Tuesday, 21 May 2019

अब दुनिया के सिर चढ़ेगा क्रिकेट का बुखार


सपाट पिचों पर गेंदबाजों की शामत
मौला नहीं हरफनमौला दिखाएंगे दम
श्रीप्रकाश शुक्ला
ताबड़तोड़ क्रिकेट आईपीएल के रतजगे के बाद क्रिकेट मुरीदों के बीच अंग्रेजों की धरती पर चौथी बार होने जा रहे एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप को लेकर कयासबाजी का दौर-दौरा शुरू हो चुका है। क्रिकेट विश्व कप को लेकर भारत ही नहीं इस मजमें में शिरकत कर रहे सभी मुल्कों के खेलप्रेमियों में खासा उत्साह है। मेजबान इंग्लैण्ड जहां अपनी सपाट पिचों पर पहली बार इतिहास रचने को बेताब है वहीं दक्षिण अफ्रीकी टीम भी हर हाल में अपने ऊपर लगे चोकर्स के अभिशाप से मुक्त होने को उन्मुक्त है। विश्व कप क्रिकेट के इस बारहवें समागम में शिरकत कर रही हर टीम किसी न किसी क्षेत्र में बेजोड़ है, ऐसे में विश्व चैम्पियन का फैसला होने से पहले क्रिकेट मुरीदों को रोमांचक क्रिकेट के दीदार होंगे इसमें संदेह नहीं है।
विश्व कप क्रिकेट की जहां तक बात है, अब तक खेले गए 11 क्रिकेट महासंग्रामों को सिर्फ पांच मुल्क ही फतह कर सके हैं, जिनमें तीन एशियाई देश शामिल हैं। आस्ट्रेलियाई टीम जहां पांच बार विश्व चैम्पियन बनी है वहीं वेस्टइंडीज और भारत ने दो-दो बार खिताबी जश्न मनाया है। पाकिस्तान और श्रीलंका भी एक-एक बार विश्व कप की खिताबी जीत का रसास्वादन कर चुके हैं। क्रिकेट बिरादर के तीन मजबूत स्तम्भ इंग्लैण्ड, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड खिताबी दौर तक पहुंचने के बाद भी अब तक खिताब से वंचित हैं। अंग्रेजों की धरती में 30 मई से होने जा रहे क्रिकेट के इस बारहवें समागम में शिरकत कर रही भारत से लेकर अफगानिस्तान तक की टीमों पर गौर करें तो हर टीम ने हरफनमौला खिलाड़ियों पर दांव खेला है। विशेषज्ञ यह मानकर चल रहे हैं कि इस मर्तबा मौला नहीं हरफनमौला क्रिकेटर अपनी टीमों के लिए तुरुप का इक्का साबित होंगे।
इंग्लैण्ड की जहां तक बात है वह हमेशा से अच्छा मेजबान रहा है। इंग्लैण्ड का मौसम भी दर्शकों और क्रिकेट खिलाड़ियों के मुफीद रहता आया है। इस बार इंग्लैण्ड के छोटे मैदान, सपाट पिचें और तेज आउटफील्ड गेंदबाजों के लिए मुसीबत का सबब बन सकती हैं। हाल ही इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच खेली गई एकदिवसीय सीरीज में लगभग हर मैच में साढ़े तीन सौ का स्कोर बनना इस बात का संकेत है कि इस मर्तबा रन बरसेंगे लिहाजा गेंदबाजों की शामत आएगी। यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि इस बार जिस टीम के गेंदबाज कंजूसी भरी गेंदबाजी करेंगे उसी की जय-जयकार होगी। क्रिकेट की दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं है। देखा जाए तो हर दशक में खेलों की सूरत और सीरत में बड़े बदलाव आए हैं। एक समय वनडे क्रिकेट में डेढ़-पौने दो सौ रनों का स्कोर बनाकर भी टीमें जीतती थीं लेकिन अब इससे बड़े स्कोर तो टी-20 में ही बनने लगे हैं। वनडे क्रिकेट में अब कोई भी आंकड़ा सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। अब अमूमन हर टीम तीन-साढ़े तीन सौ रनों का स्कोर बनाने का माद्दा रखती है। टीमें अब 400 रनों का आंकड़ा भी आसानी से पार कर रही हैं।
एकदिवसीय क्रिकेट के इतिहास में अब तक 20 मैच ऐसे हैं जिसमें स्कोर 400 रनों के पार पहुंचा है। टी-20 क्रिकेट के चलन ने बल्लेबाजों को इस कदर फौलादी बनाया है कि 2015 विश्व कप के बाद से अब तक 128 मैचों में टीमों ने तीन सौ से ज्यादा के स्कोर बनाए हैं। इंग्लैण्ड में होने जा रहे बारहवें विश्व कप में टीमें 500 का आंकड़ा छू लें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देखा जाए तो फटाफट क्रिकेट में अब तक किसी भी टीम ने पांच सौ का आंकड़ा नहीं छुआ है लेकिन छोटे फार्मेट में जिस तरह बल्लेबाज रन कूट रहे हैं उसे देखते हुए यह कारनामा नामुमकिन नहीं लगता। इंग्लैण्ड टीम ने बेशक अभी तक विश्व कप नहीं जीता हो लेकिन वनडे क्रिकेट इतिहास के दो सबसे बड़े स्कोर इसी टीम के नाम हैं। इंग्लिश टीम एकदिनी क्रिकेट में आस्ट्रेलिया के खिलाफ 481 रनों का पहाड़ खड़ा कर चुकी है।
इस बार इंग्लैण्ड की जिन पिचों पर विश्व कप के मैच खेले जाने हैं वहां रन बनेंगे इस बात का जिक्र हर कोई कर रहा है। सचिन तेंदुलकर भी इस बात को कह चुके हैं कि 2019 विश्व कप में बल्लेबाजों को रन बनाने के लिए मुफीद पिचें मिलेंगी। सचिन के इस आकलन के बाद चर्चा यह भी है कि क्या टीम इण्डिया इंग्लैण्ड की पिचों पर पांच सौ रनों का जादुई आंकड़ा छू सकेगी। यह चर्चा इसलिए भी जायज है क्योंकि भारतीय टीम दुनिया की नम्बर दो टीम है। इसके अलावा विश्व क्रिकेट में जिन 20 मैचों में 400 रनों का आंकड़ा पार हुआ है उसमें पांच बार यह कारनामा भारतीय टीम ने ही किया है। इस मामले में दक्षिण अफ्रीकी टीम पहले नम्बर पर है, जिसने छह बार 400 रनों का आंकड़ा छुआ है।
भारतीय टीम के पास शीर्ष बल्लेबाजी क्रम में तीन धुरंधर बल्लेबाज हैं, जिसमें से विराट कोहली इस वक्त दुनिया के नम्बर एक वनडे बल्लेबाज हैं। शिखर धवन की आक्रामकता हर किसी ने देखी है तो रोहित शर्मा बड़ी पारियां खेलने में माहिर हैं। वनडे क्रिकेट में दोहरा शतक लगाने में रोहित का कोई तोड़ नहीं है। वनडे में एक पारी में 264 रनों के स्कोर का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है। अब तक वनडे क्रिकेट में जो आठ दोहरे शतक लगे हैं उसमें से तीन अकेले रोहित शर्मा के नाम हैं। विश्व कप के प्रबल दावेदारों में शामिल विराट सेना लीग चरण के नौ मैच छह मैदानों पर खेलेगी जिनमें से बर्मिंघम का एजबेस्टन भी शामिल है, जहां उसका शानदार रिकॉर्ड रहा है। भारत ने एजबेस्टन में अब तक 10 एकदिवसीय मैच खेले हैं, जिनमें से सात में उसे जीत और केवल तीन में हार मिली है। भारतीय टीम ने 2013 से यहां लगातार पांच मैच जीते हैं जिनमें पाकिस्तान के खिलाफ आईसीसी चैम्पियंस ट्रॉफी की दो बड़ी जीत भी शामिल हैं। इस बार एजबेस्टन में भारत का मुकाबला मेजबान इंग्लैंड (30 जून) और बांग्लादेश (दो जुलाई) से होगा। इंग्लैंड के खिलाफ भारत ने यहां चार मैच खेले हैं जिनमें से तीन में उसे जीत मिली है। बांग्लादेश को भी भारत ने 2017 में इस मैदान पर नौ विकेट से करारी शिकस्त दी थी।
विश्व कप में भारत का अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से मुकाबला 16 जून को ओल्ड ट्रैफर्ड, मैनचेस्टर में होगा। भारत ने 2007 के बाद से इस मैदान पर कोई वनडे मैच नहीं खेला है। इस मैदान पर भारत को आठ मैचों में से तीन में जीत और पांच में हार मिली है। भारत ने विश्व कप 1999 में पाकिस्तान को इस मैदान पर 47 रनों से पराजित किया था। मैनचेस्टर में ही 27 जून को भारत का मुकाबला वेस्टइंडीज से होगा। भारत ने 1983 विश्व कप के लीग चरण में इसी मैदान पर कैरेबियाई टीम को 34 रन से हराकर सनसनी फैला दी थी लेकिन इसके बाद दोनों टीमें कभी इस मैदान पर आमने-सामने नहीं हुईं।
अंग्रेजों की धरती पर होने जा रहे बारहवें विश्व कप को लेकर विशेषज्ञ बेशक भारत और आस्ट्रेलिया को खिताबी जीत का मजबूत दावेदार मान रहे हों, मेरी नजर में इस मर्तबा खिताब के प्रमुख दावेदारों में सबसे पहला नाम इंग्लैण्ड का है। इंग्‍लैंड क्रिकेट टीम इस समय वनडे में नम्बर वन टीम है। ओएन मॉर्गन की कप्‍तानी में इस टीम ने गजब का प्रदर्शन किया है। विश्व कप से पहले इंग्‍लैण्ड टीम ने पाकिस्तान को पराजय का जो पाठ पढ़ाया है, वह बाकी टीमों के लिए किसी सबक से कम नहीं है। विश्व कप 2015 के बाद से इंग्‍लैण्ड ने अपने खेल में आमूलचूल बदलाव किए हैं। यह टीम अब आक्रामक क्रिकेट खेलती है और ताबड़तोड़ बल्‍लेबाजी के दम पर बड़े लक्ष्‍य बनाती है। पिछले चार साल में इंग्लिश टीम ने वनडे में सबसे ज्‍यादा रन का स्‍कोर बनाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। इंग्‍लैंड ने ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ ट्रेंटब्रिज मैदान में 481 रन मारे थे, इससे पहले उसने पाकिस्‍तान के खिलाफ 444 रन बनाए थे।
विश्व कप 2015 के बाद से इंग्‍लैण्ड ने अपने 65.51 प्रतिशत मैच जीते हैं। इस मामले में टीम इण्डिया दूसरे नम्बर पर है जिसने अपने 65.11 प्रतिशत मुकाबलों में विजय दर्ज की है। इंग्‍लैण्ड ने अपने घर में पिछले पांच साल में लक्ष्‍य का पीछा करते हुए एक भी मैच नहीं गंवाया है, इसका कारण उसकी टीम में चार ऐसे खिलाड़ियों का होना है जो बल्लेबाजी और गेंदबाजी में जरूरत पड़ने पर लगातार उपयोगी योगदान दे रहे हैं। इनमें बेन स्टोक्स विशुद्ध हरफनमौला हैं जोकि किसी भी टीम की रणनीति को कुछ पल में ही तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं। मोईन अली बल्लेबाजी आलराउण्डर जबकि डेविड विली और टॉम कुरेन गेंदबाजी आलराउण्डर के रूप में इंग्लैण्ड के लिये अहम साबित हुए हैं। इनके अलावा क्रिस वोक्स भी खुद को अच्छा गेंदबाजी आलराउण्डर साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
भारत की जहां तक बात है चयनकर्ताओं ने अम्बाती रायुडू की जगह विजय शंकर को तरजीह देकर इंग्लैण्ड में हरफनमौला खिलाड़ियों के महत्व को ही स्वीकारा है। भारतीय टीम में वैसे हार्दिक पांड्या एक अदद उच्चस्तरीय आलराउण्डर हैं जिन्हें पूर्व क्रिकेटर भी तुरुप का इक्का मानकर चल रहे हैं। विजय शंकर और केदार जाधव टीम में बल्लेबाजी आलराउण्डर की भूमिका निभाएंगे जबकि रविन्द्र जड़ेजा गेंदबाजी आलराउण्डर के तौर पर टीम के लिये एक्स फैक्टर साबित हो सकते हैं। पाकिस्तान के पास फहीम अशरफ, मोहम्मद हफीज, इमाद वसीम और शादाब खान के रूप में अच्छे क्रिकेटर हैं जो खेल के महत्वपूर्ण विभागों में अच्छी भूमिका निभाने में सक्षम हैं। न्यूजीलैंड के पास जेम्स नीशाम अच्छे आलराउण्डर हैं जबकि कोलिन डि ग्रैंडहोम और मिशेल सेंटनर गेंदबाजी आलराउण्डर की भूमिका में खरे उतरते हैं।
बांग्लादेश के पास शाकिब अल हसन के रूप में बेहतरीन हरफनमौला खिलाड़ी है जो बायें हाथ की अपनी स्पिन की मारक शक्ति से बल्लेबाजों को परेशान करने के अलावा बल्ले से भी बड़ा स्कोर खड़ा करने की क्षमता रखते हैं। उनके अलावा महमुदुल्लाह बल्लेबाजी आलराउण्डर हैं जबकि मोहम्मद सैफुद्दीन, कप्तान मशरेफी मुर्तजा और मेहदी हसन गेंदबाजी आलराउण्डर में उपयोगी साबित हो सकते हैं। श्रीलंका की टीम को हाल के प्रदर्शन के कारण थोड़ा कमजोर आंका जा रहा है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इस टीम में धनंजय डिसिल्वा, जीवन मेंडिस, एंजेलो मैथ्यूज, तिसारा परेरा, मिलिंदा सिरीवर्धने और इसुरू उदाना जैसे लाजवाब हरफनमौला खिलाड़ी भी हैं। इस विश्व कप में अफगानिस्तानी टीम को छुपा रुस्तम माना रहा है और उसका कारण टीम में मोहम्मद नबी, कप्तान गुलबदीन नैब, रहमत शाह और शमीउल्लाह शेनवारी जैसे हरफनमौला खिलाड़ियों की मौजूदगी है।
आस्ट्रेलिया के पास ग्लेन मैक्सवेल और मार्कस स्टोइनिस के रूप में बल्लेबाजी आलराउण्डर हैं। दक्षिण अफ्रीकी टीम में जीन पॉल डुमिनी और क्रिस मौरिस यही भूमिका निभाएंगे। वेस्टइंडीज की बात करें तो यह टीम हरफनमौला खिलाड़ियों का जमावड़ा है। कप्तान जैसन होल्डर, आंद्रे रसेल और कार्लोस ब्रेथवेट अपनी बल्लेबाजी या गेंदबाजी से किसी भी टीम के खिलाफ जीत दिला सकते हैं। आईपीएल में रसेल ने अपनी धमाकेदार बल्लेबाजी से खासा प्रभाव छोड़ा है। क्रिस गेल अभी बल्लेबाजी पर ध्यान दे रहे हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर वह अपनी कामचलाऊ आफ स्पिन से जमे जमाए बल्लेबाज के पैर उखाड़ सकते हैं। इंग्लैण्ड में होने जा रहा बारहवां विश्व कप जो भी जीते पर इसमें रनों का कीर्तिमान बनना तय है।

Monday, 22 April 2019

फुटबॉल अर्श से फर्श पर क्यों?



आओ नम्बर एक खेल की भी सुध लें
श्रीप्रकाश शुक्ला
भारत युवाओं का देश है। दुनिया में सबसे अधिक प्रतिभाएं भारत में ही हैं बावजूद नम्बर एक खेल फुटबॉल में हम अर्श से फर्श पर आ गए हैं। भारत में फुटबॉल ही नहीं कई ऐसे खेल हैं जिनकी स्थिति में सुधार होने की बजाय निरंतर गिरावट आई है। एक समय था जब भारतीय फुटबॉल टीम पूरे विश्व में न सही लेकिन एशिया की सबसे अच्छी टीमों में से शुमार थी। क्रिकेट, रेसलिंग, बॉक्सिंग, हॉकी, कबड्डी, बैडमिंटन जैसे खेलों में दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम सम्मान से लिया जाता है लेकिन फुटबॉल का नाम सामने आते ही निराशा हाथ लगती है। इस ग्लोबल स्पोर्ट्स में हम अभी घाना, सीरिया, युगांडा, क्रोएशिया जैसे देशों से भी काफी पीछे हैं। इसकी मुख्य वजह हम इस खेल में लगातार खराब प्रदर्शन और खेलप्रेमियों की अनिच्छा को मान सकते हैं। देखा जाए तो समय के साथ इस खेल में सुधार तो दिख रहा है लेकिन हम अभी ताली पीटने की स्थिति में नहीं आ पाए हैं। फुटबॉल से जुड़े भारतीय महान खिलाड़ी गाह-बगाहे ही सही भावनात्मक संदेश जरूर देते हैं लेकिन दर्शकों का हुजूम अभी फुटबॉल से नहीं जुड़ पाया है।
फुटबॉल जैसा शानदार खेल, अपने जोश और खेल की महानता के साथ दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर लेता है। दूसरी ओर भारत में जमीनी स्तर पर अप्रयुक्त क्षमता और निवेश की कमी ने देश की उस प्रगति में बाधा डाली है, जिसको 20वीं सदी में प्रारम्भ किया गया था। भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का चरमोत्कर्ष समय 1951 से 1962 तक माना जा सकता है, जब हमारी टीम की चर्चा एशिया ही नहीं दुनिया की अच्छी टीमों में होती रही। 1950 में, जब ब्राजील ने 12 साल के अंतराल के बाद फीफा विश्व कप की मेजबानी की, तो कई यूरोपीय देशों के समर्थन के बाद भारत को भी प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया, लेकिन भारत के फुटबॉल संचालक मंडल ने पैसे की तंगहाली का हवाला देते हुए टीम को ब्राजील न भेजने का फैसला लिया। फुटबॉल संचालक मंडल का तत्कालीन फैसला भारतीय फुटबॉल के लिए नासूर बन गया। उस एक अनिर्णय से जहां इस खेल ने अपनी लोकप्रियता खो दी वहीं जल्द ही टीम एशियाई फुटबॉल के परिदृष्य से भी बाहर हो गई। पिछले 6-7 दशकों में राष्ट्रीय टीम के हार के कई कारक और कारण हैं लेकिन फुटबॉलप्रेमी खुश हो सकते हैं कि अब यह खेल प्रगति की राह चल निकला है। महिला फुटबॉलरों को हम शाबासी दे सकते हैं।
खेलों में भाग्य से नहीं बल्कि पौरुष से चमत्कार होते हैं। 1983 विश्व कप ने भारतीय क्रिकेट को संजीवनी प्रदान की और यह खेल निवेश और व्यावसायीकरण के प्रवाह के साथ आज जनता जनार्दन के बीच एक लोकप्रिय खेल-धर्म बन गया। एक समय था जब हाकी और फुटबॉल जैसे खेलों में दर्शक खूब जुटते थे लेकिन आज इन खेलों को देखने वाले ही नहीं हैं। सच कहें तो भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता ने अन्य खेलों से दर्शक छीन लिए हैं। पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय फुटबॉल टीम के खिलाड़ी देश में बुनियादी ढांचे की कमी के बारे में कहते रहे हैं। देखा जाए तो 2015 तक  देश में एक भी ऐसा स्टेडियम नहीं था जो फीफा द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरा उतरता रहा हो। 2017 में हुए अंडर-17 फीफा विश्व कप से केवल एक साल पहले, फीफा ने दिल्ली, गुवाहाटी, नवी मुंबई, कोच्चि और कोलकाता में टूर्नामेंट के लिए मेजबान स्टेडियमों सहित कई स्टेडियमों को ग्रेडिंग दी थी लेकिन अधिकांश घरेलू स्टेडियम आज भी फीफा के मानकों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। देश में जमीनी स्तर पर फुटबॉल की स्थिति काफी दयनीय है। देश में प्रतिभाशाली फुटबॉलरों के लिए मैदानों की कमी के साथ प्रशिक्षण सुविधाएं न के बराबर हैं। यही असुविधाएं कभी-कभी खिलाड़ियों को वैकल्पिक रूप से अपना प्रोफेशन बदलने के लिए मजबूर कर देती हैं। प्रशिक्षण के लिए उचित बुनियादी सुविधाओं के बिना खिलाड़ियों का कौशल निखर पाना कदाचित सम्भव नहीं है।
भारत में फुटबॉल की दुर्दशा की मुख्य वजहों में मीडिया की उदासीनता भी मानी जा सकती है। क्रिकेट की लोकप्रियता में मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। मीडिया जनता के बीच जागरूकता फैलाने की महत्वपूर्ण कड़ी है।  किसी खेल विशेष की पहुंच जन-जन तक पहुंचाने में मीडिया की ही भूमिका होती है। पिछले कुछ वर्षों में  भारतीय मीडिया ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के कवरेज के लिए अरबों डॉलर के अनुबंध किए हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड आज दुनिया का सबसे धनाढ्य खेल संगठन है। जबकि इसके उलट धनाभाव के चलते फुटबॉल सहित अन्य खेल मीडिया कवरेज के लाभों से वंचित हैं। आज भी देश के कई क्षेत्रों में भारतीय फुटबॉलप्रेमियों को टीम के लाइव मैचों को देखने का मौका नहीं मिल पाता। यही वजह है कि भारत में फुटबॉल के कुछ खिलाड़ियों को छोड़कर बहुत से लोग, देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों के नाम भी नहीं जानते।
देखा जाए तो भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। भारत की अपरिपक्व प्रतिभाओं को यदि उचित प्रशिक्षण और अधिकाधिक सुविधाएं प्रदान की जाएं तो वे भी विश्व विजेता बन सकती हैं। दुख की बात है कि आई-लीग क्लबों के साथ-साथ अन्य क्लबों में युवा विकास कार्यक्रमों की कमी ने लाखों युवाओं की आकांक्षाओं और उनके सपनों को नेस्तनाबूद किया है। पश्चिमी देश यह सुनिश्चित करते हैं कि क्लबों में युवा विकास कार्यक्रम हों क्योंकि यही युवा तरुणाई किसी राष्ट्र का भविष्य होती है। देखा जाए तो पिछले तीन-चार वर्षों में भारत में कई खेलों का विकास परिलक्षित हुआ है। भारतीय फुटबॉल की बात करें तो इंडियन सुपर लीग की शुरुआत के साथ देश फीफा रैंकिंग में 97वें स्थान पर आ गया है। इंडियन सुपर लीग से जहां फुटबॉल को दर्शक मिले हैं वहीं इस खेल के लिए निवेशक भी सामने आए हैं। भारतीय फुटबॉल का क्रमिक सुधार, राष्ट्रीय टीम का प्रदर्शन और आईएसएल क्लबों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस खेल को चार चांद लगाए हैं। फुटबॉल तेजी से उन क्षेत्रों में भी जगह बना रहा है जहां अब तक क्रिकेट को धर्म माना जाता रहा है। फीफा (एफआईएफए) और कई अन्य हितधारकों के सहयोग से अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (एआईएफएफ) यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनींदे भारतीय खेलप्रेमी जागें और देखें कि हमारे फुटबॉलर भी अपने बुरे प्रदर्शन से बाहर आकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। भारतीय पुरुष और महिला खिलाड़ी उत्साह और उमंग के साथ इस खेल को उच्च मुकाम तक पहुंचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
देश में खेल संस्कृति नहीं है, ऐसा कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि दुनिया के 20 देश क्रिकेट खेलते हैं और हम उनमें सिरमौर हैं। ओलम्पिक से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों में कम ही सही, लेकिन भारतीय खिलाड़ी लगातार पदक जीत रहे हैं। समय के साथ भारतीय एथलीटों के प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है लेकिन दुनिया का नम्बर एक खेल फुटबॉल अभी भी भारतीयों के दिल में जगह नहीं बना सका है। भारतीय फुटबॉल टीमों ने जिस तरह जीतने की आदत डाली है, ऐसे में अब फुटबॉल को फैशन से नहीं पैशन के साथ खेलना जरूरी हो गया है। भारत में फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक लीग तथा विश्वस्तरीय आयोजनों की मेजबानी जरूरी है।
फीफा की भविष्य की योजनाओं पर गौर करें तो 2026 विश्व कप में 32 की बजाय 48 टीमें खेल सकती हैं। यदि ऐसा सम्भव हुआ तो 2026 में एशिया महाद्वीप की आठ टीमों को विश्व कप खेलने का मौका मिलेगा। भारतीय फुटबॉल संगठन को इस मौके का फायदा उठाना चाहिए।  भारतीय खिलाड़ियों के मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए हम 2026 में विश्व कप खेलने का अपना सपना साकार कर सकते हैं। देखा जाए तो भारतीय अंडर-17 टीम एशिया में काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। अगर हमें विश्व कप खेलना है तो इसके लिए हमें ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने होंगे और एक नहीं कम से कम तीन राष्ट्रीय टीमें तैयार करनी होंगी। तीन टीमों से हमारे पास विकल्प बढ़ जाएंगे और खिलाड़ियों का चयन नाम से नहीं बल्कि उनके प्रदर्शन के आधार पर किया जा सकेगा। भारत में फुटबॉल के प्रति रुझान बढ़ना अच्छी बात है। भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कोच और दिग्गज खिलाड़ी सैयद नईमुद्दीन कहते हैं कि भारतीय फुटबॉल को एक भारतीय कोच ही उबार सकता है। फुटबॉल में अर्जुन और द्रोणाचार्य अवॉर्ड जीतने वाले नईम कहते हैं कि भारतीय प्रबंधन चाहता है कि खिलाड़ी डेविड बेकहेम जैसा बने, लेकिन वक्त और पैसा खर्च करने के लिए कोई तैयार नहीं है। अगर बच्चों को पैसा और सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो मुफ्त में कौन जान देने को तैयार होगा। नईम की बात में दम है। आओ दुनिया के नम्बर एक खेल के लिए हम सब ताली पीटें और क्रिकेटरों की ही तरह भारतीय फुटबॉलरों के लिए दुआ मांगें।




Tuesday, 2 April 2019

राजनीतिक पिच पर खिलाड़ियों का हो-हल्ला


खेलहित के लिए खिलाड़ियों का राजनीति में आना जरूरी
                              श्रीप्रकाश शुक्ला
इस समय देश क्रिकेट और राजनीति के आगोश में है। हर गली-चौराहे पर या तो आईपीएल में खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर चर्चा हो रही है या फिर देश के भावी राजनीतिक परिदृश्य की सम्भावनाओं पर लोग अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। एक समय था जब खिलाड़ियों का राजनीति से कोई वास्ता नहीं होता था। आज ऐसी बात नहीं है। हर राजनीतिक दल खिलाड़ियों की लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास करने लगा है। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर से बड़ा कोई और उदाहरण नहीं हो सकता। आज खिलाड़ियों की लोकप्रियता जहां जनता जनार्दन को मतदान के लिए प्रेरित करने के काम आ रही है वहीं कई खिलाड़ी राजनीतिक पिच पर भी जबर्दस्त हो-हल्ला मचा रहे हैं। राज्यवर्धन सिंह राठौड़, कीर्ति आजाद, पद्मश्री कृष्णा पूनिया, लक्ष्मीरतन शुक्ला, चेतन चौहान, मोहम्मद अजहरुद्दीन, ज्योतिर्मय सिकदर, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे खिलाड़ी गाहे-बगाहे ही सही प्रतिद्वन्द्वी दलों की पेशानियों पर बल ला चुके हैं।
क्रिकेट की लोकप्रियता को चुनावों में भुनाने के लिए राजनीतिक दल हमेशा तत्पर रहते हैं और काफी हद तक सफल भी रहे हैं। क्रिकेट खिलाड़ियों को भी राजनीतिक पिच काफी मुफीद नजर आई है। भारत में क्रिकेट इबादत और क्रिकेटर को भगवान का दर्जा प्राप्त है, यही वजह है कि लोग अपना जरूरी काम छोड़कर भी क्रिकेट देखते हैं और खिलाड़ियों की बलैयां लेते हैं। देखा जाए भारतीय राजनीतिक पिच पर कई खिलाड़ियों ने हाथ आजमाए लेकिन बहुत कम को ही सफलता हाथ लगी है। देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ने कई क्रिकेटरों को राजनीति में एक अलग पहचान दिलाई है। इस कड़ी में सबसे पहला नाम भारतीय क्रिकेट जगत की चर्चित हस्ती मंसूर अली खान पटौदी का आता है। क्रिकेट से संन्यास के बाद पटौदी ने राजनीति में प्रवेश किया लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। नवाब पटौदी ने 1999 में कांग्रेस के टिकट से भोपाल से चुनाव लड़ा था लेकिन उनकी हार हुई इससे पहले भी वह गुड़गांव में विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर चुनाव हारे थे।
मध्य प्रदेश की जहां तक बात है, यहां की राजनीतिक पिच पर पूर्व हॉकी कप्तान असलम शेर खान भी हाथ आजमा चुके हैं। असलम शेर खान 1984 और 1991 में कांग्रेस से सांसद रहे उसके बाद मध्य प्रदेश से कभी कोई बड़ा नामवर खिलाड़ी तो नहीं उतरा लेकिन यशोधरा राजे सिंधिया, मुकेश नायक, राजेन्द्र सिंह जैसे औसत दर्जे के खिलाड़ी राजनीतिज्ञों ने संसद और विधान सभा में खेल-खिलाड़ियों के हित की बात दबंगता से रखी है। यशोधरा राजे सिंधिया मध्य प्रदेश की सबसे अधिक समय तक खेल मंत्री रहीं और इन्होंने अपने कामकाज से एक नजीर पेश की है। मुकेश नायक भी मध्य प्रदेश के खेल मंत्री रह चुके हैं। 
प्रायः लोग कहते हैं कि खेलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन आज खिलाड़ियों को राजनीतिक पिच सबसे ज्यादा रास आ रही है, यही वजह है कि आज हर पल राजनीतिक दल नामवर खिलाड़ियों को लपकने को तैयार रहता है। राजनीति में खिलाड़ियों की लोकप्रियता को भुनाने की होड़ खेलप्रेमियों की दिलचस्पी का भी आज एक बहुत बड़ा कारण बन चुकी है। केन्द्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़, उत्तर प्रदेश के खेल मंत्री चेतन चौहान जहां आज भारतीय जनता पार्टी की अलम्बरदारी कर रहे हैं वहीं नवजोत सिंह सिद्धू, कृष्णा पूनिया जैसे खिलाड़ी कांग्रेस पार्टी के खेवनहार हैं। खिलाड़ियों के राजनीति में आने को लेकर ओलम्पिक रजत पदक विजेता, केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ तथा राजस्थान से कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया मानते हैं कि खिलाड़ियों के राजनीति में आने से खेलों व खिलाड़ियों का भला होगा क्योंकि संसद और विधान सभा में खिलाड़ियों की असल पीड़ा एक खिलाड़ी ही बयां कर सकता है। यह सच है कि एक खिलाड़ी में देश के लिए कुछ करने की ललक होती है। वह न केवल अनुशासित होता है बल्कि उसमें लाग-लपेट जैसी बातें नहीं होतीं। एक खिलाड़ी मैदान में जहां अपने प्रदर्शन से मादरेवतन का मान बढ़ाता है वहीं राजनीतिक वीथिका में भी उसके मानस में खेलभावना का भाव हमेशा जिन्दा रहता है।
सोलहवीं लोकसभा में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के अलावा पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद, पूर्व फुटबॉल कप्तान प्रसून बनर्जी (तृणमूल कांग्रेस) और राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज के. नारायण सिंह देव (बीजद) सदस्य थे। डबल ट्रैप निशानेबाज राज्यवर्धन सिंह राठौड़ 2017 में देश के पहले ऐसे खेलमंत्री बने, जो ओलम्पिक पदक विजेता होने के साथ ही आला दर्जे के शूटर रहे हें। राठौड़ सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी हैं। राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का बतौर खेल मंत्री कार्यकाल सराहनीय है। उन्होंने खिलाड़ी हित के कई अच्छे निर्णय लिए हैं। पंद्रहवीं लोकसभा में कीर्ति आजाद और के. नारायण सिंह देव के अलावा पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन (कांग्रेस) और नवजोत सिंह सिद्धू (भाजपा) भी सदसय थे। मोहम्मद अजहरुद्दीन 2014 में भी मुरादाबाद से चुनाव लड़े लेकिन हार गए थे। दूसरी ओर सिद्धू 2014 में लोकसभा का टिकट नहीं मिलने के बाद राज्यसभा के सदस्य थे लेकिन अब वह भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए हैं। सिद्धू की छवि एक कद्दावर नेता के रूप में जानी-पहचानी जाती है। बेबाक नवजोत सिंह सिद्धू के कारण ही पंजाब विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मुंह की खानी पड़ी थी।
एक अन्य क्रिकेटर भारत के सलामी बल्लेबाज रहे चेतन चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 1991 और 1998 में अमरोहा से लोकसभा चुनाव जीता जबकि 1996, 1999,  2004 व 2009 में उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। चेतन चौहान लगातार मिली पराजयों के बाद भी चुनावी पिच पर डटे रहे और आज वह उत्तर प्रदेश के खेल मंत्री हैं। पश्चिम बंगाल के क्रिकेटर लक्ष्मीरतन शुक्ला भी कुछ समय के लिए खेल मंत्री पद पर रह चुके हैं। पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद कैफ 2009 में कांग्रेस की टिकट पर उत्तर प्रदेश के फूलपुर से चुनाव लड़े लेकिन हार गए। क्रिकेटर एस. श्रीसंथ भी राजनीतिक पिच पर भाग्य आजमा चुके हैं वह भाजपा की टिकट से तिरुवनंतपुरम से विधान सभा चुनाव लड़े लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। पूर्व टेस्ट क्रिकेट और मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बाल सखा विनोद काम्बली भी राजनीति के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा चुके हैं। साल 2009 में काम्बली ने मुंबई की विक्रोली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन वह चुनाव हार गए थे। पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर को भी राजनीतिक पिच रास नहीं आई।
क्रिकेटरों के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ियों ने भी राजनीति में दस्तक दी। 2004 में एथलीट ज्योतिर्मय सिकदर पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर सीट से चुनाव जीतीं थीं। ज्योतिर्मय सिकदर और ममता बनर्जी के बीच याराना लम्बा नहीं चला लिहाजा उन्हें राजनीति से दूर होना पड़ा। पूर्व हॉकी कप्तान असलम शेर खान ने भी राजनीतिक पिच पर हाथ आजमाए और 1984 तथा 1991 में लोकसभा सदस्य बने लेकिन उसके बाद उन्हें चार चुनावों में पराजय का हलाहल पीना पड़ा। पूर्व हॉकी कप्तान दिलीप टिर्की ओड़िशा से राज्यसभा सदस्य रहे तो छह बार की विश्व चैम्पियन एम.सी. मैरीकाम और भारत रत्न सचिन तेंदुलकर आज भी राज्यसभा सदस्य हैं। मशहूर फुटबालर बाईचुंग भूटिया 2014 में तृणमूल कांगेस के उम्मीदवार थे, लेकिन वह चुनाव हार गए। पूर्व राष्ट्रीय तैराकी चैम्पियन और अभिनेत्री नफीसा अली 2004 में कांग्रेस तथा 2009 में सपा की उम्मीदवार रहीं, लेकिन दोनों ही बार उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। क्रिकेटर रवींद्र जड़ेजा की पत्नी रीवा सोलंकी, क्रिकेटर गौतम गम्भीर भाजपा की सदस्यता ले चुके हैं। रीवा सोलंकी विवादास्पद कर्णी सेना की महिला शाखा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। इस बार खिलाड़ियों पर लोगों को मतदान के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी, रोहित शर्मा, वीरेंद्र सहवाग, बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट जैसे खिलाड़ियों से जनता जनार्दन को मतदान के लिए प्रेरित करने की अपील की है। 23 मई अभी दूर है ऐसे में कुछ और खिलाड़ियों की महत्वाकांक्षा राजनीतिक पिच पर परवान चढ़ सकती है।  


भाजपा के गढ़ मथुरा में महागठबंधन की फांस


श्रीप्रकाश शुक्ला
भगवान श्रीकृष्ण की धरती मथुरा इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिए परेशानी का सबब बनती दिख रही है। हेमा मालिनी दूसरी बार दिल्ली की सल्तनत तक पहुंचने के लिए जहां खेतों में कूद पड़ी हैं वहीं महागठबंधन प्रत्याशी नरेन्द्र सिंह जनता जनार्दन से जीवंत सम्पर्क बनाते दिख रहे हैं। 17वीं लोकसभा का चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा इस बात का पता तो 23 मई को चलेगा लेकिन मथुरा सीट ड्रीम गर्ल के लिए हाट सीट बन चुकी है।
मौजूदा हालातों को देखें तो आज के समय में राजनीति सेवा की जगह समझौतों के आंचल में खेलती नजर आती है। भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में इस बार कांग्रेस से कहीं अधिक रालोद-सपा-बसपा की जोरा-जोरी परेशान कर रही है। मथुरा सीट पर स्थानीयता की हवा बह चली है इससे गठबंधन की गांठ दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है। मथुरा सीट पर हेमा के साथ जो लाव-लश्कर होना चाहिए, उसका भी अभाव साफ-साफ देखा जा रहा है। इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी महेश पाठक को भी कमतर नहीं माना जा सकता। पाठक की ताकत भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर सकती है।
देखा जाए तो राजनीति में सक्रिय पार्टियों को समझौतों की आवश्यकता तभी होती है, जब वे यह मान लेती हैं कि जिस विरोधी को उन्हें हराना है, वह उनसे अधिक सशक्त है और सहयोगियों को साथ लेकर ही उसका मुकाबला करना सम्भव है। इसी के साथ एक तथ्य यह भी है कि राजनीति में समर्थक, सहयोगी और विरोधी बदलते रहते हैं। मिसाल के तौर पर अटलबिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बैनर पर जिन दलों के सहयोग से सत्ता हासिल की थी, उनमें से कई आज भाजपा के कट्टरविरोधी बनकर उभरे हैं। इनमें खासतौर से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगूदेशम पार्टी का नाम लिया जा सकता है।
राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो भगवान श्रीकृष्ण की पावन धरती मथुरा हमेशा से ही राजनीतिक दलों के लिए खास रही है। आजादी के बाद शुरुआती चुनावों में यहां कांग्रेस का दबदबा रहा करता था, लेकिन राम मंदिर की हवा के रुख ने इसे भारतीय जनता पार्टी के लिए खास बना दिया है। पिछली बार इस सीट से हेमा मालिनी तीन लाख से अधिक मतों से जीती थीं। हेमा ने तब जयंत चौधरी को करारी शिकस्त देकर कमल खिलाया था लेकिन इस बार रालोद के नरेन्द्र सिंह को सपा और बसपा का साथ मिलने से मुकाबला कांटे का हो गया है। देखा जाए तो मथुरा सीट पर कुछ दिग्गज भाजपाई कांटे से कांटा निकालने का जतन भी कर रहे हैं।
मथुरा लोकसभा सीट आजादी के बाद पहले चुनाव से ही कश्मकश भरी रही है। पहले और दूसरे लोकसभा चुनाव में यहां से निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी लेकिन उसके बाद 1962 से लगातार तीन बार कांग्रेस पार्टी ने यहां से विजयी परचम फहराया। 1977 की सत्ता विरोधी लहर में भारतीय लोकदल ने कांग्रेस को पराजय का हलाहल पिलाकर एक नई पटकथा लिखने की कोशिश की। 1980 में जनता दल ने जहां विजयी जश्न मनाया वहीं 1984 में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां जोरदार आमद दर्ज की। इस जीत के बाद कांग्रेस के लिए यहां से लम्बा वनवास शुरू हुआ। 1989 में जनता दल के प्रत्याशी ने जहां जीत दर्ज की वहीं इसके बाद 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार फतह हासिल कर इसे केसरिया का गढ़ बना दिया। भाजपा के चौधरी तेजवीर सिंह लगातार तीन बार यहां से चुनाव जीते। 2004 में मानवेन्द्र सिंह ने जहां कांग्रेस की वापसी कराई वहीं 2009 के चुनाव में कमल दल से यारी कर रालोद के जयंत चौधरी ने पाला फतह किया। 2014 में चली मोदी लहर में हेमा मालिनी ने जयंत चौधरी के पैर इस कदर उखाड़े कि उनकी हिम्मत ही दगा दे गई।
मथुरा सीट का जहां तक सवाल है पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इस सीट पर जाट और मुस्लिम वोटरों का वर्चस्व रहा है। 2014 में जाट और मुस्लिम वोटरों के अलग होने का नुकसान ही रालोद को भुगतना पड़ा था। बीते चुनाव में जाटों ने एकमुश्त भाजपा के पक्ष में मतदान कर रालोद को ठेंगा दिखाया था। मथुरा लोकसभा में कुल पांच विधान सभा सीटें आती हैं, इनमें छाता, मांट, गोवर्धन, मथुरा और बलदेव विधानसभा सीटें शामिल हैं। 2017 के विधानसभा चुनावों में यहां मांट सीट पर बहुजन समाज पार्टी को जीत मिली थी, जबकि बाकी सीटों पर केसरिया परचम फहरा था। मथुरा लोकसभा सीट पर जो एक बात हेमा मालिनी के पक्ष में है, वह है इनकी साफ-सुथरी छवि। नरेन्द्र सिंह बेशक स्थानीय हों लेकिन मतदाता हेमा की छवि को उनसे बेहतर मान रहा है। अगर संसद में मथुरा की आवाज उठाने की बात करें तो हेमा मालिनी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हेमा मालिनी ने अपने संसदीय कोटे से क्षेत्र के विकास के लिए कुल  90 फीसदी राशि खर्च की है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार को धार देते हुए मैं भी चौकीदार हूं अभियान शुरू किया है लेकिन मथुरा में भाजपाइयों की सुस्ती केसरिया रंग फीका करती दिख रही है।
मथुरा में जातीय समीकरणों की बात की जाये तो भी इस बार की हवा भाजपा के पक्ष में बहती नहीं दिख रही। हम जानते हैं कि समाज के विकास क्रम में जातियों का जन्म पेशों के बाद हुआ है और आज के हालात में पहले विद्यमान वर्ण व्यवस्था को जातीय आधार मानकर देखा, समझा और जांचा नहीं जा सकता। यही हाल वंश परम्पराओं और उनसे जन्मे परिवारों का भी है, जिनमें निरन्तर टूटन की प्रक्रिया जारी है और उसे समाप्त करना सम्भव नहीं हो पा रहा। नरेन्द्र सिंह की राह का रोड़ा इनके भाई कुंवर मानवेन्द्र सिंह बन चुके हैं। आज के हालातों पर गौर करें तो मथुरा में बिजली, पानी, खाद, गैस, गरीबी, महंगाई, डीजल-पेट्रोल, बेरोजगारी, उद्योग, कृषि, शिक्षा सब हाशिये पर हैं। मथुरा में पिछले पांच साल में जिन समस्याओं का ढिंढोरा पीटा गया, आज उन पर भयानक चुप्पी है। यमुना शुद्धिकरण का मुद्दा भी भाजपा के गले की फांस बन सकता है।


Monday, 18 March 2019

हौसला हो तो भारुलता जैसा


भारुलता ने उत्तरी ध्रुव में फहराया तिरंगा

यह दुनिया बहुरंगी है। सबके अपने अलग-अलग शौक और महत्वाकांक्षाएं होती हैं। हर किसी व्यक्ति का सपना होता है कि वह अपने शौक को पूरा करे। मगर यदि उस शौक के जरिये प्रेरणा व बदलाव की मुहिम चलाई जाये तो शौक सार्थक सिद्ध हो जाता है। दुनिया की महिलाओं को यह बताने के लिये कि ब्रेस्ट कैंसर होने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती बल्कि दुनिया फतह की जा सकती है, भारतीय मूल की ब्रिटिश नागरिक भारुलता ने कार से उत्तरी ध्रुव तक की दूरी नापकर यह जता दिया कि इंसान में यदि कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो कोई काम असम्भव नहीं है। उत्तरी ध्रुव के सफर में भारुलता के साथ उनके दो किशोर बच्चे भी थे। देशभक्ति का जज्बा देखिये कि ब्रिटिश नागरिक होने के बावजूद भारुलता ने उत्तरी ध्रुव पहुंचकर भारतीय तिरंगा फहराया। ऐसा नायाब सफर तय करने वाली भारुलता पहली भारतीय महिला हैं। इस उपलब्धि के लिये ब्रिटिश संसद में भारुलता और उनके दोनों बेटों का सम्मान होना हर भारतीय के लिए गौरव की बात है।

बचपन में पिता के निधन के बाद भारुलता के सामने भविष्य का संकट पैदा हो गया। चाचा ने साथ रखने से न केवल मना किया बल्कि बोले-  लड़कियां तो रास्ते का पत्थर होती हैं, जिन्हें कोई भी ठोकर मार जाता है। चाचा की इस बात ने भारुलता के मर्म पर इतनी गहरी चोट की कि उसने संकल्प लिया कि वह दुनिया को बताएंगी कि बेटियां क्या कुछ नहीं कर सकतीं। भारुलता ननिहाल में पढ़ी-बढ़ीं और उन्होंने दुनिया को चौंकाने का संकल्प लिया। भारुलता ने उत्तरी ध्रुव यानी नार्डकैप की बीस दिन की यात्रा तमाम जोखिम उठाते हुए पूरी की। ब्रिटेन के ल्यूटन से शुरू हुआ दस हजार किलोमीटर का सफर बच्चों के साथ पूरा करना निश्चिय ही दुस्साहस भरा कदम कहा जायेगा।

भारुलता ने अपनी यात्रा इंग्लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, पोलैण्ड, स्वीडन आदि 14 देशों से गुजरते हुए पूरी की। पूरे सफर में उनके दस व तेरह साल के बेटे आरुष व प्रियम भी साथ थे। एक बार वे स्वीडन में आये तूफान में फंसकर मुश्किल हालातों में जा पहुंचे। उन्हें रेस्क्यू टीम ने चार घंटे की मदद के बाद बचाया। फिर एक घर में चार दिन के लिये पनाह ली। संयोग देखिये कि यह घर केरल मूल के भारतीय का था, जिसने निर्जन इलाके में भारतीय आतिथ्य का एहसास करा दिया। भारुलता जब दुनिया के अंतिम छोर कहे जाने वाले उत्तरी ध्रुव पहुंचीं तो वहां का तापमान माइनस पंद्रह था। इसके बावजूद उन्होंने वहां तिरंगा फहराकर उद्दात राष्ट्रीय भावना का परिचय दिया।

इस अभियान का रोचक पक्ष यह है कि भारुलता की इस यात्रा का मार्गदर्शन घर बैठे उनके पति करते रहे। पेशे से महाराष्ट्र मूल के डॉक्टर सुबोध कांबले घर से ही अभियान को नेविगेट करते रहे। ऐसी स्थिति में जब बेहद विषम परिस्थितियों में यात्रा कर रही भारुलता के पास वैकल्पिक कार और बैकअप क्रू नहीं था तो पति का मार्गदर्शन ही काम आया। उनके पास भारुलता की कार का ट्रैकिंग पासवर्ड था। जिसके जरिये वे रास्ते बताते रहे कि कहां वे अपनी यात्रा में सुरक्षित विश्राम कर सकती हैं और कहां कार में ईंधन डलवा सकती हैं।

दरअसल, विवाह से पहले भारुलता को कार ड्राइविंग का बेहद शौक था, जिसे उन्होंने अपने वकालत के पेशे और पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए परवान चढ़ाया। मगर उनकी कोशिश थी कि उनका शौक दूसरे लोगों के जीवन में बदलाव का वाहक बने। जब उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ तो वह गहरे अवसाद में थीं। उन्होंने अपने ऊंचे मनोबल से किसी हद तक इस जानलेवा रोग को टाला भी। इसी बीच दोनों बेटों ने सलाह दी कि क्यों न वह अपने कार ड्राइविंग शौक को पूरा करते हुए कुछ ऐसा करें कि दुनिया के लिये प्रेरणा की मिसाल बन जाएं। बच्चों ने अपनी उम्र के हिसाब से समाधान रखा कि फिर हम सेंटाक्लॉज से कहेंगे कि वह आपका कैंसर ठीक कर दे। भारुलता को यह सुझाव रोचक लगा और फिर वह बच्चों को लेकर निकल पड़ीं दुनिया फतह करने।

इससे पहले भारुलता अपनी ड्राइविंग के जरिये कई रचनात्मक अभियान चला चुकी थीं। मसलन बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, कैंसर मुक्त महिलाएं, प्लास्टिक मुक्त दुनिया के लिये लोगों को प्रेरित करती रही हैं। जिसके लिये उन्हें भारत के राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया। इसकी वजह यह है कि गुजरात मूल की भारुलता परदेस में रहते हुए भी भारतीय सरोकारों से गहरे तक जुड़ी हैं। भारुलता का विश्वास रहा है कि उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया गया कोई भी कार्य समाज के लोगों को प्रेरणा देता है। यही वजह है कि मैंने अपने शौक को मकसद देकर सोच बदलने की मुहिम शुरू की है। इसी कड़ी में मैंने अब पचास देशों की यात्रा कार से पूरा करने का मन बनाया है।

ब्रिटिश सरकार की पूर्व नौकरशाह रहीं भारुलता जीवन के रंगमंच में तमाम तरह की भूमिका निभा रही हैं। वह वकील हैं, मां हैं, पत्नी हैं, संगीत-कला में दखल है, डॉक्यूमेंट्री बनाती हैं और हर कसौटी पर खरी उतरती हैं। कार चलाने का जुनून इस हद तक है कि रास्ते में मैकेनिक न मिले तो क्या होगा, यह सोचकर कार की गूढ़ तकनीकी जानकारियां भी हासिल कीं। इतना ही नहीं, भारत में अपने पैतृक गांव से जुड़े सैकड़ों गांवों में वह बदलाव की रचनात्मक मुहिम चलाती रही हैं। भारुलता का ऊंचा मनोबल इस बात का संदेश देता है कि ईश्वर भी बहादुरों का ही साथ देते हैं।

उच्च शिक्षा का नायाब प्रकल्पः संस्कृति यूनिवर्सिटी



शिक्षा मानव के व्यक्तित्व निर्माण के साथ ही किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला है. शिक्षा सामाजिक चिन्तन की बुनियाद, सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक प्रतिष्ठा का भी परिचायक है. सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जहां तीव्रता से परिस्थितियां बदल रही हैं वहीं चुनौतियां भी कम नहीं हैं. भूमण्डलीकरण के वर्तमान परिदृश्य में हमारे सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों और मान्यताओं में अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहा है. परम्परागत मूल्यों एवं मान्यताओं में परिवर्तन का प्रभाव शिक्षा, विशेष रूप से उच्च शिक्षा पर पड़ा है. संस्कृति यूनिवर्सिटी शैशवकाल में होने के बावजूद यंगस्टर्स को शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ उच्च आदर्शों की पूर्ति के लिये प्रतिबद्ध शैक्षणिक संस्थान है. संस्कृति यूनिवर्सिटी का नाम सुनते ही यंगस्टर्स के मन में गर्व और गौरव का अहसास होने लगता है. उसके मन में यहां के एनवायरमेंट, पठन-पाठन की व्यवस्थाओं को देखने की इच्छा प्रबल हो जाती है. मथुरा की छाता तहसील के सन्निकट स्थित संस्कृति यूनिविर्सिटी में प्रवेश करते ही हवा में लहराते फव्वारे, यहां का मनमोहक वातावरण और यहां का बेहतरीन एज्यूकेशन सिस्टम स्टूडेंट्स में नई ऊर्जा का संचार करता है. हायर एज्यूकेशन के क्षेत्र में संस्कृति यूनिविर्सिटी देश में प्रमुख स्थान रखती है. इनोवेशन और क्रिएटिविटी में अग्रणी यूनिवर्सिटी का विजन ड्रीमर्स, अचीवर्स और विनर्स का निर्माण करना है. हाईटेक फैसिलिटीज के साथ ही यूनिवर्सिटी एडवांस्ड लैब, न्यू टेक्नोलाजी, लर्निंग टूल्स से लैस है. यूनिवर्सिटी के संस्थापक, संचालक राजेश गुप्ता और सचिन गुप्ता ने दैनिक जागरण-आईनेक्स्ट से खास बातचीत में बताया कि हम राष्ट्र को टेकर्स नहीं गिवर्स यंगस्टर्स देने को प्रतिबद्ध हैं. 

दिल्ली से उच्च तालीम हासिल कुलाधिपति सचिन गुप्ता और उप-कुलाधिपति राजेश गुप्ता का कहना है कि यह 21वीं सदी है, जहां हर समय कुछ न कुछ नया सीखना ही सफलता का मानदण्ड है. भारत युवाओं का देश होने के फलस्वरूप बेरोजगारी यहां की सबसे बड़ी समस्या है. यंगस्टर्स की इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए संस्कृति यूनिवर्सिटी ने अपनी परिकल्पना और उद्देश्य न केवल तय किए हैं बल्कि वैश्विक व्यवसाय के मानकों को अपने पाठ्यक्रम में संजीदगी से समाहित किया है. यहां अध्ययनरत छात्र-छात्राएं टेक्निकल एज्यूकेशन के मूल तत्वों का अध्ययन-मनन कर न केवल इंडस्ट्रियल रिक्वायरमेंट को पूरा करते हैं बल्कि नौकरी के पीछे भागने की बजाय स्वरोजगार को प्राथमिकता देते हैं. राष्ट्र के शैक्षिक विकास में युवा कुलाधिपति सचिन गुप्ता और उप-कुलाधिपति राजेश गुप्ता ने जो दूरदर्शिता दिखाई है, उसी का नतीजा है कि यहां यंगस्टर्स नित नए प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं.

क्वालिटीपरक एज्यूकेशन, मिशन और विजन

शांत वातावरण, सर्वसुविधायुक्त सेमिनार हाल, सुयोग्य प्राध्यापक, आधुनिक लैब, डिजिटल लाइब्रेरी, सेण्टर आफ एक्सीलेंस, स्कूल आफ लाइफ स्किल, मनमोहक क्रीड़ांगन और प्लेसमेंट विभाग संस्कृति यूनिवर्सिटी की ऐसी खूबियां हैं जोकि हर युवा मन को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बदलते परिवेश में जहां हर यंगस्टर्स को रोजगारमूलक शिक्षा प्रदान करना चुनौती माना जा रहा है वहीं संस्कृति यूनिवर्सिटी कौशलपरक शिक्षा के माध्यम से आज की युवा पीढ़ी को स्वावलम्बी बना रही है। टेक्निकल एज्यूकेशन संस्कृति यूनिवर्सिटी का सबसे मजबूत पक्ष है। यहां खुले सेण्टर आफ एक्सीलेंस की लैबों में संचालित लेटेस्ट टेक्निकल मशीनें यंगस्टर्स के टैलेण्ट को विश्व प्रतिस्पर्धी बना रही हैं।

इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स की शिक्षा

इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स, मैन्यूफैक्चरिंग एण्ड आटोमेशन (एम.टैक) और फोरेंसिक साइंस एज्यूकेशन की सुविधा ब्रज मण्डल में सिर्फ संस्कृति यूनिवर्सिटी में ही उपलब्ध है। रोबोटिक्स इंजीनियरिंग एज्यूकेशन में दक्षता हासिल कर यंगस्टर्स नासा, प्राइवेट इंडस्ट्रीज, ऑटोमोबाइल्स सेक्टर, इंडस्ट्रियल टूल्स, रोबोटिक टेक्नोलॉजी, कम्प्यूटर कंट्रोल्ड मशीन प्रोग्रामिंग, रोबोटिक सेल्स में अच्छे पैकेज पर जॉब हासिल कर रहे हैं। आज की इंडस्ट्रियल डिमांड को देखते हुए संस्कृति यूनिवर्सिटी में यंगस्टर्स को आटोकैड,  एंसिस और मैन्यूफैक्चरिंग में सीएनसी की ट्रेनिंग भी प्रदान की जाती है।

शिक्षा ही नहीं संस्कार भी

संस्कृति यूनिवर्सिटी में टेक्निकल एज्यूकेशन ही नहीं हर ऐसा पाठ्यक्रम संचालित है जोकि युवा पीढ़ी को शिक्षा पूरी करने से पहले ही इस योग्य बना देता है कि वह कहीं भी किसी से भी प्रतिस्पर्धा कर सके। संस्कृति यूनिवर्सिटी तकनीकी शिक्षा ही नहीं भारतीय चिकित्सा पद्धति को भी नया आयाम प्रदान करने को संकल्पित है। यहां आयुर्वेदिक, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा की तरफ भी प्रमुखता से ध्यान दिया गया है। यहां लाइफ स्किल्स की शिक्षा ग्रहण करना प्रत्येक छात्र-छात्रा के लिए अनिवार्य है। सच्चाई यह है कि संस्कृति यूनिवर्सिटी में शिक्षा ही नहीं संस्कार भी प्रदान किए जाते हैं।

वसुधैव कुटुम्बकम की मिसाल

संस्कृति यूनिवर्सिटी वसुधैव कुटुम्बकम की मिसाल है। यहां भारत ही नहीं विदेशी छात्र-छात्राएं भी अपना करियर संवारते हैं। यहां यंगस्टर्स को समय-समय पर विशेषज्ञों द्वारा गेस्ट लेक्चर, शैक्षिक भ्रमण तथा सेमिनारों का भी लाभ मिलता रहता है। डिजिटल लाइब्रेरी, सर्वसुविधायुक्त जिम, आधुनिक खेल मैदान, समस्त विभागों और संकायों में जीवन जीने की कला पाठ्यक्रम, शांत वातावरण यंगस्टर्स में नई ऊर्जा का संचार करता है। संस्कृति यूनिवर्सिटी में यंगस्टर्स के व्यक्तिगत एवं जीवनोपयोगी कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे छात्र-छात्राएं स्वयं ही चुनौतियों से निपटने में सक्षम हो रहे हैं। हम कह सकते हैं कि संस्कृति यूनिवर्सिटी एक शिक्षण संस्थान ही नहीं बल्कि दुनिया के बदलते परिदृश्य का आईना है।                   

अनुसंधान को विशेष तरजीह

आजकल वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, धन उत्पत्ति और सम्पन्नता की संचालक शक्ति सिर्फ शिक्षा को ही कहा जा सकता है। भारतीय यंगस्टर्स के विदेशी पलायन को रोकने के लिए संस्कृति यूनिवर्सिटी निरंतर प्रयास कर रही है। यहां शोध पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एक अच्छा शोध ऐसे परिवेश की माँग करता है, जहाँ शिक्षकों का स्तर अनुसंधान और अन्वेषण को ईमानदार सोच के साथ बढ़ावा देने वाला हो, छात्र निरंतर विषय को आगे बढ़ाने, उसका विस्तार करने और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नये आयाम जोड़ने के प्रयास में लगे हों। संस्कृति यूनिवर्सिटी में शोध के लिए जरूरी अन्वेषणपरक बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया गया है। यहां उच्च शिक्षा का विकास वर्तमान में विद्यमान आवश्यकताओं एवं भविष्य की सम्भावनाओं तथा सामाजिक अपेक्षाओं के आलोक में किया जा रहा है।

अपग्रेडेशन पर निरंतर ध्यान

सचिन गुप्ता और राजेश गुप्ता हायर एज्यूकेशन के क्षेत्र में नई इबारत लिखने को प्रतिबद्ध हैं। इन दोनों भाइयों का कहना है कि क्रिएटिंग ड्रीमर्स, अचीवर्स एण्ड विनर्स यूनिवर्सिटी की गाइड लाइन हैं. स्टूडेंट्स हों या फैकल्टी मेम्बर्स इनके अपग्रेडेशन पर निरंतर ध्यान दिया जाता है, ताकि ये ग्लोबल मार्केट के लिए एक बेहतरीन एसेट के रूप में तैयार रहें।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवार्ड

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी राजेश गुप्ता और सचिन गुप्ता की काबिलियत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भी संजीदगी से सराहा जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए अप्रतिम योगदान के लिए गुप्ता बंधुओं को अब तक दर्जनों नेशनल और इंटरनेशनल अवार्ड मिल चुके हैं। इन्हें भारत विद्या शिरोमणि अवार्ड, वर्ल्ड एज्यूकेशन कांग्रेस ग्लोबल अवार्ड, यंग एंटरप्रिन्योर अवार्ड के साथ ही अमेरिका में भारत गौरव सम्मान, रि-थिंक इंडिया का दूरदर्शी उद्यमी बंधु अवार्ड, यूनेस्को, भारतीय पुनर्वास परिषद, विजन इंस्टीट्यूट और विजन दिव्यांग संगठनों द्वारा समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए विजन यूएन-एसडीजी एम्बेसडर सम्मान से नवाजा जा चुका है। कौशल विकास के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रहे श्री सचिन गुप्ता को एसोचैम द्वारा गठित परिषद में भी विशेषज्ञ के रूप में शामिल किया गया है। श्री गुप्ता संस्कृति विश्वविद्यालय के चेयरमैन पद की जवाबदेही संभालने के साथ ही सोसायटी फार एज्यूकेशन डेवलपमेंट एण्ड रिसर्च के महासचिव, रामेश्वर दयाल चेरिटेबल एज्यूकेशन सोसायटी के अध्यक्ष, श्री महाराज अग्रसेन नार्थ-ईस्ट वेलफेयर सोसायटी के ट्रस्टी के रूप में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।