडिया की ताकत का पता नहीं चल सकता। सम्भव है कि बांग्लादेश ने पहले पाकिस्तान को अपने घर में हराया, फिर भारत को, इसलिए अति उत्साह में वहां के अखबार ऐसा कदम उठा रहे हैं। खराब खेलने पर किसी टीम की आलोचना करना अलग बात है और विज्ञापन बना कर सुनियोजित तरीके से अपमानित करना अलग बात। ठीक है, अखबार पर सरकार का नियंत्रण नहीं है और इसमें बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का हाथ नहीं है। पर वहां की सरकार को यह देखना होगा कि एक अखबार की गंदी हरकत का वहां के क्रिकेट पर क्या असर पड़ सकता है। आज भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के खिलाफ अपने देश में नहीं खेल सकते। यह दोनों देशों के बिगड़ते रिश्ते का प्रतिफल है। पाकिस्तान के हालात के कारण दुनिया की कोई अच्छी टीम वहां नहीं जा रही। हाल ही में सिर्फ जिम्बाब्वे की टीम ही वहां जा पायी।  मैच नहीं होने से पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से टूट गया है। इस बात को बांग्लादेश को भी समझना होगा। अगर ऐसा होता रहा, तो सम्भव है कि भारत आगे वहां खेलने से बचे। आवश्यक हुआ तो ‘बी’ या ‘सी’ टीम भेजेगा। ऐसी स्थिति में वहां क्रिकेट का भला नहीं हो सकेगा। खेल को खेल रहने देना चाहिए। इसमें राजनीति घुसी तो क्रिकेट का अहित ही होगा। खेल देशों को जोड़ता है। भारत ने जिस आईपीएल की शुरुआत की है, उसने क्रिकेट को ही बदल दिया है। दुनिया के महान खिलाड़ी आईपीएल खेलने भारत आ रहे हैं। पाकिस्तान के दरवाजे अभी तक बंद हैं, जबकि बांग्लादेश के लिए अवसर खुला है। वहां के कई खिलाड़ी आईपीएल खेलते हैं। अगर दोनों टीमों के बीच खटास बढ़ती है, तो सम्भव है कि आईपीएल की कोई टीम भी बांग्लादेशी खिलाड़ी को लेने से हिचके।अगर ऐसा होता है तो वहां की प्रतिभाओं के साथ अन्याय होगा। इसलिए यह क्रिकेट के हित में है कि बांग्लादेश खेल में नफरत को न लाये। खिलाड़ियों का सम्मान करना सीखे, चाहे वह भारत का खिलाड़ी हो या किसी अन्य देश का। जीत पर जश्न बनता है, पर उसका एक दायरा होता है। ऐसा न हो कि भारतीय खिलाड़ियों को अपमानित करने वाला जश्न बांग्लादेश को महंगा पड़ जाये।
अनुज कुमार सिन्हा

घर में मेरी कोच है प्रियंका: रैना

भारतीय टीम के वामहस्त बल्लेबाज सुरेश रैना इन दिनों अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन का लुत्फ उठा रहे हैं। उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन पर बेबाक बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-
-आईपीएल के बाद आप टेस्ट टीम में नहीं चुने गए। इस दौरान आपको पत्नी के साथ समय बिताने को मिला। टेस्ट टीम में चुना जाना बेहतर कहलाता या प्रियंका के साथ समय बिताना?
-टीम की घोषणा काफी पहले ही हो गई थी। टेस्ट टीम में मेरा नाम नहीं था इसलिए मुझे थोड़ा समय घर वालों के साथ बिताने को मिल गया। क्रिकेट के अलावा भी जिंदगी है। हम लोग पूरा समय क्रिकेट खेलते हैं। शादी के दो दिन बाद ही आईपीएल खेलने चला गया। डेढ़ महीने उसमें इधर से उधर जाते रहे।
-अब तो लेडी लक भी आपके साथ जुड़ गया है?
-प्रियंका बहुत अच्छी लड़की है। मुझे तो लगता ही नहीं कि हमारी शादी हुई है। हम अच्छे दोस्त की तरह रहते हैं। वह बहुत साथ देती है। वह घर में मेरी कोच है। वह नॉन स्ट्राइकर बल्लेबाज की तरह मेरी मदद करती रहती है। मुझे सलाह देती है। घर में एक इन्वेस्टमेंट बैंकर हो और पढ़ा-लिखा साथी हो तो जिंदगी और बेहतर हो जाती है।
-परिवार और क्रिकेट के बीच सामंजस्य बैठाने के लिए भी किसी सीनियर से सलाह लेंगे क्या?
- (हंसते हुए) आप सही कह रहे हैं। यह बड़ी चुनौती है। ये बिलकुल स्विच आॅन और स्विच आॅफ की तरह है। अगर दो दिन का समय भी परिवार के साथ मिल जाता है तो बैट्री चार्ज हो जाती है। मेरे परिवार वाले मेरी समस्या समझते हैं। मैं सामंजस्य बैठा लूंगा।
-प्रियंका को कैसे समझाएंगे?
-वह भी समझती है। अभी हम जितने दिन साथ रहे। साथ में ही जिम गए। वह योगा करती है। उसे स्वस्थ लाइफ स्टाइल पसंद है और मुझे तो फिट रहना ही है।
-धोनी और विराट की कप्तानी को कैसे देखते हैं?
-विराट बहुत आक्रामक कप्तान हैं। धोनी ने हमे बहुत मैचों में जीत दिलवाई है। दोनों के बीच तुलना करना सही नहीं है। मैं तो इतना ही कहूंगा कि विराट को थोड़ा समय देना चाहिए। वह एक बेहतरीन टीम मैन है। उसके नेतृत्व में टीम काफी आगे तक जाएगी।
-टीम डायरेक्टर रवि शास्त्री भारत के कोच बन सकते हैं। क्या यह टीम के लिए फायदेमंद होगा?
-मैं दो दौरों में उनके साथ रहा हूं। जब इंग्लैंड में कार्डिफ में मैंने शतक बनाया तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई। वह भाई की तरह हैं। उनके रहने से टीम का माहौल बहुत बढ़िया रहता है। निश्चित ही यह टीम के लिए फायदेमंद रहेगा।
-राहुल द्रविड़ अंडर-19 टीम के कोच बने हैं। यह भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है?
-अगर युवा खिलाड़ियों को द्रविड़ जैसा कोच मिल जाएगा तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। वीवीएस, गांगुली और सचिन पा जी भी बोर्ड से जुड़ गए हैं। इन सबके आने से नि:संदेह देश का क्रिकेट और बेहतर रास्ते पर जाएगा।
अभिषेक त्रिपाठी

मोदी यूं ही चुप नहीं

ललित मोदी प्रकरण को लेकर हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं और हर खुलासे के साथ मामले की सच्चाई समझना कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। सबसे पहले सुषमा स्वराज का नाम आया, फिर उनके पति एवं पुत्री को भी लपेट लिया गया। उसके बाद वसुंधरा राजे पर आरोप लगना प्रारंभ हुए तथा उसमें उनके पति एवं पुत्र के नाम भी आ गए। इसके पश्चात सामने आई प्रियंका गांधी व रॉबर्ट वाड्रा की ललित मोदी के साथ कथित मुलाकात की खबर। सोमवार की शाम को एक पूर्वज्ञात सूचना को रेखांकित किया गया कि ललित मोदी का परिवार सिगरेट उत्पादन में संलग्न है, इस बिना पर क्रिकेट में घोटाले के साथ कैंसर फैलाने का आरोप भी लागू हो गया।
भारत में क्रिकेट एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है। इसमें नैतिक-अनैतिक के बीच कोई सीमारेखा नहीं है। इस खेल का व्यापार ही ऐसा है जिसमें पार्टीगत राजनीति आड़े नहीं आती। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री सहित अनेक नामी-गिरामी नेता क्रिकेट से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। इनमें अधिक सक्रियजनों में शरद पवार, अरुण जेटली व राजीव शुक्ला के नाम लिए जा सकते हैं। इनसे क्रिकेट को फायदा हुआ अथवा इन्होंने क्रिकेट से लाभ उठाया, इस पर फैसला होना बाकी है। आईपीएल के प्रारंभिक दिनों में ही पत्रकार आलम श्रीनिवास ने इस विषय पर जो शोधपरक पुस्तक लिखी थी, वह खेलप्रेमियों को पढ़ लेना चाहिए। इस मुद्दे को लेकर भाजपा के भीतर ही अरुण जेटली व कीर्ति आजाद के आपसी विवाद सामने आए।
विगत तीन सप्ताह के भीतर ललित मोदी प्रकरण को लेकर जो सूचनाएं सामने आर्इं, उनसे यह तो स्पष्ट है कि ललित मोदी ने 2010 में भारत छोड़कर इंग्लैंड में शरण ले ली। उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच प्रारंभ की एवं उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया, जो बाद में मुंबई उच्च न्यायालय ने बहाल किया किन्तु उसके खिलाफ सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर नहीं की। ललित मोदी को पुर्तगाल जाने के लिए ब्रिटिश आव्रजन कार्यालय ने भारत सरकार से अनापत्ति प्रमाण-पत्र मांगा, जो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उपलब्ध करवाया। ललित मोदी की पत्नी का लिस्बन के जिस अस्पताल में उपचार चल रहा है, उसी को जयपुर शहर में अस्पताल खोलने के लिए वसुंधरा राजे ने कीमती सरकारी जमीन दे दी। इससे कहीं अधिक गंभीर यह तथ्य भी प्रकट हुआ कि राजस्थान विधानसभा में विपक्ष की नेता रहते हुए वसुन्धरा राजे ने ब्रिटिश सरकार को गोपनीयता की शर्त पर हलफनामा दिया कि ललित मोदी से उनके पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए यूपीए सरकार द्वारा ललित मोदी को राजनीतिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। सुषमा स्वराज ने तो मानवीय आधार पर सहायता की पेशकश की थी; वसुंधरा ने उसे राजनीतिक स्वरूप प्रदान कर दिया। हलफनामे को गोपनीय रखने की शर्त तो और भी विचित्र है। ललित मोदी ने लंदन के किसी रेस्तरां में रॉबर्ट वाड्रा व प्रियंका गांधी से अकस्मात भेंट हो जाने का दावा किया है। इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। वाड्रा भी आज के सुविधाभोगी समाज की युवापीढ़ी से भिन्न नहीं हैं। इस समूचे प्रकरण में कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को लगातार घेरे हुए है व दबाव बना रही है कि स्वराज व राजे के इस्तीफे लिए जाएं। कांग्रेस के ये आक्रामक तेवर राजनीतिक दृष्टि से सही हैं। उसके प्रवक्ता दस्तावेजों एवं तर्कों के आधार पर हल्ला बोल रहे हैं। प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते यह उसका अधिकार है कि वह सत्तारूढ़ दल की कमजोरियों को उजागर करे। इसमें दिलचस्प तथ्य यह है कि शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी खुलकर विरोध करने से बच रही है तथा वही रवैया मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने भी अपना रखा है। शरद यादव के स्वराज कौशल व सुषमा स्वराज के साथ आपातकाल के दिनों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध रहे हैं, इसलिए उनका चुप रहना समझ आता है। बहरहाल, नरेंद्र मोदी कांग्रेस पार्टी की मांग पूरी करने के मूड में नजर नहीं आते। जो अर्णव गोस्वामी एक साल पहले तक उग्र स्वर में कांग्रेस की आलोचना करते थे, वे आज उसी उग्रता के साथ भाजपा नेताओं की खबर ले रहे हैं, किंतु नरेन्द्र मोदी उनकी मांग को भी अनसुनी कर रहे हैं। प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री ने अपने दोनों कान बंद कर लिए हैं। जनता उम्मीद लगाए बैठी थी कि वह मन की बात में कुछ कहेंगे, लेकिन इस मामले में वे बिल्कुल मौन रहे। सोशल मीडिया में अब उनका नया नामकरण हो गया है- मौनेंद्र मोदी।
यह समझना होगा कि इतनी सार्वजनिक आलोचना, नेताओं की छवि एवं पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आने के बावजूद वे जनापेक्षा के अनुकूल कोई निर्णय लेने से क्यों कतरा रहे हैं? इसके लिए कुछ तो इतिहास में जाना होगा और कुछ वर्तमान को देखना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी या अनिर्णय को समझने के लिए हमें शायद उन दिनों को ध्यान में रखना चाहिए जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अपने बारह साल के कार्यकाल में नरेन्द मोदी ने कब किसकी बात मानी? क्या यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि उन्होंने अपने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा राजधर्म का पालन करने की सीख को भी एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया था? क्या यह आईने की तरह साफ नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने जनमत की कभी परवाह नहीं की? मोदी की आलोचना चाहे निजी जीवन को लेकर की गई हो, चाहे मुख्यमंत्री के रूप में लिए गए निर्णयों पर, उन्होंने हर अवसर पर मौन रहना ही श्रेयस्कर समझा है। आज प्रधानमंत्री के रूप में भी संभवत: वे इस पुराने आजमाए गए नुस्खे का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। देशव्यापी पैमाने पर नुस्खा कितना कारगर हो पाता है, यह कहना कठिन है, किंतु आज की सोच शायद यही है कि जो चिल्ला रहे हैं उन्हें चिल्लाने दो, एक दिन थककर सब अपने आप चुप हो जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी को शायद यह विश्वास भी है कि वे जिस शीर्ष पर हैं, वहां उनके सामने कोई चुनौती, कोई खतरा नहीं है। हमें शायद इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी का चरित्र कांग्रेस पार्टी से एकदम भिन्न है। भाजपा मूलत: एक कैडर आधारित पार्टी है, जहां आज के तमाम बड़े नेता साथ-साथ रहते हुए आगे बढ़े हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पितृ संगठन के रूप में इन्हें एक सूत्र में बांधे रखने के तमाम प्रयत्न पर्दे के पीछे से करता है। इसलिए जब किसी पर मुसीबत आन पड़े, कोई मुश्किल आ खड़ी हो जाए तो निजी मतभेदों को कुछ देर के लिए दरकिनार कर सब एकजुट हो जाते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या लालकृष्ण आडवानी-वे तक फूं-फां करने से अधिक कुछ नहीं कर पाते। जिनकी पृष्ठभूमि संघ की नहीं है, मसलन यशवंत सिन्हा या कीर्ति आजाद, ऐसे लोगों का यथासमय उपयोग अवश्य किया जाता है, पर पार्टी के भीतर उनकी एक नहीं चलती। इसके बरक्स कांग्रेस एक जन आधारित पार्टी है। वह सार्वजनिक आलोचनाओं से असुविधा महसूस करती है। इसलिए केन्द्र हो या प्रदेश-पिछले 65 साल में कितनी ही बार कांग्रेसी मंत्रियों को नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद छोड़ने पर विवश होना पड़ा है। यह बात दीगर है कि हाल के समय में पार्टी को इस्तीफे लेने में जितनी त्वरा दिखाना चाहिए थी, वह उसका परिचय नहीं दे सकी। कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी अपने परिवार के सदस्यों की देखभाल ठीक तरह से करती है। कोई बेटा नालायक निकल जाए तो उसे घर से बाहर नहीं करती।
यदि नरेंद्र मोदी अपने विवादास्पद सहयोगियों के त्याग-पत्र नहीं ले रहे हैं तो उसका एक और कारण हो सकता है। बिहार में विधानसभा चुनाव होने में मात्र 10-12 सप्ताह बाकी हैं। अगर अभी इस्तीफे मांगे गए तो इससे समीकरण बिगड़ने की आशंका बन सकती है। बेहतर है कि फिलहाल जो जहां है, उसे वहीं रहने दिया जाए। अगर कोई बड़ा फैसला लेना ही है तो वह बिहार चुनाव के बाद भी लिया जा सकता है। आज केन्द्र में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है, राजस्थान विधानसभा में भी। इसलिए सरकार को तो कोई खतरा है नहीं। इस्तीफे  न होने पर संसद के मानसून सत्र में हंगामा मच सकता है तो इससे क्या? अधिक से अधिक यही होगा कि कुछ और बिल शीतकालीन सत्र तक के लिए टल जाएंगे तो टल जाएं। अपने मन का कोई फैसला लागू करने के लिए अध्यादेश लाना होगा तो वह कर लिया जाएगा। सबसे बड़ी बात तो यही है कि पांच साल राज करने का अवसर मिला है तो उसमें कोई विघ्न-बाधा उत्पन्न न हो।
ललित सुरजन

Wednesday, 1 July 2015

डिजिटल इण्डिया की चुनौतियां

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुल्क के सभी गांवों को तकनीकी रूप से मजबूत करना चाहते हैं। बुधवार एक जुलाई को उन्होंने डिजिटल इण्डिया सप्ताह की शुरुआत कर अपने इरादे जता दिये हैं। मोदी सरकार की मंशा है कि डिजिटल इण्डिया के माध्यम से ग्रामीणों को भी रोजमर्रा की सहूलियतें उपलब्ध हों। सरकार ने इस अभियान के तहत नौ क्षेत्रों को निर्धारित किया है। मोदी सरकार का पहला लक्ष्य ब्रॉडबैंड हाईवे है जिसके तहत देश के आखिरी घर तक इण्टरनेट पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। इसमें सबसे बड़ी बाधा नेशनल आॅप्टिक फाइबर नेटवर्क का प्रोग्राम है, जो तीन-चार साल पीछे चल रहा है। गांव-गांव तार बिछाने के लिए सरकार को उन लोगों को काम देना होगा जोकि आॅप्टिक फाइबर नेटवर्क की तकनीक को समझते हैं। सरकार सभी को टेलीफोन सुविधा सुनिश्चित करना चाहती है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब लोगों के पास फोन खरीदने की क्षमता हो। अगर सरकार  यह सोच रही है कि वह खुद सस्ते फोन बनाएगी तो उसके पास तकनीक और तैयारी कैसी है, इस पर उसे मंथन करना होगा। हर किसी के लिए इण्टरनेट हो यह अच्छी बात है। इसके लिए पीसीओ की तर्ज पर पब्लिक इण्टरनेट एक्सेस प्वाइंट बनाए जा सकते हैं। यह पीसीओ आसानी से समस्या हल कर सकते हैं, लेकिन हर पंचायत स्तर पर इसको लगाना और चलाना आसान नहीं होगा। मोदी सरकार सरकारी दफ्तरों का डिजिटलाइजेशन कर उसकी सेवाओं को इंटरनेट से जोड़ना चाहती है, पर पिछला अनुभव बताता है कि दफ्तर तो डिजिटल हो जाएंगे पर उनमें काम करने वाले लोग दक्ष कैसे होंगे? मोदी सरकार की मंशा है कि इण्टरनेट के जरिए विकास गांव-गांव तक पहुंचे, लेकिन इसके लिए हमारा दिमाग, हमारी सोच, हमारा प्रशिक्षण और उपकरण सब कुछ डिजिटल होना चाहिए। अगर हमने सरकार के ढांचे को इण्टरनेट से नहीं जोड़ा तो फिर इसके तहत डिलीवरी कैसे होगी? अगर कर भी दी, तो सही मायनों में इसका फायदा लोगों तक नहीं पहुंचेगा क्योंकि इसमें बड़ी धांधली होती है। मोदी सरकार इंफॉर्मेशन फॉर आॅल यानी सभी को जानकारियां मुहैया कराने को तत्पर है लेकिन सवाल यह उठता है कि एक्सेस टू इंफॉर्मेशन के अभाव में यह कैसे सम्भव है? इसके लिए जरूरी है अतिरिक्त अधोसंरचना की ताकि लोगों को आसानी से जानकारी मिल सके। मोदी सरकार को देश में सूचना क्रांति लाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को न केवल बढ़ावा देना होगा बल्कि इनके कल-पुर्जों को आयात शून्य करना भी जरूरी है। यह काम मुश्किल है क्योंकि समूची दुनिया व्यापार करना चाहती है। जहां तक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों का सवाल है तो अभी तक हम इस मामले में शहरों तक ही सीमित हैं, वजह इसमें नीति और नियमितता की चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। सरकार अगर आईटी क्षेत्र के जरिए नौकरियां पैदा करना चाहती है तो उसे हर ब्लॉक स्तर पर रूरल बीपीओ खोल देना चाहिए। इससे रोजगार के अवसर भी बनेंगे तथा डिजिटलाइजेशन और ई-गवर्नेंस भी होगा। मोदी सरकार यदि वाकई मुल्क की आवाम को तकनीक से लैश करना चाहती है तो उसे पुरानी तकनीक से तौबा कर नया रवैया अपनाना होगा।