Monday, 18 March 2019

नादिया के संघर्ष और जज्बे को सलाम


नरक से नोबेल तक का मर्मांतक सफर
संघर्ष और सहनशक्ति के मामले में महिलाएं पुरुषों से कहीं आगे होती हैं। वात्सल्य की प्रतिमूर्ति महिलाएं किसी भी चुनौती को न केवल हंसकर सहने की क्षमता रखती हैं बल्कि समय की शिला पर नए प्रतिमान स्थापित करने का हुनर और कौशल भी उनमें होता है। छह भाईयों व माता-पिता का कत्ल करके इंसानी भेड़ियों की यौन दासी बनने का दुख कितना भयावह होता है, इसे नादिया मुराद के अलावा कौन महसूस कर सकता है। रात-दिन खूंखार आईएस लड़ाकों द्वारा महीनों लगातार नोचे जाने, बार-बार मालिक के बदलने, कोड़े खाने के बावजूद नादिया ने साक्षात‍ नरक से निकलने का सपना नहीं छोड़ा। आधा दर्जन बार भागी, फिर जिस्म के शिकारियों के आगे फेंक दी गईं, मगर मुक्ति की छटपटाहट इतनी प्रबल थी कि वह एक भले परिवार की मदद से मोसूल से निकलकर तुर्किस्तान की सीमा तक जा पहुंचीं। बिना नागरिकता प्रमाणों के खुद को साबित करना कितना मुश्किल होता है, यह नादिया ही जानती हैं। फिर इराक से जर्मनी पहुंचकर उन्होंने सारी दुनिया को आईएस के अमानवीय अत्याचारों के बारे में बताया। नादिया ने बताया कि उस जैसी हजारों महिलाएं और बच्चियां आज भी आईएस लड़ाकुओं की यौन गुलाम बनी हुई हैं तथा हर दिन एक नई मौत मरती हैं।

यौन हिंसा को युद्ध का हथियार बनाने के खिलाफ मुहिम चला चलाने वाले कांगो गणराज्य के डेनिस मुकवेगे को जहां पिछले साल बलात्कार पीड़िताओं की मदद के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला वहीं नादिया मुराद को उस असाधारण साहस के लिए यह सम्मान मिला, जो उन्होंने बलात्कार के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए दिखाया। नादिया मुराद को वर्ष 2014 में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने अगवा कर लिया था और उन्हें बंधक बनाकर महीनों तक यौन हिंसा का शिकार बनाया। उसने न केवल पूरी दुनिया को अपनी आपबीती सुनाई बल्कि अन्य बंधकों को मुक्त कराने की मुहिम भी चलाई।

दरअसल, दुनिया के सबसे पुराने मजहबों में से एक यजीदी समुदाय हमेशा से सुन्नी लड़ाकों के निशाने पर रहा है। इस अल्पसंख्यक समुदाय को नेस्तनाबूद करने के लिए हजारों यजीदियों को गोलियों से भूनने के साथ लड़कियों और महिलाओं को यौन गुलाम बना दिया गया। उन्हें इस्लाम कबूलने के लिए आतंकित किया गया और फिर मारकर सामूहिक कब्रों में दफन कर दिया गया। इराक के शिंजा पर्वत के पास बसे कोचू गांव में सत्रह सौ लोगों के समूह में नादिया ने आंखें खोलीं। तीन अगस्त, 2014 को इनके गांव को आईएस लड़ाकों ने चारों तरफ से घेर लिया। हथियार, सम्पत्ति-जेवर आदि लूटकर एक दो मंजिला इमारत में सबको बंधक बना लिया गया। तीन हजार लोगों की हत्या और पांच हजार महिलाओं-बच्चियों को बंधक बनाने की खबर ने गांव का मनोबल तोड़ दिया। स्कूल की एक मंजिल में महिलाओं व बच्चियों को तथा दूसरी में पुरुषों व लड़कों को रखा गया। जिसने इस्लाम दबाव में कबूला, उसे भी इस धारणा के तहत मारा गया कि हर यजीदी को इस्लाम कबूल करके मर जाना चाहिए। सभी मर्दों को गोली मार दी गई। उन महिलाओं को भी जो शादी लायक नहीं थीं। इस मर्मांतक पीड़ा का वर्णन नादिया ने द लास्ट गर्ल: माई स्टोरी ऑफ कैप्टिविटी एण्ड माई फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट पुस्तक में किया है।

यजीदियों के साथ हुए अत्याचार दिल दहला देने वाले हैं। साक्षात‍ नरक भोगने वाली नादिया बताती हैं कि सेक्स स्लेव की जिंदगी से मुक्ति की छटपटाहट में उन्होंने छह बार भागने का प्रयास किया। लेकिन उन लोगों ने फिर आईएस लड़ाकों को सौंप दिया। फिर अत्याचारों का सिलसिला और भयानक हो गया। मोसूल से भागने का सातवां प्रयास कामयाब रहा और वह किसी तरह जुल्मो-सितम से निकलकर शरणार्थी शिविर तक जा पहुंचीं। जर्मनी पहुंचकर नादिया ने सारी दुनिया को यजीदी समाज, खासकर उनकी महिलाओं के साथ हुए अमानवीय अत्याचारों के बारे में बताया। नादिया ने संयुक्त राष्ट्र के कई कार्यक्रमों में अपनी दर्दनाक दास्तान बयां कीं। हालांकि नादिया का मानना था कि हर बार उन घटनाओं का जिक्र मुझे उसी भयावह माहौल की याद ताजा करा देता है, मगर मैं यजीदी समाज की टीस को दुनिया को बताना चाहती हूं कि कैसे यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। उस अकल्पनीय खौफ को बयां करने का मकसद अभी भी कब्जे में फंसी हजारों महिलाओं को मुक्त कराना है।

हर क्षण को यातनादायक व धीमी मौत को करीब से महसूस करने वाली नादिया आज यजीदी समुदाय की बुलंद आवाज बन गई हैं। हालांकि, इन यातनाओं से गुजर कर इसे एक स्त्री के रूप में बार-बार बयां करना भी खासा मुश्किल था, लेकिन वह एक भयावह सच्चाई से दुनिया को रूबरू कराना चाहती हैं। वह बताना चाहती हैं कि शांतिप्रिय कौम को कैसे नेस्तनाबूद करने की कोशिश हुई। आज नादिया ने अपने साथ हुए अमानवीय अत्याचारों को अपनी ताकत बना लिया है। उसने पूरी दुनिया के सामने आईएस के शर्मनाक कारनामों का खुलासा किया है। उसे विश्वास है कि एक न एक दिन यजीदी समाज की काली रात का अंत जरूर होगा। तब एक नई सुबह उनके खोये मनोबल को लौटाएगी। नादिया को इसी असाधारण साहस के लिए शांति के सर्वोच्च नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया, जिसकी वह वाकई हकदार भी थीं। नादिया मुराद के संघर्ष और जज्बे को सलाम। 

खेती-किसानी में महिलाओं की प्रेरणास्रोत

किसान चाची राजकुमारी
भारतीय महिलाएं आज हर क्षेत्र में अपनी सफलता की कहानी लिख रही हैं। एक बंद समाज की दहलीज लांघकर अपना नया मुकाम तय करना किसी भी महिला के लिये आसान नहीं होता। फिर पुरुष के वर्चस्व वाले क्षेत्र में पहचान बनाना और परिवार को आत्मनिर्भर बनाने के साथ हजारों चूल्हों को जलाना आसान नहीं है। बिहार के मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड के गांव आनंदपुर की किसान चाची राजकुमारी ने जो कुछ किया वह महिलाओं के लिए ही नहीं पुरुष समाज के लिए भी एक सबक है। खेती-किसानी के क्षेत्र में नजीर स्थापित करने वाली राजकुमारी को हाल ही भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। किसान चाची का यह सम्मान  उनके मार्गदर्शन में चलने वाले चालीस स्वयं सहायता समूहों के लिये किसी उत्सव से कम नहीं है।

आज देश राजकुमारी को किसान चाची के नाम से जानता है। मैट्रिक करके पंद्रह साल में ब्याह दी गई राजकुमारी जब ससुराल पहुंचीं तो घूंघट की बंदिशों के समाज में खुद को पाया। शिक्षक पिता ने उन्हें लाड़-प्यार से पाला था। राजकुमारी ने टीचर की ट्रेनिंग लेकर पढ़ाना चाहा तो परिवार ने मना कर दिया। परिवार में जमीन का बंटवारा हुआ तो बेरोजगार पति के हिस्से में सिर्फ ढाई एकड़ जमीन आई, जिसमें तम्बाकू आदि की खेती होती थी, जिससे घर चलाना मुश्किल था। ऐसे में दृढ़ संकल्प के साथ राजकुमारी घर चलाने को निकल पड़ीं। परिवार-समाज के तानों से बेपरवाह उन्होंने ऐसी राह चुनी जो रूढ़िवादी समाज में सम्भव नहीं थी।

राजकुमारी ने पाया कि खेती में सबसे ज्यादा महिलाएं ही मेहनत करती हैं मगर उनके श्रम को न तो पहचान मिलती है और न ही कुछ नया करने का अवसर। यहीं से राजकुमारी की किसान चाची बनने की कहानी शुरू होती है। उन्होंने सबसे पहले अपने खेतों में फसल चक्र में बदलाव किया। राजकुमारी ने वर्ष 1990 में ओल, हल्दी और पपीते की फसल उगानी शुरू की। नजदीक के कृषि विश्वविद्यालय से सम्पर्क कर मिट्टी परीक्षण व आधुनिक तकनीक से नकदी व जैविक फसलों के उत्पादन का प्रशिक्षण लिया।

किसान चाची ने महसूस किया कि यदि हम उत्पादित अनाज व सब्जी तथा फल बाजार में बेचते हैं तो औने-पौने दाम में खरीद लिया जाता है। यदि खाद्य प्रस्संकरण के जरिये अचार-मुरब्बा आदि बनाकर बेचा जाये तो ज्यादा आमदनी हो सकती है। समस्या यह थी कि अपना उत्पाद गांव से बाहर कैसे बेचा जाये। इसके लिए उन्होंने कमर कसी और खुद ही साइकिल से हाट-बाजारों में अपने उत्पाद बेचने का मन बना लिया। पहले तो पति व परिवार ने विरोध किया मगर बाद में किसान चाची का संकल्प देखकर सबने हामी भर दी। साठ साल की उम्र पार करने पर भी किसान चाची रोज तीस-चालीस किलोमीटर साइकिल चलाकर अपने उत्पाद बेचती हैं। उनके हाथ से बनाए जाने वाले अचार व मुरब्बे आज विश्वसनीय ब्रांड बन गये हैं। राजकुमारी के उत्पादों की महक किसान मेले के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने महसूस की और किसान चाची को पुरस्कार दिया। फिर वर्ष 2007 में किसान चाची को किसान श्री सम्मान से नवाजा गया। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनकी कामयाबी से इतने मुग्ध हुए कि महिला उद्यमशीलता को नमस्कार करने किसान चाची के घर जा पहुंचे।

चाची की कामयाबी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्होंने हजारों महिलाओं को उन्नत खेती करने के लिये प्रेरित किया। उन्हें बताया कि कैसे खेती को लाभकारी बनाकर ज्यादा मुनाफा कमाकर स्वावलम्बी बना जाये। महिलाओं को राह दिखाती उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री खासी चर्चित हुई। कालांतर में वह कई कृषि विश्वविद्यालयों की समितियों तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की सदस्य भी बनीं। किसान चाची ने समाज को यह संदेश दिया कि मजबूत इरादों और प्रगतिशील सोच से मुश्किल लक्ष्य भी हासिल किये जा सकते हैं।

किसान चाची के प्रशंसकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा बिहार के राज्यपाल रहे और वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी हैं। पद्मश्री देते वक्त राष्ट्रपति ने उन्हें नाम से सम्बोधित कर हालचाल पूछा। किसान चाची के अचार और मुरब्बे की महक को सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने भी महसूस किया और केबीसी के सेट पर बुलाया। इसी दौरान उन्हें पांच लाख रुपये और आटे की चक्की स्वरोजगार समूहों की मदद के लिये दी। किसान चाची दिल्ली के प्रगति मैदान से लेकर देश के दूसरे राज्यों में लगने वाले कृषि मेलों में स्वयं सहायता समूहों द्वारा बनाये गये  उत्पादों को लेकर पहुंचती हैं। उनके स्टॉल पर लाइन लगकर भरोसे का सामान बिकता है।

नि:संदेह गांव की पगडंडियों पर रोज मीलों साइकिल चलाकर किसानों को आधुनिक तकनीक के प्रति जागरूक करने वाली किसान चाची आज अपने काम को पद्मश्री मिलने से खासी  उत्साहित हैं। वह मानती हैं कि खेती में महिलाएं हाड़तोड़ मेहनत करती हैं मगर उनके काम का सही मूल्यांकन कभी नहीं हो पाता। उनके नाम जमीन न होने से उनको सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता। इस दिशा में सरकार रचनात्मक भूमिका निभाये तो महिलाएं भी घर की चौखट से निकलकर कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। किसान चाची हमें विश्वास दिलाती हैं कि हमारे आसपास रहने वाले साधारण लोग भी दुनिया बदलने की कूबत रखते हैं।

कमाल की कृति भारती


बाल विवाह के खिलाफ जगाई अलख
भारत परम्पराओं का देश है। इन परम्पराओं की आड़ में कुछ कार्य ऐसे भी हुए या होते हैं जिनसे हमारे समाज में असंतुलन की बयार सी बहने लगती है। हमारे देश आखातीज भी एक ऐसी परम्परा है, जिसमें आमजन को अपने बेटे-बेटियों की शादी के लिए किसी तरह का शुभ मुहूर्त निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ती। सदियों से ग्रामीण और उपनगरों में इस अवसर का दुरुपयोग बाल विवाह कराने में किया जाता रहा है। कानून और पुलिस अपना काम करती रह जाती है और जो बाल विवाह अटक जाते हैं वो बाद में हो जाते हैं। वर्ष 2012 तक किसी स्वैच्छिक संगठन या सरकार ने नहीं सोचा था कि बाल विवाह अगर हो भी गया है तो उसे कानून के दायरे में निरस्त भी कराया जा सकता है। बाल विवाह कैसे रुकें इस दिशा में जानलेवा हमले व धमकियों से निडर कृति भारती ने जो किया वह भारत ही नहीं आज दुनिया के लिए एक नजीर है।
हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है- वो क्या जाने पीर पराई जाके पैर न फटे बिवाईं। किसी महिला की वेदना को न केवल कृति ने समझा बल्कि देश को एक ऐसी सशक्त राह दी, जिसको कोई भी चाहे तो अपना सकता है। हौसलों की उड़नपरी नाम से मशहूर कृति भारती का बचपन संघर्षों से गुजरा मगर उसका जीवन और कर्म भारत ही नहीं दुनिया में आज एक मिसाल बन गया है। सम्भ्रांत जैन परिवार से ताल्लुक रखने वाली कृति के दुनिया में आंखें खोलने से पहले ही डॉक्टर पिता ने मां और बेटी (भ्रूण) का परित्याग कर दिया था। उसकी मां पर नाते-रिश्तेदारों ने गर्भ गिराने तक की सलाह दी, जिसे नकार दिया गया। अस्वस्थता की वजह से गर्भ के भीतर ही भ्रूण चिपक गया, जिससे मासूम बच्ची के जन्म से पहले ही सिर पर गहरे जख्म हो गए। बहुत मुश्किल से बच्ची का सातवें माह में ही जन्म हुआ।
सामाजिक शोषण और दुर्भावना के चलते जब दस साल की उम्र में जब कृति चौथी कक्षा में अध्ययनरत थी तो किसी रिश्तेदार ने उसे कोई धीमा जहर खिला दिया। ईश्वर ने फिर चमत्कार दिखाया। धीमे जहर के असर के कारण उसके अंग लाचार हो गए। उसके सिर और एक हाथ को छोड़कर बाकी शरीर बेजान हो गया। रैकी चिकित्सा से नन्हीं कृति के अंगों में धीरे-धीरे जान लौटने लगी। 11 साल की उम्र में दुबारा से काफी असहनीय पीड़ाओं से गुजर कर उसने घुटनों के बल चलना सीखा। बाल योगिनी की पहचान वाली कृति ने गुरु सरस्वती के सान्निध्य में क्रिस्टल के प्रयोगों से रैकी चिकित्सा पद्धति प्राप्त कर दुर्बल महिलाओं को सफल रैकी चिकित्सा देनी शुरू कर दी।
उसने जोधपुर से मनोविज्ञान विषय में स्नातकोत्तर की परीक्षा में टॉप किया और इसी विषय पर पी.-एचडी. की उपाधि हासिल की। समाज के निम्न और शोषित तबके के लिए कार्य करने के जज्बे के कारण कृति ने उच्च वेतन के जॉब को भी ठुकरा दिया। जब वह बाल दुराचार और शोषण को होता देखती तो बहुत व्याकुल हो जाती। पीड़ित बच्चों और महिलाओं को राहत दिलाने और बेहतर पुनर्वासित करने को ही जीवन का उद्देश्य बनाकर उसने दृढ़ संकल्प के साथ एक मशाल उठाई। मंदबुद्धि बच्चों के लिए पुनरुत्थान व पुनर्वास के लिए कार्य किया।
अन्य स्वयंसेवी संगठनों के साथ कार्य करने में कुछ बाधाएं सामने आती देख उसने वर्ष 2012 में सारथी ट्रस्ट स्थापित किया। बाल विवाह की सामाजिक रूढ़िवादी परम्परा को मिटाने के लिये सारथी ने एक के बाद एक बाल विवाह पीड़िताओं को सम्बल प्रदान किया। पश्चिम राजस्थान में लक्ष्मी एक साल की थी जब उसे उसके मां-बाप ने जोधपुर में दो साल के लड़के के साथ बाल विवाह में बांध दिया। लक्ष्मी जब 2012 में 18 साल की हुई और उसे  ससुराल भेजने का समय आया तो उसने इसका डटकर विरोध किया और कृति से सम्पर्क किया। काफी जद्दोजहद के बाद ‘फेमली कोर्ट’ से लक्ष्मी को बाल विवाह से मुक्त करा दिया गया। 10 साल की पिंकी कंवर हो या 18 साल की पपली जैसी तीन दर्जन बाल विवाहिताएं, उन सभी ने गौने की त्रासदी से बचने के लिये सारथी का दामन थामा। विवाह निरस्त कराने की कोशिश में इन सभी के परिवारों को लड़के वालों द्वारा मारने की धमकी दी गयी, पुलिस की ताकत दिखाई, गुंडे दौड़ाये गये। मगर सारे खतरों और कानूनी चुनौतियों से संघर्ष करते हुए कृति ने युवा अवस्था में वो कर दिखाया जो बड़े-बड़े स्वयंसेवी संगठन विदेशी फण्ड से भी नहीं कर पाते।
वर्ष 2012 में जब कृति ने फेमिली कोर्ट में प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मेरिज एक्ट, 2006 की धारा 3 में पहला बाल विवाह निरस्त कराया तो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ऑफ इंडिया में प्रसिद्धि प्राप्त की। उसके बाद कृति अब तक तीन दर्जन से अधिक बाल विवाह निरस्त कराने का एक विश्व रिकार्ड बना चुकी हैं। साथ ही सीबीएसई के ग्यारहवीं और बारहवीं स्तर के पाठ्यक्रम में भी कृति के बाल विवाह निरस्त की मुहिम को शामिल किया गया। वर्ष 2016 में महज तीन दिन में दो जोड़ों के बाल विवाह को निरस्त करवाने के कारण उसे वर्ल्ड रिकॉर्ड इंडिया, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स व यूनिक वर्ल्ड रेकार्ड्स में शामिल किया गया। इस पर चीफ जस्टिस ऑफ राजस्थान ने भी कृति को सम्मानित किया। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) बाल विवाह दर कम होने के कितने ही आंकड़े दर्शाये मगर जब परिवार में ‘मौसर’ (मृत्युभोज) होता है तो रुके हुए बाल विवाह इसलिये हो जाते हैं कि वो पुण्य आत्मा का एक नेक दिन होता है। कृति कहती हैं कि भले ही गांव निरंतर हाईटेक हो रहे हों मगर जातिगत और संकीर्ण मानसिकता से पुरुष समाज अभी उबरा नहीं है। जो भी हो कृति के कृतित्व ने समाज को एक नई दिशा जरूर दिखाई है।

नारी अस्मिता सर्वोपरि


महिलाओं की स्थिति भले ही स्थानिक प्रभाव व काल प्रवाह में बदलती रही हो, उसकी छवि भी भले ही समय-समय पर दबती-उभरती रही हो, परन्तु हर युग के निर्माण में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उसकी अस्मिता को लेकर साहित्य में हमेशा ही समय-सापेक्ष अनेकानेक प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। उनका समाधान हुआ है या नहीं, यह सब कुछ निरुत्तरित ही है जब तक वह मानवीय रूप में उभरकर सबके सामने न आए। सब नाते-रिश्तों के बावजूद वह स्वतंत्र इकाई भी है और स्वतंत्र अस्तित्व वाली भी है। साहित्य दिशा-बोधक एवं दिशा-स्तम्भ है। आज हमारा युग-बोध बदल गया है, जीवन-पद्धतियां बदल गई हैं। इसीलिए स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में समीकरण की तलाश है। नये मूल्यों का निर्माण करने से ही नये युग की नई नारी की प्रतिमा उभरेगी।
आज स्त्रीवाद या स्त्री विमर्श एक फैशन बन गया है। आधी आबादी की अस्मिता को लेकर आज आन्दोलन भी हो रहे हैं, परन्तु यह कोई नई बात नहीं है। देखा जाए तो नारी अस्मिता और उससे जुड़े तमाम सवालों के हल पिछले दो सौ से भी अधिक वर्षों से ढूंढ़े जा रहे हैं तथापि समस्याएं यथावत हैं। अठारहवी शताब्दी के मध्य में ही दुनिया की तमाम महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलवाने की ज़रूरत महसूस की गई और पहली बार राइट्स ऑफ वूमेन के माध्यम से स्त्री-अधिकारों के लिए आवाज मुखर हुई। इंग्लैण्ड की मैरी वोलस्टोन पहली महिलावादी थीं जिन्होंने महिला शिक्षा और अधिकारों को लेकर महिला आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने शोषण से स्त्री की मुक्ति हेतु पुरुषों में बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया है।
स्वीडन की फ्रेडरिका बेमर ने भी 1849 में स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को स्वयं अनुभव किया। उन्होंने अमेरिका जाकर वहां की स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन किया। फिर स्वीडन लौटकर अपना उपन्यास हेर्था लिखा, जिसमें उन्होंने स्त्री को परम्परागत भूमिका से मुक्त रूप में चित्रित किया। यही उपन्यास स्वीडन की संसद में स्त्रियों के हित में बनाये जाने वाले क़ानूनों का आधार बना। 1791 में फ्रांस में ओलिम्पी दे गाज द्वारा महिलाओें के नागरिक अधिकारों पर घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया गया। इसमें महिलाओं के लिए पुरुषों के समान अधिकारों की घोषणा की गई। भारत में सरोजिनी नायडू पहली ऐसी महिला थीं जिन्होंने एनी बेसेण्ट और अन्य लोगों के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना की।
उन्नीसवीं शताब्दी की महिला आन्दोलनकारियों में फ्रांस की सिमोन द बोउवा का नाम सर्वोपरि है। उनकी पुस्तक द सेकेण्ड सेक्स स्त्री विमर्श की चर्चित कृति है। सिमोन मानती थीं कि स्त्री का जन्म भी पुरुष की तरह ही होता है मगर परिवार व समाज द्वारा उसमें स्त्रियोचित गुण भर दिए जाते हैं। 1970 में फ्रांस के नारी मुक्ति आंदोलन में भाग लेने वाली सिमोन स्त्री के लिए पुरुष के समान स्वतंत्रता की पक्षधर थीं।
प्रसंगवश यहां अमेरिका की रॉबिन मोर्गन, बैटी फ्रीदां, एंड्रिया ड्वार्किन, सुजेन फलूदी और ग्लोरिया स्टीनेम जैसी प्रसिद्ध महिलावादियों का नामोल्लेख उचित है। रॉबिन ने महिला आन्दोलन पर सिस्टरहुड इज पावरफुल जैसी चर्चित पुस्तक लिखी। 1960 के दशक में वे लेस्बियन के रूप में जानी गईं और महिला मुक्ति आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं। बैटी फ्रीदां अमेरिका में राष्ट्रीय महिला संघ की संस्थापक और अध्यक्ष रहीं। उन्होंने अपनी पुस्तक द फेमिनिन मिस्टीक में गृहिणी शिक्षा पर प्रश्न उठाया। वे गर्भपात-क़ानून की विरोधी और समान अधिकारों की समर्थक थीं। इस विवेचना का आशय यही है कि समान अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष नया नहीं है। यह सर्वकालिक और सार्वदेशिक है। महिलाएं चाहे जिस भी नस्ल, वर्ण, जाति, धर्म, संस्कृति या देश की हों, उनके संघर्ष लगभग एक समान हैं।
आश्चर्यजनक तो यह है कि स्त्रीवादियों के आन्दोलन की जो लहर पहले पहल अठारहवी शताब्दी के मध्य में उठी थी, अब तक अपनी मंजिल नहीं पा सकी है। यद्यपि स्त्री की एक नयी छवि अवश्य उभर रही है। सदियों से बंधनों में जकड़ी स्त्री अब स्वावलम्बी और सबला बनने हेतु सचेष्ट है। अतएव विश्व के अधिकतर देशों में सकल घरेलू उत्पाद में उनकी सक्रिय भागीदारी बढ़ रही है। अमेरिका, कनाडा, चीन, ब्राजील, मेक्सिको, युगांडा, भारत और बांग्लादेश जैसे तमाम विकसित व विकासशील देशों में जहां रोजगार सृजन का कार्य व्यापक पैमाने पर हो रहा है, वहां की समृद्धि का आधार स्तम्भ महिलाएं हैं। सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर देने के बावजूद समूची दुनिया में आज भी महिलाएं हाशिए पर हैं।
मध्य एशिया के सबसे बड़े देश ईरान में 36 विश्वविद्यालयों ने 80 अलग-अलग पाठ्यक्रमों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसे पाठ्यक्रमों में इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस, नाभिकीय भौतिकी, अंग्रेजी साहित्य और पुरातत्व जैसे विषय शामिल हैं। आर्यों की धरती माने जाने वाले ईरान में स्त्रियों की ज़ुबान पर ताले जड़े हैं। उन्हें सिर्फ चेहरा खुला रखने की आजादी है। वहां कोई महिला संगठन नहीं है, जो महिला अधिकारों की बात करे। कोई महिला राजनेता नहीं हैं। तीन वर्ष पूर्व विरोधी प्रदर्शन के दौरान एक युवती नेहा आगा सुल्तान मारी गई थी तदुपरान्त किसी महिला ने आगे आने की हिम्मत नहीं दिखाई। ईरान की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शीरीन इबादी ईरान से बाहर रहकर स्त्रियों की आजादी की लड़ाई लड़ रही हैं। वैश्विक स्तर पर स्त्री की स्थितियों में अधिक अन्तर नहीं है। हम चाहे सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या पारिवारिक परिदृश्य की बात करें, हर कहीं स्त्री का शोषण बदस्तूर जारी है। धार्मिक नेता और समाज के ठेकेदार युवतियों के रहन-सहन, परिधान, संचार साधनों के उपयोग और जीवनसाथी के चयन जैसे सर्वथा निजी मामलों में भी अपनी राय थोपकर उनकी स्वतंत्रता का हनन करते हैं।
महिलाओं के संदर्भ में रोजगार, शिक्षा और क़ानून को लेकर समानता की मांग बेमानी नहीं है, क्योंकि वे हर जगह भेदभाव से पीड़ित हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के दस्तावेज़ मानव विकास रपट से ज्ञात होता है कि समूचे विश्व में महिलाएं शोषण का शिकार हैं। पुरुष प्रधान समाज में उसकी उन्नति के मार्ग में हर कदम पर अवरोध दिखाई देते हैं। जनसंख्या व विकास पर जब काहिरा में विश्व सम्मेलन हुआ तो धार्मिक पुरोहितों ने गर्भपात और अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए सम्मेलन के प्रस्ताव का विरोध किया। फलतः एक स्त्री-हितैषी निर्णय खटाई में पड़ गया। यह भी कटु सत्य है कि संसार के दो तिहाई कठिन परिश्रम वाले कार्य महिलाएं ही करती हैं परन्तु इसके बदले उन्हें बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है। उन्हें पुरुषों की आय के दसवें भाग के बराबर मिल पाता है और सम्पत्ति तो बमुश्किल सौ में से एक महिला के नाम पर होती है। दरअसल प्रत्येक महिला अपने परिवार के लिए अथक परिश्रम करती है पर उसके श्रम की कोई सामाजिक मान्यता नहीं हैं। भारत में तो कर्तव्य और प्रेम की ओट में उसके श्रम की अनदेखी कर दी जाती है।
आज नारी का अस्तित्व खतरे में है। यदि हम भारत की बात करें, तो यहां परिवार की व्यवस्था के लिए एक सौभाग्यवती ब्याहता की मांग होती है। मगर कम्पनियों और बाजारवादी व्यवस्था को स्वयं निर्णय लेने में सक्षम, स्वावलम्बी और सौन्दर्यचेता स्त्री चाहिए। इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए मीडिया स्त्री की जो छवि रच रहा है वह नकारात्मक अधिक है। नारी मुक्ति आन्दोलन स्त्री की स्वतंत्रता पर बल देता है, जबकि असल मुद्दा यह है कि उसे इंसान के रूप में मान्यता मिले। तब उसे पुरुष के समान अधिकारों की मांग अलग से करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। देश और समाज के प्रति उसकी भूमिका और उत्तरदायित्व इंसान के रूप में ही सुनिश्चत हो जाएंगे। मगर दु:ख की बात यह है कि भारतीय महिलाओं की स्थिति सरकार के समस्त प्रयासों के बावजूद बेपटरी है।
आज सबसे बड़ी समस्या स्त्री की स्वतंत्रता की नहीं, सुरक्षा की है। दुधमुंही बच्ची से लेकर वृद्धा तक के साथ बलात्कार हो रहे हैं। समूचे विश्व में स्त्री यौन उत्पीड़न और हिंसा से जूझ रही है। उसकी महत्वाकांक्षाओं के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। उसे इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। आखिर कब तक महिला की योग्यता और क्षमता की अवहेलना होती रहेगी? कब तक उसका शोषण जारी रहेगा? औपचारिक तौर पर किसी एक दिन महिला दिवस मनाने से उनकी समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। अब विश्व महिला दिवस एक विशेष दिन के रूप में मनाने की बजाय ऐसी पहल की जानी चाहिए जिसमें हर दिन महिला अपने को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके। अपने देश की उन्नति में एक इन्सान और मज़बूत नागरिक के रूप में योगदान कर सके। अपने स्त्री होने पर गर्व कर सके।
कभी बेटियों को अभिशाप मानने वाला हमारा पुरुष प्रधान समाज आज बेटियों के कारनामों से न केवल हतप्रभ है बल्कि उनका गुणगान करते नहीं थक रहा। यह वही बेटियां है जिन्हें आज से कुछ दशक पहले पर्दे में रखा जाता था और घर की इज्जत-आबरू बताकर उन्हें चौखट के बाहर कदम रखने की इजाजत नहीं दी जाती थी। बड़ी मुश्किल से कोई कोई माता-पिता हिम्मत जुटाकर अपनी बेटियों को स्कूली शिक्षा के लिए घर से बाहर भेजा करते थे और समाज की मान्यता के विपरीत अपनी बेटियों को पढ़ाया करते थे। ऐसे अभिभावकों को इसके लिए कभी-कभी परिवारीजनों और बाहरी लोगों से विरोध तथा उलाहना का सामना भी करना पड़ता था। ऐसे हिम्मती अभिभावकों के चलते ही बेटियों को घर से बाहर निकलने का मौका मिला।
आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। आज हमारा समाज बेटियों की शिक्षा को लेकर न केवल सजग और जागरूक है बल्कि प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अपनी बेटी को उच्च से उच्चतम शिक्षा देने की लालसा रखता है। बेटियों को नील गगन में स्वच्छंद उड़ान भरने की इजाजत मिल रही है। देश के गाँव हों या शहर जहां देखो वहीं लड़कियाँ समूह में स्कूल-कालेज जाती हुई आपको दिख जाएंगी। कुछ अलग परन्तु श्रेष्ठ करने की दृढ़ इच्छा लिए ये बेटियां अपने आत्मबल और आत्मविश्वास से कठिन परिश्रम के सहारे सफलता की ऊंची उड़ान उड़ रही हैं। आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां बेटियों की दखल उनकी कामयाबी के हस्ताक्षर न हों।
नारी अस्मिता के संदर्भ में बात करें तो शुरू से ही स्त्री को मनुष्य का दर्जा नहीं दिया गया। उसे अनुगामिनी व आज्ञाकारिणी ही बनाकर रखा गया। यह सब पितृ सत्तात्मक समाज की देन थी और है। भूमंडलीकरण से नारी अस्मिता के सवाल उभरे। स्त्री जागी। महिलाओं के जागरण मात्र से ही पितृ सत्तात्मक समाज की नींद उड़ गई। स्त्री जब तक सोई हुई थी तब तक पितृ सत्तात्मक समाज चैन से था। उसका जगना उन्हें बेचैन कर गया। देखा जाए तो आज नारी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष आवश्यक है। वह संघर्ष पुरुषों से नहीं पुरुष सत्ता से होना चाहिए। वैसे अब चीजें बदलने लगी हैं। मगर, एक सतत व लम्बे संघर्ष के बाद ही नारी अस्मिता पूरी तरह स्थापित हो पाएगी। नारी व पुरुष में अंतर है। इस नैसर्गिक सच को हमें स्वीकार करना होगा। नारी व पुरुष समान नहीं हैं। इसलिए दोनों में तुलना नहीं की जा सकती। दोनों अपने आप में बेमिसाल हैं। दोनों की अपनी अलग-अलग विशेषताएं हैं। नारी अस्मिता या नारी स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं है कि नारी समय व समाज के नियमों से ऊपर है। इसका मतलब है कि किसी और के अधीन न होकर नारी स्वाधीन हो।

Wednesday, 25 July 2018

भारतीय उम्मीदों की किरण नीरज और हिमा दास




एशियाड ही नहीं ओलम्पिक के भी पदक दावेदार
 श्रीप्रकाश शुक्ला                                                   
इंडोनेशिया में होने वाले एशियाई खेलों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। भारतीय उम्मीदों का दिया भी अनायास ही सही टिमटिमाने लगा है। खिलाड़ी और खेल महासंघ भारतीय खेलप्रेमियों को नायाब प्रदर्शन की सौगात देने को जहां प्रतिबद्ध हैं वहीं पिछले कुछ दिनों में हमारे दो खिलाड़ियों ने विश्व एथलेटिक मंच पर अपने करिश्माई प्रदर्शन से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यह दो खिलाड़ी हैं असम की नई उड़नपरी हिमा दास और पानीपत (हरियाणा) का सदाबहार भालाफेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा। यह दोनों एथलीट न केवल प्रतिभाशाली हैं बल्कि भारतीय उम्मीदों के चमकते सितारे भी हैं। एथलेटिक्स की बात करें तो भारत ओलम्पिक खेलों में 100 साल से भी अधिक समय से सहभागिता कर रहा है लेकिन आज तक इस विधा में उसे कोई पदक नहीं मिला है। हिमा और नीरज ने जूनियर स्तर पर जो कमाल दिखाया है, उससे लगने लगा है कि देर-सबेर ये दोनों जांबाज एथलेटिक्स की रीती झोली में पदकों की खुशफहमी डाल सकते हैं। ओलम्पिक खेल अभी दूर हैं ऐसे में इन दोनों ही खिलाड़ी को इंडोनेशिया में होने जा रहे एशियाई खेलों में पदक का प्रमुख दावेदार माना जा सकता है।   
देशभर में धींग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर हो चुकी हिमा दास ने फिनलैंड के टेम्पेरे में वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में 400 मीटर दौड़ में जो स्वर्णिम सफलता हासिल की है, उसे संयोग नहीं कहा जा सकता। इसके लिए इस भारतीय बेटी ने अथक परिश्रम किया है। फिनलैंड में हिमा की हिमालयीन सफलता के बाद राष्ट्रगान की अनुगूंज के बीच उसकी आंखों से बहे खुशी के आंसू उद्दात राष्ट्रप्रेम का सूचक है। हिमा की इस सफलता के निहितार्थ भी हैं। जिस देश में खेल-संस्कृति का नितांत अभाव हो वहां की बेटी का दुनिया जीतना छोटी बात नहीं हो सकती। अभावों की तपिश में तपकर कुंदन बनी हिमा दास हों या नीरज चोपड़ा, इनकी कामयाबी इसी बात का संकेत है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। हिमा और नीरज की चर्चा देश-दुनिया में होना सुकून की बात है। खुशी के इस अवसर पर हर भारतीय को इन खिलाड़ियों के श्रमसाध्य प्रयासों और उन विषम परिस्थितियों को भी याद करना चाहिए, जिससे गुजरकर इन दोनों ने यह मुकाम हासिल किया है। हिमा और नीरज महिला और पुरुष वर्ग के एथलीटों में विश्व स्पर्धा में सुनहरी सफलता हासिल करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी हैं। हिमा और नीरज से पहले भारतीय खेलप्रेमियों को चौथे-पांचवें स्थान में पहुंचे खिलाड़ियों का ही गुणगान करने का सौभाग्य मिला था।
धान के खेतों में दौड़ लगाकर फिनलैंड तक सुनहरा सफर हासिल करने वाली हिमा की कामयाबी सही मायने में किसी बॉयोपिक फिल्म सरीखी है। एक संयुक्त किसान परिवार में जन्मी हिमा की सफलता मुश्किलों के रास्तों से होकर गुजरती है। एक लड़की होकर लड़कों के बीच खेलने वाली यह जांबाज कम उम्र में ही सब कुछ देख चुकी है। भारत में खेलों का रास्ता काफी कंटीला है, बेटियों के लिए तो और भी अधिक। असम के नौगांव जिले के कांदुलीमारी गांव में जन्मी हिमा में बचपन से ही खिलाड़ी बनने के गुण थे। पिता रंजीत दास ने इन गुणों को समझा और उसे प्रोत्साहन भी दिया। हिमा धान के खेतों में काम करती और मौका मिलने पर खेलने भी जाती। मगर दिक्कत यह थी एक लड़की किसके साथ खेले, कौन-सा खेल खेले। वहां तो कोई स्टेडियम भी नहीं था और न ही दौड़ने का ट्रैक। वह धान के खेतों में दौड़ती थी। मगर उसके गांव का इलाका ऐसा था कि बरसात के दो-तीन महीने खेतों में पानी भर जाता था। फिर वह कहां दौड़े? कभी-कभी तो वह सड़क पर दौड़ती कारों के पीछे ही दौड़ पड़ती थी। कई मौके ऐसे आए कि उसने तेज गति की कार तक को पीछे छोड़ दिया। हिमा को न कोई सिखाने वाला था और न उसके साथ खेलने वाला।
आखिरकार हिमा ने सोचा क्यों न फुटबाल खेली जाए। मगर उसे लड़के खेलाने को तैयार नहीं थे। महिला फुटबालरों की कोई टीम नहीं थी। एक बार उसकी फुटबाल टीम के लड़कों के साथ खूब लड़ाई भी हुई। लड़के कहते- इस लड़की को नहीं खेलाएंगे। मगर हिमा के हृदय का खिलाड़ी हमेशा उफान मारता रहता। उसने जब फुटबाल टीम में खेलना शुरू किया तो दनादन गोल दागे। फिर तो वह फुटबाल टीम का हिस्सा ही बन गई। वह आसपास के जिलों में फुटबाल खेलने जाती। जीतकर आती तो जो दो-चार सौ रुपये मिलते, मां के हाथ पर रख देती। हिमा की मां जोनाली दास इस बात को बड़े गर्व से बताते हुए कहती हैं कि जब उसे पैसे की जरूरत होती तो वह सिर्फ पिता से मांगती। उसके घर वालों को मलाल इस बात का है कि जब उसे फिनलैंड में मेडल दिया गया तो लाइट न होने से उस कार्यक्रम को नहीं देख पाये।
दरअसल, हिमा के जीवन में टर्निंग प्वाइंट तब आया जब वह कोच निपुण दास की नजर में आई। जनवरी 2017 में हिमा गुवाहाटी में एक प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लेने आई थी। निपुण दास ने ट्रैक पर दौड़ते हुए हिमा को देखा तो उन्हें लगा कि यह तो लम्बी रेस की खिलाड़ी है। इसके बाद निपुण दास ने उसे ट्रैक पर निपुण बनाने का संकल्प लिया। वे उसके गांव पहुंचे और माता-पिता से कहा कि उसे बेहतर ट्रेनिंग के लिये गुवाहाटी भेजें। माता-पिता बेटी को आगे बढ़ते तो देखना चाहते थे मगर उनकी ऐसी स्थिति नहीं थी कि वे हिमा का गुवाहाटी में रहने का खर्चा उठा सकें। निपुण दास ने कहा-आप इसे बाहर भेजिए, खर्चा मैं उठाऊंगा। कहते हैं कि एक जौहरी ही हीरे की पहचान कर सकता है, निपुण दास की निपुणता और हिमा की मेहनत से ही भारत को एक नई उड़नपरी मिल सकी।
फिनलैंड में सम्पन्न हुई अंतरराष्ट्रीय ट्रैक एण्ड फील्ड चैम्पियनशिप की चार सौ मीटर दौड़ के मुकाबले में 35 सेकेण्ड तक हिमा शीर्ष तीन धावकों में भी नहीं थी। आखिरी 100 मीटर में चौथे स्थान पर चल रही हिमा की दौड़ को देखकर कोच निपुणदास ने अंदाजा लगा लिया कि वह आज मेडल लेकर लौटेगी। उन्हें पता था कि वह पहले तीन सौ मीटर में धीमी रहती है और फिर आखिरी सौ मीटर में पूरी जान लगा देती है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण के अभाव में हिमा ट्रैक के कर्व पर अच्छी तरह नहीं दौड़ पाती, मगर जब आखिरी 100 मीटर में ट्रैक सीधा हो जाता है तो पिछली कसर पूरी करते हुए सबसे आगे निकल जाती है। हिमा आज लाखों अभावग्रस्त उदीयमान खिलाड़ियों की प्रेरणापुंज बन गई है। उम्मीद करनी चाहिए कि हिमा पहले इंडोनेशिया में होने वाले एशियाई खेलों, फिर टोक्यो ओलम्पिक में भारत के लिये कुछ खास जरूर करेगी।
भारत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा की बात करें तो इस 20 वर्षीय खिलाड़ी ने भी कम उम्र में ही अनेकों झंझावातों का सामना किया है। सोतेविले एथलेटिक्स मीट (फ्रांस) में नीरज चोपड़ा ने 85.17 मीटर की दूरी तक भाला फेंक कर स्वर्णिम सफलता हासिल की। इस स्पर्धा में चोपड़ा ने 2012 लंदन ओलम्पिक के स्वर्ण पदक विजेता केशोर्न वालकोट को भी पीछे छोड़ा। त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो के वालकोट 78.26 मीटर के प्रयास के साथ पांचवें स्थान पर रहे। एंड्रियन मारडेयर ने 81.48 मीटर के साथ रजत तो लिथुआनिया के एडिस मातुसेविसियस ने 79.31 मीटर की दूरी के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया। नीरज चोपड़ा की जहां तक बात है पानीपत के 20 साल के इस जांबाज ने 2016 में उस समय सुर्खियां बटोरी थीं जब उन्होंने विश्व जूनियर चैम्पियनशिप में 86.48 मीटर के विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता था। नीरज ने इस साल गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता और फिर दोहा डाइमंड लीग में चौथे स्थान पर रहने के बावजूद 87.43 मीटर के प्रयास के साथ नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। हिमा दास और नीरज चोपड़ा का अगला बड़ा इम्तिहान इंडोनेशिया में होने वाले एशियन गेम्स हैं, जहां इन दोनों को गोल्ड मेडल का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।



Friday, 13 July 2018

बहुत जिद्दी और जुनूनी है बेटी हिमाः रंजीत दास


हिमा दास की हिमालयीन सफलता
वह किया जो मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा भी नहीं कर पाए
श्रीप्रकाश शुक्ला
सच कहूं तो मैं एक सपना जी रही हूं। यह शब्द हैं हिमा दास के जिनके जरिए वह असम के एक छोटे से गांव में फुटबॉलर से शुरू होकर एथलेटिक्स में पहली भारतीय महिला विश्व चैम्पियन बनने के अपने सफर को बयां करना चाहती है। नौगांव जिले के कांदुलिमारी गांव के किसान परिवार में जन्मी 18 वर्षीय हिमा 12 जुलाई, गुरुवार को फिनलैंड में आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देशवासियों की आंख का तारा बन गई।
हिमा दास महिला और पुरुष दोनों वर्गों में ट्रैक स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट है। हिमा अब नीरज चोपड़ा के क्लब में शामिल हो गई है, जिन्होंने 2016 में पोलैंड में आईएएएफ विश्व अंडर-20 चैम्पियनशिप में भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था। हिमा के पिता रंजीत दास के पास दो बीघा जमीन है और उनकी मां जुनाली घरेलू महिला हैं। जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा ही छह सदस्यों के परिवार की आजीविका का साधन है।
बकौल हिमा मैं अपने परिवार की स्थिति को जानती हूं कि हम कैसे संघर्ष करते हैं। लेकिन ईश्वर के पास सभी के लिए कुछ होता है। मैं सकारात्मक सोच के साथ जिंदगी में आगे के बारे में सोचती हूं। मैं अपने माता-पिता और देश के लिए कुछ करना चाहती हूं। मैं अब विश्व जूनियर चैम्पियन हूं जोकि मेरे लिए सपने की तरह है।
हिमा चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनकी दो छोटी बहनें और एक भाई है। एक छोटी बहन दसवीं कक्षा में पढ़ती है जबकि जुड़वां भाई और बहन तीसरी कक्षा में हैं। हिमा खुद अपने गांव से एक किलोमीटर दूर स्थित ढींग के एक कालेज में बारहवीं की छात्रा हैं। पिता रंजीत कहते हैं कि हिमा बहुत जिद्दी है। अगर वह कुछ ठान लेती है तो फिर किसी की नहीं सुनती। वह दमदार लड़की है इसीलिए उसने कुछ खास हासिल किया है। मुझे उम्मीद थी कि वह देश के लिए कुछ विशेष करेगी और उसने कर दिखाया।
हिमा के चचेरे भाई जॉय दास कहते हैं कि शारीरिक तौर पर भी वह काफी मजबूत है। वह हमारी तरह फुटबॉल पर किक मारती है। मैंने उसे लड़कों के साथ फुटबॉल नहीं खेलने के लिए कहा लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी। उसके माता-पिता की जिंदगी संघर्षों से भरी है। हम लोग बहुत खुश हैं कि उसने खेलों को अपनाया और अच्छा कर रही है। हमारा सपना है कि हिमा एशियाई खेलों और ओलम्पिक खेलों में पदक जीते।
हिमा अपने प्रदर्शन के बारे में कहती है कि मैं पदक के बारे में सोचकर ट्रैक पर नहीं उतरी थी। मैं केवल तेज दौड़ने के बारे में सोच रही थी और मुझे लगता है कि इसी वजह से मैं पदक जीतने में सफल रही। हिमा का कहना है कि मैंने अभी कोई लक्ष्य तय नहीं किया है जैसे कि एशियाई या ओलम्पिक खेलों में पदक जीतना। मैं अभी केवल इससे खुश हूं कि मैंने कुछ विशेष हासिल किया है और अपने देश का गौरव बढ़ाया है।
भारत की हिमा दास ने 12 जुलाई, 2018 को फिनलैंड के टेम्पेरे में आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैम्पियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। हिमा ने राटिना स्टेडियम में खेले गए फाइनल में 51.46 सेकेंड का समय निकालते हुए गोल्ड पर कब्जा किया। इसी के साथ वह इस चैम्पियनशिप में सभी आयु वर्गों में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला बनी। देश की उभरती हुई स्प्रिंटर हिमा दास ने गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया में शानदार प्रदर्शन करते हुए 400 मीटर रेस के फाइनल में छठा स्थान हासिल किया था। जिसके बाद हिमा अखबारों की सुर्खियां बनी और थोड़ी बहुत लोकप्रिय भी हुई लेकिन क्रिकेट के दीवाने इस देश में जैसे ही आईपीएल शुरू हुआ लोग अपने कॉमनवेल्थ के एथलीटों को भूलते गए।
हिमा दास ने इस उपलब्धि के साथ ही उस सूखे को भी खत्म कर दिया जो भारत के दिग्गज और फ्लाइंग सिक्ख मिल्खा सिंह और उड़न परी पीटी ऊषा भी नहीं कर पाई थीं। हिमा दास से पहले भारत की कोई महिला या पुरुष खिलाड़ी जूनियर या सीनियर किसी भी स्तर पर विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल नहीं जीत सका था। ग्लोबल स्तर पर हिमा दास से पहले सबसे अच्छा प्रदर्शन मिल्खा सिंह, पीटी ऊषा और लांगजम्पर अंजू बाबी जार्ज का रहा था।
पीटी ऊषा ने जहां 1984 ओलम्पिक में 400 मीटर हर्डल रेस में चौथा स्थान हासिल किया था वहीं मिल्खा सिंह ने 1960 रोम ओलम्पिक में 400 मीटर रेस में चौथे स्थान पर रहे थे। इन दोनों के अलावा जेवलिन थ्रोवर नीरज चोपड़ा ने 2016 में अंडर 20 वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड जीता था वहीं सीमा पूनिया ने साल 2002 में इसी चैम्पियनशिप में ब्रांज और साल 2014 में नवजीत कौर ने भी ब्रांज मेडल जीता था। लांगजम्पर अंजू बाबी जार्ज ने 2004 में विश्व एथलेटिक्स स्पर्धा में कांस्य पदक जीता था।  इसके अलावा कोई भी खिलाड़ी ट्रैक एण्ड फील्ड स्पर्धा में मेडल के करीब नहीं पहुंचा है।
नौ जनवरी, 2000 को असम के नौगांव जिले के कांदुलिमारी गांव में पैदा हुईं हिमा दास 400 मीटर में सबसे तेज दौड़ने वाली भारतीय महिला एथलीट हैं। हिमा ने गोल्ड कोस्ट में राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 51.32 सेकेण्ड में अपनी रेस पूरी की थी। वह गोल्ड मेडल जीतने वाली एमांट्ल मोंटशो से सिर्फ 1.17 सेकेण्ड ही पीछे रही थी। 21वीं सदी में पैदा हुई 18 वर्षीय धावक हिमा दास ने घरेलू स्तर पर हुए फेडरेशन कप में शानदार प्रदर्शन करके गोल्ड कोस्ट का टिकट कटवाया था। हिमा गोल्ड कोस्ट में भारत के लिए चार गुणा चार सौ मीटर रेस में भी दौड़ी थीं जहां उन्होंने 33.61 सेकेण्ड का समय निकाला था। हिमा दास के पिता मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं। उनके क्षेत्र में खेलों को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती, इसके अलावा उधर ट्रेनिंग की भी व्यवस्था नहीं थी। हिमा दास अपने स्कूल और खेतों में शौकिया तौर पर फुटबॉल खेला करती थीं। बाद में वह लोकल क्लब के लिए खेलने लगी जहां उन्हें पूरी उम्मीद थी कि वह भविष्य में जरूर भारत के लिए खेलेंगी। साल 2016 में उनके टीचर ने उन्हें समझाया कि फुटबॉल में करियर बनाना कठिन है इसलिए उन्हें किसी व्यक्तिगत इवेंट में ट्राई करना चाहिये। उसके कुछ ही महीने बाद हिमा ने साधारण खेत में ही स्प्रिंट की ट्रेनिंग शुरू कर दी और गुहावाटी में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में 100 मीटर रेस में भाग लिया। हिमा को इस इवेंट में कांस्य पदक मिला लेकिन इसके बाद उन्हें अपने करियर में सही दिशा मिल गई।
हिमा जब जूनियर स्तर पर असम के लिए नेशनल चैम्पियनशिप में भाग लेने कोयम्बटूर गई थीं तब ये बात सरकार को भी नहीं पता थी लेकिन हिमा ने फाइनल में जगह बनाकर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। हालांकि हिमा दास मेडल नहीं जीत पाने की वजह से निराशा में ये खेल छोड़ना चाहती थीं लेकिन उनके कोच निपोन दास ने उनके परिवार के अलावा हिमा को खेलने के लिए राजी किया। जिसके बाद हिमा के कोच उसे गुवाहाटी ले आये। निपोन दास ने हिमा को ट्रेनिंग देनी शुरू की और वह बहुत जल्द ही बेहतरीन स्पीड पकड़ने में सफल हो गई। आज वह अण्डर-20 आयु वर्ग में विश्व चैम्पियन एथलीट है।