Friday, 26 July 2019

अब बीएसएफ के लिए पदक जीतना मेरा लक्ष्यः मनीषा


किसान पिता ने लगाए बेटियों के सपनों को पर
मनीषा और मोनिका एथलेटिक्स में करिश्मा करने को बेताब
श्रीप्रकाश शुक्ला
भारत गांवों का देश है। गांवों में खेल प्रतिभाएं भी हैं लेकिन उन्हें उचित परवरिश और सही मार्गदर्शन न मिलने से वे अपना तथा देश का सपना साकार करने से वंचित रह जाती हैं। उदीयमान डिस्कस थ्रोवर किसान की बेटी मनीषा और हैमर थ्रोवर मोनिका शर्मा इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। इन बेटियों ने गरीबी के बावजूद अपने राज्य और मुल्क को दर्जनों पदक दिलाए हैं लेकिन हरियाणा सरकार इन्हें आश्वासन के सिवाय कुछ भी नहीं दे सकी। अंतरराष्ट्रीय एथलीट मनीषा अब बी.एस.एफ. में हैं, जहां वह ओलम्पिक खेलने और अपनी यूनिट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक दिलाने का सपना देख रही हैं।
हरियाणा जिसे खेलों और खिलाड़ियों का सबसे बड़ा पैरोकार माना जाता है, वहां की राष्ट्रीय खिलाड़ी बेटियां सरकार की उपेक्षा के चलते खेतों में काम करने को मजबूर हैं। पद्मश्री कृष्णा पूनिया को अपना आदर्श मानने वाली झज्जर जिले के गांव अकेहरी मदनपुर की मनीषा कहती हैं कि सरकार की उपेक्षा से दुःखी तो हूं लेकिन हौसला नहीं हारी हूं। मनीषा के पिता श्रीभगवान शर्मा का भी सपना है कि उनकी बेटियां खेलों में देश का नाम रोशन करें। मनीषा जब 14 साल की थी तभी से वह अपने पिता की देख-रेख में डिस्कस थ्रो में अपनी किस्मत आजमा रही है। मनीषा कहती हैं कि हर खिलाड़ी की तरह मेरे भी सपने हैं जिन्हें मैं बी.एस.एफ. में रहकर पूरा करना चाहती हूं।
अब तक जीते पदक
मनीषा ने हरियाणा के लिए अब तक 68 पदक जीते हैं जिनमें 40 राज्य स्तर, 26 नेशनल स्तर तो दो इंटरनेशनल स्तर पर शामिल हैं। मनीषा ने 2013 में रांची में हुई साउथ एशियन चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता था। 18 मई, 1995 को श्रीभगवान शर्मा के घर जन्मी मनीषा स्नातक तक की तालीम हासिल कर लेने के बाद खेल के साथ ही स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी करना चाहती हैं। मनीषा की छोटी बहन मोनिका हैमर थ्रो में न केवल हाथ आजमा रही है बल्कि दो नेशनल में उसने एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है। मनीषा अपनी चार बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी है।
पिता का सपना साकार करना है
मनीषा कहती हैं कि मैं अपने प्रशिक्षक पिता की खुशी और उनके सपने को साकार करने के लिए अभी भी खेलना चाहती हूं। मेरा परिवार तंगहाली के दौर से गुजर रहा है, फिर भी पिताजी चाहते हैं कि मैं और मेरी बहनें देश के लिए खेलें और दर्जनों मेडल जीतें। बी.एस.एफ. में नौकरी न लगने से पहले मनीषा अपने पिता के साथ खेतों में काम करती थी तथा सुबह-शाम तीन-तीन घण्टे प्रैक्टिस भी करती थी ताकि परिवार को दो जून की रोटी मयस्सर हो सके। मनीषा बताती हैं कि नेशनल में मेडल जीतने पर मुझे राज्य सरकार की तरफ से कई बार सम्मानित किया गया। सम्मान से कुछ पल के लिए खुशी तो मिली लेकिन उससे पेट नहीं भरा जा सकता। भारत सरकार 2020 में होने वाले ओलम्पिक खेलों के लिए प्रतिभाएं तलाश रही है जबकि मनीषा-मोनिका जैसी प्रतिभाशाली बेटियां अपनी किस्मत पर आंसू बहा रही हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि एक मामूली किसान अपने प्रशिक्षण और जुनून से देश को सितारा खिलाड़ी दे सकता है तो हमारा खेल तंत्र उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का क्यों नहीं बना सकता।

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