Wednesday, 11 January 2017

कलियुग का वाल्मीकि

अपराध की दुनिया छोड़ पकड़ी समाजसेवा की राह
जीवन में ढेरों मुसीबतें झेलने और गलत रास्ते पर चलना शुरू कर देने के बावजूद मुंबई के इस विकलांग युवक ने दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस के बूते न सिर्फ अपनी जिन्दगी का रुख पलट डाला बल्कि अपने जैसे सैकड़ों-हजारों-लाखों लोगों का प्रेरणास्रोत बनकर दिखाया। हम इस शख्स को यदि कलियुग का वाल्मीकि कहें तो गलत न होगा। छह साल की उम्र में पांव गंवाने के बाद माहौल और हालात से दुःखी इस युवक ने 15 साल की उम्र में घर छोड़ दिया, अपराधी बन गया और जब उसकी जिन्दगी इतने 'अंधेरे' दौर में पहुंच गई कि उसके खिलाफ देखते ही गोली मार देने का (शूट एट साइट) आदेश जारी हो गया, तब एक रोशनी की किरण इसकी जिन्दगी में आई और इसकी जिन्दगी बदलकर रख दी। सिर्फ एक शख्स ने जो कारनामा हमारी कहानी के नायक युवक की जिन्दगी में कर दिखाया, वह सचमुच लाखों-करोड़ों के लिए प्रेरणा बन सकता है यह सही ही कहा जाता है कि एक आदमी ही काफी होता है, जिन्दगी बदल डालने के लिए।

कभी अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह रहा यह शख्स अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखता है कि मैं स्कूल जा रहा था, जब एक ट्रक मेरे पांव पर से गुजर गया। मुझे तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन डॉक्टर ने कहा कि अगर हमारे पास 25,000 रुपये होते, तो मेरी टांग को बचाया जा सकता था। मैं गरीब परिवार से था, सो वह तो मुमकिन ही नहीं था। मेरी टांग काटने के लिए छह ऑपरेशन किए गए और जब मुझे अस्पताल से छुट्टी मिली, मुझे एहसास हुआ कि जिन्दगी में मुश्किलात बनी ही रहेंगी। छह साल की मासूम उम्र में ही मुझे 'लंगड़ा' कहकर पुकारा जाने लगा। अगर मैं दूसरे बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने जाता भी था, तो मुझे मैदान में भी घुसने नहीं दिया जाता और सभी कहते थे कि मेरी वजह से मैदान और बॉल को नुकसान पहुंचेगा। मेरे अपने पिता मुझे बोझ समझते थे, क्योंकि सबसे बड़ा बच्चा होने के नाते मुझे घर चलाने के लिए पैसे से मदद करनी चाहिए थी मुझे हर रोज घर में यातना मिलती आखिरकार मैं 15 साल की उम्र में घर से भाग गया, ताकि पैसा कमाकर अपने पैरों पर खड़ा हो सकूं।
फिर क्या था मैंने लोगों को मार-पीटकर पैसा कमाना शुरू कर दिया।
मैंने बचपन से ही गली में घूमते गैंग देखे थे, सो मैंने तय किया कि खुद को बचाए रखने और जल्दी पैसा कमाने के लिए मैं भी किसी गैंग में शामिल हो जाऊंगा। मैंने चाकू रखने के साथ ही लोगों से मार-पीटकर पैसा कमाना शुरू कर दिया। छोटे-मोटे अपराधों के चलते मैं तीन बार जेल भी गया। मेरी जिन्दगी का वह अंधेरा पहलू था, लेकिन मैं कुछ और जानता ही नहीं था। कोई कमाई नहीं थी, सो मेरा लगातार मजाक उड़ाया जाता था। वर्ष 1994 में तो मुझे 'देखते ही गोली मार देने' के आदेश जारी कर दिए गए थे। इससे पहले पुलिस ने मेरे पिता को जेल में डाल दिया था, और मेरी मां को भी पीटा था।
एक रात जब मैं किसी जगह छिपा हुआ था, छह-फुट लम्बे एक आदमी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं उसे पुलिस वाला समझकर अपना चाकू फेंकने ही वाला था, उसने कहा, 'मेरे बच्चे, जीसस तुमसे प्यार करते हैं, और उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ शानदार सोचा है। वह घंटों मेरा हाथ थामे रहा, मुझसे बातें करता रहा और समझाता रहा कि जिन्दगी यहीं खत्म नहीं हुई है। ऐसा कभी मेरे पिता ने भी नहीं किया था। मैंने कहा, अगर भगवान है तो उससे कहो कि वह मुझे इस नर्क से निकाल दे। बस, उसी वक्त से वह मेरे गाइड बन गए। उन्होंने परेशान युवकों के लिए बनाई गई एक जगह पर मेरा दाखिला करवा दिया, मुझे चर्च ले जाने लगे, बाइबिल से उपदेश पढ़कर सुनाने लगे और मुझे सुधारने की कोशिश की। मैं दो साल तक एनजीओ में रहा और उन्हीं के जरिये मुझे जयपुर फुट भी हासिल हुआ। उसी समय मुझमें भरोसा जागा कि मैं अपने सपनों को हासिल कर सकता हूं। उन लोगों ने मेरे लिए पुलिस तक से बात की, उन्हें समझाया कि मैं अभी 18 साल का भी नहीं हूं, लेकिन सुधर चुका हूं। पुलिस ने मुझे अंतिम चेतावनी देकर छोड़ दिया। इसी दौरान, मुझे खबर दी गई कि मेरे पिता का देहांत हो गया है। मैं उस समय तक तय कर चुका था कि मैं अपने भाई-बहनों और मां की जिम्मेदारी उठाना चाहता हूं, सो, मैं हर रोज दिनभर एनजीओ में काम करता था, शाम चार बजे से सात बजे तक स्कूल जाया करता और सात बजे से रात 11 बजे तक मैकडोनाल्ड में काम करता था। शनिवार-रविवार को मोजे (जुराबें) बेचता था और एक-एक पैसा जमा करता था।

दो साल तक ऐसे ही चलता रहा और फिर एक दिन एनजीओ में मेरे बॉस ने मुझे बताया कि वह मुझे तरक्की देना चाहते हैं और मुझे पुर्तगाल में एक लीडरशिप प्रोग्राम में शामिल होना है। मैं खुशी-खुशी मान गया और ज्यादा पैसे कमाने लगा। मुझे एक खूबसूरत लड़की मिली, मैंने उससे शादी की, लेकिन मेरे बेटे को जन्म देने के दौरान ब्रेन हैमरेज की वजह से मैंने उसे खो दिया। बस, तभी से मैं समाजसेवा में पूरी तरह रम गया। अब पिछले 13 साल से मैं मैराथन में भाग ले रहा हूं। कई पहाड़ों पर चढ़ चुका हूं। विकलांगों की टीम में क्रिकेट भी खेल चुका हूं। गली में घूमने वाले बच्चों के लिए कई प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। बाढ़ प्रभावित परिवारों की मदद के लिए लद्दाख तक बाइक चलाकर ले गया हूं। सिर्फ उस एक शख्स की वजह से, जिसने मेरी परवाह की, मेरी जिन्दगी को बदलने की कोशिश की। मेरी कहानी का यही संदेश है- एक ही आदमी काफी होता है, जिन्दगी बदल डालने के लिए।

ओलम्पिक का पहला पदकधारी


मुरलीकांत पेटकर
अफसोस भारत सरकार ने राजीव गांधी खेल पुरस्कार, अर्जुन अवार्ड या पद्मश्री के लायक नहीं समझा
यह धरती वैसे तो अनगिनत शूरवीरों की गवाह है लेकिन कुछ ऐसी विलक्षण शख्सियतें भी हैं जिनका नाम अमरता की श्रेणी हमेशा शुमार होगा। भारत की ऐसी ही शख्सियत हैं पहले पैरालम्पिक पदकधारी  मुरलीकांत पेटकर। इस शख्सियत ने 1972 में भारत के लिए पैरालम्पिक में पहला पदक जीता था। पेटकर से पहले सामान्य ओलम्पिक खेलों में भी भारत ने सिर्फ और सिर्फ हाकी में ही पदक जीते थे। भारत की तरफ से ओलम्पिक में पहला पदक जीतने वाली इस विलक्षण शख्सियत के बिना खेलों की वर्णमाला कभी पूरी नहीं हो सकती।  
मुरलीकांत पेटकर पुणे के बाहरी इलाके में एक तिमंजिले मकान की पहली मंजिल पर अपने परिवार के साथ रहते हैं। श्री पेटकर बताते हैं कि उस दिन जर्मनी का वह स्वीमिंग पूल खेलप्रेमियों से ठसाठस भरा था और मैं चार में से तीन हीट जीत चुका था। लोग मेरा हौसला बढ़ा रहे थे। मुझे पता था कि मैं इतिहास बना सकता हूं। मैं भारत के लिए पहला ओलम्पिक स्वर्ण पदक ला सकता हूं। मुरलीकांत पेटकर की जहां तक बात है वह भारत-पाकिस्तान के बीच हुई 1965 की जंग में बुरी तरह घायल हो गए थे। वह बताते हैं कि हम सियालकोट में थे और मैं लाइट इंफेंट्री का हिस्सा था। हम बंकरों में बैठे थे कि अचानक बाहर से सायरन की आवाज आई। हममें से कई सैनिकों को लगा कि यह रोजाना की चाय की आवाज है और मेरे साथी बाहर चले गए लेकिन यह पाकिस्तानी वायु सेना का हमला था। हर तरफ से गोलियां चल रही थीं। हम पर बिना चेतावनी हमला हो गया था। मैं और बचे-खुचे तीन हवलदार बाहर भागे और 45 मिनट तक लड़ने के बाद मुझे पोजीशन बदलने की जरूरत पड़ी। मैं जैसे ही चट्टान की ओट से निकला एक लड़ाकू विमान गोलियां बरसाता मेरे सर के ऊपर से निकला। पैरों से होते हुए मेरे सिर तक सात गोलियां लगीं और मैं पहाड़ी से नीचे की ओर मौजूद एक सड़क पर गिरा जहां भारतीय सेना के कई वाहन चल रहे थे। मैं ठीक एक आर्मर ट्रक के सामने गिरा और वो ट्रक मुझे कुचलते हुए कुछ दूरी पर रुका। मैं बेहोश हो गया।
17 महीने तक कोमा में रहने के बाद दिल्ली के रक्षा अस्पताल में मुरलीकांत को होश आया और उन्हें मालूम चला कि रीढ़ में गोली लग जाने के कारण उनकी कमर से नीचे के हिस्से को लकवा मार गया है। उन्हें बताया गया कि समय लगेगा और शायद वह चल सकेंगे लेकिन उनकी रीढ़ की हड्डी में एक गोली अभी भी बाकी है जिसे कभी हटाया नहीं जा सकता। मुरलीकांत पेटकर को फिजियोथैरिपी के लिए मुंबई के रक्षा अस्पताल आईएनएस अश्विनी भेजा गया जहां वह तैराकी की ट्रेनिंग लेने लगे। श्री पेटकर बताते हैं कि मैं डिफेंस के लिए बॉक्सिंग की कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं जीत चुका था और भारत का प्रतिनिधित्व बॉक्सिंग में ही करना चाहता था लेकिन शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था। मुरलीकांत ने डिफेंस की कई प्रतियोगिताओं में तैराकी में अच्छा प्रदर्शन किया और फिर मशहूर क्रिकेटर विजय मर्चेंट की ओर से मिली आर्थिक सहायता से वह जर्मनी में होने वाले पैरालम्पिक खेलों के लिए भारत के सात सदस्यीय दल का हिस्सा बन गए।
श्री पेटकर बताते हैं कि हमें भेजते हुए रक्षा अधिकारियों और एक-दो मंत्रियों को छोड़कर कोई भी खुश नहीं था। वे ताने दे रहे थे कि चलो इनको भी मौका दे ही दो। जर्मनी में हुए उन पैरालम्पिक खेलों में मुरलीकांत ने इतिहास रच दिया। उन्होंने न सिर्फ भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता बल्कि उन्होंने सबसे कम समय में 50 मीटर की तैराकी प्रतियोगिता जीतने का विश्व रिकार्ड (पैरालम्पिक) भी बनाया। वह कहते हैं कि स्वीमिंग पूल के अंदर मुझे सिर्फ इतना पता था कि मैं जीत गया हूँ लेकिन बाहर आने के बाद मुझे मालूम चला कि मैंने वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया है। भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। मुरलीकांत को इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए भारत सरकार की ओर से कई पुरस्कार मिले। भारतीय कम्पनी टाटा ने उन्हें नौकरी दी। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र भूषण का सम्मान दिया और डिफेंस की ओर से उन्हें इलाज की रियायतें और सफर के लिए सहूलियतें भी दी जा रही हैं लेकिन मेरे मन में एक टीस है। भारत सरकार ने कभी भी मुझे राजीव गांधी खेल पुरस्कार, अर्जुन अवार्ड या पद्मश्री के लायक नहीं समझा।

श्री पेटकर कई सारे कागज हिलाते हुए कहते हैं, मैंने कई सरकारी दफ्तरों को चिट्ठियां लिखीं लेकिन मेरी अपील पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मैंने भारत का पहला ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीता था लेकिन लोग पैरालम्पिक को भूल जाते हैं और मुझे भी भूल गए। आज मुरलीकांत पेटकर पर अभिनेता से निर्माता बने सुशांत सिंह राजपूत एक फिल्म बना रहे हैं। उस पर मुरलीकांत सिर्फ इतना कहते हैं फिल्म से ही सही लोगों को पता तो चलेगा कि एक पेटकर था जिसने अपने वतन का नाम ऊंचा किया था और कहानी अमर हो जाएगी।

Friday, 6 January 2017

नेत्रहीनों का भाग्य विधाता




भावेश भाटिया का जवाब नहीं
किसी ने सच कहा है कि खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है। अगर इंसान सोच ले और पूरी लगन और इच्छाशक्ति से उस लक्ष्य के लिए समर्पित हो जाए तो वह हर चीज को पा सकता है। ऐसा कर दिखाया है नेत्रहीन भावेश चंदू भाई भाटिया ने जिन्होंने अपनी अक्षमता को ही अपनी शक्ति बनाकर 25 करोड़ की कम्पनी सनराइज कैंडल कम्पनी खड़ी कर दी। यह कम्पनी दिव्यांगों द्वारा चलाई जाने वाली दुनिया की शायद पहली कम्पनी है। इस कम्पनी का टर्नओवर 25 करोड़ रूपये है। इसके अलावा भावेश ने मलेश्वर गाँव में दृष्टिबाधितों के लिए एक कोचिंग सेण्टर खोला जोकि मोमबत्तियां बनाने का प्रशिक्षण देता है। भावेश को अब तक अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
भावेश कहते हैं कि आपको अपनी जिन्दगी में कभी असफलता नहीं मिली तो इसका मतलब है कि आपने कभी कोई नया काम नहीं किया। असफलता ही सफलता की चाबी है इसके बिना आप सफलता के द्वार नहीं खोल सकते। जीवन में कठिनाइयां तो आती ही हैं और कभी-कभी सम्हलने का पूरा समय भी नहीं मिलता, पर यही जीवन का कटु सत्य है कि ठोकर खाकर ही हम सम्हलना सीख सकते हैं। नेत्रहीन भावेश भाटिया ने हिम्मत नहीं हारी और किसी से मदद की आस किए बिना खुद अपने लक्ष्य तय किए तथा उन्हें हासिल कर यह जता दिया कि हिम्मत बंदे मदद खुदा। रेटिना मस्कुलर डिटेरिएशन नामक रोग से ग्रस्त भावेश भाटिया को पता था कि उनकी नजर समय के साथ कमजोर पड़ती जाएगी। लेकिन जब वह 23 वर्ष के थे तो उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई। वह उस समय होटल मैनेजर के रूप में काम कर रहे थे और अपनी कैंसर से पीड़ित मां के इलाज के लिए पैसे बचाने का प्रयास कर रहे थे। अपनी मां को बचाने की उनकी अधीरता महज संतानोचित प्रेम नहीं बल्कि अस्तित्व की रीढ़ थी। भावेश जानते थे कि निःशक्तता वाले जीवन को आगे बढ़ाने के लिए मां का होना बहुत जरूरी है। जब वह अपने जीवन को लेकर परेशान थे तब उनकी मां ने कहा कि दुनिया नहीं भी देख पाओगे तो क्या हुआ, कुछ ऐसा करो कि दुनिया तुम्हें देखे। अपनी मां के ये शब्द भावेश के दिल में इस तरह उतर गए कि वह अंधे होते हुए भी दुनिया के लिए मिसाल बन गए।
भावेश बताते हैं कि स्कूल में मुझे बुरी तरह से तंग किया जाता था। एक दिन घर लौटने के बाद मैंने मां से कहा कि अब मैं स्कूल नहीं जाऊंगा। सब लड़के मुझे अंधा लड़का-अंधा लड़का चिल्लाकर फब्तियां कसते हैं। मुझ पर दबाव देने या मेरी मांग मान लेने के बजाय मेरी मां ने मेरा सिर सहलाते हुए कहा कि लड़के निर्दयी नहीं हैं। वे तुम्हारा मित्र बनना चाहते हैं लेकिन तुम उनसे इतने भिन्न हो इसलिए वे तुमसे अलग रहते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि तंग करना तुम्हारा ध्यान आकर्षित करने का उनका तरीका है। मैं बहुत मुश्किल से उनकी बात पर विश्वास कर पाया। अगले दिन तंग करने की कोशिशों के बावजूद मैंने उनसे दोस्ती की पेशकश की और हम लोग जिन्दगी भर के लिए दोस्त बन गए। भावेश बताते हैं कि जीवन का यह शुरुआती सबक मेरे व्यवसाय का भी निर्देशक सिद्धांत है। मेरी गरीबी और निःशक्तता ने मेरे सामने अपार चुनौतियां प्रस्तुत कीं लेकिन उनके विवेक के कारण ही मैं सही निर्णय कर पाता हूं। वह कहते हैं कि एक दिन मैंने अपनी मां को खो दिया। मां को खोने के बीच आंखों की रोशनी का चला जाना उनके लिए संघातक आघात था। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उनके पिताजी उनकी मां के इलाज पर अपनी सारी बचत पहले ही फूंक चुके थे। बिना नौकरी और नौकरी की सम्भावना के बिना वे उनकी देखरेख नहीं कर सकते थे। भावेश के पिताजी गेस्ट हाउस में केयर टेकर थे।
भावेश कहते हैं कि मां बिना मैं अकिंचन हो गया था। उन्होंने खुद को काफी शिक्षित ही नहीं किया था, मेरे अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए अथक परिश्रम भी किया था। मैं ब्लैकबोर्ड नहीं पढ़ पाता था। वह मेरे पाठों को याद कराने के लिए घंटों जूझा करतीं। उनका यह व्यवहार मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन करने तक जारी रहा। भावेश उनके लिए खुद को कुछ सार्थक बनाना चाहते थे। कामयाबी की राह पकड़ते ही मां का चला जाना उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा अन्याय महसूस हुआ। भावेश कहते हैं कि मां, नजर और नौकरी चले जाने के दुःख से वह टूट गए थे लेकिन जिस चीज ने उन्हें सांत्वना दी, वह था मां द्वारा मिली सर्वोत्तम सलाह। इसीलिए मैं आत्मदया में डूबने-उतराने के बजाय उस मोहक कुछ की तलाश में लग गया जो उन्हें दुनिया की नजरों में देखने के काबिल बनाए। भावेश बताते हैं कि बचपन से ही मेरी रुचि अपने हाथों से चीजें बनाने में थी। मैं पतंगें बनाया करता था। मिट्टी के साथ प्रयोग किया करता था। खिलौने और छोटी मूर्तियां आदि गढ़ा करता था। मैंने मोमबत्ती निर्माण में हाथ आजमाने का फैसला किया क्योंकि उसमें मेरे लिए आकार और गंध की संवेदना का उपयोग करने की गुंजाइश थी। लेकिन मुख्यतः इसलिए भी कि मैं प्रकाश के प्रति आकर्षित हूं और हमेशा से रहा हूं। वह कहते हैं कि ज्वलंत जुनून के सिवा कोई संसाधन नहीं होने के कारण मैं समझ नहीं पा रहा था कि शुरुआत कैसे की जाए। भावेश बताते हैं कि मैंने 1999 में मुंबई के नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्लाइंड संस्थान से प्रशिक्षण लिया। वहां उन लोगों ने सिखाया कि सादा मोमबत्ती कैसे बनाई जाती है।
वह मायूस होते हुए कहते हैं कि मैं रंगों, सुगंधों और आकारों से खेलना चाहता था लेकिन रंग और सुंगध मेरे बजट से बाहर थे। अर्थाभाव के चलते मैं रात भर जागकर मोमबत्तियां बनाता और दिन में उन्हें महाबालेश्वर के स्थानीय बाजार के एक कोने में ठेले पर बेचता था। ठेला भी मेरा नहीं बल्कि मेरे एक मित्र का था जो उसने मुझे पचास रुपए रोज पर उपयोग करने के लिए दिया था। हर दिन मैं अगले दिन के लिए सामान की खरीद के वास्ते पचीस रुपए अलग रख दिया करता था। यह मेरे जीवित रहने का एकमात्र और कमरतोड़ जरिया था। लेकिन मुझे आत्मसंतोष इस बात का था कि मैं कम से कम वह तो कर पा रहा था जो करना चाहता था। भावेश सहानुभूति की किसी अभिव्यक्ति को दृढ़तापूर्वक नकारते हुए कहते हैं कि मैं अपने कर्म-पथ पर चल रहा था और अप्रत्याशित रूप से चीजें बदलने लगीं। इसकी शुरुआत तब हुई जब एक महिला उसके ठेले के सामने मोमबत्तियां खरीदने के लिए रुकी। वह उसके सौम्य व्यवहार और जीवंत हंसी से प्रभावित हुई। हम दोनों मित्र बन गए और घंटों बातें करते रहे। इसे पहली नजर का प्रेम कहा जा सकता है। लेकिन यह दो आत्माओं के बीच सम्पर्क से बढ़कर भी बहुत कुछ था।
भावेश बताते हैं कि उनका नाम नीता था। मैंने उनसे विवाह करने का इरादा कर लिया था। वह भी उनसे मिलकर लौटते समय हर रोज उनसे बात करने और साथ जिन्दगी बिताने के लिए सोचा करती थीं। नीता को गरीब और अंधे मोमबत्ती बनाने वाले से शादी के फैसले के कारण घर वालों के विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने पक्का इरादा कर लिया था और जल्द ही महाबलेश्वर के खूबसूरत हिल स्टेशन में छोटे से मकान में उनके साथ जिन्दगी जीने की राह पर बढ़ गईं। नीता जबर्दस्त आशावादी थीं। भावेश नया बर्तन नहीं खरीद सकते थे इसलिए उन्हीं बर्तनों में वह मोम पिघलाते थे और नीता खाना पकाती थीं। उन्हें चिंता होती थी कि इससे शायद पत्नी के दिल को चोट पहुंचती होगी लेकिन वह उनकी चिन्ता पर हंसती थीं। उन्होंने एक दोपहिया वाहन खरीदा जिससे वह अपने पति को मोमबत्तियां बेचने के लिए शहर ले जा सकें। बाद में परिस्थितियों में सुधार हुआ तो उन्होंने वैन चलाना भी सीखा ताकि बड़ी मात्रा में मोमबत्तियों को ले जाया जा सके। भावेश कहते हैं कि आज नीता ही मेरी जिन्दगी की रोशनी है।
कहने की बात नहीं है कि नीता के जिन्दगी में आने के बाद उनके लिए संघर्ष आसान हो गया था। बोझ उठाने के लिए एक संगिनी थी इसलिए बोझ अब उतना भारी नहीं लगता था। आंख वाले लोग स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि कोई अंधा आदमी अपने पांव पर खड़ा हो सकता है। एक बार कुछ उपद्रवी लोगों ने भावेश की सारी मोमबत्तियां ठेले से उठाकर नाली में फेंक दीं। वह जहां भी मदद को गए उन्हें अंधा कहकर भगा दिया गया। भावेश बताते हैं कि मैंने प्रोफेशनल मोमबत्ती निर्माताओं और अन्य संस्थाओं से मार्गदर्शन पाने की कोशिश की लेकिन किसी ने मदद नहीं की। वह कहते हैं कि अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए मैं जहां भी ऋण सम्बन्धी आवेदन देता उन्हें सिरे से नकार दिया जाता था। अमौद्रिक अनुरोधों पर भी आक्रामक प्रतिक्रिया मिलती थी। वह मोमबत्ती निर्माण पर विशेषज्ञों की सलाह लेना चाहते थे लेकिन उन्हें हर जगह डांट-फटकार और अपमान मिलता था।
भावेश कहते हैं इन विषम परिस्थितियों में मैं अपनी पत्नी के साथ मॉल में जाता और वहां रखी विभिन्न प्रकार की कीमती मोमबत्तियों को छूता और महसूस करता। वह जो भी महसूस करते थे उसको अपनी प्रतिभा और सृजनात्मकता से संवारकर वह अधिक प्रकार की मोमबत्तियां बनाने लगे। टर्निंग पाइंट तब आया जब उन्हें सतारा बैंक से पंद्रह हजार रुपए का ऋण स्वीकृत हुआ जहां अंधे लोगों के लिए एक विशेष योजना चल रही थी। उससे हम लोगों ने पंद्रह किलो मोम, दो डाई और पचास रुपए में एक ठेला लिया। धीरे-धीरे समय का चक्र बदला और कई करोड़ रुपये का कारोबार खड़ा कर लिया। आज मेरी कम्पनी के देश-दुनिया में प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट ग्राहक हैं और दो सौ कर्मचारियों की समर्पित टीम भी जिसमें सारे के सारे दृष्टिबाधित हैं। भावेश बताते हैं कि अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस करता हूं कि मेरे ऋण मांगने पर इतने सारे लोगों ने मुझे इस कारण दुत्कार दिया कि दुनिया में निर्मम तरीके से कारोबार चलता है। हर कोई अपने दिमाग से सोचता है, दिल से नहीं। मैंने महसूस किया सफल व्यापार चलाने का एकमात्र तरीका दिल से सोचना है। इसमें समय लगेगा, काफी समय। लेकिन अगर आप अपने दिल के कहे के अनुसार कर रहे हैं तो आपने जो लक्ष्य तय किया है, उसे हासिल करके रहेंगे।
एक समय ऐसा भी था जब भावेश अगले दिन की मोमबत्तियों के लिए मोम खरीदने के लिए पच्चीस रुपए अलग रख दिया करते थे। अब वह सनराइज कैंडल्स 9000 डिजाइन वाली सादा, सुगंधित और सुगंध चिकित्सा की मोमबत्तियां बनाने के लिए पच्चीस टन मोम का उपयोग रोज करते हैं। वे अपना मोम अमेरिका से खरीदते हैं। उनके ग्राहकों में रिलायंस इंडस्ट्रीज, रनबैक्सी, बिग बाजार, नरोदा इंडस्ट्रीज और रोटरी क्लब आदि कुछ प्रमुख नाम हैं। सनराइज कैंडल्स चलाने के लिए दृष्टिबाधित लोगों को काम में लगाने के बारे में भावेश कहते हैं। हम अंधे लोगों को सिखाते हैं जिससे कि वे हमारी इकाई को महज सहायता न करके काम समझ सकें जिससे किसी दिन लौटकर अपना कारोबार भी खड़ा कर सकें। जहां वह कम्पनी के सृजनात्मक पक्षों पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करते हैं वहीं नीता उद्यम की प्रशासनिक जिम्मेदारियों की देखरेख करती हैं। वह स्वावलम्बी बनने के लिए अंधी लड़कियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण भी देती हैं।

कोई भी सोचेगा कि खाक से कई करोड़ का कारोबार खड़ा करने में वाले भावेश को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उसे देखते हुए उनका पूरा समय लग जाता होगा लेकिन वह एक नैसर्गिक खिलाड़ी हैं और अपनी क्षमताओं को पेशेवराना ढंग से तराशने के लिए वह पर्याप्त समय देते हैं। भावेश कहते हैं कि मैं बचपन से ही खेलकूद में सक्रिय रहता था। बद्धमूल धारणाओं के विपरीत अंधेपन का मतलब शरीर से कमजोर होना नहीं है। मुझे अपने खिलाड़ीपन पर गर्व है। सनराइज कैंडल्स खड़ा करने के दौरान लम्बे समय तक वह खेलकूद से दूर रहे लेकिन अब जब कारोबार अपने पूरे उत्कर्ष पर है, वह अपने दैनिक प्रशिक्षण के मामले में कठोर हैं। भावेश कहते हैं कि मोमबत्ती का कारोबार जमा लेने के बाद मैंने फिर से स्पोर्ट्स (शॉर्टपुट, डिस्कस और जेवलिन थ्रो) की प्रैक्टिस शुरू कर दी। पैरालम्पिक स्पोर्ट्स में मिले कुल 109 मेडल मेरे पास हैं। अपने रियाज के दौरान मैं रोज 500 दण्ड करता हूं। आठ किलोमीटर दौड़ता हूं और अपने कारखाने में स्थापित जिम का उपयोग करता हूं। दौड़ने के रियाज के लिए मेरी पत्नी 15 फीट लम्बी नाइलोन की रस्सी का एक सिरा अपने वैन से बांध देती हैं और दूसरा सिरा मुझे पकड़ा देती हैं। फिर वह मेरी गति से वैन चलाती हैं और मैं साथ-साथ दौड़ता हूं। अगर किसी दिन मैं उनसे तेज आवाज में बात करता हूं तो दूसरे दिन वह वैन की गति बढ़ा देती हैं। भावेश कहते हैं कि दुनिया में 21 मीटर की सबसे ऊंची मोमबत्ती बनाने का रिकॉर्ड जर्मनी के नाम है। मेरी योजना उससे ऊंची मोमबत्ती बनाने की है। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और 25 अन्य नामचीन व्यक्तियों की मोम की आदमकद मूर्तियां बनाना चाहता हूं। भावेश कहते हैं कि उन्होंने जो लक्ष्य तय किए हैं उनको हासिल कर लेने पर उन्हें अत्यंत संतुष्टि मिलेगी। मेरे कई सपने और अनेक लक्ष्य हैं। मैं माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाला दुनिया का पहला अंधा आदमी बनना चाहता हूं। मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं कि हर अंधा भारतीय अपने पांवों पर खड़ा हो।

Wednesday, 4 January 2017

दिव्यांगता को अवसरों में बदलने की दरकार

                     
विकलांग होना बुरी बात नहीं- स्टीफन हाकिंग
60 फीसदी दिव्यांगों के पास नहीं हैं प्रमाण-पत्र
पूरी दुनिया में लगभग एक अरब लोग दिव्यांगता की गिरफ्त में हैं। अधिकांश देशों में हर दस व्यक्तियों में से एक व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रूप से दिव्यांग है। इसी चिन्ताजनक स्थिति से उबरने के प्रयास हो रहे हैं, जिन्हें और गति देने की दरकार है। वैसे तो पूरे विश्व में तीन दिसम्बर को विकलांग दिवस मनाया जाता है लेकिन दिव्यांगता को अवसर में बदलने के अभी तक वाजिब प्रयास नहीं हुए। विकलांगता एक ऐसा शब्द है, जो किसी को भी शारीरिक, मानसिक और उसके बौद्धिक विकास में अवरोध पैदा करता है। ऐसे व्यक्तियों को समाज में अलग ही नजर से देखा जाता है। यह शर्म की बात है कि हम जब भी समाज के विषय में विचार करते हैं तो सामान्य नागरिकों के बारे में ही सोचते हैं। इसमें हम दिव्यांगों को बिसरा देते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा किस संविधान में लिखा है कि यह दुनिया केवल सक्षम लोगों के लिए ही बनी है, बाकी वह लोग जो एक साधारण इंसान की तरह व्यवहार नहीं कर सकते, उन्हें मुख्य धारा से अलग रखा जाए। क्या इन लोगों के लिए यह दुनिया नहीं है।
दिव्यांगों में सबसे बड़ी बात यही होती है कि ये स्वयं को कभी लाचार नहीं मानते। वह सिर्फ यह चाहते हैं कि उन्हें अक्षम न माना जाए। उनसे सामान्य तरह से व्यवहार किया जाए। दिव्यांगों की असलियत को जानना है तो हमें उनके बीच पहुंचना होगा। कभी किसी विकलांग संस्था में जाकर देखें तो पाएंगे कि जिन्हें हम लाचार मानते हैं, उनमें कुछ कर गुजरने का जुनून होता है, वह अपने आपको कभी दिव्यांग नहीं मानते। यह अपनी छोटी सी दुनिया में ही मस्त रहते हैं। कई बार तो यह अपना प्रदर्शन एक सामान्य व्यक्ति से अधिक बेहतर करते हैं। सरकारी ही नहीं बल्कि निजी संस्थानों में भी यह दिव्यांग अपनी सेवाएं बड़ी शिद्दत से दे रहे हैं। यह अपनी ही दुनिया में इतने व्यस्त और मस्त हैं कि इन्हें हमारी आवश्यकता ही नहीं है। इनके अपने खेल होते हैं। ये साधारण इंसान के साथ ताश भी खेल सकते हैं। हम चाहकर भी इन्हें धोखा नहीं दे सकते। जो नेत्रहीन हैं, उनके पोरों में ही छिपी होती है ताकत। ईश्वर उनसे दृष्टि ले लेता है, पर स्पर्श का वह खजाना दे देता है कि जिस चीज को वे एक बार छू लें तो वह स्पर्श वे कभी नहीं भूलते। यह हमारी कमजोरी है कि हम एक जागरूक समाज के नागरिक होने के नाते समाज के विभिन्न वर्ग को समझने और स्वीकारने का साहस रखते हैं, पर दिव्यांगों के लिए यह भाव नहीं रखते। हमारे संविधान में सामान्य नागरिक की तरह सभी को अधिकार दिए गए हैं, इसी तरह दिव्यांगों को भी कई अधिकार दिए गए हैं। फिर भी समाज में उन्हें अपना स्थान प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हमने न जाने कितने दिव्यांगों को अपने अधिकार के लिए जूझते देखा होगा। कोई पेंशन के लिए, कोई अपनी नौकरी बचाने के लिए, कोई अपने बच्चे की फीस के लिए और कोई अपने जीने के हक के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। पर हम कभी आगे बढ़कर उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आते। कई बार इन्हें बुरी तरह से दुतकारा जाता है। मानो विकलांगता इनके लिए एक श्राप हो। कोई खुद होकर विकलांग होना नहीं चाहता। इंसान हालात से मजबूर होता है। कई जन्म से विकलांग होते हैं तो कोई दुर्घटना से। किसी को बीमारी के बाद विकलांगता आ जाती है, आखिर इसमें इनका क्या दोष है। अब सवाल यह कि इनके साथ भी सामान्य नागरिक सा व्यवहार क्यों नहीं किया जाता।
विश्व में न जाने कितने दिव्यांग ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से सामान्य लोगों को सोचने के लिए विवश कर दिया है। कई लोग एवरेस्ट की ऊंचाई को पार कर चुके हैं, तो हजारों हजार लोगों ने अच्छी तालीम हासिल कर नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। दिव्यांगों ने विज्ञान के क्षेत्र में भी सफलता का परचम लहराया है। समाज का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जहां दिव्यांगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज न कराई हो। वे सक्षम हैं, पूरी तरह से सक्षम हैं, हम ही उन्हें सक्षम नहीं मान रहे। इन्हें हमारी सहानुभूति नहीं चाहिए। यह भी चाहते हैं कि उन्हें लाचार न समझा जाए, एक सामान्य नागरिक की तरह उनसे व्यवहार किया जाए। स्टीफन हाकिंग का नाम दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम है। चाहे वह कोई स्कूल का छात्र हो या फिर वैज्ञानिक, सभी इन्हें जानते हैं। उन्हें जानने का केवल एक ही कारण है कि वे दिव्यांग होते हुए भी आइंस्टाइन की तरह अपने व्यक्तित्व और वैज्ञानिक शोध के कारण हमेशा चर्चा में रहे।
स्टीफन हाकिंग ने ब्रह्मांड और ब्लेक होल पर नए सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है। विज्ञान को एक साधारण से साधारण व्यक्ति तक पहुंचाने वाले हाकिंग ने एक किताब लिखी है ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम। इस किताब की अब तक एक करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्हें विज्ञान का प्रचारक कहा जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उन्हें अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति का खिताब देकर सम्मानित कर चुके हैं। हाकिंग स्वयं विकलांगता की व्याख्या इस प्रकार करते हैं- विकलांग होना बुरी बात नहीं है। मेरी बीमारी के विषय में मेरे पास अच्छे शब्द नहीं हैं, परंतु मुझे इतना समझ में आता है कि हमें कभी भी किसी की दया का पात्र नहीं बनना है क्योंकि अन्य लोग आपसे भी अधिक खराब स्थिति में हैं। इसलिए आप जो कर सकते हो, उसे प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ो। मैं भाग्यशाली हूं कि सैद्धांतिक विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें विकलांगता कोई बड़ी समस्या नहीं है। अभी मैं जीवन के सातवें दशक में हूं। एमयोट्रोफिक लेटरल स्केलरोसिस बीमारी से पीड़ित हूं। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों में से सबसे अधिक समय तक जिन्दा रहने वालों में से मैं हूं। इससे भी बड़ी बात यह है कि मेरे शरीर का अधिकांश हिस्सा शिथिल हो गया है, अपनी बात कम्प्यूटर के माध्यम से करता हूं। यह हैं एक विकलांग के शब्द, जो हमें आज तक प्रेरणा देते हैं।
हम अपना नजरिया बदलें और देखें कि हमारे आसपास ऐसे न जाने कितने दिव्यांग मिल जाएंगे जो अपनी दिव्यांगता को भूलकर अपनी जिन्दगी को आसान बनाकर जी रहे हैं। कई बार तो इन्होंने सरकारी सहायता को भी ठुकरा दिया है। ये अपना अधिकार चाहते हैं, ये दया के पात्र नहीं हैं। इन्हें भी जीने का अधिकार है, इन्हें जीने का अधिकार सरकार दे या न दे, पर हम अपना नजरिया बदल कर दे सकते हैं। इनकी खिलखिलाहट को महसूस करें, इनकी पीड़ा को समझने की कोशिश करें, इनकी वेदना से जुड़ने की हमारी एक छोटी सी कोशिश इनके जीवन में उजास भर देगी।
दिव्यांगता एक ऐसी परिस्थिति है जिससे आप चाहकर भी पीछा नहीं छुड़ा सकते। एक आम आदमी छोटी-छोटी बातों पर झुंझला उठता है तो जरा सोचिये उन लोगों के बारे में जिनका खुद का शरीर उनका साथ छोड़ देता है। फिर भी जीना कैसे है कोई इनसे सीखे, कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने दिव्यांगता जैसी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया है। सरकार की भी कोशिश होनी चाहिए कि वह इनके अधिकारों से इन्हें रूबरू कराए, इन्हें बंदी न बनने दे। लोग यह बात न भूलें की अपंग और विकलांग कोई भी, कभी भी हो सकता है। जिस घृणा भरी नजरों से हम इन्हें देखते हैं उन्हीं नजरों में अगर खुद के किसी व्यक्तिगत आपातकाल का नजारा देख लें तो दिव्यांगों के प्रति यह भावना अपने आप दूर हो जाएगी। जरा सोचिए इनके हालात, जहाँ आज के समय में जब खून के रिश्ते तक धोखा दे जाते हैं और अपना सहारा स्वयं बनना पड़ता है, ऐसे में अगर आपका खुद का शरीर ही साथ न दे तो इंसान किस उम्मीद पर जिएगा, किसके सहारे जिएगा।
दिव्यांगों के उत्थान के लिए सरकार ने कई योजनायें मुहैया करायी हैं मगर क्या सिर्फ इतना ही इनके लिए काफी होगा। दिव्यांगों की थोड़ी सी मदद उनका जीवन संवार सकती है। अगर किसी के सुनने की शक्ति कमजोर है तो उसे लिप-रीडिंग यानी होठों को पढ़ने की विद्या सिखाई जा सकती है। इनकी आँखों का इस्तेमाल करके इन्हें सशक्त बनाया जा सकता है। वैसे ही अगर कोई देख नहीं सकता तो उसके सुनने की शक्ति को इतना मजबूत बनाएं कि वह कानों से ही देखने लगे और नाक से महसूस कर ले। कोई अंग खराब है तो ऐसा पहनावा दें की वह छिप जाए और इंसान पूरे आत्मविश्वास के साथ सर उठाकर चल सके। ऐसी तमाम चीजें हैं जिनसे विकलांगता की समस्या को अनदेखा किया जा सकता है और दवा और दुआ तो दो ऐसे विकल्प हैं जिन पर यह दुनिया चलती है। इस समस्या को हम इस दुनिया से मिटा नहीं सकते पर हाँ इससे लड़कर हम इसे दुनिया से गायब जरूर कर सकते हैं।
                                 विकलांग दिवस के मायने
तीन दिसम्बर को पूरी दुनिया में विश्व विकलांग दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तीन दिसम्बर, 1991 से प्रतिवर्ष विश्व विकलांग दिवस को मनाने की स्वीकृति प्रदान की थी। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्राप्त आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 65 करोड़ लोग विकलांग की श्रेणी में आते हैं। यह दुनिया की सम्पूर्ण जनसंख्या का आठ प्रतिशत है। विश्व विकलांग दिवस का उद्देश्य आधुनिक समाज में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त किया जाना है। यह दिवस शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए मनाया जाता है। इस भेदभाव में समाज और व्यक्ति दोनों की भूमिका रेखांकित होती रही है। आज दुनिया में करोड़ों व्यक्ति दिव्यांगता का शिकार हैं। दिव्यांगता अभिशाप नहीं है क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो दिव्यांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सकारात्मक रहा जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं। दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों को मजाक बनाना, उन्हें कमजोर समझना और उनको दूसरों पर आश्रित समझना एक भूल और सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है। आज हम इस बात को समझें कि उनका जीवन भी हमारी तरह है और वे अपनी कमजोरियों के साथ उठ सकते है। किसी को कुछ देना है तो सबसे उत्तम है कि आत्मविश्वास जगाने वाला उत्साह व प्रोत्साहन दें।
दुनिया में अनेकों ऐसे उदाहरण मिलेंगे जो बताते हैं कि सही राह मिल जाये तो अभाव एक विशेषता बनकर सबको चमत्कृत कर देती है। भारत विकासशील देशों की गिनती में आता है। विज्ञान के इस युग में हमने कई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन आज भी हमारे देश, हमारे समाज में कई लोग हैं जो हीनदृष्टि झेलने को मजबूर हैं। वह लोग जो किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाते हैं अथवा जो जन्म से ही विकलांग होते हैं, समाज उन्हें हीनदृष्टि से देखता है जबकि यह लोग सहायता एवं शाबासी के योग्य होते हैं। हर साल दिव्यांगों के लिए एक बेहतर जीवन और समाज में समान अधिकार के लिए आवाज बुलंद की जाती है लेकिन सच्चाई यह है कि भारत में निःशक्त आज भी अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए दूसरों पर आश्रित हैं।
भारत में विकलांगों से सम्बन्धित योजनाओं का क्रियान्वयन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन होता है। भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय व गरिमा सुनिश्चित करता है और स्पष्ट रूप से यह विकलांग व्यक्तियों समेत एक संयुक्त समाज बनाने पर जोर डालता है। हाल के वर्षों में विकलांगों के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदला है। यह माना जाता है कि यदि विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं। भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों में सरकारी सेवा में आरक्षण देना, योजनाओं में विकलांगों की भागीदारी को प्रमुखता देना आदि शामिल हैं। भारत में बहुत सी ऐसी सरकारी योजनाएं हैं जो विकलांगों की मदद के लिए हैं लेकिन आज भी सिर्फ चालीस फीसदी विकलांग भारतीयों को ही विकलांगता प्रमाण-पत्र मुहैया कराये जा सके हैं, ऐसे में विकलांगों के लिए सरकारी सुविधाएं महज मजाक बनकर रह गई हैं। भारत में आज भी विकलांगता प्रमाण-पत्र हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों के कई दिनों के चक्कर लगाने के बाद भी लोगों को मायूस होना पड़ता है। हालांकि सरकारी दावे कहते हैं कि इस प्रक्रिया को काफी सरल बनाया गया है लेकिन हकीकत इससे काफी दूर नजर आती है। विकलांगता प्रमाण-पत्र जारी करने के सरकार ने जो मापदण्ड बनाये हैं, अधिकांश सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक उनके अनुसार विकलांगों को विकलांग होने का प्रमाण-पत्र जारी ही नहीं करते हैं, जिसके चलते विकलांग व्यक्ति सरकारी सुविधायें पाने से महरूम हो जाते हैं।
सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 2013-14 में महज 39.28 फीसदी लोगों को विकलांगता का प्रमाण-पत्र प्राप्त हैं वहीं पश्चिम बंगाल में 41 फीसदी लोगों को यह प्रमाण-पत्र प्राप्त हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश मे 2.68 करोड़ विकलांग हैं जिनमें से महज 1.05 करोड़ लोगों को विकलांगता का सर्टिफिकेट हासिल है। पश्चिम बंगाल में 20.17 लाख लोग विकलांग हैं जिनमें से 8.27 लाख लोगों को विकलांगता का प्रमाण-पत्र प्राप्त है जबकि नागालैंड में महज 5.7 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश में सात फीसदी, दिल्ली में 21 फीसदी विकलांगों के पास विकलांगता का प्रमाण-पत्र है जोकि सरकार की नीतियों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। त्रिपुरा इस मामले में सबसे बेहतर है। यहां 97.72 फीसदी विकलांगों को विकलांगता का प्रमाण-पत्र प्राप्त हैं। तमिलनाडु में 84 फीसदी लोगों के पास विकलांगता का प्रमाण-पत्र है। देश में विकलांगों के लिए सरकार ने कई नीतियां बनायी हैं। उन्हें सरकारी नौकरियों, अस्पताल, रेल, बस सभी जगह आरक्षण प्राप्त है। साथ ही विकलांगों के लिए सरकार ने पेंशन योजना भी शुरू की है लेकिन ये सभी सरकारी योजनाएं विकलांगों के लिए मजाक बनकर रह गयी हैं। वजह इन सुविधाओं को हासिल करने के लिए विकलांगता का प्रमाण-पत्र जरूरी होना है।

हाल ही में केन्द्र की मोदी सरकार ने देशभर के विकलांग युवाओं को बड़ा तोहफा दिया है। सरकार ने शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को सरकारी नौकरी में 10 साल तक की छूट दी है। केन्द्र सरकार में सीधी भर्ती वाली सेवाओं के मामले में दृष्टि बाधित, बधिर और चलने-फिरने में विकलांग या सेरेब्रल पल्सी के शिकार लोगों को उम्र में 10 साल की छूट दी है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने इस बाबत नए नियमों की घोषणा कर दी है। नए नियम के मुताबिक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणी के लोगों को 15 साल की छूट मिलेगी जबकि अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को 13 साल की छूट हासिल होगी। सरकार की यह खास छूट उन आवेदकों को मिलेगी जिनकी अधिकतम उम्र 56 साल से ज्यादा नहीं है। आपको बता दें कि इससे पहले सरकारी नौकरियों के लिए एससी-एसटी को अधिकतम उम्र सीमा में पांच साल छूट थी जबकि ओबीसी को आठ साल तक की छूट का प्रावधान था। देश में मध्य प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य है जहां विकलांगों को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।

दिव्यांगों की हमराही

नीता पांचाल के जज्बे का हर कोई मुरीद
इंसान मन में ठान ले तो कोई काम असम्भव नहीं हो सकता। नीता पांचाल ने न केवल दिव्यांगता पर फतह हासिल की बल्कि आज वह दिव्यांगों का मार्गदर्शन भी कर रही हैं। नीता पांचाल के प्रयासों से गुजरात के दिव्यांग न केवल आत्मनिर्भर बन रहे हैं बल्कि उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना भी आई है। नीता पांचाल का अब तक का जीवन संघर्षों में ही बीता है। गुजरात की यह बेटी संघर्षों से घबराने की बजाय इसे अपनी ताकत बना लेती है। गुजरात में कच्छ जिले के अंजार तालुके के जुनी हुघई गांव की इस बेटी के जीवन में 26 जनवरी, 2001 को ऐसा भूचाल आया जिसे शब्दों में बयां करना काफी मुश्किल काम है। नीता के जीवन में और भी अनगिनत मुसीबतें आईं जिनका उसने न केवल बहादुरी से सामना किया बल्कि उनको हंसते हुए अपनी ताकत भी बनाया।
26 जनवरी, 2001 को  भूकम्प ने गुजरात के कच्छ में ऐसी तबाही मचाई थी जिसमें सैकड़ों लोग न केवल मौत के आगोश में हमेशा-हमेशा के लिए सो गए बल्कि हजारों लोग निःशक्तता का शिकार हो गए, उन्हीं में से नीता बेन (अब पांचाल) भी एक हैं। जब भूकम्प की तबाही मची थी तब 17 साल की नीता 10वीं कक्षा में पढ़ती थीं और उनकी सगाई भी हो चुकी थी तथा अगले साल उनकी शादी होनी थी। नीता दो दिनों तक मलबे में दबी रहीं। भूकम्प के बाद दो दिन तक कोई सुविधा नहीं मिलने से नीता की हालत न केवल खराब हो गई बल्कि वह पूरी तरह से अशक्त भी हो गईं। बाद में उन्हें मुंबई के हिन्दुजा अस्पताल ले जाया गया और वहाँ एक साल तक उनका इलाज चला।
नीता बताती हैं कि उस विनाशकारी भूकम्प ने मेरे सपनों को ही तार-तार कर दिया। मेरी सगाई टूट गई। एक तो भूकम्प का झटका और दूसरी ओर सगाई टूटने से मेरे सपनों के राजकुमार की छवि जैसे ओझल सी हो गई थी। मैं भगवान को कोसती गई कि तूने मेरे साथ कैसा अन्याय किया। अब ऐसी जिन्दगी का क्या करूं। नीता कहती हैं कि उस दौरान मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं दुनिया में अकेली ही बची हूँ। मुझे जीवन मौत से भी बदतर लगने लगी। भूकम्प के चलते मलबे में दबने से मेरी रीढ़ की हड्डी टूट गई और मैं पैराप्लेजिक (जिनको कमर के नीचे का पूरा हिस्सा बिना संवेदना का हो जाता है) से ग्रस्त हो गई। बैठे और सोये रहने से मुझे बेडसोर होता था। यूरिनीरी इंफेक्शन और ड्रेसिंग की पीड़ा से मुझे हर पल जूझना पड़ता। टॉयलेट पर काबू न पाने के कारण मेरा सामाजिक कार्यक्रमों में जाना भी मुश्किल हो गया था और मुझे अपना जीवन कैद सा लगने लगा। नीता कहती हैं कि हैण्डीकेप इंटरनेशनल जैसी स्वैच्छिक संस्थाओं के फिजियोथेरेपिस्ट मुझे कसरत के साथ जीने के गुर सिखाते थे, जिससे मैं ह्वीलचेयर पर बैठ पाई। कैथेटर का उपयोग करने लगी। समाज में आई और शुरू हुई मेरे जीवन के बेरंगी कैनवास पर नये रंगों के सृजन की प्रक्रिया।
नीता बताती हैं कि अस्पताल में मेरा इलाज तीन साल तक चलने के कारण पिताजी पर कर्ज का भार बढ़ गया। जीवन जीने के लिए पैसा हथियार है, इसके महत्व को समझते हुए मैंने पिताजी का आर्थिक बोझ कम करने के लिए काम करने का मन बनाया और मैंने अपने गाँव में एस.टी.डी.-पी.सी.ओ. शुरू करने के साथ ही कटलरी बेचना शुरू किया। मुझे सजना-संवरना बहुत अच्छा लगता था, पर मैं चलने-फिरने की अक्षमता के कारण श्रृंगार भी नहीं कर सकती थी। जो लोग मेरे पास वस्तुएं खरीदने आते, मेरे साहस की सराहना करते तो मुझे लगता कि मैं भी श्रृंगार कर रही हूँ।
नीता कहती हैं कि मैंने भूकम्प के बाद समाज, सरकार और स्वैच्छिक संस्थाओं के असरकारक पुनर्वास में शामिल होने का प्रयत्न किया। हैण्डीकेप इंटरनेशनल के सहयोग से दिल्ली में एबीलिम्पिक (विकलांग व्यक्तियों के लिए ओलम्पिक जैसी स्पर्धा) में गई, वहाँ मुझे एक अलग दुनिया का अनुभव हुआ। खेल-कूद के कला-कौशल से मानसिक शक्ति के विकास के साथ-साथ नृत्य आदि की क्षमता से मेरा साक्षात्कार हुआ। मैंने अपने जिले में पैराप्लेजिक (पक्षाघात) साथियों का एक मंडल शुरू किया, जिसका नाम नवजीवन मित्रमंडल है। मैं उसकी प्रमुख हूं। मैं दिव्यांग साथियों को सरकारी योजना के तहत उनके हक और लाभ दिलाने में मदद करती हूँ। मैंने 2002 में विश्व सामाजिक सम्मेलन में कच्छ जिले की विकलांग संकलन समिति का भी प्रतिनिधित्व किया। 2004 में बैंगलोर में स्पेशियल स्पोर्ट्स में स्वर्ण पदक पाकर अपने गांव का नाम रोशन किया। इसी तरह छोटी-बड़ी खेल-कूद की स्पर्धाओं में मुझे 20 बार प्रथम और पांच बार द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुए। इसी बीच मेरी रीढ़ की हड्डी में डाली हुई प्लेट टूट गई और मैं इलाज के लिए अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में भर्ती हुई, जहाँ मेरी मुलाकात पराग पांचाल से हुई। वे हैण्डीकेप इंटरनेशनल संस्था की तरफ से मेरी देखभाल करने आते थे। उन मुलाकातों के दौरान हमने महसूस किया कि हमारी सोच और समझ एक समान है, जिससे नजदीकियां बढ़ती गईं और 2006 में हमने शादी कर ली। नीता कहती हैं कि पराग की शादी एक सामान्य लड़की से हो सकती थी क्योंकि उसकी विकलांगता मेरे मुकाबले बहुत कम थी। मैं ह्वीलचेयर के सहारे चलती और वो बैसाखी से चलता था। उसकी नौकरी भी अच्छी थी और वह स्मार्ट भी हैं लेकिन उसे अपने से अधिक विकलांग लड़की से शादी करनी थी। आज भी जब हम बाहर जाते हैं तो लोग हमें देखते रहते हैं क्योंकि मैं ह्वीलचेयर से और पराग बैसाखी से चलते हैं।
नीता कहती हैं कि मैं 2008 में गर्भवती हुई और डॉक्टर से परामर्श करने पर मुझे बताया गया कि डिलीवरी मुश्किल है। मैं और मेरे पति करीबन 15 अस्पतालों में गए लेकिन सभी जगह निराशा हाथ लगी पर हमने हिम्मत नहीं हारी। मेरी एक सहेली किडनी अस्पताल में काम करती है, उसने जिस डॉक्टर से हमारा सम्पर्क कराया, उनसे मिलने पर हममें आशा की किरण जगी। उस डॉक्टर की सलाह से सब ठीक होता गया और अप्रैल 2009 में मैंने बेटे को जन्म दिया। बेटे भव्य के आने से हमारे घर में खुशियाँ छाने लगीं लेकिन कुछ समय बाद ही ऐसा लगा जैसे मुसीबत मेरे पीछे ही पड़ गई है। नीता कहती हैं कि मेरे साथ एक भयंकर हादसा हुआ जिसे मैं जिन्दगी भर कभी नहीं भूल पाऊंगी। 2010 में मैं कच्छ में अपने घर गई। मुझे कच्छ से वापस लौटने के लिए भचाउ से अहमदाबाद की ट्रेन पकड़नी थी। मैं रेलवे स्टेशन पहुँची। भचाउ रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म कच्चा है और वहाँ ट्रेन सिर्फ दो मिनट के लिए ही रुकती है। जैसे ही ट्रेन आई हड़बड़ाहट में मेरे सहायकों ने मुझे ट्रेन में चढ़ाने के लिए ह्वीलचेयर से उठाया और सहारे से ट्रेन में चढ़ते वक्त सीढ़ी में मेरा पैर फंस गया, तभी ट्रेन चलने लगी। मेरे सहायकों ने मेरा पैर निकालने की कोशिश की पर पैर नहीं निकला, उन्होंने पैर खींचा तो मेरा पैर घुटने के नीचे से क्रैक हो गया। अहमदाबाद पहुँचने पर अस्पताल गये, वहाँ डॉक्टर ने प्लास्टर लगाया।
नीता कहती हैं कि तब अप्रैल-मई का महीना चल रहा था। झुलसती गर्मी में पूरे दिन प्लास्टर की वजह से और गर्मी के कारण एक तरफ सोए रहने से मेरी पीठ में कमर के नीचे के हिस्से की स्कीन में संसेशन नहीं होने के कारण मुझे बेडसोर हो गया। मैं बुखार से तड़पने लगी। डॉक्टर की दी दवाइयाँ लेने पर भी बुखार कम नहीं हुआ और मैं घर में बेहोश हो गई। तब मेरा बेटा दो साल का था। पराग ऑफिस गए हुए थे। मेरा बेटा जोर-जोर से रोने लगा, तभी पड़ोसी आए और मुझे बेहोशी की हालत में अस्पताल ले गए। मेरे पूरे शरीर में इंफेक्शन फैल गया और हीमोग्लोबिन पांच हो गया। मेरी और पराग की हिम्मत टूट गई। मेरी बचने की उम्मीद न के बराबर थी। मुझे देख पराग नर्वस हो गए लेकिन अपने बच्चे को देखकर जैसे मुझ में कुदरती हिम्मत जाग उठी। पैराप्लेजिया अस्पताल में डॉ. प्रभाकर की निगरानी में छह महीने तक मेरा इलाज चला। मुझे नौ बार खून की बोतलें चढ़ाई गईं और धीरे-धीरे कसरत, खान-पान में मूंग, सलाद, नारियल पानी आदि लेने से मेरी तबियत में सुधार हुआ। इस दौरान अस्पताल में मैंने दूसरे मरीजों को भी मुश्किलों में हिम्मत नहीं हारने को कहा। छह महीने बाद मैं घर लौटी। नीता कहती हैं कि आज तक मेरी छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 32 सर्जरी हो चुकी हैं। मैं अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश हूं। शादी के बाद भी मैं विकलांग महिलाओं के प्रश्नों का प्रतिनिधित्व करती हूं। मैं ह्वीलचेयर पर आश्रित होने के बावजूद अपने पति का पूरा ख्याल रख सकती हूं और सामाजिक प्रसंगों में भी हिस्सा ले सकती हूं।
नीता कहती हैं कि भूकम्प ने मुझे नयी जिन्दगी दी। धीरे-धीरे समय बीतता गया। सब कुछ ठीक से सम्हलने लगा तभी मेरे पति पराग का एक्सीडेंट हो गया। वे दो महीने तक बेडरेस्ट पर रहे, जिस कम्पनी में वे काम कर रहे थे वहाँ प्रोजेक्ट पूरा नहीं होने के कारण उनकी नौकरी छूट गई। ऐसा लगा जैसे भगवान ने सारी मुसीबतें मेरी झोली में ही डाल दी हों। दो महीने तक वे नौकरी के लिए इधर-उधर भटकते रहे। सभी लोग पराग की विकलांगता देखते थे, काबिलियत नहीं। बहुत कोशिश करने पर पराग को अहमदाबाद से 120 किलोमीटर की दूरी पर बरोडा में नौकरी मिली। वे सुबह पांच बजे जाते और रात 10 बजे घर आते। घर और बाहर का सारा काम मेरे जिम्मे आ गया। तब मुझे कभी-कभी अपनी विकलांगता के कारण असहाय होने का अहसास होता लेकिन मैं इस कारण कभी किसी काम से पीछे नहीं रही। मैंने धैर्य रखते हुए हिम्मत से काम लिया। बाद में पराग को आई.पी.आर. गांधीनगर में नौकरी मिली और लगा कि धीरे-धीरे ही सही मानो मेरी जिन्दगी में जैसे सूरज की रोशनी भरने लगी हो।
नीता कहती हैं कि अहमदाबाद में हैण्डीकेप इंटरनेशनल संस्था के सहयोग से हमने पूरे गुजरात के कुल 50 व्यक्तियों से सम्पर्क किया जो अलग-अलग प्रकार की विकलांगता से ग्रस्त थे। इन सभी 50 व्यक्तियों को तालीम देकर इनकी क्षमता का वर्धन किया गया। इसमें विकलांग व्यक्तियों को सरकार के जो भी कायदे-कानून बने हैं जैसे-विकलांगता विधेयक 1995, रीहेबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इण्डियन एक्ट, मेंटल हेल्थ एक्ट आदि से परिचित करवाया गया। अपने अधिकारों के प्रति जागृत होने से इनके जीवन में नया जोश आया। फिर उन 50 व्यक्तियों ने और 50 व्यक्तियों को जोड़ा और आगे लोग जुड़ते गये। हम लोग अनौपचारिक रूप से तो मिलते ही थे, धीरे-धीरे हमने सोचा कि यदि हम लोग औपचारिक तौर पर एकजुट रहेंगे तो हमारी आवाज सभी तक पहुँच पाएगी और 2010 में हमने विकलांगता हिमायत यूथ के नाम से विकलांग व्यक्तियों के लिए हिमायत करने वाली संस्था का गठन किया। उसमें अभी तक पूरे गुजरात में अलग-अलग विकलांगता से ग्रस्त 1200 के करीब सदस्य जुड़े हैं। हमने विकलांगता के क्षेत्र में बहुत कम समय में कुछ सफलता प्राप्त की। विकलांग व्यक्तियों की जनगणना का प्रश्न जो 2001 में 15वें नम्बर पर था उसे हमने हिमायत कर 2011 में नौवें स्थान पर रखवाया। इसकी मुख्य वजह थी जनगणना में विकलांग व्यक्तियों की जनगणना ठीक से हो और उनके लिए ठीक से बजट प्रावधान हो।
नीता डिसेबिलिटी एडवोकेसी ग्रुप की सेक्रेटरी भी हैं जिसमें इनके पति पराग पूरा सहयोग करते हैं। नीता कहती हैं कि हम दोनों जहाँ भी जाते हैं वहाँ विकलांग व्यक्तियों के लिए बाधारहित वातावरण की बात करते हैं, जिससे हर प्रकार का विकलांग व्यक्ति हर जगह बिना किसी सहारे से आ-जा सके। नीता कहती हैं कि हमारी शादी को देखकर लोग प्रेरित हुए और आठ दिव्यांग एक-दूजे के बने। नीता दिव्यांगों के उत्थान की खातिर कई जगह प्रेरणात्मक प्रवचन भी देने जाती हैं। नीता ने शादी से पहले गुजराती में दो किताबें भी लिखींइनकी पहली पुस्तक विकलांग महिला की समस्या-गर्भ से कब्र तक तथा दूसरी किताब नियति को चुनौती है। विकलांगता के क्षेत्र में हक और अधिकारों के लिए लोगों का रोल माडल बनीं नीता पांचाल को अब तक दर्जनों पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
नीता की उपलब्धियां-
नीता ने 2007 में बैंगलोर में हुई ह्वीलचेयर रेस में स्वर्ण पदक जीता तो 2012 में उन्हें अहमदाबाद में आदर्श नागरिक का पुरस्कार प्रदान किया गया। 2013 में नीता को दिल्ली स्थित नेशनल सेण्टर फार प्रमोशन एण्ड एम्प्लायमेंट (एनसीपीईडीपी) द्वारा आयोजित कुमारी शैलजा के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता सचिव द्वारा हेलेन केलर पुरस्कार प्राप्त हुआ जो गुजरात में पहला पुरस्कार है और वह भी एक महिला को दिया गया है। इसी साल नीता को लायंस क्लब आफ इंटरनेशनल संस्था द्वारा साहसिक महिला का पुरस्कार प्रदान किया गया। 2014 में              नीता ने गुजरात सरकार द्वारा आयोजित खेल महाकुंभ में जिलास्तर और राज्यस्तर पर ह्वीलचेयर हर्डल खेल में स्वर्ण पदक अर्जित किए। 2015 में मुंबई स्थित नीना फाउंडेशन संस्थान द्वारा नीता को पद्मश्री पंडित हरिहरन (प्रसिद्ध गायक) के करकमलों से नारी रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया। 2016 में नीता पांचाल को समभाव मीडिया समाचार द्वारा सर्वश्रेष्ठ महिला रोल मॉडल का पुरस्कार तो मुंबई स्थित पैराप्लेजिया फाउंडेशन द्वारा विल स्टार अवार्ड से नवाजा गया। नीता को भुवनेश्वर, उड़ीसा स्थित शांता मेमोरियल रीहेबिलिटेशन सेण्टर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय महिला अधिवेशन में अनीता अग्निहोत्री, सचिव, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय नई दिल्ली के करकमलों से विकलांग महिलाओं के हक और अधिकार के सम्बन्ध में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। 2016 में ही नीता ने गुजरात राज्य सरकार द्वारा आयोजित खेल महाकुंभ में जिलास्तर और राज्यस्तर पर ह्वीलचेयर हर्डल खेल में स्वर्ण पदक अर्जित किया। नीता पांचाल विकलांगता विधेयक 2016 को राज्यसभा और लोकसभा में पारित करवाने के लिए चलाए गये अभियान में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने वाली गुजरात की पहली महिला हैं।
इन उपलब्धियों के अलावा नीता वर्ष 2007 में भोपाल में आयोजित दूसरी नेशनल पीपल्स हेल्थ असेम्बली में अपने उद्गार व्यक्त करने के साथ ही "वैश्वीकरण के युग में विकलांग व्यक्तियों के स्वास्थ्य का बचावका भी कुशलतापूर्वक प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इन्होंने वर्ष 2005 के दौरान दिल्ली और बैंगलोर में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम 'अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य' में विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व किया और विकलांग महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा लिए एक आवाज उठाई। साल 2006 में 'गुजरात में बाधारहित पयार्वरण' के लिए भव्य रैली का आयोजन किया जिसमें 3000 विकलांगों ने भाग लिया। नीता पांचाल अब तक विभिन्न फोरमों पर विकलांग महिलाओं के मुद्दे का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं जिसमें वर्ल्ड सोशल फोरम में उनका योगदान खास है। नीता गुजरात राज्य में विकलांगता जनसंख्या की गिनती के लिए जनगणना-2011 के दौरान सरकार और अन्य एनजीओ के साथ जुड़कर सहयोग देने में सबसे आगे रहीं। इन्होंने 2011 में आनंदी संस्था के साथ अंत्योदय अन्न योजना और खाद्य सुरक्षा पर भव्य रैलियों के मार्गदर्शन में भी सबसे आगे रहीं। नीता खाद्य सुरक्षा और जनगणना 2011 के अभियान सहित कई एडवोकेसी अभियानों का हिस्सा रह चुकी हैं। इन्होंने विभिन्न विकलांगता की सेवाओं में सुधार लाने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम को अपना हथियार बनाया तो विभिन्न एजेंसियों में विकलांग व्यक्तियों की नियुक्ति भी करवाई है। वह लगातार विकलांगों को रोजगार प्राप्त करने को प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहती हैं। नीता बेन को गुजरात में विकलांग व्यक्तियों के हक और अधिकार दिलाने में अग्रणी माना जाता है। नीता गुजरात स्टेट जेण्डर डिसेबिलिटी रिसोर्स सेंटर (जी.डी.आर.सी.) में स्टेट कोआर्डीनेटर हैं तो डिसेबिलिटी एडवोकेसी ग्रुप (डी.ए.जी.) की सचिव एवं विकलांगों के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय समिति की सक्रिय सदस्य हैं।

नीता पांचाल पिछले 13 साल से खाद्य सुरक्षा कानून के तहत अंत्योदय राशन कार्ड दिलवाने के साथ-साथ विकलांग व्यक्तियों को रोजगार एवं स्व-रोजगार के लिए भी काम कर रही हैं। वह अब तक वोडाफिन, होटल लेमन ट्री, रिलायंस फ्रेश, बी-सफल इंफ्रास्ट्रकचर आदि में 60 से अधिक दिव्यांगों को रोजगार दिलाने के साथ ही एन.एच.एफ.डी.सी., दिल्ली और एम.पी.कोन, भोपाल के सहयोग से 120 विकलांग व्यक्तियों को स्व-रोजगार की तालीम भी दिला चुकी हैं। इतना ही नहीं 58 विकलांग महिलाओं को स्व-रोजगार के साधन दिलवाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के साथ 524 विकलांग महिलाओं को घरेलू हिंसा अधिनियम की तालीम देकर उनमें आत्मविश्वास पैदा कर चुकी हैं। गुजरात में डेढ़ दर्जन से अधिक बाधारहित बांधकाम बनवाने में सहयोग करने वाली नीता पांचाल विकलांगता क्षेत्र में तालीम लेने के लिए दो बार विदेश यात्राएं भी कर चुकी हैं।