Friday, 6 September 2013

उत्तम राह पर उत्तर प्रदेश

बीते साल विधानसभा चुनाव के समय जब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की आम जनता को समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का भरोसा दे रही थी, उस समय किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा हो भी सकता है। इसकी वजह सूबे की 22 करोड़ की आबादी और उसके सीमित संसाधनों को जाता है। प्रदेश की जनता ही नहीं किसी राजनीतिक दल को भी भरोसा नहीं था कि समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी। लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता ने गठबंधन की गांठ खोलते हुए न केवल युवा अखिलेश यादव पर पूरा भरोसा जताया बल्कि सपा की झोली में एक ऐतिहासिक जीत डाल दी। खुशी यह है कि सरकार प्रदेश के ढेरों युवा वोटरों को संतुष्ट करने में सफल सिद्ध हुई है।
15 मार्च, 2012 को उत्तर प्रदेश की सल्तनत का सरताज बनने के बाद अखिलेश यादव ने प्रदेश की जनता, खासकर युवाओं से किये गये वायदे एक-एक कर पूरे करने शुरू किए। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता, तो मेधावी बेटियों को कन्या विद्या धन और प्रतिभाशाली छात्रों को लैपटॉप देने को सरकार ने पहली वरीयता में रखा। आज प्रदेश भर में बांटे गये लैपटॉपों को पाकर मेधावी छात्र-छात्राएं जहां पुलकित हैं वहीं गांव-गांव तक पहुंची सूचना क्रांति का किसान भी लाभ उठाने को तैयार हैं। देखा जाये तो आजादी के बाद से ही देश के नागरिकों को शिक्षा और चिकित्सा का मौलिक अधिकार प्राप्त है लेकिन इसके उलट, आजादी के 66 बरस बाद स्वतंत्र भारतीय गणतंत्र में निवास करने वाले आम जनमानस को मौलिक और संवैधानिक दोनों ही अधिकार अर्थ के बदले ही मयस्सर हो रहे हैं। यह विडम्बना देश के नीति-नियंताओं की देन है, जिन्होंने नागरिकों को बेबसी में जीने को विवश किया है। हर क्षेत्र के घटनाक्रमों पर दृष्टिपात का कुल जमा फलसफा बहुत सुखद नहीं कहा जा सकता। उत्तर प्रदेश की बात करें तो आजादी के बाद से ही इस सूबे को राजनीतिक संत्रास का सामना करना पड़ा है। राजनीतिक दलों ने प्रदेश को देश की सल्तनत का रास्ता तो हमेशा माना पर दिल्ली पहुंचते ही यहां की गरीब आवाम को भूल गये। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव प्रदेश के जनमानस को राजनीतिक भूल-भुलैया से दूर निकालने की न केवल हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं बल्कि सूबे पर जब भी कोई संकट आता है तो मुख्यमंत्री को नसीहत देने से नहीं चूकते। जिस तरह से उसका असर होता है, उससे लगता है कि अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की जवाबदेही सौंपना एक अच्छा फैसला है। अखिलेश युवा भले हों पर उनकी दूरदृष्टि मंझे हुए राजनीतिज्ञों से कहीं बेहतर कही जा सकती है।
एक तरफ देश के नीति-नियंता आम आदमी के जीवनयापन को जहां अपनी ही तूलिका से तौल रहे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी जमीनी हकीकत को समझते हुए गरीब परवरदिगारों की आवाज दिल्ली तक बुलंद कर रही है। आज देश के लोकतंत्र और गणतंत्र के सामने गंभीर चुनौती आ खड़ी हुई है। बढ़ती महंगाई से देश का हर आदमी आशा-निराशा भरे चौराहे पर खड़ा है। बात शिक्षा की हो, स्वास्थ्य अथवा कृषि की,आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी राज्यों से लेकर केन्द्र तक की सरकारें प्रयोगधर्मिता के आगोश से मुक्त नहीं हो पाई हैं। तथाकथित जवाबदेह नेतृत्व और प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक दलों के नुमाइंदे आज दोहरे चरित्र और मानदण्डों का शिकार हैं। एक तरफ जहां शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय विद्वानों-चिन्तकों और शिक्षाशास्त्रियों के सवाल सत्ता के गलियारों से बिना जवाब पाए लौट रहे हैं, वहीं अखिलेश सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में शिक्षक भर्ती को प्राथमिकता देकर युवाओं के लिए रोजगार सृजन की भी पहल की है। एक समय प्रदेश की ग्रामीण प्रतिभाएं उच्च शिक्षा और उच्च तकनीक से वंचित थीं पर समाजवादी पार्टी सरकार सीमित संसाधनों के बाद भी युवाओं को लैपटॉप की सौगात देकर उनकी मुट्ठी में दुनिया सौंप रही है। एक बीमारू राज्य को भला-चंगा करने में वक्त तो लगेगा पर उम्मीद है कि सपा सरकार इसमें सफल होगी। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार जो आमूलचूल परिवर्तन कर रही है उससे निरक्षरों की संख्या घटेगी, इस पर संदेह नहीं किया जा सकता।  इसके साथ ही मुख्यमंत्री आम जनता के लिए सुलभ भी हुए। उनके जनता दर्शन कार्यक्रम से 26 प्रतिशत लोग लाभान्वित हुए। सपा सरकार ने सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि महिलाओं और किसानों के लिए भी कई लाभकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की है। प्रदेश में वूमेंस पॉवर लाइन, समाजवादी एम्बुलेंस सेवा, कन्या विद्या धन, पढ़ें बेटियां-बढ़ें बेटियां, रानी लक्ष्मीबाई पेंशन योजना, हमारी बेटी-उसका कल योजनाएं गरीब महिलाओं और बेटियों के लिए खुशियों की सौगात साबित हो रही हैं। इन योजनाओं से गरीबों में विश्वास जागा है। जो गरीब शिक्षा को दूर की कौड़ी मानते रहे हैं, उनके बच्चे आज न केवल स्कूलों की तरफ रुख कर रहे हैं बल्कि सरकार उन्हें मुफ्त गणवेश और पुस्तकें भी मुहैया करा रही है। महिला-बेटियों के साथ ही सरकार ने धरती पुत्रों के लिए क्रेडिट कार्ड योजना, कर्जमाफी योजना के साथ-साथ उन्हें ग्राम उद्योग योजना की सौगात देकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया है। सपा सरकार के अब तक के 18 माह के कार्यकाल पर लोग लाख नुक्ताचीनी करें पर प्रदेश की गरीब जनता और युवाओं को राहत जरूर मिली है। उम्मीद है कि 2017 तक अखिलेश सरकार न केवल अपने सभी वायदे पूरे करेगी बल्कि उसका कार्यकाल प्रदेश में तरक्की की नई पटकथा भी लिखेगा।

Thursday, 29 August 2013

दद्दा ध्यानचंद: न भूतो, न भविष्यति

ओलम्पिक के आठ स्वर्ण और एक विश्व खिताब का मदमाता गर्व हर भारतीय को कालजयी दद्दा ध्यानचंद की याद दिलाता है। नपे-तुले पास, चीते सी चपलता, दोषरहित ट्रेपिंग, उच्च स्तर का गेंद नियंत्रण और सटीक गोलंदाजी हॉकी के मूल मंत्र हैं, दद्दा ध्यानचंद की हॉकी भी मैदान में प्रतिद्वंद्वी को कुछ यही पाठ पढ़ाती थी। 29 अगस्त, 1905 को परतंत्र भारत के प्रयाग नगर में एक तंगहाल गली में सोमेश्वर दत्त सिंह के घर जन्मे ध्यानचंद अब इतिहास के पन्नों में दफन हैं, पर उनका असाधारण खेल कौशल आज भी जिन्दा है।  
बचपन में पहलवानी का शौक रखने वाले दद्दा की हॉकी प्रतिभा के असल पारखी सूबेदार मेजर बाले तिवारी रहे। पिता सोमेश्वर सिंह और बड़े भाई मूलचंद के सेना में होने के चलते दद्दा ने 16 साल की उम्र में ही वर्ष 1922 में फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट में एक सिपाही से अपनी नौकरी प्रारम्भ की। सेना में बाले तिवारी ने न केवल दद्दा ध्यानचंद की छुपी खेल प्रतिभा को पहचाना बल्कि हॉकी के प्रारम्भिक गुर भी सिखाए। तिवारी की देख-रेख में कुछ समय में ही दद्दा की हॉकी में ऐसी तूती बोली कि दुनिया वाह-वाह कर उठी। दद्दा ध्यानचंद की हॉकी जब परवान चढ़ी तब भारत आजाद नहीं  था। तब हॉकी में ही एकाध लम्हे ऐसे आते थे, जब गुलाम भारत को गर्व और गौरव का अहसास होता था। इन्हीं लम्हों के बीच महसूस होता था कि इस मुल्क से जो सोने की चिड़िया उड़ गई है वह कभी-कभार भारतीय हॉकी के ऊपर आ बैठती है। समय बदल चुका है अब देश आजाद है पर हमारी हॉकी गुलाम हो चुकी है। अब हमारे पास कोई हॉकी का जादूगर नहीं है। एक लम्हा बर्लिन ओलम्पिक 1936 का, जब हिटलर का जलजला था लेकिन तब भी हॉकी में भारतीय बादशाहत का ही डंका पिटता था।  15 अगस्त, 1936 को बर्लिन ओलम्पिक हॉकी का खिताबी मुकाबला देखने तानाशाह हिटलर मैदान में आया था। हिटलर मैदान में इसलिए आया था कि जर्मनी जीतेगी और वह अपने खिलाड़ियों को सोने से मढ़ देगा लेकिन जादूगर दद्दा ध्यानचंद ब्रिगेड ने जर्मनी को 8-1 से ध्वस्त कर उसका गुरूर चूर-चूर कर दिया। पराजय से स्तब्ध जर्मन जहां हिटलर के न्याय को ताक रहा था वहीं तानाशाह उमंगित था तो बस जादूगर की जादूगरी से। वाकई उस दिन दो भाइयों (ध्यान और रूप) की जोड़ी ने ही जर्मनी का मानमर्दन किया था। उस दिन दोनों भाइयों को हिटलर ने जर्मनी से खेलने का आमंत्रण भी दिया पर ध्यानचंद ने उसका टका सा जवाब दिया कि मुझे हॉकी से भी अधिक अपने देश और उसकी मिट्टी से प्यार है। यदि हॉकी खेलूंगा तो सिर्फ अपने वतन के लिए। हालांकि तब भारत ने कोई नई जमीन नहीं तोड़ी थी, इससे पूर्व एक्सटर्डम (1928) और लॉस एंजिल्स (1932) में भारत हॉकी का स्वर्ण तमगा गले लगा चुका था, फिर भी खुशी थी तो बस इसलिए कि परतंत्र भारत की स्वतंत्र हॉकी ने जहां लगातार तीसरी बार दुनिया जीती वहीं दद्दा ध्यानचंद ने भी तीन ओलम्पिक मजमों में बडेÞ ही शान से 33 गोलों का अद्भुत कीर्तिमान बना डाला। उस बर्लिन की शाम को जब भारतीय तिरंगा फहराया गया तब वह 15 अगस्त की शाम थी। यह तिथि आज भी भारतीय गौरवगाथा और उसकी स्वतंत्रता का सूचक है। समय ठहर गया। दूसरे विश्व युद्ध की प्रतिछाया के चलते दुनिया ओलम्पिक में फिर जादूगर की जादूगरी नहीं देख सकी। भारत को हॉकी में अपनी चौथी फतह के लिए 12 वर्ष लम्बा इंतजार करना पड़ा। सच तो यह है कि दद्दा की दमदार हॉकी से ही पूरबी जादू और जादूगर जैसे विशेषण निकले। समय और उम्र कुदरत की नियामत है। समय बदला भारतीय परतंत्रता की बेढ़ियां कटीं लेकिन तब तक दद्दा बूढेÞ हो चुके थे और उन्होंने भी खेलभावना के साथ 1949 में प्रथम श्रेणी हॉकी को विश्राम दे दिया। देश आजाद हुआ पर दुनिया पर राज करने वाली हमारी हॉकी भारत-पाकिस्तान के बीच बंट गई। भारतीय हॉकी ने ओलम्पिक में चैम्पियन बने रहने का सिलसिला तो कायम रखा पर उसकी जादूगरी वाली बात फिर नजर नहीं आई। किशनलाल ने आजाद भारतीय हॉकी की कमान सम्भाली और भारत पहली बार ध्यानचंद के बिना भी जीता लेकिन दद्दा के शून्य की कमी कभी नहीं भरी जा सकी। हॉकी के चक्रवर्ती अभियान में पद्मभूषण दद्दा ने जर्मनी, स्पेन, मलेशिया, अमेरिका, इंग्लैण्ड, डेनमार्क आदि मुल्कों के साथ 133 मैच खेलकर जहां 307 गोल किए वहीं न्यूजीलैण्ड दौरे पर गई टीम की तरफ से मेजर ध्यानचंद ने 43 मैचों में ही 201 बार गोलंदाजी कर दुनिया को चकाचौंध कर दिया था।
लगभग ढाई दशक तक भारतीय हॉकी को अपने कंधों का सहारा देकर दद्दा ध्यानचंद तो अमर हो गए पर भारत से हॉकी की बादशाहत छिन गई। उम्मीद है कि मरती नहीं, हॉकी टीम के प्रदर्शन पर लोग चाहे लाख उंगलियां उठाएं लेकिन किसी खेल मजमे से पूर्व मन के किसी कोने में अपने पुराने चावल होने का भाव आज भी जिन्दा रहता है। दद्दा ध्यानचंद तीन दिसम्बर, 1979 को हमारे बीच से जुदा हो गए लेकिन उनकी हॉकी आज भी भारतीय हृदय को उन्मादित करती है। आज दद्दा ध्यानचंद के जन्मदिन पर एक बार पुन: भारतीय हॉकी का अतीत उनकी अमरता में खोजना पडेÞगा।

Tuesday, 27 August 2013

दागी पहलवानों के दम से पस्त तंत्र

आपराधिक मामलों में सजा पाए सांसदों को चुनाव मैदान से दूर रखने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों को जहां हमारे माननीय सांसदों ने नकार दिया, वहीं अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के इन्हीं प्रयासों पर भारतीय ओलम्पिक संघ ने पानी फेर दिया है। आम आवाम ने राजनीतिक अपराधीकरण के खिलाफ तो क्लीन स्पोर्ट्स इण्डिया से जुड़े खिलाड़ियों ने दागी खेलनहारों के खिलाफ खूब गाल बजाए पर उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगती नहीं दिख रही। इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और हमारे संविधान का यह अजीब लचीलापन है कि कानून तोड़ने वाला अपराधी ही नए कानून का निर्माता बन जाता है। जबकि देश का सामान्य नागरिक आपराधिक छवि वाले जनप्रतिनिधियों और खेलनहारों से खासा परेशान है। इससे समाज में अपराधियों को प्रश्रय मिलता है और आपराधिक मानसिकता वाले लोग हावी होते हैं। गौर करें तो देश में मौजूदा 4835 सांसदों और विधायकों में से 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। लाख प्रयासों के बावजूद आपराधिक छवि वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
यह अपराध का राजनीतिकरण ही है कि राजनीतिक परिदृश्य में दागियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। नामजद और सजायाफ्ता दोषियों को चुनाव लड़ने का अधिकार जनप्रतिनिधित्व कानून के जरिये मिला हुआ था लेकिन इस विधि सम्मत व्यवस्था के विपरीत संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 में प्रावधान है कि न्यायालय द्वारा अपराधी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जाने चाहिए। सवाल यह उठता है कि जब संविधान के अनुसार कोई अपराधी मतदाता नहीं बन सकता तो वह जनप्रतिनिधि बनने के लिए निर्वाचन प्रक्रिया में भागीदारी कैसे कर सकता है? जनहित याचिका इसी विसंगति को दूर करने के लिए दाखिल की गई थी। न्यायालय ने केन्द्र सरकार से पूछा था कि यदि अन्य सजायाफ्ता लोगों को निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं है तो सजायाफ्ता सांसदों व विधायकों को यह सुविधा क्यों मिलनी चाहिए? लेकिन सरकार ने कहा कि वह इस व्यवस्था को नहीं बदलना चाहती और उसने नहीं बदला।
राजनीति से इतर भारतीय खेलों पर नजर डालें तो यहां की गंगोत्री भी मैली की मैली ही है। जिस देश की आन-बान-शान और आजादी के लिए हजारों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, उसी का आज दुनिया में मजाक उड़ रहा है। खेलों पर अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं लेकिन खेलनहारों की काली करतूत के चलते आज हमारे खिलाड़ी देश-दुनिया में अपने राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान के बिना पौरुष दिखा रहे हैं। भारतीय खेलों में गड़बड़झाला और भाई-भतीजावाद तो लम्बे समय से चल रहा है लेकिन 2010 में देश में हुए राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन में जिस तरह की अनियमितताओं का भण्डाफोड़ हुआ, उससे खेल जगत में हमारी जमकर थू-थू हुई। खेलों में होते खिलवाड़ को संज्ञान में लेते हुए अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ने सरकारी हस्तक्षेप के कारण पिछले साल पांच दिसम्बर को भारतीय ओलम्पिक संघ को निलम्बित कर दिया था। भारत को खेल बिरादर में पुन: शामिल किये जाने को 15 मई को लुसाने में हुई अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की बैठक में केन्द्रीय खेल मंत्री जितेन्द्र सिंह ने पुरजोर कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। भारतीय खेलों में पारदर्शिता लाने की असल कोशिशें केन्द्रीय खेल मंत्री अजय माकन के कार्यकाल में हुर्इं, पर अफसोस दागी खेलनहारों की एकजुटता ने न केवल उनके किए कराए पर पानी फेर दिया बल्कि केन्द्र सरकार ने दबाव में आकर माकन से खेल मंत्रालय ही छीन लिया। देखा जाए तो जिस तरह सुप्रीम कोर्ट नहीं चाहता कि कोई अपराधी जनप्रतिनिधि बने उसी तरह आईओसी भी नहीं चाहती कि खेलों में दागियों की दखलंदाजी बढ़े।
अफसोस, भारतीय ओलम्पिक संघ ने 25 अगस्त को अपनी आमसभा की महत्वपूर्ण बैठक में भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों के लिये नैतिक आयोग के गठन का फैसला तो लिया पर केवल दो या इससे अधिक साल तक सजायाफ्ता व्यक्तियों को चुनावों से दूर रखने का फैसला करके राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के आरोपी सुरेश कलमाड़ी, ललित भनोट और वीके वर्मा जैसे लोगों के चुनाव लड़ने का रास्ता साफ कर दिया। बैठक में 182 में से 161 सदस्यों ने भाग लिया और आईओसी के आरोप-पत्र वाली शर्त को छोड़कर बाकी सभी शर्तें सर्वसम्मति से स्वीकार लीं। हाल ही देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कारों की जो घोषणा हुई उसमें राजीव गांधी खेल रत्न को लेकर जमकर नूरा-कुश्ती हुई। वर्ष 1991-92 से प्रारम्भ इस खेल अलंकरण को पाने वाले पहले भारतीय शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद रहे। उसके बाद से यह अवॉर्ड 12 खेलों के 26 खिलाड़ियों को दिया जा चुका है। इस अलंकरण के लिए विवादों की फेहरिस्त भी अर्जुन अवार्डों की ही तरह लम्बी है। वर्ष 2001 में राजीव गांधी खेल रत्न के लिए शूटर अभिनव बिन्द्रा का नाम आया। उन्हें पुरस्कार मिला भी पर तब तक अभिनव के नाम कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी। 2002 में एथलीट केएम बीनामोल को चुना गया लेकिन निशानेबाज अंजलि भागवत के नाम पर विवाद हो गया। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि आखिर दोनों को संयुक्त रूप से यह पुरस्कार दिया गया। विवादों के चलते ही वर्ष 2009 में महिला मुक्केबाज एमसी मैरीकाम, पहलवान सुशील कुमार और बॉक्सर विजेन्द्र सिंह को एक साथ राजीव गांधी खेल रत्न से अलंकृत किया गया। इस अलंकरण के लिए गगन नारंग ने भी विरोध का बिगुल फूंका और निशानेबाजी छोड़ने तक की धमकी दे दी। अंतत: 2011 में नारंग भी खेल रत्न बन गये। इस साल शूटर रोंजन सोढ़ी और डिस्कस थ्रोवर कृष्णा पूनिया के बीच इस अलंकरण के लिए जमकर लाबिंग हुई अंतत: रोंजन सोढ़ी बाजी मार ले गये। देखा जाए तो हितों के टकराव में सबसे पहले शुचिता पराजित होती है। जब हमारे नेता और खेलनहार ही नहीं चाहते कि राजनीति और खेलों से अपराधी दूर रहें तो लाख संशोधनों के बाद भी नेताओं और खेलनहारों का दागी अतीत, वर्तमान और भविष्य हमेशा जनप्रतिनिधित्व करता रहेगा।

Wednesday, 21 August 2013

प्रणब दा, आपका जवाब नहीं

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के एक साल के कार्यकाल और उनकी उपलब्धियों पर नजर डालें तो पाएंगे कि शांतिप्रिय इस शख्स का त्वरित कार्य निपटारे के साथ कानून पर जबर्दस्त भरोसा है। भारतीय राष्ट्राध्यक्ष मुखर्जी ने अपराधियों की दया याचिकाओं को जिस तरह दरकिनार किया है उससे आपराधिक हलकों में अच्छे संकेत पहुंचे हैं। देश की विभिन्न संवैधानिक संस्थाएं हमारे संविधान और कानून के शासन का आधार स्तम्भ हैं, इनमें किसी प्रकार की गड़बड़ी से संविधान का आदर्शवाद कायम रखने में दिक्कत आती है। अपने एक साल के कार्यकाल में मुखर्जी ने 17 दया याचिकाएं ठुकराकर जो मिसाल कायम की है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा की जा रही है।
आज देश को अंदर और बाहर दोनों खतरों से सुरक्षित बनाए रखना सभी का कर्तव्य है। लाख कानून बनें, उनके अमल में यदि ढिलाई बरती गई तो उसके परिणाम भयावह ही होंगे। दरअसल सीमाओं पर चौकसी के समान ही आज देश के भीतर भी चौकसी जरूरी हो गई है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह आपराधिक वारदातें बढ़ी हैं उससे मुल्क को आंतरिक खतरा पैदा हो गया है। देश को अमन का पैगाम सिर्फ बातों से नहीं मिलने वाला। यह तभी सम्भव है जब हम अपनी राजनीति, न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की विश्वसनीयता को बनाए रखें। माना कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी है और लोगों को अपने असंतोष को व्यक्त करने का अधिकार है, परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विधायिका से कानून को या न्यायपालिका से न्याय को अलग नहीं किया जा सकता। ये सजग नागरिक के लिए सबसे जरूरी पक्ष हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 17 दया याचिकाओं को ठुकराकर न केवल उनको मिली फांसी की सजा पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है बल्कि दिवंगत राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा रद्द की गई 16 दया याचिकाओं से भी आगे निकल गए हैं। देश की पिछली राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल में मृत्युदण्ड का प्रावधान होने के बावजूद किसी को भी फांसी नहीं दी गई। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने के बाद अपराधियों को फांसी मिलना तय हो गया है। फरवरी और मार्च 2013 के बीच राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने वीरप्पन के सहयोगी सायमन, गगन प्रकाश, मदैया, बिला वंद्रन की दया याचिकाओं को खारिज किया था। इन पर 22 लोगों की हत्या का जुर्म साबित हुआ था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें फांसी की सजा दी थी। इसके अलावा पूरे परिवार की हत्या के दोषी सुरेश और रामजी समेत गुरमीत सिंह और जफर अली की भी दया याचिका को राष्ट्रपति ने ठुकरा दिया था। हरियाणा के विधायक समेत उनके पूरे परिवार की हत्या के दोषी की दया याचिका को भी राष्ट्रपति मुखर्जी ने खारिज करने में संकोच नहीं किया। दरअसल दया याचिकाओं के निपटारे में हुई देरी को आधार बनाकर पूर्व में दर्जनों अपराधी फांसी की सजा माफ कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे थे। जबकि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 24 साल पहले ही कह चुकी है कि दया याचिका के निपटारे में हुई देरी अदालत में याचिका दाखिल करने का आधार तो हो सकती है, लेकिन मृत्युदण्ड से माफी का आधार नहीं हो सकती। देखा जाये तो दया याचिका में विलम्ब के चलते कई बार राष्ट्रपति और राज्यपाल के क्षमादान के विवेकाधिकार पर भी लोगों ने उंगली उठाने का दुस्साहस किया पर ऐसी याचिकाएं अब तक खारिज ही की गई हैं।
ऐसे ही एक मामले में रंगा-बिल्ला ने भी राष्ट्रपति के विवेकाधिकार को चुनौती दी थी और कहा था कि दया याचिका निपटाने के लिए कोई तय प्रक्रिया नहीं है, लेकिन याचिका खारिज कर दी गई।
इंदिरा गांधी के हत्यारे केहर सिंह और सतवंत सिंह की भी इसी तरह की दलीलें सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी थीं। आखिरकार दोनों मामलों में फांसी पर अमल हुआ। देरी अगर आधार होती तो धनंजय चटर्जी की फांसी भी माफ हो गई होती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी भी देरी की दलील खारिज कर दी थी। देखा जाये तो आपराधिक मामलों में तीसरे पक्ष को याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं होता। केहर और सतवंत के मामले में दया याचिका ठुकराए जाने के बाद अल्तमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी लेकिन कोर्ट ने सिर्फ लोकस (किस अधिकार से याचिका दाखिल की) के आधार पर याचिका खारिज कर दी थी। देखा जाए तो हमारे देश में त्वरित न्याय प्रक्रिया अन्य मुल्कों की अपेक्षा काफी शिथिल है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा संगीन अपराधियों की दया याचिकाएं खारिज किए जाने को जहां एक साहसिक कदम बताया जा रहा है वहीं मानवाधिकारों के हिमायती मृत्युदण्ड का विरोध कर रहे हैं। देखा जाये तो भारत में आज हर मामले में मृत्युदण्ड के स्वर मुखरित हो रहे हैं। दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध के समय से मृत्युदण्ड उन्मूलन के प्रयास हो रहे हैं। 1977 में छह देशों ने मृत्युदण्ड का निषेध किया था। मौजूदा समय में 95 देशों ने मृत्युदण्ड को अलविदा कह दिया है तो नौ देशों ने इसे अन्य सभी अपराधों के लिए निषेध किया है, सिवाय विशेष परिस्थितियों के। 35 देशों ने बीते 10 साल में इस सजा के लिए किसी को आरोपित नहीं किया है। इस तरह दुनिया के लगभग 140 देश मृत्युदण्ड की परिधि से दूर होते दिख रहे हैं। साल 2009 में 18 देशों ने 714 लोगों को फांसी पर चढ़ाया था। भारत में आज भी सैकड़ों कैदी हैं जिन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, इनमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के तीन कसूरवार भी शामिल हैं। भारत में 1975 से 1991 के बीच कम से कम 40 लोगों को फांसी दी गई। लेकिन तमिलनाडु के सलेम में 27 अप्रैल, 1995 को सीरियल किलर आटो शंकर को फांसी देने के नौ साल बाद अगस्त 2004 में कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई। 2004 के बाद मुम्बई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब और अफजल गुरु को फांसी पर लटकाया गया। एक तरफ देश में वर्ष 2006 के अंत में विभिन्न जेलों में कैद 347 अभियुक्तों को (इनमें आठ महिलाएं शामिल) फांसी की सजा सुनाई गई जबकि इसी साल देश की जेलों में 1423 कैदियों की प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक कारणों से मौत हो गई। जो भी हो प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनते ही फांसी की घटनाओं में तेजी आई है। इस तेजी को राजनीतिज्ञ अगले चुनाव से पहले लोगों की सहानुभूति हासिल करना मान रहे हैं जबकि आम अवाम में इसकी सराहना हो रही है।

Wednesday, 24 July 2013

अब शटलरों की बल्ले-बल्ले

खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त के बाद यह तय हो गया है कि  आईपीएल की तर्ज पर अब देश में इंडियन बैडमिंटन लीग के सहारे शटलरों की बल्ले-बल्ले होगी। यह अच्छा प्रयास है पर इस पर सतत नजर रखनी होगी। प्रतियोगिता से पूर्व कम दाम में खरीदी गई ज्वाला गुट्टा जिस तरह ज्वाला बनकर मीडिया के सामने पेश हुईं हैं वह इस खेल के लिए शुभ संकेत नहीं है। ज्वाला की ज्वाला कई बार धधक चुकी है ऐसे में आईबीएल आईपीएल न बन जाये इस बात का ख्याल आयोजकों को रखना होगा।
वैसे भी जिस तरह आईबीएल की शुरुआत हुई उसमें क्रिकेट  की ही तरह बाजारीकरण के दीदार हुए हैं। वही खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त, वही बोली, वही नीलामी। देशी-विदेशी खिलाड़ियों की लोकप्रियता के हिसाब से उनका आधार मूल्य और नीलामी। खिलाड़ियों पर डालर और रुपयों की बरसात। वही फ्रेंचाइजियों की जोड़-तोड़। ऐसे में लगता है कि कहीं बैडमिंटन के बाजारीकरण का भी वही परिणाम सामने न आये जो देश में क्रिकेट का हुआ। इसमें दो राय नहीं कि देश में खेलों का विकास होना चाहिए, नई प्रतिभाएं सामने आनी चाहिए, उन्हें प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए लेकिन यह सब कुछ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
खेल खेलभावना का सूचक होने के साथ विश्व बंधुत्व की अलख जगाते हैं लिहाजा इसके साधन भी साफ-सुथरे होने चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि लोगों में खेल के प्रति विश्वास बना रहे। उसे यह नहीं लगना चाहिए कि यह खेल विशुद्ध पैसा कमाने का जरिया है। धनाढ्य लोगों की मौजमस्ती और खिलवाड़ का जरिया कम से कम खेलों को नहीं बनने देना चाहिए। यदि आईबीएल के आयोजक आईपीएल के दामन पर लगे दागों से सबक लेकर खेलों की शुचिता बनाए रखते हैं तो ऐसे प्रयासों का स्वागत ही किया जाना चाहिए। लेकिन एक बात तो तय है कि जो फ्रेंचाइजी लाखों रुपये खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त में खर्च कर रही हैं, वे जाहिर तौर पर लाभ कमाने के लिए ही सारा तामझाम कर रही हैं। मगर इसके बावजूद खेल की आत्मा का तो कम से हनन नहीं होना चाहिए। यानी खेल के साथ कोई ऐसा निगरानी तंत्र भी विकसित होना चाहिए जो खेल को महज खेल रहने दे।
नई दिल्ली में अगले महीने की 16 तारीख से शुरू होने वाले इंडियन बैडमिंटन लीग में मुकाबले नए प्रारूप के हिसाब से होंगे। भारतीय बैडमिंटन प्रेमियों के लिए दुनिया के नम्बर एक बैडमिंटन खिलाड़ी चोंग वेई को अपने देश में खेलते देखना रोमांचकारी होगा। एक जगह पर दुनिया के बैडमिंटन स्टार आइकान को खेलते देख नवोदित बैडमिंटन खिलाड़ियों को अवश्य प्रेरणा देगा। लेकिन ऐसे में आयोजकों का भी दायित्व बनता है कि वे खेल की गरिमा को अपनी प्राथमिकता बनाएं। इस काम में भारत सरकार का खेल मंत्रालय यदि सचेत रहे तो आईपीएल जैसे हालात पैदा नहीं होंगे। दुनिया के इस सबसे ज्यादा इनामी राशि वाले आयोजन पर हम गर्व कर सकते हैं कि देश में एक नई बैडमिंटन खेल संस्कृति का विकास होने जा रहा है। नई स्कोरिंग प्रणाली के तहत होने वाले पुरुष एकल, महिला एकल, पुरुष युगल तथा मिश्रित युगल मुकाबले खेल प्रेमियों को देखने को मिल सकेंगे। नई स्कोरिंग प्रणाली  से उन खिलाड़ियों को मदद मिल सकेगी, जिनका खेल आक्रामक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय बैडमिंटन खेलप्रेमियों को रोमांचक खेल की दावत देगा और क्रिकेट की तरह इसकी भद नहीं पिटेगी।

Tuesday, 9 July 2013

जूनियर भारतीय महिला हॉकी टीम में सीनियर खिलाड़ी

सर, जर्मनी में कौन सा जन्म प्रमाण-पत्र लेकर चलना होगा, जो हालैण्ड ले गये थे वो या जो मई में आयरलैण्ड ले गये थे वो? यह संवाद किसी फिल्म का नहीं बल्कि भारतीय महिला हॉकी की हकीकत का वह कड़वा सच है जिसके चलते अब प्रतिभाएं इस खेल से पलायन को मजबूर हैं। उम्र के इस फरेब में जहां प्रतिभाशाली सब जूनियर और जूनियर खिलाड़ियों का दम घुट रहा है वहीं हॉकी इण्डिया के कर्ताधर्ता व गोरे हमारे पुश्तैनी खेल का मटियामेट कर रहे हैं। जिस हॉकी को स्वर्णिम दौर की तरफ लाने की हॉकी इण्डिया वकालत कर रही है उसका बुरा हाल है। जर्मनी में 27 जुलाई से चार अगस्त तक खेली जाने वाली सातवीं जूनियर विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता के लिए जिस टीम का चयन किया गया है उसके 18 सदस्यीय दल में 15 सीनियर खिलाड़ी शामिल हैं। नियमत: जूनियर कैम्प से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का चयन किया जाना था पर उसके तीन खिलाड़ियों को ही टीम में जगह मिल पाई है। इन खिलाड़ियों में दो गोलकीपर सानरिक चानू व बिगन साय तथा फारवर्ड नवनीत कौर शामिल हैं। कहने को टीम चयन के लिए 27 जून को ट्रायल होनी थी पर हॉकी के हुक्मरानों ने खिलाड़ियों का मैदान में प्रदर्शन देखना वाजिब नहीं समझा। मुख्य प्रशिक्षक नील हावर्ड के बिना ही कमरे में बैठकर टीम का चयन फिजिकल ट्रेनर की सहमति से कर लिया गया।
   हॉकी इण्डिया की मति इस कदर मारी गई है कि जिन सीनियर खिलाड़ियों ने हालैण्ड में भारतीय हॉकी को शर्मसार किया उन्हीं को जर्मनी का टिकट दे दिया गया। हालैण्ड में हुई प्रतियोगिता की आठ टीमों में भारतीय टीम सातवें स्थान पर रही। वहां हमारी पलटन ने जहां सिर्फ पांच गोल किये वहीं प्रतिद्वन्द्वी टीमों ने उस पर 28 गोल ठोंक डाले। महिला हॉकी में चल रहे इस गड़बड़झाले पर जब पुष्प सवेरा ने कुछ खिलाड़ियों से बात की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अच्छे खिलाड़ियों पर हमेशा अनफिट होने का लांछन लगा दिया जाता है। बकौल सीनियर टीम कप्तान रितु रानी की कही सच मानें तो हालैण्ड गई टीम में जहां सीनियर खिलाड़ियों से परहेज किया गया था वहीं जर्मनी में विश्व कप खेलने जा रही जूनियर टीम में सीनियर खिलाड़ियों को प्रवेश देकर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के गाल पर तमाचा मारा गया है। उम्मीद थी कि हॉकी इण्डिया हालैण्ड में मिली शर्मनाक पराजय से सबक लेते हुए प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मौका देगी पर अफसोस जर्मनी के लिए जो टीम चयन हुआ उसमें भी गोरों की मनमानी और बेईमानी जमकर परवान चढ़ी। इस टीम में खिलाड़ियों के उम्र फरेब की जांच हो तो गम्भीर अनियमितताएं सामने आ सकती हैं। कहने को हॉकी इण्डिया प्रतिवर्ष जवाबदेह लोगों की देखरेख में सब जूनियर, जूनियर और सीनियर नेशनल प्रतियोगिताएं करा रही है पर खिलाड़ियों का उम्र फरेब रोके नहीं रुक रहा। जर्मनी जा रही टीम की कप्तान पी. सुशीला चानू और वंदना कटारिया जहां 21 साल से अधिक हैं वहीं दूसरी सदस्यों पर नजर डालें तो वे भी दूध की धुली नहीं हैं। जानकर ताज्जुब होगा कि एक-एक महिला खिलाड़ी के पास कई-कई जन्म  प्रमाण पत्र हैं।
कहां गई रानी रामपाल?
बीते कई सालों से महिला हॉकी में रानी रामपाल की धूम रही है। उसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाशाली फारवर्ड खिलाड़ी माना जाता रहा पर वह रानी रामपाल न जाने कहां गुम हो गई? इस बाबत जब हॉकी जानकारों से पड़ताल की गई तो उन्होंने बताया कि अब वह रानी देवी के नाम से जूनियर टीम के साथ जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि रानी रामपाल आखिर रानी देवी क्यों बनी? सच तो यह है कि शाहाबाद (हरियाणा) की यह छोरी भी उम्र फरेब का शिकार है। बीते पांच साल से भारतीय टीम से खेल रही रानी रामपाल अभी 19 साल की ही है।
महिला खिलाड़ियों की उम्र नहीं बढ़ती
मानो या न मानो भारत में महिला खिलाड़ियों की उम्र नहीं बढ़ती। यही वजह है कि जर्मनी जा रही जूनियर टीम में 15 सीनियर खिलाड़ियों ने प्रवेश पा लिया है और जूनियर खिलाड़ी मायूस हैं। जो भी हो इस गड़बड़झाले में कहीं जर्मनी में खलल न          पड़ जाये।
गोलकीपर
सानरिक चानू 02-01-1993
बिगन साय 07-05-1993
डिफेंडर्स
पिंकी देवी 23-12-1992
दीप ग्रेस इक्का 03-06-1993
नमिता टोप्पो 04-06-1995
मनजीत कौर 23-12-1995
एमएन पूनम्मा 25-10-1992
पी सुशीला चानू (कप्तान) 25-02-1992
मिडफील्डर
लिली चानू 03-06-1996
लिलिमा मिंज 10-04-1994
नवजोत कौर 07-03-1995
वंदना कटारिया 15-04-1992
रितुषा आर्य 23-03-1993
फारवर्ड
पूनम रानी 08-02-1993
रानी देवी (उप कप्तान) 04-12-1994
अनुपा बारला 06-05-1994
नवनीत कौर 26-01-1996

Friday, 5 July 2013

विदेशी भगाओ, हॉकी बचाओ



हॉकी में आठ बार के ओलम्पिक चैम्पियन भारत की स्थिति दिन-ब-दिन खराब हो रही है। लंदन ओलम्पिक में हम 12वें स्थान पर रहे तो बीते 10 साल में हमारा पुश्तैनी खेल अर्श से फर्श पर आ गिरा। जिस भारतीय हॉकी की कभी दुनिया में तूती बोलती थी उसकी स्थिति बद से बदतर हो गई है। समझ में नहीं आता कि हमारे खेल मंत्री और भारत सरकार क्या देख रहे हैं। भारतीय हॉकी के पूर्व कप्तान धनराज पिल्लै इसके साथ ही यह कहने से भी नहीं हिचकते कि यदि हमें अपने पुश्तैनी खेल से जरा भी लगाव है तो जल्दी से जल्दी विदेशी प्रशिक्षकों को देश से भगा देना चाहिए। खास बातचीत में पूर्व कप्तान धनराज पिल्लै ने कहा कि हॉकी इण्डिया अपने काम को सही अंजाम नहीं दे पा रही। जब से विदेशी प्रशिक्षकों के हाथ भारतीय हॉकी गई, इस खेल का सत्यानाश हो गया है। टीम खिलाड़ियों को एकजुटता का पाठ पढ़ाने की जगह विदेशी प्रशिक्षक उनमें मनमुटाव पैदा कर अपनी कुर्सी बचा रहे हैं। क्या भारतीय टीम चयन में पक्षपात होता है? इस पर पिल्लै ने कहा कि शत-प्रतिशत ऐसा होता है। खिलाड़ियों के चयन में पक्षपात की बीमारी लम्बे समय से है। जो खिलाड़ी मैदान में अपना सौ फीसदी योगदान देते हैं उन्हें ही टीम से बाहर करने के पीछे साजिश रची जाती है। वजह यह है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि टीम में सीनियर खिलाड़ी रहें और उनका महत्व कम हो। धनराज ने कहा कि हाल ही हालैण्ड से पिट-पिटाकर आई भारतीय पुरुष और महिला टीम के खराब प्रदर्शन की समीक्षा किये बिना अगले महीने मलेशिया में होने वाले एशिया कप हॉकी के प्रशिक्षण शिविर से संदीप और शिवेन्द्र सिंह को बाहर किया जाना भी इस खेल में बड़े गड़बड़झाले की ही तरफ इशारा करता है। उन्होंने कहा, मैं दावे से कह सकता हूं कि मौजूदा समय में शिवेन्द्र सिंह जैसा स्कोरर देश में दूसरा कोई खिलाड़ी नहीं है। उसने हालैण्ड में मिले अवसरों को भुनाने में कोई गलती नहीं की पर उसे बाहर कर दिया गया, जबकि हॉकी के कसूरवार खिलाड़ी टीम में हैं। हाल ही हालैण्ड में छठा स्थान हासिल करने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम की तरफ से हरवीर सिंह, धरमवीर और रघुनाथ जैसे खिलाड़ियों ने बेजा गलतियां कर जहां मुल्क को शर्मसार किया, वहीं इन पर कार्रवाई होने की जगह उन खिलाड़ियों को सजा दी गई जिन्होंने अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया। भारतीय टीम में पक्षपात की बात स्वीकारते हुए पिल्लै ने कहा कि यह लम्बे समय से चल रहा है। विदेशी प्रशिक्षक खिलाड़ियों का खेल सुधारने की जगह उनके बीच मन-मुटाव पैदा कराकर मौज-मस्ती और सैर-सपाटा करते हैं। अफसोस, हॉकी इण्डिया सब कुछ जानते हुए भी कोई ठोस कदम नहीं उठा रही। टीम में चल रहे गड़बड़झाले पर जब टीम के कुछ खिलाड़ियों से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हॉकी में सब कुछ सही नहीं चल रहा। इन खिलाड़ियों ने दबी जुबान से कहा कि जब तक हॉकी किसी हिन्दुस्तानी के हाथ नहीं होगी तब तक इस खेल का भला नहीं होने वाला।
खुदा मेहरबान तो...
हॉकी इण्डिया कुछ खिलाड़ियों पर मेहरबान है, इस बात का अंदाजा प्रशिक्षण शिविर के लिए चयनित खिलाड़ियों की सूची से सहज लगाया जा सकता है। इस शिविर में कुछ ऐसे खिलाड़ी रखे गये हैं जिन्होंने घरेलू स्तर पर भी हॉकी नहीं खेली। पिछले कुछ वर्षों में जिस मध्य प्रदेश ने हॉकी की बेहतरी के लिए सबसे अधिक काम किये उसका एक भी खिलाड़ी प्रशिक्षण शिविर में नहीं है। इस सूची को देखें तो इसमें छह खिलाड़ी कर्नाटक, तीन उड़ीसा, दो-दो खिलाड़ी मणिपुर और उत्तर प्रदेश तथा एक खिलाड़ी केरल का शामिल है। शेष लगभग सभी खिलाड़ी पंजाब और हरियाणा के हैं।
पक्षपात पर क्या बोले सितारे------
मैं क्या बताऊं: संदीप सिंह
एक साल पहले तक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रैग फ्लिकरों में शुमार रहे संदीप सिंह ने पुष्प सवेरा से कहा, मुझे खुद ही नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? मुझे प्रशिक्षण शिविर से क्यों बाहर किया गया इस बारे में हॉकी इण्डिया ही सही-सही बता सकता है।
मेरा काम सिर्फ खेलना: शिवेन्द्र सिंह
भारतीय टीम के सेण्टर फारवर्ड शिवेन्द्र सिंह ने कहा कि वह मैदान में सिर्फ खेल से वास्ता रखते हैं। हालैण्ड में मुझे जब-जब अवसर मिला मैंने मौकों को भुनाने की कोशिश की। तीन गोल भी किये पर उसकी समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हुआ?
... और बदहाल हॉकी इंडिया की इतनी लम्बी मीटिंग
एसएमएस से कहते रहे बत्रा- बैठक में हूं
हॉकी में चल रहे गड़बड़झाले पर हॉकी इण्डिया के महासचिव नरिन्दर बत्रा से बात करने की कोशिश करने पर उन्होंने कहा कि मैं अभी मीटिंग में हूं, थोड़ी देर बाद बात करूंगा। दिन में कई बार दूरभाष पर सम्पर्क की कोशिश की गई पर हर बार उन्होंने मैसेज के जरिये यही सूचना दी कि वे मीटिंग में हैं। समझ में नहीं आता कि जिस हॉकी इण्डिया का महासचिव मीटिंग को इतनी तवज्जो देता हो उस हॉकी का सत्यानाश क्यों और कैसे हो रहा है? अगर हॉकी इंडिया की इतनी लम्बी मीटिंग चलती हैं तो खेल का भला क्यों नहीं हो पा रहा।
महिला हॉकी में भी सब-कुछ ठीक नहीं: राजिन्दर सिंह
पुरुष हॉकी ही नहीं, महिला हॉकी में भी सब कुछ सही नहीं चल रहा। अण्डर-21 आयु वर्ग का विश्व कप खेलने जा रही टीम में कई उम्रदराज खिलाड़ियों का चयन किया गया है। दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इस टीम का चयन बिना मुख्य प्रशिक्षक के हुआ है। संपर्क किए जाने पर द्रोणाचार्य अवार्डी राजिन्दर सिंह ने कहा कि जिस तरह टीम का चयन किया गया उसकी जांच होनी चाहिए।