Thursday, 5 March 2015

विविधता में एकता का संदेश

आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति में त्योहारों और उत्सवों का महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यहां मनाये जाने वाले त्योहार ही हैं जोकि समाज में मानवीय गुणों को स्थापित कर लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना का संदेश देते हैं। भारत में त्योहारों एवं उत्सवों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। त्योहारों से ही मानवीय गरिमा को सम्बल मिलता है। होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्योहार है जिसमें हर कोई रंग-उमंग में खो जाता है। होली विविधता में एकता का संदेश देती है।
होली भारत के सबसे पुराने त्योहारों में शुमार है। होली की हर कथा में एक समानता है। होली आनंदोल्लास तथा भाईचारे का त्योहार है। यह लोकपर्व होने के साथ ही अच्छाई की बुराई पर जीत, सदाचार की दुराचार पर जीत और समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यही वजह है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता व दुश्मनी को भूलकर एक-दूसरे से गले मिल फिर से दोस्त बन जाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत ऋतु का संदेशवाहक भी है। होली को लेकर मान्यता है कि प्राचीनकाल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यन्त बलशाली एवं घमण्डी राक्षस अपने को ही ईश्वर मानने लगा था। हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रहलाद को मारने के उद्देश्य से उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई किन्तु आग में बैठने पर होलिका तो जल गई परन्तु ईश्वर भक्त प्रहलाद बच गये। इस प्रकार  होली होलिका के विनाश तथा भक्त प्रहलाद की प्रभु के प्रति अटूट भक्ति एवं निष्ठा के प्रसंग की ही याद दिलाती है। होली का त्योहार हमारे अन्त:करण में प्रभु प्रेम तथा प्रभु भक्ति के अटूट विश्वास को निरन्तर प्रगाढ़ करता है।
होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम तरह की मान्यताएं हैं और शायद यही विविधता में एकता, भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर-पूर्व भारत में होलिका दहन को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस के रूप में जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोलकर भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दु:ख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत में अग्नि प्रज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहां गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। होली हर जाति-सम्प्रदाय का पर्व है। मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिन्दू ही नहीं अपितु मुसलमान लोग भी मनाते हैं। इसके सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें मुगलकाल की हैं और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। इन तस्वीरों में अकबर को जोधाबाई के साथ तथा जहांगीर को नूरजहां के साथ होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज ही बदल गया था। इतिहास को सच मानें तो शाहजहां के जमाने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं पर अंतत: इस पर्व का उद्देश्य मानव-कल्याण ही है। वैसे तो होली देश भर में अपने-अपने तरीके से मनाई जाती है लेकिन ब्रज क्षेत्र में इसका अपना अलग महत्व है। होली न केवल रंगों और हंसी-खुशी का त्योहार है बल्कि आपसी भाईचारे की मिसाल भी है। बदलते समय के साथ तीज-त्योहारों के तौर-तरीके भी बदले हैं। अब होली में प्राकृतिक रंगों का स्थान रासायनिक रंगों ने ले लिया है तो भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक-संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इसके अन्य आधुनिक रूप हैं। अतीत में लोग चंदन, गुलाब जल और प्राकृतिक रंगों से होली खेलकर अपने आपको भला-चंगा रखते थे। वर्तमान में अधिक से अधिक पैसा कमाने की होड़ में लोगों ने बाजार को रासायनिक रंगों से भर दिया है। यह रासायनिक रंग हमारी त्वचा के लिए काफी नुकसानदायक हैं। इन रासायनिक रंगों में मिले हुए सफेदा, वार्निश, पेंट, ग्रीस, तारकोल आदि से खुजली और एलर्जी होने की आशंका बढ़ जाती है। लोकसंगीत, नृत्य नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहां तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। होली को आपसी प्रेम एवं एकता का प्रतीक माना जाता है। होली हमें सभी मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाने की प्रेरणा प्रदान करती है। इसके साथ ही रंग का त्योहार होने के कारण भी होली हमें प्रसन्न रहने की प्रेरणा देती है। इसलिए इस पवित्र पर्व के अवसर पर हमें ईर्ष्या, द्वेष, कलह आदि बुराइयों को दूर भगाने की पहल करनी चाहिए। आमजन के लिए रंगों के इस त्योहार को मनाना तभी सार्थक होगा जबकि हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार ही आचरण करें। इसलिए वर्तमान परिवेश में जरूरत है कि इस पवित्र त्योहार पर आडम्बर की बजाय इसके पीछे छुपे संस्कारों और जीवन-मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण हो सकता है।  

Tuesday, 3 March 2015

श्रीनिवासन के आसन पर डालमिया

जगमोहन डालमिया सर्वसम्मति से भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष चुन लिए गये हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है। जगमोहन डालमिया का क्रिकेट से 36 साल पुराना रिश्ता है। डालमिया के प्रयासों से ही न केवल बीसीसीआई मालामाल हुई बल्कि यह आज दुनिया की सबसे ताकतवर खेल संस्था भी है। कल के दुश्मन आज दोस्त हैं। यह दोस्ती दिल की नहीं बल्कि उस दलदल से निकलने का प्रयास है जिसमें आज आईसीसी अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन बुरी तरह से फंसे हुए हैं। भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड आज बदनाम संस्था है। जिन लोगों ने इसे बदनाम किया है, उनके छद्म प्रयासों से ही डालमिया को क्रिकेट की आसंदी मिली है।
 व्यक्ति जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है। विपत्ति में धैर्य, उत्कर्ष में विनम्रता, सभा में वाक-चातुर्य, युद्ध में वीरता, यश में समता, वाणी में सत्यता नेक इंसान के स्वाभाविक गुण हैं। निंदा-प्रशंसा, सम्पत्ति-विपत्ति, जीवन-मरण की स्थिति में भी वे कभी अपना संतुलन नहीं खोते। आज डालमिया को जो कांटों का ताज मिला है, उसके निहितार्थ उन्हें समझना होगा। भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड को भ्रष्टाचार के दलदल से निजात दिलाना उनकी पहली वरीयता होनी चाहिए। भद्रजनों का खेल क्रिकेट आज न सिर्फ कारोबार बल्कि सट्टेबाजी समेत कई तरह की आपराधिक गतिविधियों का अखाड़ा बन गया है। यही कारण है कि जो भी एक बार क्रिकेट बोर्ड पर काबिज हो जाता है, फिर वहां से जाने का नाम नहीं लेता। खेल की बदनामी और अपनी फजीहत के बावजूद एन. श्रीनिवासन कैसे भी भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड का अध्यक्ष बने रहना चाहते थे। भला हो सर्वोच्च न्यायालय का जिसके चलते श्रीनिवासन ने अपने निहित स्वार्थ से परे डालमिया को बीसीसीआई की अध्यक्षी दिलाई है। क्रिकेट को अपनी बपौती समझने वाले श्रीनिवासन के आसन पर आज डालमिया का बिराजना बेशक भारतीय क्रिकेट का सुखद संकेत माना जा रहा हो पर भविष्य में जो भी अड़चनें आएंगी उसमें कहीं न कहीं श्रीनिवासन के लोग ही संलिप्त होंगे। स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के चलते पूरी दुनिया में भारतीय क्रिकेट को बदनाम करवाने के बावजूद श्रीनिवासन जिस तरह इस कलंक कथा और इसके खलनायकों पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हैं, उससे साफ है कि उनका दामन बेदाग नहीं है। श्रीनिवासन अपने दामाद कोे बचाने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। डालमिया 2001 से 2004 तक बीसीसीआई के अध्यक्ष रह चुके हैं। 2004 में कई तरह के आरोप लगने के बाद ही उन्होंने बीसीसीआई की अध्यक्षी गंवाई थी।  2014 में श्रीनिवासन को हटाए जाने के बाद बीसीसीआई अध्यक्ष की अंतरिम जिम्मेदारी सम्हालने वाले डालमिया का पुन: अध्यक्ष बनना, चुनाव में श्रीनिवासन के अधिकांश लोगों का जीतना, अनुराग ठाकुर का सचिव बनना तथा राजीव शुक्ला और ज्योतिरादित्य सिंधिया की पराजय भारतीय क्रिकेट के लिए शुभ संकेत नहीं है।
जगमोहन डालमिया को अपनी दूसरी पारी में बीसीसीआई ने सपाट पिच नहीं दी है। खेल के नजरिए से भी दूसरी पारी में बल्लेबाजी करना कभी आसान नहीं होता। डालमिया के सामने क्रिकेट बोर्ड की नई टीम में एकता कायम करना और फिर उसका नेतृत्व करना टेढ़ी खीर साबित होगा। साथ ही आईपीएल का अगला सीजन शुरू होने वाला है। भारतीय क्रिकेट  बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे लीग की विश्वसनीयता को बहाल किया जाये। उधर भारतीय टीम वर्ल्ड कप के महासमर में अपना ताज बचाने के लिए मजबूत दावा पेश करने में जुटी है और इधर जगमोहन डालमिया दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड का मुखिया बनने में कामयाब रहे हैं। भारतीय क्रिकेट में जग्गू दादा का नाम कोई नया नहीं है, लेकिन अपने जमाने में विकेटकीपर व बल्लेबाज रहे डालमिया बीसीसीआई की राजनीतिक पिच पर जो जोरदार वापसी की है, उसमें श्रीनिवासन का अहम रोल है। चतुर सयाने एन. श्रीनिवासन ने सुप्रीम कोर्ट के दबाव के चलते बेशक बोर्ड के अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ सके पर उन्होंने वक्त के चक्र में जगमोहन डालमिया और शरद पवार को एक बार फिर आमने-सामने लाकर जरूर खड़ा कर दिया है।    
एक दौर था जब भारतीय क्रिकेट को जगमोहन डालमिया अपनी ब्रीफकेस से चलाते थे। 1987 में विश्व कप को पहली बार इंग्लैंड से बाहर लाकर भारतीय उपमहाद्वीप में आयोजन कराने से लेकर क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था आईसीसी का प्रमुख बनने तक डालमिया ने विश्व क्रिकेट के केन्द्रबिंदु को लार्ड्स से हटाकर कोलकाता लाने में अहम भूमिका निभाई। डालमिया ने क्रिकेट के प्रसारण मामले में भारतीय क्रिकेट को आर्थिक सुपर-पावर बनाने की नींव रखी, लेकिन वक्त ने ऐसा पलटा खाया कि डालमिया अर्श से फर्श पर आ गए। मराठा सरदार शरद पवार ने डालमिया को बीसीसीआई की राजनीति से ही बेदखल कर दिया।
एक ऐसा भी दौर आया जब डालमिया पर फण्ड के घपले के आरोप लगे और वे बीसीसीआई से सस्पेंड कर दिये गये। लेकिन, डालमिया ने बंगाल क्रिकेट संघ में वापसी की, कोलकाता हाईकोर्ट में मुकदमा जीता और एन. श्रीनिवासन को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी, तो अंतरिम अध्यक्ष बन गये। बाद में जैसे-जैसे मैच फिक्सिंग मामले में श्रीनिवासन गुट पर शिकंजा कसता चला गया, लड़ाई एक बार फिर से जगमोहन डालमिया बनाम शरद पवार के बीच हो गयी। आखिरकार, ईस्ट जोन के दो वोट डालमिया के लिए मैच विनर साबित हुए। पवार ने खुद को रेस से बाहर कर लिया और पावर डालमिया के पास दोबारा आ गयी। अब भारतीय क्रिकेट मुरीद तीन अहम सवाल कर रहे हैं। पहला, क्या जगमोहन डालमिया पिछली बार की तरह एक बार फिर से एन. श्रीनिवासन के डमी साबित होंगे? दूसरा, क्या बोर्ड की राजनीति में एन. श्रीनिवासन राज का खात्मा हो गया है? तीसरा, यहां से भारतीय क्रिकेट राजनीति की दिशा और दशा क्या होगी? जहां तक पहले सवाल का जवाब है, डालमिया पिछली बार आपात स्थिति में बोर्ड के अंतरिम अध्यक्ष बने थे, इस बार पूर्णकालिक अध्यक्ष बने हैं। जाहिर तौर पर, जहां पिछली बार श्रीनिवासन की खड़ाऊं कुर्सी पर रखकर राज किया, इस बार ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। दूसरा, भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता अनुराग ठाकुर ने करीबी लड़ाई में श्रीनिवासन के करीबी संजय पटेल को हराकर साफ कर दिया है कि बोर्ड में अब एन. श्रीनिवासन गुट का वर्चस्व खत्म हो रहा है। बोर्ड के सचिव का एक बड़ा कार्यक्षेत्र है और अनुराग ठाकुर तथा श्रीनिवासन के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। उम्र के ढलते पड़ाव पर खड़े डालमिया को बोर्ड चलाने के लिए अनुराग ठाकुर को साथ लेकर चलना होगा। देश के लोकप्रिय खेल की राजनीति से जुड़ा अहम सवाल है कि अब भारतीय क्रिकेट किस दिशा में आगे जायेगी?        
दरअसल, क्रिकेट में किस्सा कुर्सी का होने की वजह से भारतीय क्रिकेट से जुड़े कुछ सवाल हाशिये पर चले गये थे। मौजूदा विश्व कप में अब तक का प्रदर्शन भले ही अच्छा रहा हो, पर बीते चार साल में भारत विदेश में एक भी बड़ी टेस्ट सीरीज जीतने में कामयाब नहीं रहा है। महेन्द्र सिंह धोनी टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं और कोच डंकन फ्लेचर का कार्यकाल खत्म होने वाला है, ऐसे में क्रिकेट बोर्ड की नयी टीम और टीम इण्डिया की लीडरशिप को लेकर अहम फैसले लेने हैं। दूसरा, आईपीएल का अगला सीजन शुरू होने वाला है। बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे लीग की विश्वसनीयता को बहाल किया जाये। तीसरा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब साफ है कि बोर्ड को पेशेवर और पारदर्शी बनाने के लिए ढांचागत बदलाव जरूरी है। भारत तेजी से बदल रहा है और अब बोर्ड को बंद ब्रीफकेस से नहीं चलाया जा सकता।  स्पोर्ट्स की तरह जिन्दगी के किसी भी सफर में हर बदलाव एक नयी चुनौती लेकर आता है। बोर्ड की कमान भले ही एक बार फिर से 74 साल के जगमोहन डालमिया के हाथों में है, लेकिन अब नये सिरे से शुरुआत की जरूरत है। जग्गू दादा को अपनी नयी युवा टीम को साथ लेकर बदले हालात के हिसाब से फैसले लेने होंगे। उनकी पहली पारी, विश्व क्रिकेट के भूगोल में पहचान के लिए संघर्ष की लड़ाई थी। उस लड़ाई को अपने साथियों के साथ मिलकर डालमिया ने जीता। दूसरी पारी, साख बहाल करने की लड़ाई है। इस लड़ाई को जीतने के लिए डालमिया और टीम को नये सिरे से, नये नियम-कायदों के साथ शुरू करने की जरूरत है।

Saturday, 28 February 2015

आमजन को प्यार की मार

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले आम बजट में जहां धनकुबेरों की तिजोरी खाली कर गरीबों की मदद का जोखिमपूर्ण हौसला दिखाया है वहीं उन्होंने सम्पत्ति कर समाप्त करने के साथ ही व्यक्तिगत आयकर सीमा यथावत रख मध्यमवर्गीय परिवारों की उम्मीदों पर पानी भी फेरा है। आम बजट में हर गरीब को रोजगार तो गरीब बुजुर्गों को अटल पेंशन योजना की सौगात देकर मोदी सरकार ने यह जताने की कोशिश की है कि वह उद्योगपतियों की नहीं बल्कि आमजन की सरकार है।
पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती महंगाई के कारण रिजर्व बैंक पहले तो ब्याज दरों को लगातार बढ़ाता रहा लेकिन उसके बाद उसे घटा नहीं पाया। ऊंची ब्याज दरों के कारण औद्योगिक ही नहीं अधोसंरचना के क्षेत्र में भी निवेश नहीं हो पा रहा था। निवेश न होने से उद्योगों में नई क्षमता का निर्माण नहीं हुआ। ऊंची ब्याज दरों से आटोमोबाइल समेत तमाम उपभोक्ता वस्तुओं की न केवल मांग घटी बल्कि लोगों का नए आवास क्षेत्र में भी रुझान कम हो गया।  पिछले चार-पांच साल से रुकी औद्योगिक ग्रोथ के लिए अब अनुकूल वातावरण है। अब रिजर्व बैंक के पास ब्याज दरें घटाने के  पर्याप्त कारण हैं। यदि ब्याज दर में गिरावट आती है तो उसका सीधा असर अधोसंरचना और औद्योगिक निवेश पर तो पड़ेगा ही, अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में भी खासा इजाफा हो सकता है। अरुण जेटली ने अपने आम बजट में विकास की अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए भी कुछ फैसले लिए हैं। घटती तेल की कीमतों, थमती महंगाई और विदेशी भुगतान की स्थिति में सुधार के चलते अब नीति-निर्माता राहत में हैं। देखा जाए तो पुराने ऋणों पर ब्याज की अदायगी, वेतन, पेंशन, पुलिस, प्रतिरक्षा समेत ऐसे कई खर्च हैं, जहां राजकोष का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। पिछले अनुभवों से परे जेटली ने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, विकास, पेयजल के साथ ही गरीबों पर दरियादिली दिखाने का प्रयास किया है।
अरुण जेटली ने बजट में  गरीबों का ख्याल रखते हुए  कृषि, सिंचाई, औद्योगिक विकास के साथ ही अधोसंरचना को पुख्ता करने की भी हिम्मत जुटाई है। राजकोष की वर्तमान स्थिति को देखते हुए जेटली ने राजस्व में इजाफे के लिए धनकुबेरों पर कराधान बढ़ाया है। मोदी सरकार ने बजट में बिहार और पश्चिम बंगाल को विशेष इमदाद देकर अपनी राजनीतिक मंशा को भी पर लगाए हैं। बजट में सब्सिडी तो नहीं खत्म की गई लेकिन कम करने के संकेत जरूर दिए गए हैं। गरीबों की मदद और राजकोष को बढ़ाने के लिए जेटली ने ऐसे कदम उठाए हैं जिनके दूरगामी परिणाम सरकार के लिए घातक साबित हो सकते हैं। सरकार ने सम्पत्ति कर तो खत्म कर दिया लेकिन सालाना 10 करोड़ और इससे अधिक आय अर्जित करने वाली कम्पनियों पर दो फीसदी अधिभार बढ़ाकर धनकुबेरों की नींद उड़ा दी है। अब 10 करोड़ और इससे अधिक आय अर्जित करने वाली कम्पनियों को 12 फीसदी तो एक से 10 करोड़ सालाना आय अर्जित करने वाली कम्पनियों को सात फीसदी अधिभार देना होगा। सम्पत्ति कर समाप्त कर मोदी सरकार ने जहां एक हजार करोड़ रुपये की कुर्बानी दी है वहीं धन कुबेरों पर दो फीसदी का अधिभार लगाकर नौ हजार करोड़ रुपये जुटाने का प्रबंध भी किया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बिजली की किल्लत से निजात के लिए पांच नई अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं सहित बजट में अन्य अधोसंरचनाओं पर 70 हजार करोड़, रेलवे की खस्ता हालत को सुधारने के लिए 10 हजार करोड़, मनरेगा के लिए 34699 करोड़ तथा लघु उद्योगों की खातिर 20 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। आम बजट में जन-धन योजना के तहत गरीबों के लिए दो लाख रुपए का बीमा सिर्फ 12 रुपए के प्रीमियम पर करने का भी बंदोबस्त किया गया है। मोदी सरकार अटल पेंशन योजना में हर गरीब बुजुर्ग को जहां 60 साल की उम्र के बाद प्रतिमाह एक हजार रुपये बतौर पेंशन देगी वहीं प्रधानमंत्री बीमा योजना के तहत हर नागरिक को बीमा सुरक्षा प्रदान की जाएगी। अल्पसंख्यक युवाओं के लिए नई मंजिल योजना में 3,738 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है तो अति निर्धन बुजुर्गों के लिए विशेष बीमा योजना अमल में आएगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न केवल गरीबों के मर्म पर मलहम लगाया है बल्कि धरती पुत्रों का भी विशेष ख्याल रखा है। बजट में किसानों को सिंचाई के लिए 5,300 करोड़, लघु सिंचाई योजना के लिए  5,300 करोड़,  ग्रामीण कर्ज योजना के लिए 1500 करोड़ तथा बाल विकास योजना के लिए 1,500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जहां गरीबों का बोझ अमीरों पर डालने की कोशिश की है वहीं उन्होंने कम्पनियों को स्वच्छ  भारत अभियान और गंगा सफाई कोष में योगदान के लिए कर में छूट देने का भरोसा भी दिया है। बजट में  स्वास्थ्य बीमा में कटौती पर छूट की सीमा 15 हजार रुपये से बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दी है तो दुसाध्य रोगों के मामले में वरिष्ठ नागरिकों के लिए कटौती सीमा 60 हजार रुपये को बढ़ाकर 80 हजार रुपये करने का भरोसा दिया है। अब पेंशन निधि में योगदान पर छूट को एक लाख रुपये से बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये सालाना किया जाएगा। सुकन्या योजना में सभी तरह के निवेश पर पूरी तरह कर छूट मिलेगी। सरकार ने परिवहन भत्ता छूट को प्रति महीने 800 रुपये से बढ़ाकर 1,600 रुपये कर दिया है।
मोदी सरकार कालेधन के विरुद्ध संजीदा दिख रही है, वह  कालेधन के विरुद्ध एक नया कानून लाएगी। अब सम्पत्ति की खरीद-फरोख्त में पैन दर्ज करना जरूरी होगा। बजट में कर व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने के भी संकेत दिए गये हैं तो आय छिपाने पर 10 साल की कठोर सजा का प्रावधान भी किया गया है। मोदी सरकार पूर्वी राज्यों को न केवल तेजी से विकास का अवसर देगी बल्कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की तर्ज पर बिहार और पश्चिम बंगाल को भी विशेष सहयोग प्रदान करेगी। 2015-16 में एम्स जैसे संस्थानों की स्थापना जम्मू-कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश में की जाएगी। बिहार को एम्स जैसा दूसरा संस्थान मिलेगा। अब सरकार नकद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए डेबिट कार्ड को प्रोत्साहन देगी।  हर भारतीय के लिए यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी सिस्टम भी अमल में आएगा।  मोदी सरकार ने ग्रामीण रोजगार योजना में 34,699 करोड़ रुपये खर्च करने के साथ ही हर गरीब को नौकरी देने का भरोसा भी दिया है। बजट से पूर्व अटकलें लगाई जा रही थीं कि मोदी सरकार सभी तरह की सब्सिडी खत्म कर सकती है पर वित्त मंत्री ने सब्सिडी खत्म न कर उसे कम करने का संकेत जरूर दिया है। सरकार अपने राजकोष को बढ़ाने के लिए विनिवेश का सहारा लेने के साथ ही वर्ष 2017 तक वित्तीय घाटा 3.7 फीसदी तक लाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। जो भी हो अरुण जेटली ने अपने पहले आम बजट में आमजन को प्यार की मार देकर पूर्ववर्ती सरकारों का ही अनुसरण किया है।

Friday, 27 February 2015

यमुना उद्धार का संकल्प

मंद-मंद ही सही इन दिनों ब्रज में यमुना उद्धार की बयार बह रही है। जल उद्धार की इस बयार में उन आठ करोड़ लोगों की मुसीबतें समाहित हैं, जिनकी तरफ किसी सरकार ने आज तक गम्भीरता से ध्यान नहीं दिया है। यमुना उद्धार की जब भी बात होती है तब बरबस कुछ सवाल उठाए जाते हैं। मसलन, क्या अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है, क्या एक फूल से बहार आ सकती है? इन्हीं सवालों का जवाब देने की खातिर एक संत उठ खड़ा हुआ है। संत जयकृष्ण दास यमुना आंदोलन के प्रेरक व संचालक आचार्य प्रवर स्वामी विज्ञानाचार्य महाराज और अपने गुरु रमेश बाबा के संकल्प को पूरा करना चाहते हैं। अविरल और निर्मल यमुना का संकल्प पूरा हो इसके लिए  समाज, संत और सरकार को एक साथ प्रयास करने की दरकार है।
व्यक्ति की कार्यशैली, व्यवहार, कर्म, वाणी, रहन-सहन और प्रकृति-स्वभाव ही उसका मापदण्ड है। महानता भाग्य की फसल और पुरुषार्थ की निष्पत्ति है। हर किसी को वह नसीब नहीं होती, यह सतत् जागरूकता, जीवन के प्रति सकारात्मकता एवं अच्छाई की ग्रहणशीलता से ही सम्भव है। कुछ अलग पहचान बनाने या महानता को हासिल करने के लिये जरूरी है कि हम जिस चेहरे पर जिस विशेषता की गरिमा को देखें, उसे आदर से जीना सीखें, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति चाहता है अच्छा बनना, महान बनना। हमें उन भूलों को लगाम देनी होगी, जिनकी स्वच्छंदता आत्मविकास में बाधक बनती है। उनका फौलादी व्यक्तित्व होता है और वे बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में जीवन का कोई निर्णय नहीं लेते, जो परिणाम में महंगा पड़ने के साथ-साथ जीवन की सार्थकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाये। ऐसे व्यक्ति अन्याय और शोषण को सहते नहीं, उनका दमन भी नहीं करते, अपितु उनका मार्गान्तरीकरण करते हैं। मानवीय संवेदना के कारण वे सबके सुख-दु:ख को अपना सुख-दु:ख मानते हैं। उनकी जिन्दगी औरों के लिये समर्पित हो जाती है। ऐसे व्यक्ति श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं देते, बल्कि वे स्वयं प्रमाण होते हैं।
यमुना उद्धार और ब्रजवासियों के कल्याण को उठ खड़े संत जयकृष्ण दास का संकल्प कब और कैसे पूरा होगा यह भविष्य के गर्भ में है, पर यमुना हमारी धर्म-संस्कृति तथा राष्ट्रीय अस्मिता की अमूल्य धरोहर हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आज यमुना का अस्तित्व और यमुनोत्री से इलाहाबाद तक कोई 1376 किलोमीटर के तटों पर निवास करने वाली आवाम तथा जीव-जंतुओं का जीवन संकट में है। कलुषित यमुना जल से हजारों लोग घातक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं तो दूसरी तरफ जन आकांक्षाओं से बेखबर हमारी हुकूमतें गहरी नींद सोई हुई हैं। यमुना रक्षक दल बीते चार साल से सरकार को जगाने के साथ ही यमुना भक्तों को संकट से बचाने के लिए जन जागरण अभियान चला रहा है। राह कठिन तो मंजिल दूर है लेकिन यमुना उद्धार का भरोसा जिन्दा है। मानव कल्याण की कोई भी मुहिम क्यों न हो बिना संघर्ष के वह कभी पूरी नहीं हो सकती। जल और वायु प्रदूषण मुल्क में महामारी की शक्ल ले चुका है। जो दिल्ली ब्रजवासियों को जल प्रदूषण का दंश दे रही है वह स्वयं भी वायु प्रदूषण की गिरफ्त में है।
यमुना तलहटी की कोई आठ करोड़ आबादी की आसन्न नियति का अंदाजा प्रतिवर्ष हजारों लोगों की कैंसर आदि से होती मौतों से सहज लगाया जा सकता है।  गंगा प्रदूषण का ढोल पीटती मोदी सरकार का ध्यान कलुषित यमुना की तरफ दिलाने की खातिर ही यमुना रक्षक दल 11 मार्च को दिल्ली कूच कर रहा है। मोदी सरकार को सोचना होगा कि एक भारत, श्रेष्ठ भारत का संकल्प तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक कि हमारी जीवनदायिनी नदियां प्रदूषण मुक्त नहीं हो जातीं। दिल्ली ही नहीं आज मुल्क के तकरीबन सभी नगर वायु और जल प्रदूषण का संत्रास झेल रहे हैं। शहरों का मलमूत्र, कारखानों का जहरीला रसायन और मवेशियों की लाशें मोक्षदायिनी नदियों को विषाक्त बना रही हैं। यही प्रदूषित जल नदियों के किनारे बसे गांवों को असाध्य बीमारियां बांट रहा है। जल प्रदूषण सिर्फ मानव के लिए ही नहीं जीव-जंतुओं के लिए भी जानलेवा है। आज विभिन्न प्रदूषणों को लेकर हमारी सरकारें हायतौबा मचा रही हैं लेकिन मानव को इससे निजात दिलाने के कोई ठोस प्रयास होते नहीं दिखते। शहरीकरण के नाम पर विश्वस्तरीय सुविधाओं के सपने दिखाने वाली विकास नीतियां पर्यावरण संरक्षा के भाव से कोसों दूर हैं। इस मसले पर न केवल सिलसिलेवार विचार होना चाहिए बल्कि तत्काल उन पर अमल भी जरूरी है।
1376 किलोमीटर लम्बी यमुना और उसके जल को लेकर कितने भी तर्क-कुतर्क क्यों न दिए जाते हों पर यमुनोत्री से 180 किलोमीटर के बाद जल की जगह असाध्य बीमारियां ही प्रवाहित हो रही हैं। हरियाणा में हथिनी कुंड पर बंधक बनी यमुना की जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक यमुना भक्त काल के गाल में समाते ही रहेंगे। ब्रज में पहुंचने वाली यमुना का जल जल न होकर विष है। वजीराबाद से ओखला के बीच लगभग दो सौ छोटे-बड़े नालों से बहता मलमूत्र और रसायन इतना विषाक्त है कि उसके छूने मात्र से असाध्य रोग हो जाते हैं। आमतौर पर किसी त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान के बाद यमुना में बहती या उसके किनारों पर जमा पूजा सामग्री और विसर्जित मूर्तियों का अम्बार देखा जा सकता है। नालों के रास्ते शहर की गंदगी और औद्योगिक कचरे के जहरीले रसायनों से मरती इस नदी के सामने लोगों की आस्था भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। मुश्किल यह है कि तमाम जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद लोग समझने या मानने को तैयार नहीं हैं।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने मैली से निर्मल यमुना पुनर्जीवन योजना-2017 को हरी झंडी देते हुए यमुना के डूब क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण कार्य और नदी में मलबा डालने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इन नियमों के उल्लंघन पर पचास हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। यमुना को बचाने के लिए हरित पंचाट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने कई बार दिशा-निर्देश तो दिए हैं लेकिन लापरवाही की प्रवृत्ति आम लोगों से लेकर सरकारी महकमों तक में आज भी पसरी हुई है। यूं तो एक सभ्य और जागरूक समाज अपने आसपास अच्छी आदतों की संस्कृति को न केवल बढ़ावा देता है बल्कि इसके उलट कुछ होता देख उस पर उंगली भी उठाता है, पर हम सुधरने का नाम नहीं ले रहे। यमुना में कचरा फेंकने पर भारी जुर्माने का निर्देश देकर हरित पंचाट ने नेक काम किया है। सोचने की बात है कि जो गतिविधियां एक सभ्य नागरिक की आदत में शुमार होनी चाहिए उन्हें सुनिश्चित कराने के लिए हरित न्यायाधिकरण जैसे निकाय को सख्त कदम उठाने पड़ते हैं? यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयकृष्ण दास और राष्ट्रीय महासचिव रमेश सिसौदिया की अगुआई में यमुना उद्धार का जो बिगुल बजा है उसकी अनुगूंज सरकार के कानों तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि सभी एक साथ उठ खड़े हों। एक सभ्य समाज के बिना अर्थव्यवस्था के सुहाने आंकड़े विकास का पर्याय नहीं हो सकते लिहाजा सरकार और समाज, दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए वरना ब्रजवासियों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।

Wednesday, 25 February 2015

गेल का खेल


क्रिकेट वर्ल्‍ड कप में डबल सेंचुरी बनाने वाले पहले बल्लेबाज
कैनबरा : वेस्टइंडीज के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज क्रिस गेल ने आज यहां जिम्बाब्वे के खिलाफ 215 रन की तूफानी पारी खेलकर कई नये रिकार्ड बनाये। वह एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय में दोहरा शतक जड़ने वाले चौथे और विश्व कप में यह कारनामा करने वाले पहले बल्लेबाज बने।
इसके साथ ही उन्होंने मलरेन सैमुअल्स के साथ मिलकर वनडे में किसी भी विकेट के लिये सबसे बड़ी साझेदारी का 16 साल पुराना रिकार्ड भी तोड़ा। खराब फार्म के कारण आलोचकों के निशाने पर रहे गेल ने जिम्बाब्वे के गेंदबाजों का कचूमर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी 147 गेंद की पारी में दस चौके और 16 छक्के लगाये। वह वनडे में दोहरा शतक लगाने वाले पहले गैर भारतीय बल्लेबाज हैं। गेल से पहले भारत के सचिन तेंदुलकर (नाबाद 200), वीरेंद्र सहवाग (219) और रोहित शर्मा (209 और 264 रन) ने वनडे में दोहरे शतक लगाये थे। विश्व कप में यह पहला अवसर है जबकि किसी बल्लेबाज ने दोहरा शतक लगाया। इससे पहले इस टूर्नामेंट में एक पारी में सर्वाधिक स्कोर का रिकार्ड दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन के नाम पर था जिन्होंने यूएई के खिलाफ 1996 में रावलपिंडी में नाबाद 188 रन बनाये थे।
गेल ने अपनी पारी में 16 छक्के लगाये और इस तरह के वनडे में एक पारी में सर्वाधिक छक्कों के पिछले रिकार्ड की बराबरी की। रोहित शर्मा ने 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी 209 रन की पारी के दौरान 16 छक्के लगाये थे। दक्षिण अफ्रीका के एबी डिविलियर्स ने जनवरी 2015 में जोहानिसबर्ग में वेस्टइंडीज के खिलाफ 16 छक्के जड़े थे। विश्व कप में इससे पहले एक पारी में सबसे अधिक छक्के जड़ने का रिकार्ड डेविड मिलर के नाम पर था जो उन्होंने कुछ दिन पहले जिम्बाब्वे के खिलाफ ही हैमिल्टन में बनाया था। इसके साथ ही गेल दुनिया के पहले ऐसे बल्लेबाज बन गये हैं जिन्होंने टेस्ट मैचों में तिहरा शतक, वनडे में दोहरा शतक और टी20 में शतक बनाया है।
गेल ने सैमुअल्स (नाबाद 133) के साथ दूसरे विकेट के लिये 372 रन की साझेदारी की जो वनडे में किसी भी विकेट के लिये साझेदारी का नया रिकार्ड है। इससे पहले का रिकार्ड भारत के तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ के नाम पर था जिन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ 1999 में हैदराबाद में दूसरे विकेट के लिये ही 331 रन जोड़े थे। विश्व कप में सबसे बड़ी साझेदारी का रिकार्ड इससे पहले सौरव गांगुली और द्रविड़ के नाम पर था। उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ 1999 में टांटन में दूसरे विकेट के लिये 318 रन की साझेदारी की थी। गेल अपनी पारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 400 छक्के जड़ने वाले दूसरे बल्लेबाज भी बने। अपना 414वां अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रहे गेल ने टेस्ट मैचों में 98, एकदिवसीय मैचों में 229 और टी20 अंतरराष्ट्रीय में 87 छक्के लगाये हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सर्वाधिक 447 छक्के लगाने का रिकार्ड पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी के नाम पर है। उनके बाद गेल (414), न्यूजीलैंड के ब्रैंडन मैकुलम (356), श्रीलंका के सनथ जयसूर्या (352), भारत के महेंद्र सिंह धोनी (280), तेंदुलकर (264), आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट (262) और दक्षिण अफ्रीका के जाक कैलिस (254 छक्के) का नंबर आता है। गेल ने इसके साथ ही एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में 9000 रन भी पूरे किये। वह ब्रायन लारा (10,405 रन) के बाद वनडे में 9000 से अधिक रन बनाने वाले दूसरे कैरेबियाई बल्लेबाज बन गए हैं।

Saturday, 21 February 2015

प्रयोगधर्मिता का नया स्वांग

दिल्ली की अकल्पनीय पराजय के बाद कमल दल सकते में है। मोदी मैजिक के सहारे चक्रवर्ती बनने का सपना टूटते ही अब भाजपा उनके परिधानों की नीलामी का फंडा आजमा रही है। इससे देश की आवाम को क्या हासिल होगा, यह तो राम जानें पर भारतीय राजनीति में प्रयोगधर्मिता और चाटुकारिता का नया स्वांग अबूझ पहेली जरूर बन गया है।  हिन्दुस्तान अब सिर्फ गांवों का ही नहीं बल्कि गगनचुम्बी इमारतों, फ्लाईओवर, शॉपिंग मालों से दमकते महानगरों का भी देश है। अफसोस विकास से दूर, मद में चूर हमारी सल्तनतों को इस बात का इल्म ही नहीं है कि भारत गरीबों का देश है, जहां आज भी कई करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे  जीवन यापन कर रहे हैं। उन्हें दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं है।
भारत लोकतांत्रिक देश है, जहां एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। भारत में राजतंत्र कायम है, जहां प्रधानमंत्री चक्रवर्ती राजा की तरह है, जो दस लाख का सूट पहनता है और सियासत की खातिर उस गांधी का नाम लेता है, जो भारतीय गरीबों के कारण अधनंगा फकीर बना रहा। भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति, उसकी धार्मिक, भाषायी और सामाजिक विविधता गैर मुल्कों के लिए आज भी अबूझ पहेली है। विदेशियों की दिलचस्पी इस बात में हमेशा रही है कि इतनी विविधताओं वाले देश हिन्दुस्तान में एकता कैसे कायम रहती है। अब शायद उनकी जिज्ञासा इस बात में भी हो कि भारत में किस किस्म की आर्थिक असमानता है। भारतीय संविधान में भले ही सबको बराबरी का अधिकार मिला हो, पर अर्थतंत्र के बाजारवाद ने संवैधानिक भावनाओं के साथ क्रूर मजाक किया है। प्रधानमंत्री मोदी के परिधानों की नीलामी के स्वांग से न ही मुल्क की विविधता दूर होगी और न ही इससे नमामि गंगे का उद्धार होने वाला है।
लोकसभा चुनाव के समय मोदी ने अपने आपको एक जनसेवक के रूप में पेश किया था। वह जानते हैं कि मुल्क असमानता की राह चल रहा है। करोड़ों भारतीयों के पास न तो तन ढंकने को कपड़ा है और न ही दो वक्त की रोटी। जनमानस को उम्मीद थी कि मोदी के सल्तनत सम्हालते ही देश से भ्रष्टाचार छूमंतर हो जाएगा, राजनीतिज्ञों की शाहखर्ची पर लगाम लगेगी और सबका विकास होगा, पर 10 माह के उनके शासनकाल में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आया। गरीबी आज भी मुंह चिढ़ा रही है। दिल्ली चुनाव हारने के बाद उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सिपहसालार जनसेवा और देशहित के कामों को वरीयता देंगे, अफसोस वे परिधानों की नीलामी के बेहूदा प्रयोग में मदमस्त हैं। नरेन्द्र मोदी की जहां तक बात है, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने अपना चेहरा बनाया तो लोगों की पहली नजर उनके पहनावे पर ही गई थी।  उनका चूड़ीदार कुर्ता, जैकेट, कभी सिर पर साफा, कभी कंधे पर पड़ी शॉल, इन सबको उनके प्रचारकों ने अपने अंदाज में बिना कुछ कहे पेश किया। टेलीविजन पर जब वे दिखें तो किस कोण से बेहतर लगेंगे, मंच पर जब हों तो उन्हें कैसे जाना चाहिए, अमेरिका यात्रा में उनका पहनावा क्या हो, जापान और आस्ट्रेलिया में क्या हो, हर बात का बारीकी से ध्यान रखा गया। समय के अनुकूल उनके परिधानों के रंग भी बदलते रहे। कभी केसरिया, कभी हरा, कभी भूरा तो कभी गाढ़े नीले रंग में मोदी नजर आये। जो भी हो अब मोदी के रंग में भंग पड़ता दिख रहा है। भारत युवाओं का देश है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि युवा तरुणाई के बिना सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता, इसी वजह से उसने सारा तामझाम देश के युवाओं को आकर्षित करने के लिए किया था। इसमें दो राय नहीं कि युवाओं पर मोदी का जमकर जादू चला पर बुजुर्ग हाशिए पर चले गये।  मोदी भी युवा नहीं हैं, लेकिन बेकाबू युवाओं पर कैसे काबू पाना है, उन्हें पता है। मोदी हों या कोई और, जोश भरी बातों और फैशनेबल कपड़ों से बहुत दिनों तक जनमानस को झांसे में नहीं रखा जा सकता।  इस बात का अहसास कमल दल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके फैशन डिजाइनरों को तब हुआ जब वे मफलरबाज और पतलून के बाहर आधी बाजू की शर्ट पहनने वाले अरविंद केजरीवाल से दिल्ली चुनावों में बुरी तरह मात खा गए।
बराक ओबामा की भारत यात्रा पर अपना नामधारी सूट पहन कर बेशक नरेन्द्र मोदी को थोड़ी-बहुत संतुष्टि मिली होगी, पर उनका महंगा लाखिया सूट और आडम्बर भारतीय जनमानस को  कतई रास नहीं आया। भारतीय राजनीति में अकेले नरेन्द्र मोदी ही नहीं कभी बसपा सुप्रीमो मायावती भी अपने धन-वैभव का खुला प्रदर्शन करने में यकीन रखती रही हैं, लेकिन उनके समर्थकों का मोहभंग उनसे कभी नहीं हुआ, बल्कि वे प्रसन्न होते थे कि एक दलित की बेटी अपना जन्मदिन सवर्णों की तरह शान से मना रही है। कमल दल को अफसोस होगा कि मोदीजी के मामले में ऐसा समीकरण फिट क्यों नहीं बैठा। आम चुनाव के वक्त अपने चायवाला होने का जिक्र मोदीजी ने खूब किया था। तब मोदी के उन लफ्जों और उनकी छवि पर गरीब परवरदिगारों को यकीन था कि मुल्क की सल्तनत पर काबिज होने के बाद यह चायवाला गरीबों का हमदर्द साबित होगा। धीरे-धीरे ही सही देश से गरीबी जरूर दूर होगी, पर ऐसा नहीं हुआ। अब तो जो लोग मोदी की जमीन से जुड़ी छवि के कायल थे, उनका भी धीरे-धीरे मोहभंग होता जा रहा है। यह भारतीय जनता पार्टी के लिए चिन्तन का विषय होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब लगने लगा है कि उनसे कहीं न कहीं चूक जरूर हुई है। अपनी भूल सुधार के लिए ही प्रधानमंत्री सूरत में दस लाख के सूट समेत, उपहार में मिले 237 कपड़ों व अन्य सामानों की नीलामी से प्राप्त राशि को नमामि गंगे योजना में लगाना चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को मिले उपहार, उनकी निजी नहीं वरन राष्ट्र की सम्पत्ति होते हैं और उन्हें सरकारी तोषखाने में जमा किया जाता है। नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी इसी तरह नीलामी करवाते थे। अब भी उन्होंने वही तरीका अपनाया है। मोदी के इस कदम से मुमकिन है अच्छी-खासी रकम जुटे और उसका सदुपयोग भी हो, लेकिन उनका यह कार्य राजसी मिजाज के मुताबिक ही लगता है, जिसमें राजा प्रजा के लिए काम तो करता है, पर उसका अहसान भी जताता है। सच्चाई तो यह है कि नीलामी के इस स्वांग से न तो गरीबों का पेट भरेगा और न ही सबका साथ, सबका विकास होगा। अपनी गरीबी का बखान करने, गरीबों के साथ एकाध बार खाना खा लेने भर से देश की दरिद्रता दूर नहीं होगी। कमल दल को अपने 10 माह के शासनकाल की स्वयं विवेचना करते हुए यह सोचना होगा कि उसने आमजन से जो कहा था, उस पर कितना अमल हुआ है। 

Thursday, 19 February 2015

सरकार के अधीन हों खेल संगठन

स्पर्श स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फाउण्डेशन की पहल
खेल मंत्री से की मुलाकात, 11 बिन्दुओं पर हुई चर्चा
नौकरियों में 10 फीसदी खिलाड़ियों को मिले आरक्षण
आगरा। खेल और खिलाड़ियों को उनका हक दिलाने को प्राणपण से जुटे उत्तर प्रदेश के स्पर्श स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फाउण्डेशन के प्रतिनिधिमण्डल ने 18 फरवरी को केन्द्रीय खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल से उनके आवास में मुलाकात की। खेल मंत्री को न केवल 11 सूत्रीय ज्ञापन सौंपा गया बल्कि सभी खेल संगठनों को सरकार के अधीन लेने और खिलाड़ियों को शासकीय नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग भी की गई। खेल मंत्री सोनोवाल ने सभी बिन्दुओं  को  ध्यान से सुनते हुए खिलाड़ी हित में कार्य करने का आश्वासन दिया।
फाउण्डेशन के अध्यक्ष अजीत वर्मा ने खिलाड़ियों को उनका वाजिब हक दिलाने के साथ ही खेल मंत्री को वालीबाल में चल रहे फर्जीवाड़े से भी अवगत कराया। खेल मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को वालीबाल में चल रहे भाई-भतीजावाद की जांच कराने का आश्वासन दिया। खेल मंत्री को सौंपे ज्ञापन में शारीरिक शिक्षा को प्राथमिक स्तर से ही अनिवार्य करने, भारतीय खेल प्राधिकरण, खेल परिषदों में प्रशिक्षकों को स्थायी नियुक्ति देने और खिलाड़ियों को नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण की मांग की है। फाउण्डेशन ने खेल मंत्री से गुजारिश की कि खिलाड़ियों को उचित परवरिश मिले तथा सभी खेल उपकरण टैक्स-फ्री हों। इतना ही नहीं फाउण्डेशन ने आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी के समकक्ष खेल शिक्षा एवं प्रशिक्षण को भी प्राथमिकता देने का अनुरोध किया है।
प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से ग्रामीण स्तर पर खेलों के प्रचार-प्रचार को प्रश्रय देने और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को टोल-फ्री नम्बर उपलब्ध कराने के साथ ही उन्हें हर तरह की नि:शुल्क सहायता देने की मांग की है। इस अवसर पर खेल मंत्री का ध्यान खेल संगठनों की कारगुजारियों पर भी दिलाया गया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि निरंकुश खेल संगठनों पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी है कि  सरकार सभी खेल संगठनों को अपने नियंत्रण में ले ले। सरकार यह काम खेल अधिनियम के जरिए कर सकती है। फाउण्डेशन ने खेल मंत्री सोनोवाल से खेल पुरस्कारों में पारदर्शिता लाने के लिए पुरस्कार चयन प्रक्रिया को आॅन लाइन किए जाने, पब्लिक ओपीनियन को महत्व देने और खेल संघों में लम्बे समय से काबिज खेलनहारों को सख्ती से हटाने की मांग की है। केन्द्रीय खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने प्रतिनिधिमंडल की मांगों को न केवल ध्यान से सुना बल्कि खिलाड़ियों को हरमुमकिन सहायता देने का आश्वासन भी दिया।
उम्मीद है कि खेलमंत्री जी कुछ करेंगे: अजीत वर्मा
स्पर्श स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फाउण्डेशन के अध्यक्ष अजीत वर्मा ने पुष्प सवेरा को बताया कि केन्द्रीय खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने जिस तरह से हर मुद्दे पर चर्चा की उससे उम्मीद बंधी है कि खिलाड़ियों का भला होगा और खिलाड़ी जरूर खिलखिलाएंगे। प्रतिनिधिमण्डल में अजीत वर्मा, राहुल गर्दी, रवि शंकर आचार्य, देवेन्द्र बहादुर यादव, सुन्दर धोनी, कमलेश भार्गव तथा बुद्धी राणा शामिल थे।
और चौंक गए खेल मंत्री
स्पर्श स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फाउण्डेशन के प्रतिनिधिमण्डल ने जैसे ही वालीबॉल संघ के महासचिव की कारगुजारी सुनाई खेल मंत्री सोनोवाल चौंक गये। महासचिव ने न केवल अपनी बेटी का भारतीय टीम में चयन कराया बल्कि उसी आधार पर उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला भी दिला दिया। प्रतिनिधिमण्डल ने उदीयमान खिलाड़ियों का भविष्य खराब करने वाले वालीबॉल संघ के गड़बड़झाले की जांच किए जाने की मांग की है। खेल मंत्री ने आश्वासन दिया कि सचिव खेल से जांच कराकर उचित कार्रवाई की जाएगी।