Monday, 15 June 2015

शिक्षा का स्याह सच

इन दिनों देश भर में आम आदमी पार्टी के विधायक जितेन्द्र तोमर और विशेष रवि की फर्जी डिग्री का मामला ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। विरोधी दल आप पर न केवल तंज कस रहे हैं बल्कि चाहते हैं कि इन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाये। देखा जाये तो आप के विधायक ही नहीं दूसरे दलों के नेताओं पर भी ऐसे आरोप हैं। राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ के लिए ऐसे मुद्दों को हवा तो देते हैं लेकिन स्वार्थ सिद्ध होते ही उन्हें आसानी से दबा दिया जाता है। राजनीतिक लाभ-हानि के इस खेल में यह चिन्ता किसी को नहीं है कि आखिर हमने कैसी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व्यवस्था कायम की है कि हुनर और कौशल से ज्यादा डिग्रियों को महत्व दिया जाता है। अपने नौजवानों, नौनिहालों के भविष्य के साथ हम कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं कि वे आज ज्ञानप्राप्ति से ज्यादा अंकप्राप्ति के प्रयासों को तरजीह देते हैं। अंकप्राप्ति के इन प्रयासों का ही नतीजा है कि हर वर्ष शैक्षणिक घोटाले हो रहे हैं। घोटालों की इस प्रवृत्ति को फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में बखूबी उजागर किया गया है लेकिन फिल्म का कोई सकारात्मक असर समाज पर पड़ता नहीं दिख रहा। अफसोस की बात है कि विद्यालयीन, महाविद्यालयीन परीक्षाओं में नकल करने की नित नई तरकीबें ढूंढ़ी जा रही हैं, जबकि जरूरत शिक्षा के स्तर में सुधार की होनी चाहिए। इस संदर्भ में केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के आॅल इण्डिया प्री मेडिकल टेस्ट की परीक्षा के नतीजे पर रोक का फैसला लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की सीबीएसई को यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि आपका पूरा सिस्टम फेल है तो परीक्षा सिस्टम भी पूरी तरह पुराना हो चुका है। अब सूचना प्रौद्योगिकी के जमाने में आपको परीक्षा के नए तरीके अपनाने होंगे। न्यायालय ने बोर्ड के वकील से कहा, अगर एक भी गलत शख्स को प्रवेश मिल जाता है तो क्या हम दिन-रात मेहनत करने वाले अपने होनहार छात्रों का बलिदान नहीं दे रहे हैं? सर्वोच्च न्यायालय की चिन्ता को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है जब दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ ओपन लर्निंग में कई पेपर लीक हुए थे। मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला तो अनेक रहस्यमयी परतों में दबा ही है, जिसमें संदिग्ध सम्बन्धितों के प्राण निकल रहे हैं पर सच सामने नहीं आ रहा। विद्यालयों से लेकर व्यावसायिक परीक्षाओं तक ऐसे घोटाले इस बात का सूचक हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी रोजगार व्यवस्था में नकल की जड़ें काफी गहरी पैठ बना चुकी हैं। आज की पीढ़ी जिस शैक्षणिक व्यवस्था को देख रही है, वह एक अंधेरे कुएं की तरह है, जिसमें जिज्ञासा, शोध, नैतिकता, मेहनत, ईमानदारी जैसे शब्दों के गुम होने का खतरा बरकरार है। जब तक हम व्यवस्था सुधार की पहल नहीं करते तब तक शिक्षा में फर्जीवाड़ा चलता ही रहेगा।

शिक्षा का सच

इन दिनों देश भर में आम आदमी पार्टी के विधायक जितेन्द्र तोमर और विशेष रवि की फर्जी डिग्री का मामला ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। विरोधी दल आप पर न केवल तंज कस रहे हैं बल्कि चाहते हैं कि इन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाये। देखा जाये तो आप के विधायक ही नहीं दूसरे दलों के नेताओं पर भी ऐसे आरोप हैं। राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ के लिए ऐसे मुद्दों को हवा तो देते हैं लेकिन स्वार्थ सिद्ध होते ही उन्हें आसानी से दबा दिया जाता है। राजनीतिक लाभ-हानि के इस खेल में यह चिन्ता किसी को नहीं है कि आखिर हमने कैसी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व्यवस्था कायम की है कि हुनर और कौशल से ज्यादा डिग्रियों को महत्व दिया जाता है। अपने नौजवानों, नौनिहालों के भविष्य के साथ हम कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं कि वे आज ज्ञानप्राप्ति से ज्यादा अंकप्राप्ति के प्रयासों को तरजीह देते हैं। अंकप्राप्ति के इन प्रयासों का ही नतीजा है कि हर वर्ष शैक्षणिक घोटाले हो रहे हैं। घोटालों की इस प्रवृत्ति को फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में बखूबी उजागर किया गया है लेकिन फिल्म का कोई सकारात्मक असर समाज पर पड़ता नहीं दिख रहा। अफसोस की बात है कि विद्यालयीन, महाविद्यालयीन परीक्षाओं में नकल करने की नित नई तरकीबें ढूंढ़ी जा रही हैं, जबकि जरूरत शिक्षा के स्तर में सुधार की होनी चाहिए। इस संदर्भ में केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के आॅल इण्डिया प्री मेडिकल टेस्ट की परीक्षा के नतीजे पर रोक का फैसला लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की सीबीएसई को यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि आपका पूरा सिस्टम फेल है तो परीक्षा सिस्टम भी पूरी तरह पुराना हो चुका है। अब सूचना प्रौद्योगिकी के जमाने में आपको परीक्षा के नए तरीके अपनाने होंगे। न्यायालय ने बोर्ड के वकील से कहा, अगर एक भी गलत शख्स को प्रवेश मिल जाता है तो क्या हम दिन-रात मेहनत करने वाले अपने होनहार छात्रों का बलिदान नहीं दे रहे हैं? सर्वोच्च न्यायालय की चिन्ता को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है जब दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ ओपन लर्निंग में कई पेपर लीक हुए थे। मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला तो अनेक रहस्यमयी परतों में दबा ही है, जिसमें संदिग्ध सम्बन्धितों के प्राण निकल रहे हैं पर सच सामने नहीं आ रहा। विद्यालयों से लेकर व्यावसायिक परीक्षाओं तक ऐसे घोटाले इस बात का सूचक हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी रोजगार व्यवस्था में नकल की जड़ें काफी गहरी पैठ बना चुकी हैं। आज की पीढ़ी जिस शैक्षणिक व्यवस्था को देख रही है, वह एक अंधेरे कुएं की तरह है, जिसमें जिज्ञासा, शोध, नैतिकता, मेहनत, ईमानदारी जैसे शब्दों के गुम होने का खतरा बरकरार है। जब तक हम व्यवस्था सुधार की पहल नहीं करते तब तक शिक्षा में फर्जीवाड़ा चलता ही रहेगा।

Sunday, 14 June 2015

सुषमा की मानवीयता

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मानवीयता ही उनके गले की फांस बन गई है। लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व प्रमुख ललित मोदी को ब्रिटेन में ट्रैवल डॉक्यूमेंट दिलाने में मदद देकर सुषमा स्वराज विपक्ष के निशाने पर आ गई हैं। सत्तापक्ष जहां इस मामले में सुषमा को क्लीन चिट दे रहा है वहीं विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ा है। ललित मोदी की जहां तक बात है, वह अपनी कार्यशैली, फैसलों और गतिविधियों की वजह से हमेशा विवादों में रहे हैं। उन पर आईपीएल में वित्तीय अनियमतताओं के आरोप के साथ ही भारत में लुक-आउट नोटिस जारी है। ललित मोदी को वीजा प्रदान करने का मामला ब्रिटेन में संसदीय समिति के समक्ष विचाराधीन है। मोदी को वीजा भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसद कीथ वाज की सिफारिश पर प्रदान किया गया था। वाज ने सुषमा का नाम लेकर मोदी को ब्रिटिश यात्रा दस्तावेज प्रदान करने के लिए ब्रिटेन के शीर्ष आव्रजन अधिकारी पर दबाव डाला था। विवादित मोदी को वीजा दिलाने के मामले में सुषमा का कहना है कि उन्होंने ब्रिटिश उच्चायुक्त से कहा था कि उन्हें अपने कानून के अनुसार मोदी के आग्रह का अध्ययन करना चाहिए। यह मामला 2014 का है, जब मोदी ने कहा था कि उनकी पत्नी कैंसर पीड़ित है और उसकी सर्जरी पुर्तगाल में होगी। सुषमा ने कहा कि यह सच है कि कीथ वाज ने मुझसे मोदी के वीजा मामले में बात की थी, पर मैंने उनसे वही बात कही जो ब्रिटिश उच्चायुक्त से कही थी। मैं ईमानदारी से मानती हूं कि ऐसे हालातों में किसी भारतीय नागरिक को आपात यात्रा दस्तावेज दिलाना गलत नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी आधार पर ललित मोदी का पासपोर्ट जब्त करने वाले संप्रग सरकार के आदेश को निरस्त करते हुए कहा था कि यह बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है और इस नाते यह आदेश असंवैधानिक है और मोदी ने अपना पासपोर्ट वापस पा लिया। विपक्षी दल सुषमा पर मोदी को वीजा ही नहीं अपने भांजे ज्योतिर्मय कौशल को ब्रिटिश लॉ डिग्री कोर्स में प्रवेश दिलाने में वीटो पॉवर इस्तेमाल का आरोप लगा रहे हैं। ज्योतिर्मय कौशल की जहां तक बात है, उसे सुषमा स्वराज के मंत्री बनने से पहले ही 2013 में ससेक्स यूनिवर्सिटी के लॉ कोर्स में सामान्य प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से दाखिला मिला था। ललित मोदी और सुषमा स्वराज को लेकर विपक्ष जो ड्रामा कर रहा है, उससे तो यही लगता है उसे मानवीय सरोकारों से अब कोई वास्ता नहीं रहा है।

सच लिखने की सजा!


मीडिया देश का चौथा स्तम्भ है। मीडिया बिक चुका है। पत्रकारों में सच लिखने की सामर्थ्य नहीं है, इन दिन-प्रतिदिन की सामाजिक शिकायतों का स्याह सच ही शाहजहांपुर के साहसी पत्रकार जगेन्द्र सिंह की मौत है। यह मौत उस सुरक्षा व्यवस्था पर करारी चोट है, जिसे हम अपना रक्षक समझने की बार-बार भूल करते हैं। वैसे तो पत्रकार हर रोज मरता है लेकिन वह सामाजिक उपहास से बचाव की खातिर अपना दुखड़ा, अपनी परेशानी किसी को भी सुनाना उचित नहीं समझता। अकेला जगेन्द्र ही नहीं जिसे सच लिखने की सजा मिली हो। ईमानदार कलमकार तो हर रोज प्रताड़ित किये जाते हैं, हर दिन उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है।  हमारा समाज मीडिया से सच लिखने की उम्मीद तो करता है लेकिन सच का साथ नहीं देना चाहता। यदि यह सच नहीं तो फिर हम जगेन्द्र के हत्यारों को सजा दिलाने को आगे क्यों नहीं आ रहे?
पत्रकारिता जोखिम भरा दायित्व है। यह ऐसा दायित्व है, जिसकी हर रोज परीक्षा होती है। परीक्षक वह समाज होता है, जिसे पत्रकारों से हमेशा शिकायत रहती है। जगेन्द्र का कसूर क्या था? उसने एक भूमाफिया और उत्तर प्रदेश सरकार के उस मंत्री की आपराधिक गतिविधियों का खुलासा सोशल मीडिया के जरिए किया, जिसका संज्ञान सरकार और उसके सुरक्षा तंत्र को पहले से ही होना चाहिए था। कहते हैं कि मरता हुआ व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता, पर कोतवाल श्रीप्रकाश राय जिन पर जगेन्द्र को आग से फूंक देने का आरोप है, वह इससे इनकार करते हैं। राय का कहना है कि आग जगेन्द्र ने खुद लगाई है। अगर ऐसा है तब भी सवाल यह उठता है कि पुलिस वालों की मौजूदगी में एक व्यक्ति किस तरह अपने ऊपर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा सकता है और उसे रोकने के लिए पुलिस ने क्या किया? मृतक जगेन्द्र पर लूट, अपहरण और हत्या के जो आरोप लगे हैं, उनकी पड़ताल कैसे और कब पूरी होगी? क्या मंत्री के खिलाफ जो खबरें जगेन्द्र ने लिखी थीं, उनकी जांच करवाने का साहस सरकार दिखाएगी?
 सच लिखने की सजा जगेन्द्र की मौत ही नहीं उस पर थोपे गये अनगिनत मुकदमें भी हैं। इसे अफसोस कहें या राजनीतिक विडम्बना समाजवाद का राग अलापती उत्तर प्रदेश सरकार अवैध खनन, जमीन पर कब्जा करने और बलात्कार जैसे कई आरोपों से घिरे पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा को दण्ड दिलाने की बजाय उसे बचाने का गुनाह कर रही है। पुलिस कर्मियों के निलम्बन के बाद हो सकता है कि अखिलेश सरकार दबाव में  दोषी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई कर अपने दामन को पाक-साफ करने की कोशिश करे, पर टके भर का सवाल यह है कि किसी फैसले तक पहुंचने के लिए उसे एक पत्रकार की हत्या का इंतजार क्यों करना पड़ा?
राजनीतिक दलों के बिगड़ते आंतरिक लोकतंत्र और राजनीतिक शुचिता को लेकर हमारी सर्वोच्च अदालत कई बार चिन्ता जता चुकी है। अपराधियों को राजनीति से दूर रखने की बातें तो खूब हुर्इं पर मुल्क के किसी राजनीतिक दल ने अपना दामन पाक-साफ करने की रत्ती भर कोशिश नहीं की। दबंगों और अपराधियों के खिलाफ जहां आमजन मजबूरी में आवाज नहीं उठा पाता वहीं दूसरी ओर मीडिया में आमतौर पर उनकी कारगुजारियां तब सामने आती हैं, जब किन्हीं वजहों से वे कठघरे में खड़े हो चुके होते हैं। आज पत्रकारिता में गिरावट की वजह हिम्मत और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करने वालों की कमी के साथ ही मीडिया मालिकों के निज स्वार्थ भी हैं। सूचना क्रांति के मौजूदा दौर में सच न लिख पाने की पीड़ा ही तो है जिसकी वजह से कलमकारों को सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है। यह सच है कि हमारे पत्रकार साथी जिन कुछ जरूरी खबरों को किन्हीं वजहों से अपने पत्र-पत्रिकाओं में जगह देने से वंचित हो जाते हैं, वे सोशल मीडिया के जरिए तुरंत आम लोगों तक पहुंच जाती हैं।
जगेन्द्र चाहते तो मंत्री से सौदेबाजी कर सकते थे पर जांबाज कलमकार ने धमकियों के सामने चुप्पी साध लेने  की बजाय जोखिम भरा रास्ता चुना। जगेन्द्र के सच को यदि समाज का साथ और सहयोग मिला होता तो वह नहीं मारा जाता। जगेन्द्र की मौत का स्याह सच यह है कि अब ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों के लिए हालात किस कदर खतरनाक हो चुके हैं। आज पत्रकारों को सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भी जीवन-मौत से जूझना पड़ रहा है। पिछले कुछ साल के आंकड़ों पर गौर करें तो पड़ोसी पाकिस्तान में पत्रकारिता सबसे ज्यादा जोखिम भरा काम हो गया है। हाल के दिनों में इराक में आईएसआईएस ने भी कई पत्रकारों को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि वे ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे।
जगेन्द्र की मौत को जिस तरह मिथ्या साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं, वह चौथे स्तम्भ के लिए शुभ संकेत नहीं है। पुलिस जो भी कह रही है वह न केवल असत्य बल्कि इस बात की बानगी मात्र है कि राजनीति में निहित स्वार्थों के कारण किस तरह कानून को हथियार बनाया जा रहा है। एक पत्रकार अगर ईमानदारी से अपने पेशे का निर्वाह करता है तो एक तरह से वह समूचे समाज के हित में काम कर रहा होता है। इसलिए पत्रकारिता की ऐसी आवाजों पर हमला या उन्हें खामोश करने का दुस्साहस किसी एक व्यक्ति नहीं बल्कि इंसानियत, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के खिलाफ है। हमारे सफेदपोश राजनीतिज्ञ तन-मन से कितने निर्मल और निर्मम हैं, इसके हाल ही अनेकों उदाहरण सामने आये हैं। दिल्ली के कानून मंत्री रहे जीतेन्द्र सिंह तोमर, आम आदमी पार्टी के ही विधायक विशेष रवि जहां फर्जी शैक्षिक दस्तावेजों में धोखाधड़ी के मामले में फंसे वहीं उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा पत्रकार की हत्या तथा बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री कैलाश चौरसिया पर मिर्जापुर के आरटीओ से चौथ मांगने और जान से मार देने की धमकी देने का आरोप है। बात राजनीतिक दलों में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की करें तो आज कोई भी दल ऐसा नहीं है, जिसका दामन पाक-साफ हो। राजनीतिक मंचों पर नैतिकता की दुहाई देने वाले हमारे राजनीतिज्ञ कितने ईमानदार हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। आप के जीतेन्द्र सिंह तोमर, विशेष रवि ही नहीं केन्द्र सरकार के भी कई मंत्री दागी हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां सभी दलों में उड़ाई जा रही हैं। देश के राजनीतिक दलों को सचमुच शुचिता, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन में यकीन है, तो किसी एक पार्टी पर उंगली उठाकर इतराने के बजाय सभी दलों को अपने दामन पाक-साफ करने का संकल्प लेना चाहिए।

Thursday, 11 June 2015

पाकिस्तान का बेसुरा राग

रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई, फिलवक्त यही कुछ स्थिति पाकिस्तानियों की भी है। आतंकवाद से जूझ रहे पाकिस्तान को भारतीय जांबाज सैनिकों को शाबासी देनी चाहिए कि उन्होंने म्यांमार सीमा में घुसकर सौ से अधिक आतंकियों को मार गिराया। सैनिकों की इस कार्रवाई से भारतीय आवाम तो खुश है लेकिन पाकिस्तान बौखला गया है। आॅपरेशन के तुरंत बाद ही पाकिस्तानी गृहमंत्री निसार अली खान का यह कहना कि हम म्यांमार नहीं जो कोई हमारी सीमा में घुसकर ऐसे आॅपरेशन को अंजाम दे वहीं पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति व पूर्व सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ का यह कहना कि हमारे देश के परमाणु बम शब-ए-बरात के लिए नहीं रखे या पाकिस्तान ने चूड़ियां नहीं पहनी हुई हैं, निहायत बचकानी बात है। गुरुवार को निसार अली खान का बयान केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर की उस टिप्पणी के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि म्यांमार में उग्रवादियों के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई दूसरे देशों के लिए संदेश है। राठौर की टिप्पणी को पाकिस्तान ने चेतावनी के रूप में लिया और निसार ने कहा कि जो पाकिस्तान के खिलाफ नापाक इरादे रखते हैं, उनको कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि हमारे सुरक्षा बल किसी भी दुस्साहस का जवाब देने में सक्षम हैं। निसार के बयान के बाद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने चुटली लेते हुए कहा कि जो लोग भारत की बदली सोच से भयभीत हैं, उन्हीं को पीड़ा हो रही है। भारत-म्यांमार सीमा पर उग्रवादी ठिकानों पर हमले हमारी सैनिक और कूटनीतिक क्षमता के सराहनीय उदाहरण हैं। यह कार्रवाई एक तरफ जहां मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का नतीजा है, वहीं इसकी सफलता के पीछे म्यांमार के साथ वर्षों से चल रहे सकारात्मक कूटनीतिक प्रयास भी हैं। म्यांमार और भारत के बीच सम्बन्धों की जहां तक बात है 1990 के दशक से ही सैन्य सहायता के जरिये भारत ने सहयोग और विश्वास का माहौल बनाया है। वर्ष 1995 में भारतीय सेना की 57वीं डिवीजन ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर ‘आॅपरेशन गोल्डेन बर्ड’ नामक कार्रवाई में 38 उग्रवादी मार गिराये थे तो दोनों देशों ने जनवरी, 2006 में भी म्यांमार सीमा के भीतर कुछ आॅपरेशन किये थे। 2010 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें भारत को म्यांमार की सीमा के भीतर उग्रवादियों पर हमले की अनुमति दी गयी थी। जो भी हो हमें पाकिस्तान की नीति और नीयत पर कभी भरोसा न करते हुए यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से ही पूर्वोत्तर राज्यों में शांति कायम हो जाएगी।  

Wednesday, 10 June 2015

योग पर सियासत


भारत विश्व गुरु है, इसकी गंगा-जमुनी संस्कृति की दुनिया भर में तारीफ होती है। देश का दुर्भाग्य कहें या सियासत कुछ लोग उस योग को मिथ्या साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, जोकि स्वस्थ मानव जीवन के लिए निहायत जरूरी है। केन्द्र में जब से मोदी सरकार आई है, उसके अच्छे कामकाज पर भी उंगलियां उठाई जा रही हैं। योग को जिस तरह साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिशें हो रही हैं, वह न केवल गलत है बल्कि मानव कल्याण के लिए भी उचित नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के लोग भी मामले की गम्भीरता को न समझते हुए आग में ही घी डालने का काम कर रहे हैं। भारत विचार बहुल देश है लेकिन जिस तरह उसके नेक कार्यों को विवादित बनाया जा रहा है, उससे मुल्क की गरिमा को आंच आने से इंकार नहीं किया जा सकता। योग को लेकर चल रही मौजूदा बहस हमारी नेक पारम्परिक व्यवस्था का ही एक गलत उदाहरण है। भारतीय परम्परा में योग मनुष्य को निरोगी रखने का जरिया ही नहीं आत्मा की सार्वभौमिक चेतना का प्रतिबिम्ब भी है। इसमें ध्यान, व्यायाम और ज्ञान सभी कुछ सम्मिलित है। दुर्भाग्य से शांत, सम्यक और संतुलित जीवन-शैली तथा परिष्कृत वैचारिकी की राह प्रशस्त करने वाले योग को धर्म और राष्ट्र के प्रतीक के रूप में संकुचित करने के प्रयास हो रहे हैं। भारतीय योगियों ने इस धारा को विश्व के कोने-कोने में हमेशा शोहरत दिलाते हुए इसकी सार्थकता को सिद्ध किया है। अफसोस चंद मुट्ठी भर लोग योग की विश्व स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के प्रस्ताव को 177 देशों का समर्थन मिला है। योग की महत्ता को चीन, अमेरिका, क्यूबा, जापान, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, इराक, सीरिया, अफगानिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों ने भी समर्थन दिया है लेकिन इसे हमारे देश में एक समूह ने धर्म-विशेष के गौरव के रूप में स्थापित करने की संकीर्ण मानसिकता दर्शाई है। ऐसी मानसिकता से योग जैसी सांस्कृतिक और सभ्यतागत उपलब्धियों को सीमित करना अनुचित ही नहीं, सिद्धांतों के विपरीत भी है। योग को थोपने की कवायद और इसके विरोधियों को भारत छोड़ने या समुद्र में डूब मरने की सलाह जैसा रवैया भी निन्दनीय है। योग का विरोध करने वालों को भी अपनी चिन्ताओं को धार्मिक आवरण न देकर इसकी व्यापकता और उपयोगिता पर मंथन करना चाहिए। सरकार ने योग दिवस के कार्यक्रमों से सूर्य-नमस्कार को हटाकर वाकई सराहनीय पहल की है। योग के पक्ष और विपक्ष में खड़े समूहों को योग-परम्परा के महत्व को सियासत का जामा पहनाने की बजाय इसके प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए। 

Tuesday, 9 June 2015

जाने क्यूं अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते,

जाने क्यूं अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते,
जाने क्यूं अब मस्त मौला मिजाज नहीं होते।
पहले बता दिया करते थे दिल की बातें,
जाने क्यूं अब चेहरे खुली किताब नहीं होते।।