Tuesday, 21 March 2017


योगी की टीम से चेतन चौहान और मोहसिन रजा लगाएंगे चौके-छक्के

क्रिकेटर मोहसिन रजा नहीं हैं किसी सदन के सदस्य, राजनीति में तेली का काम तमोली से कराने का चलन                              
                                  श्रीप्रकाश शुक्ला
मथुरा। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की बागडोर सम्हाल चुके योगी आदित्यनाथ की मौजूदा मंत्रियों की टीम में दो क्रिकेटर भी शामिल हैं। अमरोहा जिले की नौगांवा सादात सीट से विधायक बने चेतन चौहान को कैबिनेट मंत्री तो मोहसिन रजा को राज्य मंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की टीम में शामिल किया गया है। योगी आदित्यनाथ की टीम में शामिल इन मंत्रियों में क्या किसी एक की खेल मंत्री के रूप में ताजपोशी होगी यह तो मंत्रिमण्डल के विभाग बंटवारे के बाद ही पता चलेगा। फिलहाल उत्तर प्रदेश के खिलाड़ी और खेलप्रेमी चाहते हैं कि इनमें से ही किसी एक को खेल मंत्री पद से नवाजा जाए।
भारतीय टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज रहे चेतन चौहान अमरोहा से दो बार सांसद रह चुके हैं। इस बार उन्होंने अमरोहा जिले की नौगांवा सादात सीट पर भगवा फहराया है। चेतन चौहान को केन्द्र सरकार ने निफ्ट के चेयरमैन का पद प्रदान किया था। वे गजरौला इंडस्ट्रियल एसोसियेशन की अध्यक्ष हैं तथा यहां उनकी एक पेपर मिल भी है। दूसरी तरफ मूलतः उन्नाव निवासी और लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बना चुके क्रिकेटर मोहसिन रजा अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए कमल दल ने तुनकमिजाज मोहसिन रजा को राज्य मंत्री बनाया है। मोहसिन रजा बतौर क्रिकेटर रणजी ट्रॉफी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। मोहसिन रजा ने 2013 में भाजपा का दामन थामा था लेकिन अब तक कोई चुनाव नहीं लड़े जबकि अब उन्हें कैबिनेट में शामिल किया गया है लिहाजा उन्हें छह माह के भीतर किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर जीत दर्ज करनी होगी।
मोहसिन रजा का परिवार कांग्रेस से जुड़ा रहा है। वे उन्नाव के जमींदार परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। मोहसिन ने अपना राजनीतिक करियर कांग्रेस से ही शुरू किया था। वे 1999 में कांग्रेस स्पोर्ट्स सेल में रह चुके हैं। मोहसिन के भाई अर्शी रजा अब भी कांग्रेस में हैं। दोनों भाई दो विचारधारा की पार्टियों में होने के बावजूद एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। सियासत उनके रिश्तों में कभी बाधा नहीं बनी। मोहसिन का निकाह पूर्व भाजपा नेता और वर्तमान में मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला की नातिन से हुआ है। मोहसिन अभिनय के क्षेत्र में भी किस्मत आजमा चुके हैं। वे दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक नीम का पेड़ में काम कर चुके हैं और उन्हें 1995 में प्रिंस ऑफ लखनऊ चुना गया था।
उत्तर प्रदेश में खेलों की खस्ताहाल स्थिति को देखते हुए प्रदेश के खिलाड़ियों और खेलप्रेमियों को भरोसा है कि योगी आदित्यनाथ चेतन चौहान तथा मोहसिन रजा में से किसी एक को खेल मंत्री पद से नवाज कर एक नजीर स्थापित कर सकते हैं। देखा जाए तो केन्द्र सरकार में भी ओलम्पिक पदकधारी राज्यवर्धन सिंह राठौर बतौर मंत्री नरेन्द्र मोदी की टीम में शामिल हैं लेकिन खेल मंत्री का दायित्व दिल्ली के विजय गोयल सम्हाल रहे हैं। दरअसल यह देश की विडम्बना ही है कि अधिकांश खेल महासंघों में राजनीतिज्ञों की पैठ होने के चलते आज तक किसी राज्य का खेल मंत्री किसी खिलाड़ी को नहीं बनाया गया है।

आजादी के बाद से ही कई खिलाड़ियों ने संन्यास के बाद राजनीति को तरजीह दी है। चुनाव लड़े और जीते भी लेकिन किसी को आज तक खेल मंत्री पद से नहीं नवाजा गया। हाल ही पंजाब के चुनावों में भी कांग्रेस से नवजोत सिंह सिद्धू जीतकर आए हैं, उन्हें उप-मुख्यमंत्री पद से नवाजा गया है। देखा जाए तो राजनीति में तेली का काम तमोली से कराने के चलते ही आज तक किसी भी खिलाड़ी को खेलों की सेहत सुधारने की जवाबदेही नहीं सौंपी गई है। दरअसल राजनीतिज्ञ खेलों को अपनी आरामतलबी का जरिया मानते हैं, ऐसे में वे नहीं चाहते कि किसी खिलाड़ी को खेल मंत्री की बागडोर सौंपी जाए और खेलों में पारदर्शिता आए। खिलाड़ी को खेलों की बागडोर सौंपने से खिलाड़ियों का ही भला होगा लेकिन राजनीतिज्ञ कभी नहीं चाहेंगे कि खेलों की त्रिवेणी में खिलाड़ी डुबकी लगाएं। तो क्या योगी राज में भी खेलों की शुचिता का ही चीरहरण होगा और चेतन चौहान तथा मोहसिन रजा हाथ मलेंगे?     

योगी को चुनौतियों का ताज

श्रीप्रकाश शुक्ला
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित और अकल्पनीय विजय पताका फहराने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने देश की आवाम को यह संदेश दिया है कि वह सही मायने में कांग्रेस का विकल्प बन चुकी है। आज भारतीय जनता पार्टी शिखर पर आरूढ़ है, सो उस पर सवा अरब की जनाकांक्षा का भारी बोझ भी है। सबका साथ, सबका विकास कहने में बेशक सरल बात लगती हो लेकिन उस पर अमल और उसे सही चरितार्थ कर दिखाना बेहद मुश्किल काम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश की सल्तनत के सरताज योगी आदित्यनाथ को भी पता है कि सत्ता हासिल करने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण प्रजा का पालन है। योगी आदित्यनाथ की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद भारतीय जनता पार्टी की रीति-नीति को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। यह सच है कि योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व के अलम्बरदार हैं लेकिन उनके कामकाज को देखे बिना जो अनर्गल प्रलाप हो रहा है उसे मिथ्या ही कहा जाएगा। योगी आदित्यनाथ को चुनौतियों का जो ताज मिला है, उसके साथ वह न्याय कर पाएंगे इसमें संदेह करना जल्दबाजी होगी।  
भारतीय जनता पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की कमान सौंपकर यदि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों का आधार तैयार करने की पहल की है तो आखिर उसमें गलत क्या है। जनादेश पा लेने के बाद किसी भी दल और उसके विधायकों को यह अधिकार है कि वे जिसे चाहें अपना मुख्यमंत्री चुनें, बशर्ते कि वह संवैधानिक अर्हताएं पूरी करता हो। 45 साल की आयु में ही संसद का अच्छा खासा अनुभव रखने वाले योगी आदित्यनाथ सभी अर्हताएं पूरी भी करते हैं। योगी के नाम पर हाय-तौबा मचाने वालों को कम से कम इस बात का इल्म तो होना ही चाहिए कि इससे पहले अन्य प्रदेशों में जिन काठ के उल्लुओं ने राज किया उनसे वह लाख गुना अच्छे हैं। हिन्दुत्व का पहरुआ होना बुरी बात नहीं है। चौतरफा चुनौतियों से घिरे उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्यों की श्रेणी से बाहर निकाल कर विकास के मार्ग पर लाने की जो चुनौती योगी आदित्यनाथ के सामने है, इसमें वह अवश्य ही सफल साबित होंगे। जरूरी प्रशासनिक अनुभव की जहां तक बात है, इसे कोई पेट से सीखकर नहीं आता। 2012 में जब अखिलेश यादव सूबे के सरदार बने थे तब उनके पास भी अनुभव की खासी कमी थी।
योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के साथ ही भाजपा की नेक-नीयत पर अनगिनत सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि आलाकमान ने बिना सोचे-समझे ही देश के सबसे बड़े राज्य के नेतृत्व का फैसला नहीं किया है। राम मंदिर, समान नागरिक आचार संहिता और धारा 370 सरीखे परम्परागत मुद्दों का सुफल कमल दल को पता है। सही मायने में भाजपा इन्हीं मुद्दों से उत्तर प्रदेश के चुनावी रंगमंच में वोटों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में सफल हुई और उसके परिणाम उम्मीदों से भी कहीं बेहतर निकले। पहला संकेत तो किसी भी मुस्लिम को टिकट न दिये जाने से ही चला गया था, बाकी कसर कब्रिस्तान-श्मशान, ईद-दीपावली जैसे जुमलों ने पूरी कर दी। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि योगी आदित्यनाथ की पहचान एक भाजपा सांसद से ज्यादा हिन्दुत्व के मुखर प्रवक्ता की रही है। हिन्दू राष्ट्र, गौरक्षा और लव जेहाद उनके ब्रह्मास्त्र हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी का राजनीतिक संदेश दूर तक जायेगा। योगी राजपूत समुदाय से हैं। इसलिए जातीय पहचान की जंग में जकड़ी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के खातिर ही भाजपा ने पिछड़े वर्ग से केशव प्रसाद मौर्य और ब्राह्मण समुदाय से दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाया है। भारतीय जनता पार्टी मुस्लिमों की दुश्मन नहीं है, इसका संकेत पार्टी ने मुस्लिम समुदाय से मोहसिन रजा को राज्यमंत्री बनाकर दिया है। कहना नहीं होगा कि मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों के चयन में भी पार्टी ने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को ध्यान में रखा है। हां दल-बदलुओं को मंत्री बनाये जाने से जो संदेश गया है, वह दरअसल भारतीय जनता पार्टी की अलग तरह की राजनीतिक संस्कृति के वाहक होने के दावों पर अनुत्तरित सवाल जरूर है।
उत्तरप्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को चुनकर भाजपा ने अपनी मंशा और रणनीति दोनों स्पष्ट कर दी है। अब ध्रुवीकरण, तुष्टिकरण, बहुसंख्यकों का हित, अल्पसंख्यकों की सुध जैसे राजनीतिक लाग-लपेट की कोई आवश्यकता नहीं। जो है, सबके सामने है। योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से पांच बार लगातार सांसद रह चुके हैं, इससे जनता के बीच उनकी पकड़ का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। योगी आदित्यनाथ की सिर्फ गोरखपुर ही नहीं बल्कि समूचे पूर्वांचल में धाक है। सच कहें तो जिसे हिन्दुत्व का जरा भी भान है, वह योगी का मुरीद है। योगी की छवि आक्रामक तेवर वाले हिन्दुत्व के पुरोधा की रही है, जो धर्म और राजनीति को अलग नहीं समझता। योगी आदित्यनाथ राम मंदिर बनाने के प्रबल समर्थक रहे हैं। उम्मीद है कि सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी पर आसीन होकर वह धर्म की राजनीति पर जोर देने की बजाय ऐसा माहौल बनाएंगे कि जनता के हर तबके को सुरक्षा का अहसास हो, धर्म अथवा जाति के कारण किसी मन में असुरक्षा का बोध नहीं हो। भारतीय जनता पार्टी की जहां तक बात है उसने जब से सत्ता में वापसी की है, तभी से उसने सिर्फ और सिर्फ विकास के दावे पर ही जोर दिया है। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले ही उसने साफ कर दिया था कि सत्ता में आने के बाद वह प्रदेश के विकास के साथ-साथ कानून-व्यवस्था, महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल, किसानों की स्थिति सुधारने की पुरजोर कोशिश करेगी।
यह सौ फीसदी सच है कि उत्तर प्रदेश में संवैधानिक तौर पर अब योगी आदित्यनाथ ही सर्वोपरि हैं। योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से नवाज कर भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी साधने का काम दिया है। योगी आदित्यनाथ गेरुवा वस्त्रधारी हैं। उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भर में इनकी छवि हिन्दुत्ववादी है। हमेशा अपने बयानों से पार्टी को असहज करने वाले योगी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सबको साथ लेकर चलने की है। योगी पर हमेशा से यह आरोप लगते रहे हैं कि वह राजनीति और धर्म को मिलाकर चलते हैं। वह अकसर अपने भाषणों में कहते भी रहे हैं कि बिना धर्म के राजनीति नहीं हो सकती। राजनीति धर्म का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। अब वह देश के सबसे बड़े राज्य के मुखिया हैं ऐसे में उनकी सबसे बड़ी चुनौती राज्य के अल्पसंख्यक वर्ग में समाये डर को दूर भगाकर उनके विश्वास को जीतना है। योगी को अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के साथ ही विरासत में मिली लचर कानून व्यवस्था की स्थिति को भी हर हाल में सुधारना होगा।
देखा जाए तो मानवाधिकार जैसा शब्द उत्तर प्रदेश पुलिस की शब्दावली में नहीं होने से वह हमेशा निरंकुश काम करती रही है। पुलिस प्रशासन में पारदर्शिता एक बड़ी समस्या है। यहां की पुलिस व्यवस्था का राजनेताओं से करीबी और सत्ताधारी दल के प्रति ज्यादा झुकाव हमेशा से ही जनता के लिए मुसीबत रहा है। बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश पुलिस की साख को समय रहते सुधारना होगा। योगी के सामने महिलाओं की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती होगी। उन पर यह दबाव होगा कि वह कैसे गुजरात, महाराष्ट्र की तरह ऐसा माहौल बनाएं कि राज्य की महिलाएं दिन-रात बेखौफ अपने घर से निकल सकें। उत्तर प्रदेश हमेशा से ही जातिगत राजनीति का गढ़ रहा है। यहां जाति आधारित राजनीति के वर्चस्व की वजह से विकास की राजनीति हमेशा निचले पायदान पर रही है। राजनीतिक तौर पर विकसित राज्य होने के बावजूद उत्तर प्रदेश विकास के मामले में अभी तक बीमारू राज्यों की श्रेणी में ही है। योगी आदित्यनाथ साइंस के छात्र रहे हैं, उनसे राज्य की जनता को अपेक्षा होगी कि वह प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकाल कर यहां के युवाओं को रोजगार मुहैया कराएं ताकि उनका पलायन रोका जा सके। योगी आदित्यनाथ पर प्रदेश के चहुंमुखी विकास की भी चुनौती होगी। सपा सरकार में क्षेत्र विशेष का विकास ही चर्चा में रहा है। उम्मीद है कि योगी सम्पूर्ण प्रदेश के विकास को अमलीजामा पहनाएंगे और हर हाथ को काम मिलेगा।

उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार में यह आरोप लगते रहे हैं कि पुलिस से लेकर हर विभाग की नौकरी में लिस्ट पहले से ही तैयार हो जाती थी। यहां तक कि उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की नौकरियों में भी पारदर्शिता पर सवाल उठे। आयोग के चयन को कोर्ट में चुनौती दी गई तथा लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष को कोर्ट के आदेश के बाद हटाया गया। अखिलेश यादव सरकार की पराजय का यह सबसे अहम कारण रहा है। अब योगी आदित्यनाथ के सामने युवाओं को लेकर कुछ ऐसे कदम उठाने की चुनौती है जिससे जाति के आधार पर नौकरियों में दी जा रही अवैध और असंवैधानिक प्राथमिकताओं पर रोक लगे तथा युवा सरकारी नौकरियों में चयन को लेकर किसी प्रकार से आशंकित न हों। योगी के सामने प्रदेश के धरती पुत्रों की माली हालत सुधारने के साथ ही 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में पार्टी को प्रचंड जीत दिलाने का जिम्मा भी होगा। समय कम है लिहाजा अल्पसमय में ही योगी आदित्यनाथ को ऐसे काम करने होंगे जिनसे राज्य के अल्पसंख्यक से लेकर बहुसंख्यक समुदाय तक को लगे कि भाजपा सिर्फ राम मंदिर निर्माण की ही पक्षधर नहीं बल्कि राम राज्य भी ला सकती है।

Saturday, 25 February 2017

आंख का अंधा नाम नयनसुख


भारतीय खेल प्राधिकरण
श्रीप्रकाश शुक्ला
आंख का अंधा नाम नयनसुख। जी हां, मुल्क में खेलों के अलम्बरदार भारतीय खेल प्राधिकरण की तथा-कथा, कामकाज का तरीका तथा सिफर परिणाममूलक उपलब्धियों पर नजर डालें तो यह कहावत पूरी तरह से सही चरितार्थ होती है। भारतीय खेल प्राधिकरण के देशभर में संचालित सेण्टर खेल प्रतिभाओं की पाठशाला नहीं बल्कि आलाधिकारियों के आरामगाह हैं। भ्रष्टाचार-कदाचार, भाई-भतीजावाद और खेल-खिलाड़ियों से खेलवाड़ के अनगिनत मामलों के बाद भी इस मूक हाथी पर कोई असर नहीं होता। यह निरंकुश गजधर आर्थिक रूप से कमजोर देश के लिए खेलों में पैसे की फिजूलखर्ची का भी जिम्मेदार है। आज हमारे प्रशिक्षक अल्पवेतन और भूखे पेट खिलाड़ी निखार रहे हैं वहीं साई की कृपा से विदेशी प्रशिक्षक अरबों रुपये पाकर भारतीय खिलाड़ियों को बिगाड़ रहे हैं। भारतीय खिलाड़ियों में डोपिंग का डंक लगना विदेशी प्रशिक्षकों की ही नापाक कारगुजारी है। हाल ही कुछ खिलाड़ियों ने भारतीय खेल प्राधिकरण पर जो आरोप लगाए हैं उन्हें मिथ्या नहीं कहा जा सकता।
खेलों के खैरख्वाह भारतीय खेल प्राधिकरण की स्थापना भारत सरकार ने जनवरी, 1984 में एक पंजीकृत सोसाइटी के रूप में की थी। प्रारम्भ में इसका उद्देश्य 1982 में एशियाड के दौरान दिल्ली में निर्मित खेलकूद की बुनियादी सुविधाओं के कारगर रख-रखाव तथा उनके अधिकतम उपयोग को सुनिश्चित करना था। अब यह देश में खेलों के विस्तार तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में विशेष उपलब्धि के लिए खिलाड़ियों के प्रशिक्षण की भी नोडल एजेंसी बन गई है। खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए शीर्ष पर एक ही एजेंसी स्थापित करने के उद्देश्य से एक मई, 1987 को राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा और खेलकूद सोसाइटी (एस.एन.आई.पी.ई.एस.) का भारतीय खेल प्राधिकरण में विलय कर दिया गया। इसके बाद नेताजी सुभाष चंद बोस राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (एन.एस.एन.आई.एस.) पटियाला और बेंगलूरु, कोलकाता तथा गांधीनगर में इसके केन्द्र तथा तिरुअनंतपुरम का लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक व्यायाम शिक्षा विद्यालय भी भारतीय खेल प्राधिकरण के अंतर्गत आ गए। अब इसके छह क्षेत्रीय केन्द्र बेंगलूरु, गांधीनगर, कोलकाता, चंडीगढ़, भोपाल और इम्फाल में हैं और दो उप-केन्द्र गुवाहाटी (असम) और लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हैं। इनकी बुनियादी खेल सुविधाएँ अब सोनीपत में जुटाई जा रही हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण शिलारू (हिमाचल प्रदेश) में एक हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेण्टर भी संचालित करता है।
भारतीय खेल प्राधिकरण राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय खेल प्रतिभा (एन.एस.टी.सी.), आर्मी ब्वायज स्पोर्ट्स कम्पनी (ए.बी.एस.सी.), भारतीय खेल प्राधिकरण प्रशिक्षण केन्द्र (एस.टी.सी.) तथा विशेष क्षेत्रीय खेल (एस.ए.जी.) जैसी योजनाओं का संचालन करता है। भारतीय खेल प्राधिकरण ने विशेष प्रतिभा सम्पन्न खिलाड़ियों के लिए अपने सभी क्षेत्रीय केन्द्रों तथा राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान पटियाला में उत्कृष्टता केंद्र (सी.ओ.ई.) स्थापित किए हैं। एक नजर में देखा जाए तो इस मतवाले हाथी का काम खिलाड़ियों को उत्कृष्टता के उस पायदान तक ले जाना है, जहां से वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादरेवतन का मान बढ़ाए लेकिन अफसोस यह हाथी खिलाड़ियों की रसद खाने के साथ ही उनके अरमान चूर-चूर कर रहा है। हाल ही कई खिलाड़ियों ने साई सेण्टरों के आलाधिकारियों पर कई गम्भीर आरोप लगाए हैं। खिलाड़ियों ने यह आरोप किसी की शह पर नहीं लगाए बल्कि भारतीय खेल प्राधिकरण के सेण्टरों में हालात इससे भी ज्यादा बदतर हैं।
भारतीय खेल प्राधिकरण पर आरोप-प्रत्यारोपों की लम्बी फेहरिश्त है। इन आरोप-प्रत्यारोपों की जांच को स्वांग भी रचे जाते हैं लेकिन परिणाम हमेशा खिलाड़ियों के खिलाफ ही गए हैं। साई सेण्टरों में क्या-क्या होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। लगभग तीन साल पहले की ही बात है जब केरल के अलप्पुझा साई सेण्टर में चार खिलाड़ी बेटियों ने एक साथ जीवनलीला समाप्त करने की कोशिश की थी। भारतीय खेल प्राधिकरण के जल क्रीड़ा केन्द्र में प्रशिक्षु चार खिलाड़ियों ने सीनियरों द्वारा कथित तौर पर उत्पीड़न के चलते एक जहरीला फल (ओथालांगा) खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की जिनमें से एक अपर्णा रामचंद्रन की मौत हो गई। मृतक अपर्णा रामचंद्रन के रिश्तेदार का कहना था कि साई छात्रावास के प्रशिक्षुओं को शारीरिक यातनाएं दी जा रही थीं। यहां तक कहा गया था कि एक लड़की को दो दिन पहले कोच ने चप्पू से मारा था जिसकी वजह से वह न खड़ी हो पा रही थी और न ही बैठ पा रही थी। इस गम्भीर मामले पर तब भारतीय खेल प्राधिकरण के तत्कालीन महानिदेशक श्रीनिवास और खेलमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का दम्भ भरा था। अफसोस प्रतिभाशाली खिलाड़ी अपर्णा तो मर गई लेकिन खेलनहार अब भी जिन्दा हैं।
2012 में साई की हिटलरशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले भारतीय महिला कुश्ती प्रशिक्षक और भारतीय कुश्ती की पहचान, अर्जुन अवॉर्डी, कृपाशंकर बिशनोई को 2014 के ग्लास्गो राष्ट्रमण्डल खेलों में मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा, उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण की नादरशाही के चलते खेलगांव में प्रवेश नहीं मिला और पुलिस भी बेवजह परेशान करती रही। कृपाशंकर को खेलगांव में प्रवेश से क्यों रोका गया इसकी कोई ठोस वजह नहीं थी बावजूद इसके वे महिला पहलवानों के पास नहीं जा सके। यह सब तब हुआ जब खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की दरकार थी। कोच कृपाशंकर का दोष सिर्फ इतना था कि उन्होंने खिलाड़ियों के हक यानि डाइट की बात साई से की थी। यह मामला 2012 का है। सवाल यह उठता है कि यदि महिला कुश्ती प्रशिक्षक से कोई गिला-शिकवा थी तो उसे ग्लास्गो क्यों भेजा गया। कोच की नियुक्ति कुश्ती संघ का मामला था। इस मामले में भारतीय खेल प्राधिकरण को दखल देने का कोई अधिकार नहीं था फिर भी उसने कुश्ती प्रशिक्षक पर आपराधिक होने के आरोप लगाए। कृपाशंकर बिशनोई इससे पूर्व भी साई के षड्यंत्र का शिकार हो चुके थे। साई की बेवजह की दखलंदाजी के चलते पूर्व में कृपाशंकर को अमेरिका और इटली जाने से रोका गया था। मध्य प्रदेश ही नहीं समूचा देश इस बात को जानता है कि पहलवान और कोच कृपाशंकर बिशनोई एक भद्र शख्सियत हैं, वे किसी को बंदूक तो क्या उंगली भी नहीं दिखा सकते। कुश्ती प्रशिक्षक कृपाशंकर पर 2013 में साई की रीजनल डायरेक्टर राधिका सामंत की शह पर एक कर्मचारी ने बंदूक दिखाकर धमकाने का आरोप लगाया था, जबकि कृपाशंकर के पास कोई लाइसेंसी हथियार ही नहीं था। खैर, पुलिस जांच के बाद कृपाशंकर निर्दोष साबित हुए और खिलाड़ियों के हक की बात पुनः उठाते हुए मामला अदालत तक ले गये। इस बीच साई ने उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन भी दिए लेकिन इस पहलवान ने साफ कह दिया कि बेटियों के हक पर वह कतई डाका नहीं डालने देंगे।
18 दिसम्बर, 2015 को बॉक्सिंग के खेल में दस्तावेजों के फर्जीवाड़े का मामला उजागर होने के बाद देशभर में बड़ा विवाद खड़ा हुआ। भिवानी, हिसार और सोनीपत साई सेण्टर्स से लेकर नई दिल्ली स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के मुख्यालय और केंद्रीय खेल मंत्रालय तक खलबली मच गई। आरटीआई कार्यकर्ता चरण सिंह को सूचना के अधिकार से मिली जानकारी से, देशभर के 10 स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इण्डिया सेंटर्स के 260 महिला और पुरुष बॉक्सरों पर फर्जी स्कूल सर्टिफिकेट, बर्थ सर्टिफिकेट के सहारे पदक बटोरने और सरकारी नौकरी हासिल करने का सच उजागर हुआ, इनमें 76 हरियाणा से हैं। मामले की गम्भीरता को देखते हुए खेलमंत्री अनिल विज ने आनन-फानन में जांच के आदेश दिए तो साई ने खिलाड़ियों के प्रवेश के वक्त दस्तावेजों के वेरीफिकेशन को अनिवार्य करने का आदेश दिया। 19 दिसम्बर, 2015 को बॉक्सरों के फर्जीवाड़े मामले की सच्चाई जानने और दस्तावेजों की सत्यता पता करने के लिए खेलमंत्री अनिल विज ने जांच के आदेश दिए लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात निकला। भिवानी बोर्ड के खुलासे के बाद कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के बॉक्सरों पर तलवार लटकी है। साई के दस्तावेजों में वर्ष 2006 से 2008 के बीच प्रवेश लेने वाले खिलाड़ियों में से कई की मार्कशीट पर 8वीं और 10वीं में अलग-अलग इनरोलमेंट नम्बर हैं। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर वर्तमान में ये खिलाड़ी भारतीय रेलवे, सेना और पुलिस विभाग में बड़े पदों पर कार्यरत हैं। इन सारे हालातों को देखकर अफसोस तो होता ही है, साथ ही खिलाड़ियों एवं खेल कमेटी पर भी प्रश्नचिह्न उठते हैं।  
भारतीय खेल प्राधिकरण से इतर देश में खेलों की गंगोत्री को नापाक करने वालों की भी कमी नहीं है। समय समय पर खिलाड़ी बेटियां अपने प्रशिक्षकों पर कुदृष्टि की बातें सार्वजनिक करती रही हैं लेकिन किसी भी मामले में उन्हें इंसाफ नहीं मिला। 2008 में कबड्डी कोच जे. उदय कुमार पर महिला टीम खिलाड़ी के साथ अभद्र व्यवहार करने का आरोप लगा था। खिलाड़ी शर्मी उलाहनन ने ट्रेन यात्रा के दौरान कोच पर अभद्रता का आरोप लगाया था। जिसके बाद कोच को हटना पड़ा था, हालांकि बाद में वह दोबारा टीम में आ गए। 2009 में लंदन में टी-20 विश्व कप के समय महिला क्रिकेट टीम के मैनेजर वी. चामुंडेश्वरनाथ के खिलाफ महिला क्रिकेटरों को टीम में शामिल करने के बदले यौन शोषण का आरोप लगा था। चांमुडेश्वरनाथ उस समय आंध्र प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव थे। आंध्र प्रदेश महिला क्रिकेट टीम की कप्तान सविता कुमारी ने तो यहां तक कहा था कि चामुंडेश्वरनाथ ट्रेनिंग कैम्पों में महिला खिलाड़ियों के साथ अभ्रद व्यवहार करते थे। आखिर न्याय न मिलने से आहत चामुंडेश्वरनाथ के खिलाफ केस करने वाली पूर्व रणजी क्रिकेटर दुर्गा भवानी ने आत्महत्या कर ली थी। इसी साल राष्ट्रीय स्तर की युवा बॉक्सर एस. अमरावती ने कथित तौर पर अपने कोच ओमकार यादव के साथ झगड़े के चलते आत्महत्या का रास्ता चुना था।
जुलाई, 2010 में भारतीय हॉकी में उस समय भूचाल आ गया जब सीनियर महिला खिलाड़ी टी.एस. रंजिता ने प्रशिक्षक एम.के. कौशिक पर शारीरिक शोषण का आरोप लगाया। महिला टीम के कोच रहे कौशिक ने उस समय इस्तीफा दे दिया और बाद में आरोप से बरी हो गए। 2014 की बात है जब पांच बार की वर्ल्ड चैम्पियन मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम ने बताया था कि जब वह 18 साल की थीं, चर्च के बाहर एक रिक्शा चालक ने उनसे छेड़छाड़ की, बाद में उन्होंने उसे वहीं गिरा दिया। सितम्बर, 2014 में दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में एशियन खेलों के दो दिन पहले भारतीय जिम्नास्ट टीम विवादों के घेरे में आ गई थी। 29 वर्षीय एक महिला जिम्नास्ट ने टीम के कोच मनोज राणा और एक खिलाड़ी चंदन पाठक पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इसके बाद पुलिस ने राणा और पाठक को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार कर प्रकरण दर्ज किया था।
भारतीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कप्तान सोना चौधरी की किताब गेम इन गेम में कई सनसनीखेज और चौंकाने वाले खुलासे हुए। सोना चौधरी ने दावा किया कि महिला टीम के कोच और सेक्रेटरी खिलाड़ियों को समझौता करने के लिए मजबूर करते थे। विदेशी टूर पर कोच रात को सोने के लिए खुद का बिस्तर हमारे कमरे में लगवा देते, यदि कोई महिला खिलाड़ी इसका विरोध करती तो उसे अनहक परेशान किया जाता था। चौधरी के अनुसार राज्य की टीम हो या फिर राष्ट्रीय टीम कई लड़कियों को कई स्तर पर समझौता करने के लिए मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। हरियाणा की रहने वाली सोना चौधरी ने 1995 में राष्ट्रीय टीम में जगह बनाई थी। राइट बैक पोजीशन पर खेलने वाली सोना ने 1996-97 तक मुल्क की कप्तानी भी सम्भाली। हम दावे से कह सकते हैं कि मुल्क में खेलों का माहौल तब तक नहीं सुधरेगा जब तक कि हर साख पर उल्लू बैठे रहेंगे। सवा अरब की आबादी वाले भारत को यदि खेलों में सिरमौर बनना है तो उसे अपने सिस्टम को सुधारने के साथ ही उन भेड़ियों को दण्ड देना होगा जोकि खेलों से खेलवाड़ के दोषी हैं। अब देखना यह है कि बिल्ली के गले में घण्टी कौन बांधता है।


Monday, 6 February 2017

कला का धवल



मत कर यकीन अपने हाथों की लकीरों पर,

 नसीब उनके भी होते है जिनके हाथ नहीं होते
यह पंक्तियां कला को समर्पित धवल खत्री पर सही चरितार्थ होती हैं। जो लोग कभी उसको बेचारा कहते थे वे आज उसका सम्मान करते नहीं थकते। जिन लोगों ने कभी उसकी बनाई पेंटिंग को दोयमदर्जे का बताया वे आज अपने ड्राइंग रूम में उसकी पेंटिंग लगाने में गर्व महसूस करते हैं। जिन लोगों ने उसको लाचार बताया था, वे आज उसकी हिम्मत की दाद देते नहीं थकते। यह है कला साधक धवल खत्री का करिश्मा।
गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले युवा धवल खत्री की बनाई पेंटिंग्स की आज देश ही नहीं दुनिया भर में काफी डिमांड है। धवल मिसाल हैं उन लोगों के लिये जो किसी हादसे के बाद टूट जाते हैं। धवल खत्री ने साबित किया है कि हादसा रुकने का नाम नहीं बल्कि आगे बढ़ने का जरिया भी हो सकता है। कॉमर्स से ग्रेजुएट धवल खत्री आज एक कामयाब पेंटर हैं। उनकी इस कामयाबी के पीछे है उनका जिन्दगी जीने का नजरिया और कठिन मेहनत। जिस मुकाम पर आज वह हैं वहां तक पहुंचना आम इंसान के बस की बात नहीं। खास बात यह है कि धवल ने यह सफलता दोनों हाथों के बगैर पाई है। वह आज बड़ी कुशलता से बिना हाथों के ही काफी खूबसूरत पेंटिंग्स बनाते हैं। धवल पैदाइशी दिव्यांग नहीं थे। धवल बताते हैं कि वह सुबह का वक्त था और लोग उस समय सैर कर रहे थे। सैर करने वालों में एक डॉक्टर भी थे और जब धवल के साथ यह घटना हुई तो उनके दिल ने धड़कना बंद कर दिया, लेकिन उन डॉक्टर की मदद से धवल की धड़कनें वापस तो आ गईं परंतु उनकी हालत नाजुक थी। इसलिये उनको तुरंत पास के एक अस्पताल ले जाया गया।
इस हादसे की वजह से धवल के दोनों हाथ काफी जल चुके थे। इस कारण उनके दोनों हाथ काटने पड़े। ऐसे वक्त में उनके माता-पिता और बहन ने उनको काफी सहारा दिया और जीने की हिम्मत दी। अस्पताल में धवल करीब ढाई महीने तक रहे। इस दौरान धवल की मां उनको पेंसिल, पेन और ब्रश पकड़ने की ट्रेनिंग देती थीं और उनकी यह ट्रेनिंग अस्पताल से घर वापस आने के बाद भी जारी रही। इस तरह धीरे-धीरे धवल दोनों हाथों की मदद से पेंसिल और ब्रश पकड़ना सीख गये। यह सब सीखने में उन्हें करीब एक साल लग गया। इस कारण उनकी स्कूली पढ़ाई भी साल भर के लिए छूट गई।
साल भर बाद जब वह अपने स्कूल गये तो वहां के प्रिंसिपल ने उनको स्कूल आने से मना कर दिया। तब उन्होंने दूसरे स्कूल में दाखिला लिया और यहां पर उनके प्रिंसिपल ने उनकी पढ़ाई में काफी मदद की। धवल बताते हैं कि मैं इत्तफाक से पेंटिंग की फील्ड में आया। मैं बचपन में पेंटिंग में बहुत अच्छा नहीं था लेकिन अपने क्लास के दूसरे बच्चों से अच्छी पेंटिंग बना लेता था। धीरे-धीरे मेरी बनाई पेंटिंग कई जगह प्रदर्शित की गईं। इससे मेरा रुझान इस ओर बढ़ा। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने गंभीरता से पेंटिंग की फील्ड में आने के बारे में सोचा लेकिन उनको ऐसा कोई गुरू नहीं मिला जो उनकी कला को और निखार सकता था क्योंकि ज्यादातर लोगों का मानना था कि बिना हाथों के वह पेंटिंग नहीं कर सकते। बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना सारा ध्यान पेंटिंग सीखने में लगा दिया। इसके लिए उन्होंने अपने घर पर ही कड़ी मेहनत की और अपने अंदर पेंटिंग स्किल को निखारने का काम किया।

धवल की जिन्दगी में सबसे बड़ा बदलाव साल 2011 में तब आया जब वह पहली बार एक रियलिटी शो एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा में दिखाई दिये। यहां पर उनको टीवी पर अपना हुनर दिखाने का मौका मिला। उनके इस हुनर से काफी लोग प्रभावित हुए। तब उन्होंने तय किया कि अब पढ़ाई बहुत कर ली अब उन्हें पेंटिंग के क्षेत्र में ही अपना करियर बनाना है। इसके बाद कई दूसरे टेलीविजन शो में भी दिखाई देने लगे। इसके बाद लोग उनके काम को पहले के मुकाबले ज्यादा इज्जत की नजर से देखने लगे। इतना ही नहीं उनको देश-विदेश से पेंटिंग बनाने के लिये कई आर्डर भी मिलने लगे। धवल की पेंटिंग्स के अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और ऑस्ट्रिया भी मुरीद हैं। अपने काम को विस्तार देने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया के अलावा अपनी वेबसाइट भी बनाई है। इसके अलावा वह समय-समय पर लाइव पेंटिंग शो भी करते हैं। इस दौरान आम लोग उनका काफी सपोर्ट करते हैं। धवल अब तक तीन सौ से ज्यादा पेंटिंग बना चुके हैं। उनकी बनाई पेंटिंग की तारीफ पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर और अभिनेत्री किरण खैर जैसी शख्सियतें भी कर चुकी हैं। धवल अब अपने इस हुनर को दूसरे लोगों को भी सिखाना चाहते हैं। कुछ समय पहले तक वह काफी बच्चों को पेंटिंग की ट्रेनिंग देते थे लेकिन अब व्यस्तता के कारण कुछ ही बच्चों को अपनी कला की बारीकी सिखा पाते हैं। धवल कहते हैं कि पेंटिंग मुझे भगवान की दी हुई सौगात है और सौगात को जितना बांटो उतनी बढ़ती है। अगर इंसान दिल से किसी काम को करे तो वह उसी काम में सफलता पा सकता है। आज के दौर में काफी लोग पेंटिंग में भी अपना करियर बना रहे हैं। यह देखकर धवल को बहुत खुशी होती है कि लोगों की सोच बदली है क्योंकि पहले ज्यादातर लोग पढ़ाई-लिखाई के अलावा दूसरी चीजों की ओर ध्यान नहीं देते थे। अपने शुरुआती दौर की परेशानियों के बारे में धवल बताते हैं कि लोग पहले उन्हें लाचारी की नजर से देखते थे। जबकि धवल का मानना है कि लोगों को ऐसा करने की बजाय दिव्यांग लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए क्योंकि दिव्यांग जानते हैं कि उनमें क्या कमी है। उस कमी को बार-बार दोहराने से कोई फायदा नहीं। हालांकि आज धवल की सफलता को देखते हुए वही लोग उनको काफी सम्मान की नजर से देखते हैं। धवल चाहते हैं कि वह पेंटिंग के क्षेत्र में अपना अलग मुकाम हासिल करें जहां तक उनके जैसा कोई नहीं पहुंच पाया और भविष्य में लोग उनको एक मशहूर पेंटर के तौर पर याद करें।

महिला ब्लेड रनर बनी उम्मीद की किरण

दर्द के बाद ही खुशी मिलती हैः किरण कनौजिया
हमारा समाज बेटियों को लेकर कैसी भी सोच रखता हो लेकिन मुल्क के पास कई ऐसी जांबाज बेटियां हैं जो अपने पराक्रम से हर किन्तु-परंतु को मिथ्या साबित कर रही हैं। इन्हीं जांबाज बेटियों में एक हैं ब्लेड रनर के नाम से मशहूर हो चुकी किरण कनौजिया। एक पैर नहीं तो क्या हुआ। यह बेटी आज उन लोगों के लिए नसीहत है जोकि थोड़ी सी परेशानी में हिम्मत हार बैठते हैं।
किरण को पांच साल पहले की त्रासदीपूर्ण घटना ज्यों-की-त्यों याद हैजब डॉक्टरों ने मेरे परिजनों से कहा था कि इस बेटी की नर्व क्रैश हो गई है और टांग काटनी पड़ेगी। यह घटना 24 दिसम्बर, 2011 में शाम के वक्त हुई और 25 दिसम्बर को उसका जन्मदिन था। वह हैदराबाद से फरीदाबाद आने के लिए ट्रेन में सफर कर रही थी तभी कुछ लड़कों ने उसका सामान छीनना चाहा और खींचतान में वह ट्रेन से गिर गई और उसका पैर रेलवे ट्रैक की पटरियों में फंस गया। किरण की जान बचाने की खातिर उसका एक पैर काटना पड़ा। एक पैर कट जाने के बाद किरण निराश जरूर हुई लेकिन उसने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। पैर कटने के बाद किरण की प्रतिक्रिया थी, मुझे लगा कि जन्मदिन पर फिर नया जन्म मिला है।
हिम्मती किरण ने आर्टिफिशियल यानी कृत्रिम पैर के सहारे फिर से जिन्दगी के साथ कदम से कदम से मिलाकर चलने की कोशिश शुरू कर दी और जिन्दगी को नई दिशा देने की ठान ली। जिस लड़की को चलने में परेशानी थी उसी लड़की ने मैराथन में दौड़ना शुरू कर दिया और आज वह भारत की महिला बलेड रनर के नाम से शोहरत बटोर रही है। किरण बताती हैं कि डॉक्टर कहते थे कि मैं दौड़ नहीं पाऊंगी, जिन्दगी नॉर्मल नहीं रहेगी। सब कहते थे कि अब तो घर पर ही रहना होगा। वह कहती है कि इलाज दौरान वह ऐसे लोगों से मिली जिन लोगों की टांगें ही नहीं थीं, हाथ नहीं थे। हम सब लोगों ने मिलकर मैराथन में भाग लेने की सोची। किरण ने धीरे-धीरे दौड़ना शुरू किया। पहले पांच किलोमीटर, फिर 10 किलोमीटर दौड़ में हिस्सा लिया। किरण ने बताया कि मुझे लगा कि अगर मैं पांच या 10 किलोमीटर दौड़ सकती हूं तो इससे ज्यादा दौड़ने की चुनौती भी स्वीकार कर सकती हूँ।
आखिरकार मैंने अपने आपको हाफ मैराथन के लिए चैलेंज किया यानी 21 किलोमीटर दौड़ने का निश्चय किया। मुझे इससे कोई मतलब नहीं था कि मैं कितने समय में मैराथन खत्म करती हूं। बस मुझे रेस पूरी करनी थी। हैदराबाद हाफ मैराथन मैंने साढ़े तीन घंटे में पूरी की, दिल्ली की रेस दो घण्टे 58 मिनट में और मुंबई मैराथन दो घण्टे 44 मिनट में। किरण बताती हैं कि हर किसी का कोई न कोई प्रेरणादायी होता है। मैंने विवादों में घिरे दक्षिण अफ्रीकी धावक ऑस्कर पिस्टोरियस से प्रेरणा ली। किरण बताती हैं, आर्टिफिशियल पैर लगने से इंसान शुरू में एकदम बच्चा बन जाता है। दिमाग को शुरू में पता नहीं होता कि हमारे पास कृत्रिम पैर है। सच कहें तो कृत्रिम पैर की आदत डालने में वक्त लगता है। किरण बताती हैं कि शुरू शुरू में मुझे हमेशा डर रहता कि हम गिर जाएंगे। एक-एक कदम रखना बिल्कुल बच्चों की तरह सिखाया जाता है। यह एकदम एक नई जिन्दगी की तरह हो जाता है। किरण कहती हैं कि अब वह भूल गई हैं कि उनके पास आर्टिफिशियल पैर है क्योंकि अब दिमाग ने इसे अपना लिया है।
अपनी मुश्किलों के बारे में किरण बताती हैं कि शुरू-शुरू में दौड़ना मुश्किल था। दौड़ने के लिए एक अलग क़िस्म का ब्लेड होता है। यह ब्लेड हमें सपोर्ट देता है, शरीर को आगे की ओर धकेलने में। आगे की ओर धकेलने की वजह से हम शरीर को और उठा सकते हैं। इस सब के कारण टांग पर काफी दबाव पड़ता है और ये थोड़ा दर्दनाक होता है मगर बिना दर्द के कुछ मिलता भी नहीं है। समय के साथ-साथ हमें सब कुछ सहना पड़ता है लेकिन सच कहें तो दर्द के बाद ही खुशी भी मिलती है। अब किरण लगातार मैराथन दौड़ती हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अपने पिता और अपनी कम्पनी इंफोसिस का काफी साथ मिला। किरण बताती हैं कि कृत्रिम पैर उन्हें कम्पनी की ओर से ही मिली है।

दुर्घटना के बाद जब किरण पहली बार दफ़्तर लौटीं तो किरण के शब्दों में उनके दोस्तों की प्रतिक्रिया कुछ यूँ थी,  जब मैं ऑफिस गई तो लोगों ने कहा कि तुम तो बिल्कुल नॉर्मल लग रही हो। हमें लगा कि तुम छड़ी के सहारे गिरती-लटकती आओगी, तुम्हें देखकर हमारी इच्छाशक्ति और दृढ़ हो गई है। किरण बताती हैं कि मैं जिन्दगी में शायद भूल गई थी कि मैंने जन्म क्यों लिया है और जिन्दगी का क्या मकसद है लेकिन अब मुझे जिन्दगी जीने का जज्बा मिल गया है। मैं अपने काम के साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ कर रही हूँ। किरण से बात करने से पहले मन में कुछ झिझक थी। जिन्दगी के बुरे दौर के बारे में सवाल पूछना कभी-कभी जख्म को हरा कर देने का काम करता है। लेकिन बातचीत के क्रम में किरण ने इन सारी शंकाओं को बेबुनियाद साबित कर दिया। किरण ने एक टांग जरूर गंवाई है लेकिन जिन्दगी जीने का हौसला नहीं। अपने नाम के अनुरूप वह अपने जैसे कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी हैं जो बतौर महिला ब्लेड रनर खूब नाम कमा रही हैं।

बेटियां अपने कौशल से जीतें सबका दिलः कृष्णा पूनिया



जी.एल. बजाज में अदम्य-2017 का रंगारंग शुभारम्भ
मथुरा। लाख बंदिशों के बावजूद बेटियां अपने कौशल और कामयाबी से न केवल अपने परिवार तथा समाज का दिल जीत सकती हैं बल्कि वे किसी से कम नहीं हैं, इसका संदेश भी दे सकती हैं। एक बेटी पर दो परिवारों के सुसंस्कार की जवाबदेही होती है। किसी भी क्षेत्र को लें आज बेटियां भारत की आन-बान-शान हैं। बीते साल रियो ओलम्पिक पर सबकी नजरें थीं लेकिन पहलवान साक्षी मलिक और शटलर पी.वी. सिन्धु ने ही अपने बेमिसाल प्रदर्शन से भारत को गौरवान्वित किया। बेटियां कुछ भी कर सकती हैं, यह भरोसा उनमें होना चाहिए। उक्त उद्गार मुख्य अतिथि पद्मश्री कृष्णा पूनिया ने जनपद के प्रख्यात इंजीनियरिंग संस्थान जी.एल. बजाज में सोमवार को अदम्य-2017 के रंगारंग शुभारम्भ अवसर पर लगभग 50 से अधिक स्कूल-कालेज के खिलाड़ी छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए।
राष्ट्रमण्डल खेलों की पहली स्वर्ण पदकधारी एथलीट कृष्णा पूनिया ने अफसोस जताते हुए कहा कि हमारे देश में हर ओलम्पिक से पहले खेल और खिलाड़ियों की फिक्र की जाती है जबकि खेलों में यदि हमें अमेरिका, रूस, चीन आदि देशों की बराबरी करनी है तो इसके लिए 365 दिन मेहनत करनी होगी। मैं चाहती हूं कि जिस तरह हमारे समाज में शिक्षा को लेकर अवेयरनेस आई है उसी तरह खेलों का भी माहौल बने। आज अभिभावक खेलने की उम्र में ही अपने छोटे-छोटे बच्चों पर शिक्षा का दबाव बनाते हैं, यह उचित नहीं है। हम अपने बच्चों को खेलों की तरफ प्रेरित कर स्वस्थ भारत के संकल्प को साकार कर सकते हैं। आज खेलों में भी करियर है। यदि हर अभिभावक अपने बच्चों को प्रोत्साहित करने का संकल्प ले तो उनके बच्चे भी खेलों में मिल्खा सिंह, मैरीकाम, पी.टी. ऊषा जैसी कामयाबियां हासिल कर सकते हैं, उनसे भी आगे निकल सकते हैं। खेलों से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि मन में भी किसी प्रकार के विकार अपना स्थान नहीं बना पाते। पूनिया ने कहा कि जी.एल. बजाज ने खेलों का जो प्लेटफार्म दिया है छात्र-छात्राएं उसका अनुशासन और खेलभावना के साथ लाभ उठाएं।

खेलों के शुभारम्भ से पूर्व पद्मश्री कृष्णा पूनिया ने आर.के. एजूकेशन हब के चेयरमैन डा. रामकिशोर अग्रवाल, वाइस चेयरमैन पंकज अग्रवाल, प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल, जी.एल. बजाज कालेज के निदेशक डा. एस.आर. चौधरी, अरुण अग्रवाल आदि की मुक्तकंठ से तारीफ करते हुए कहा कि मैंने यहां खेलों का जो माहौल देखा है वह वाकई काबिलेगौर है। कृष्णा पूनिया ने कपोत और रंग-बिरंगे गुब्बारे उड़ाकर तीन दिवसीय प्रतियोगिता का शुभारम्भ किया। जी.एल. बजाज कालेज के निदेशक डा. एस.आर. चौधरी ने कृष्णा पूनिया को स्मृति स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्ति भेंट करते हुए उनका आभार माना। इस अवसर पर डीन आर्क अश्वनी शिरोमणि, अनुराग बंसल, इंजीनियर अजीत झा, विमल गुप्ता, डा. अमित पाराशर, शिवकुमार शर्मा, जीतेन्द्र सिंह, अशोक शर्मा, इंजीनियर विनीता माथुर, संजीव अग्रवाल, प्रशासनिक अधिकारी विवेक श्रीवास्तव, लव अग्रवाल, अंकित, रविन्द्र जायसवाल, खेल अधिकारी सोनू शर्मा आदि सहित लगभग 50 स्कूल-कालेजों के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन मोनिका शर्मा ने किया।

Tuesday, 24 January 2017

तेजस्वी के तेज को सलाम



पोलियोग्रस्त युवा ने जीती हारी हुई जिन्दगी
करो योग, रहो निरोग
         जिन्दगी की असली उड़ान बाकी है, जिन्दगी के कई इम्तिहान अभी बाकी हैं,
         अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीं हमनें, अभी तो सारा आसमान बाकी है।
दिल्ली निवासी युवा दिव्यांग तेजस्वी शर्मा ने अपने हौसले और जुनून से न केवल नये आयाम स्थापित किए बल्कि अपने व्यक्तित्व को एक अलग पहचान दी। तेजस्वी पुरातन भारतीय योग में माहिर हैं और वे आसानी से ऐसे कठिन से कठिन योगासन कर लेते हैं जिन्हें करना किसी के लिए भी मुश्किल है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि आज का यह युवा मात्र नौ माह की उम्र में ही पोलियो की चपेट में आ गया था तथा चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। इस स्थिति के बावजूद तेजस्वी और उनके माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने बेटे को मात्र एक वर्ष की आयु से ही योग का प्रशिक्षण दिलाना प्रारम्भ करा दिया था। कई वर्षों के अथक प्रयासों के बाद तेजस्वी ने स्वयं को योग के क्षेत्र में इतना निपुण कर लिया कि 69 प्रतिशत विकलांगता के बावजूद वे कठिन योगासनों को बड़ी सहजता के साथ कर लेते हैं। इस युवा को यूनिक वर्ल्ड रिकार्ड्स द्वारा मोस्ट फ्लेक्सिबल हैंडीकैप्ड योग चैम्पियन-2015 के खिताब से भी नवाजा जा चुका है। तेजस्वी वर्ष 2011 में दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड कप योग प्रतियोगिता में सिल्वर मैडल, वर्ष 2012 में हांगकांग में आयोजित योग प्रतियागिता में गोल्ड मैडल और 2014 में चीन में आयोजित हुई चौथी इंटरनेशनल योग चैम्पियनशिप में सिल्वर मैडल जीत चुके हैं। सच कहें तो यह अभी तेजस्वी की शुरुआत है।
दिल्ली के विश्वप्रसिद्ध जेएनयू से जर्मन भाषा में आनर्स करने वाले तेजस्वी योग के अपने सफर के बारे में बताते हैं कि मैं अभी सिर्फ नौ महीने का ही था और घुटनों के बल चलना ही सीख रहा था कि मुझे पोलियो हो गया। मेरे माता-पिता मुझे डाक्टर के पास लेकर गए जिन्होंने मेरे अपने पैरों पर खड़े होकर चलने की सम्भावनाओं से इंकार करते हुए मुझे दिल्ली किसी अच्छे अस्पताल में दिखाने की सलाह दी। मेरे पिता मुझे दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान लाए जहां मेरे पैरों का आपरेशन किया गया। आपरेशन के बाद मेरे पैरों में रक्त का संचार सुचारु बनाए रखने के लिये पिताजी ने मात्र एक साल की आयु में ही योग का प्रशिक्षण दिलवाना प्रारम्भ कर दिया। बस एक बार योग सीखना प्रारम्भ करने के बाद सारी चीजें मेरे पक्ष में होनी शुरू हो गईं और बहुत छोटी उम्र में योगासनों का अभ्यास प्रारम्भ करने के चलते मेरा शरीर बहुत लचीला होता गया। तेजस्वी बताते हैं कि मात्र पांच वर्ष की आयु का होते-होते ही मैं प्रतिदिन 60 से 70 योगासनों का अभ्यास करने लगा। तेजस्वी बताते हैं कि पांच वर्ष का होने के बाद मेरे चाचाजी मुझे पढ़ाई के लिये दिल्ली ले आए और उन्होंने मेरा दाखिला नोएडा सेक्टर 82 स्थित महर्षि विद्या मंदिर में करवा दिया। इस स्कूल में दाखिला लेने के बाद मैं योग में और अधिक पारंगत होने में सफल रहा और इसके अलावा मैंने यहां ध्यान लगाना भी सीखा। इस प्रकार तेजस्वी स्कूल में दाखिला लेने के बाद स्वयं को योग के क्षेत्र में और अधिक पारंगत करने में सफल रहे और साथ ही साथ वे अपनी पढ़ाई भी करते रहे।
वैसे तो तेजस्वी योग की अपनी जानकारी के चलते स्कूल में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनके कई सहपाठी उनकी विकलांगता को लेकर लगातार उन पर तंज कसते रहते थे। उसी दौरान उनके स्कूल में एक अंतर-विद्यालय योग प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। तेजस्वी बताते हैं कि मैं पहले से ही अपना मजाक उड़ाने वाले दूसरे बच्चों को दिखाना चाहता था कि मैं क्या कर सकता हूं। मैंने अपने पीटीआई प्रवीण शर्मा की प्रेरणा से इस प्रतियोगिता में भाग लिया और अपने योगासनों के बल पर मैं इसमें प्रथम आने में सफल रहा। इसके बाद मुझे पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा और मेरा चयन पहले जनपद की टीम में हुआ और फिर वह प्रदेश स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे। तेजस्वी बताते हैं कि योग प्रतियोगिताओं में निःशक्त की कोई श्रेणी नहीं होती है लिहाजा मुझे सामान्य बच्चों की तरह सबके साथ ही प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती। हालांकि यह बात मेरे पक्ष में ही रही है क्योंकि इस वजह से मुझे सामान्य लोगों से मुकाबला करना पड़ता है जिसके चलते मैं और अधिक बेहतर करने के लिये प्रेरित हुआ।
कुछ प्रतियोगिताएं जीतने के बाद मुझे महसूस हुआ कि अब उन्हें अपनी इस कला को प्रदर्शन में तब्दील कर देना चाहिये। वर्ष 2010 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय स्तर की किसी प्रतियोगिता में भाग लिया जहां पर उन्होंने आर्टिस्टिक योग का प्रदर्शन किया। तेजस्वी बताते हैं कि असल में आर्टिस्टिक योगा में प्रतिस्पर्धी को मात्र 1.5 मिनट में अपने सर्वश्रेष्ठ आसन करके दिखाने होते हैं। इसके अलावा इन आसनों का प्रदर्शन उसे संगीत के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए करना होता है। मैंने पहली बार इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिता में भाग लिया और कांस्य पदक जीतने में सफल रहा। एक बार पदक जीतने के बाद तेजस्वी को लगा कि अब उन्हें इस आर्टिस्टिक योग को अपने आने वाले दिनों के लिये अपनाना चाहिये और उन्होंने इसमें अपना सर्वस्व झोंकने का फैसला किया। तेजस्वी आगे कहते हैं कि अब मुझे लगने लगा था कि मुझ में कुछ खास है और मैंने यह तय किया कि अब इसे करियर के रूप में अपनाया जाए।
इसके बाद तेजस्वी कुमार शर्मा ने कुछ मशहूर टीवी शो में अपनी प्रतिभा दिखाने का फैसला किया और वे एंटरटेनमेंट के लिये कुछ भी करेगा और इंडियाज गाट टेलेंट जैसे प्रसिद्ध टीवी शो में प्रदर्शन करने में कामयाब रहे। दोनों ही शो में इनके प्रदर्शन को जजों और दर्शकों ने काफी सराहा और इन्हें काफी प्रसिद्धि मिली। इतने वर्षों तक विभिन्न योगासनों का अभ्यास करने के चलते उनके लिये कठिन से कठिन आसन भी बच्चों के खेल सरीखे हो गए हैं। इसके अलावा इन्होंने अपने कई नए आसनों को भी ईजाद किया है जो किसी सामान्य व्यक्ति के लिये बेहद मुश्किल तो हैं ही बल्कि कुछ को करना तो लगभग असम्भव ही है।

तेजस्वी ने वर्ष 2011 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित हुए योग वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया और आर्टिस्टिक योग का स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहे। इसके बाद इन्होंने वर्ष 2012 में हांगकांग में आयोजित हुई इंटरनेशनल योगा चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता। इसके बाद सितम्बर 2014 में इन्हें चीन के शंघाई में आयोजित हुई चौथी अंतरराष्ट्रीय योग प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला जहां वे अंतिम छह में स्थान बनाने में कामयाब रहे और आखिरकार उन्होंने यहां भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और रजत पदक जीता। योगासनों को करने की इनकी सुगमता और इनके शरीर के लचीलेपन के चलते इस युवा को अब तक दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं। तेजस्वी कहते हैं कि अगर हम अपनी योग्यता को ठीक तरीके से पहचानें और नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलें तो कोई भी मंजिल असम्भव नहीं है। मैं तो सबको यही राय देता हूं कि योग करो और निरोगी रहो। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले तेजस्वी को सिर्फ इस बात का रंज है कि सरकार ने योग को खेल का दर्जा तो दे दिया है लेकिन अभी तक इसमें विकलांग की कोई श्रेणी अलग से नहीं बनाई गई है जिसके चलते उनके जैसे कई अन्य निःशक्त प्रतिस्पर्धी इनमें भाग लेने के लिये आगे नहीं आ पाते हैं।